कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)
Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation
स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा
स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)
पृष्ठ 48, कुल 56 में से
संदर्भ में पढ़ें४६ प्रजायामाजायते नाप्रतिरूपः ।।१४।। बालाकि बोला, "आदर्श (आईना) में दीखने वाला जो पुरुष है उसकी मैं उपासना करता हूँ।" अजातशत्रु ने कहा, इस विषय में तू मुझसे संवाद मत कर। इसको प्रतिरूप समझ कर मैं इसकी उपासना करता हूँ, इस प्रकार जो इसकी उपासना करता है उसके घर में उसी के समान रूपवाला पुत्र उत्पन्न होता है उसके समन रूप न हो ऐसा पुत्र नहीं उत्पन्न होता ।।१४।। स होवाच बालाकिर्य एवैष प्रतिश्रुत्कायाः पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मामैतस्मिन्स संवादिष्ठा द्वितीयोऽनपग इति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते विन्दते द्वितीयाद्द्वितीयवान्भवति ।।१५।। बालाकि बोला, "प्रतिध्वनि में जो पुरुष होता है उसकी मैं उपासना करता हूँ।" अजातशत्रु बोला, इस विषय में तू मुझसे संवाद मत कर। मैं इसको द्वितीय तथा कभी अलग न होने वाला ऐसा जानकर इसकी उपासना करता हूँ। जो इस प्रकार इसकी उपासना करता है। उसको द्वितीय से (पत्नी से) द्वितीय पुत्र प्राप्त होता है" ।।१५।। स होवाच बालाकिर्य एवैष शब्दः पुरुषमन्वेति तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजात शत्रुर्मामैतस्मिन्सम्वादयिष्ठा असुरिति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते नो एव स्वयं नास्य प्रजा पुराकालात्संमोहमेति ।।१६।। बालाकि बोला, मनुष्य के चलने में जो शब्द होता है, उसकी मैं उपासना करता हूँ। अजातशत्रु ने कहा इस विषय में तू मुझसे संवाद मत कर। मैं उसकी प्राण समझ कर उपासना करता हूँ—जो इस प्रकार इसकी उपासना करता है वह अथवा उसकी प्रजा योग्य समय के पहिले