कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)
Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation
स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा
स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४७ नहीं मरती ।।१६।। स होवाच बालाकिर्य एवैषछायायां पुरुषस्तमेवाह मुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मामैतस्मिन्सम्वादयिष्ठामृत्युरिति वा अहमेतुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते नो एव स्वयं नास्य प्रजा पुरा कालात्प्रमीयते ।। १७ ।। बालाकि बोला, “छाया में जो पुरुष है उसकी मैं उपासना करता हूँ।” अजातशत्रु ने कहा, इस विषय में तू मुझसे संवाद मत कर। उसको मृत्यु समझकर मैं उसकी उपासना करता हूँ। इस प्रकार जो इसकी उपासना करता है वह अथवा उसकी प्रजा योग्य समय से पहले मृत्यु को प्राप्त नहीं होती ।। १७ ।। स होवाच बालाकिर्य एवैष शारीरः पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मामैतस्मिन्सम्वादयिष्ठाः प्रजापतिरिति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते प्रजायते प्रजया पशुभिः ।। १८ ।। बालाकि बोला, “शरीर में जो पुरुष है उसकी मैं उपासना करता हूँ” अजातशत्रु ने कहा, “इस विषय में तू मुझसे संवाद न कर। उसको प्रजापति समझकर मैं उसकी उपासना करता हूँ। इस प्रकार जो उसकी उपासना करता है उसकी प्रजा और पशु वृद्धि को प्राप्त होते हैं ।। १८ ।। स होवाच बालाकिर्य एवैष प्राज्ञ आत्मा येनैतत्पुरुषप्तः स्वप्नमाचरति तमेवाहमुपास इति ।। १६ ।। बालाकि बोला, “जो प्राज्ञ आत्मा है और जिससे सोया हुआ पुरुष स्वप्न में भ्रमण करता है उस आत्मा की मैं उपासना करता हूँ”। अजातशत्रु ने कहा, “इस विषय में तू मुझसे संवाद मत कर ।। १६ ।। तं होवाचाजातशत्रुर्मामैतस्मिन्सम्वादयिष्ठा यमो राजेति वा