कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ८७ परिकिरति ॥१९॥ अभि तेऽधामित्यधस्तात् पलाश- मुपवृत्तति॥२०॥ उप तेऽधामित्युपर्युपास्यति ॥२१॥ कामं विनेष्यमाणोऽपाघेनासंख्याताः शर्कराः परिकिरन्व्रजति ॥२२॥ संमृद्वन्नपति ॥२३॥ असंमृद्वन् ॥२४॥ ईर्ष्याया भ्राजिं जनाद्विश्वजनीनात्त्वाष्ट्रेणाहमिति प्रतिजापः प्रदानाभिमर्शनानि ॥ २५ ॥ प्रथमेन वक्षणासु मन्त्रो- क्तम्॥२६॥ अग्नेरिवेति परशुफाण्टम् ॥२७॥ अवज्यामि- वेति दृष्ट्वाश्मानमादत्ते ॥ २८ ॥ द्वितीययाभिनिदधाति ॥२९॥ तृतीययाभिनिष्ठीवति ॥ ३० ॥ छायायां सज्यं करोति ॥३१॥ अयं दर्भ इत्योषधिवत् ॥३२॥ अग्ने जातानिति न वीरं जनयेत्प्रान्यानिति न विजायतेत्य- अब सपत्नी को जीतने के कर्म को कहते हैं । शरपुंख के पत्तों को शयनीय के नीचे "उपतेऽधां०" से बान्ध देवे ॥२०॥ काम विनाशन को कहते हैं ॥ काम (भोग की इच्छा) को विनाश करने की इच्छा वाला पुरुष पर पुरुष को "अप नः शोशुचत्" से असंख्य शर्करा को अभिमंत्रण करके शर्कराओं को छिटता हुआ जावे॥ शर्करा को मर्दता या न मर्दता हुआ जावे ॥२३॥२४॥ स्त्री विषय में ईर्ष्या विनाशक कर्मों को कहते हैं। ईर्ष्यालु को देख कर "ईर्ष्याया भ्राजिं०" इत्यादि का जप करे, जिसकी ईर्ष्या को वश करना हो उसको अभिमर्शन कर "जनात्" आदि दो मंत्रों का जप कर जो कुछ हो उसका अभिमंत्रण करके उसे देवे॥२५॥ "ईर्ष्या- या भ्राजिं०" इत्यादि से हृदयाग्नि को बुझावे ॥२६॥ "अग्नेरिव०" से पलाश के फाँट को उसे पिलावे ॥२७॥ "अवज्यामिव०" से पत्थर को लेवे और दूसरी ऋचा से उस पत्थर को भूमि पर धरे ॥२८॥२९॥ और तीसरी ऋचा से उसपर थूके ॥३०॥ मन्यु वाले पुरुष की छाया में धनुष को टंकोर कर अभिमंत्रण करे ॥ ३१ ॥ अब सब विषयों में मन्युविना- शक कर्मको कहते हैं ॥ कुशके जड़को ओषधिके समान खन कर सम्पातन कर अभिमंत्रण कर मन्युक को बान्धे ॥३२॥ अब अवीरजनन कर्म को कहते हैं ॥ "अग्ने जातान्" इन तीन ऋ० से खच्चर के मूत्र के