भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ८७ परिकिरति ॥१९॥ अभि तेऽधामित्यधस्तात् पलाश- मुपवृत्तति॥२०॥ उप तेऽधामित्युपर्युपास्यति ॥२१॥ कामं विनेष्यमाणोऽपाघेनासंख्याताः शर्कराः परिकिरन्व्रजति ॥२२॥ संमृद्वन्नपति ॥२३॥ असंमृद्वन् ॥२४॥ ईर्ष्याया भ्राजिं जनाद्विश्वजनीनात्त्वाष्ट्रेणाहमिति प्रतिजापः प्रदानाभिमर्शनानि ॥ २५ ॥ प्रथमेन वक्षणासु मन्त्रो- क्तम्॥२६॥ अग्नेरिवेति परशुफाण्टम् ॥२७॥ अवज्यामि- वेति दृष्ट्वाश्मानमादत्ते ॥ २८ ॥ द्वितीययाभिनिदधाति ॥२९॥ तृतीययाभिनिष्ठीवति ॥ ३० ॥ छायायां सज्यं करोति ॥३१॥ अयं दर्भ इत्योषधिवत् ॥३२॥ अग्ने जातानिति न वीरं जनयेत्प्रान्यानिति न विजायतेत्य- अब सपत्नी को जीतने के कर्म को कहते हैं । शरपुंख के पत्तों को शयनीय के नीचे "उपतेऽधां०" से बान्ध देवे ॥२०॥ काम विनाशन को कहते हैं ॥ काम (भोग की इच्छा) को विनाश करने की इच्छा वाला पुरुष पर पुरुष को "अप नः शोशुचत्" से असंख्य शर्करा को अभिमंत्रण करके शर्कराओं को छिटता हुआ जावे॥ शर्करा को मर्दता या न मर्दता हुआ जावे ॥२३॥२४॥ स्त्री विषय में ईर्ष्या विनाशक कर्मों को कहते हैं। ईर्ष्यालु को देख कर "ईर्ष्याया भ्राजिं०" इत्यादि का जप करे, जिसकी ईर्ष्या को वश करना हो उसको अभिमर्शन कर "जनात्" आदि दो मंत्रों का जप कर जो कुछ हो उसका अभिमंत्रण करके उसे देवे॥२५॥ "ईर्ष्या- या भ्राजिं०" इत्यादि से हृदयाग्नि को बुझावे ॥२६॥ "अग्नेरिव०" से पलाश के फाँट को उसे पिलावे ॥२७॥ "अवज्यामिव०" से पत्थर को लेवे और दूसरी ऋचा से उस पत्थर को भूमि पर धरे ॥२८॥२९॥ और तीसरी ऋचा से उसपर थूके ॥३०॥ मन्यु वाले पुरुष की छाया में धनुष को टंकोर कर अभिमंत्रण करे ॥ ३१ ॥ अब सब विषयों में मन्युविना- शक कर्मको कहते हैं ॥ कुशके जड़को ओषधिके समान खन कर सम्पातन कर अभिमंत्रण कर मन्युक को बान्धे ॥३२॥ अब अवीरजनन कर्म को कहते हैं ॥ "अग्ने जातान्" इन तीन ऋ० से खच्चर के मूत्र के

८८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । श्वतरीमूत्रमश्ममण्डलाभ्यां संघृष्य भक्तेऽलंकारे ॥३३॥ सीमन्तमन्वीक्षते ॥३४॥ अपि वृश्चेति जायायै जारमन्वाह ॥३५॥ क्लीबपदे बाधकं धनुर्वृश्चति ॥३६॥ आशयेऽश्मानं प्रहरति ॥३७॥ तृष्टिक इति बाणापर्णीम् ॥३८॥ आ ते दद इति मन्त्रोक्तानि संस्पृशति ॥३९॥ अपि चान्वाहापि चान्वाह ॥ ४० ॥ १२ ॥ ३६ ॥ इत्यथर्ववेदे कौशिकसूत्रे चतुर्थोध्यायः समाप्तः ॥४॥ अम्बयो यन्तीति क्षीरौदनोत्क्रुचस्तम्बपाटाविज्ञानानि साथ पत्थर को घिसकर अभिमंत्रण कर भात के साथ उसे खाने को देवे ॥ या अलंकार में देवे ॥ ३३॥ अब वन्ध्याकरण को कहते हैं । स्त्री के सीमन्त को देखे ॥ ३४ ॥ अपि वृश्च० ॥ तीन ऋ० से जाया के लिये जार को कहे ॥ ३५ ॥ “क्लीबपदे बाधकं धनुर्वृश्चति” पढकर जार के सांकेतिक स्थान में पत्थर फेके ॥३६॥३७॥ तृष्टिक०” पढ़कर शरपुंख भी वहीं फेके॥३८॥“आ ते दद् ०” मंत्रसे जार के हृदय, मुखको स्पर्श करे ॥ ३६ ॥ और उसे कहे । और उसे कहे ॥ ४० ॥ १२ ॥३६॥ यह छत्तीसवी कण्डिका पुरी हुई ॥ अथर्व वेद के कौशिक सूत्र के चौथे अध्याय का भाषानुवाद भी समाप्त हुआ ॥ ४ ॥ अब विज्ञान कर्मों के विधि को कहते हैं ॥ लाभ, हानि, जीत, हार, सुख, दुःख, उत्कर्ष, अपकर्ष, सुभिक्ष, दुर्भिक्ष, भय, अभय, रोग, आरोग्य डर है या नहीं, धन, अधन, धर्म, अधर्म, मरण, अमरण, धान्य होगा ? या नहीं । खेत होगा ? या नहीं, घर में वास होगा ? या नहीं, धान्य, पुत्र, पशु, हिरण्य, और वस्त्र । विद्या, शास्त्र आदि का लाभ होगा ? या नहीं, जीना, मरना, जाना, आना, बल, अबल । सत्, असत् के योग से रोगी का जीवन, मरण, प्रसव में पुत्र योग से पुत्र का होना, धर्म, अधर्म के योग से मित्र, अमित्र के संयोग से होना । ग्राम है या नहीं, पुरुष का विवाह है या नहीं, वर्ष भर में, मास में सुभगा या दुर्भगा होगी या नहीं, घर, ग्राम, आदि होंगे या नहीं ? आधान होगा या नहीं, इत्यादि विचार मन या वचन से भली-भाँति चिन्तन कर उस कर्म को करना चाहिये ॥ “अम्बयो यन्ति०” सूक्त से रिंधते हुए

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ८९ ॥१॥ साङ्ग्रामिकं वेदिविज्ञानम् ॥२॥ वेनस्तदिति पञ्चप- र्वेषुकुम्भकमण्डलुस्तम्भकाम्पीलशाखायुगेध्माक्षेषु पाण्यो- रेकविंशत्यां शर्करास्वीक्षते ॥३॥ कुम्भमहतेन परिवे- क्षीरौदन का अभिमंत्रण करके आसिंचन करे ॥ मन वचन से चिन्तन करे । भात पके या नहीं ? यदि यथा चिन्तित होवे—जैसे विचार से भात का पकना निश्चित है तो-तो जिस कार्य्य की सिद्धि जाननी है वह अवश्य होगा जानना ॥ इध्म का उपसमाधान कर अभिमंत्रण करके इच्छित कार्य्य की जिज्ञासा ( मनमें ) कर रज्जु को धर देवे—रज्जु यदि तीन गुण हो जावे तो सफलता होगी । इसी प्रकार दर्भ स्तम्ब को उक्त मंत्र से अभिमंत्रण कर मन से जिज्ञासा करे; तो यदि कुशों की संख्या सम या विषम होवे तो भाँति २ की प्रयोजन की सिद्धि होगी जाने । फिर पहिले दिन पाठा को अभिमंत्रण करके जिज्ञासा करे, यदि पत्रों पत्रों का संकोचन हो जावे तो प्रयोजन की सफलता समझनी ॥ १ ॥ संग्राम के पूर्व दिन वेदि बनाकर “अम्बयो यन्ति०” सूक्त से अभिमंत्रण करके मन में कार्य की सिद्धि की चिन्ता करे। यदि दूसरे दिन वेदि सम हो या विषम हो तो कार्य की सिद्धि जानो ॥ २ ॥ पांच गिरह वाला बांस के डंडे को मंत्र से अभिमंत्रण करके खड़ा कर दे । यदि अभिष्ट दिशा की ओर दण्ड गिर जावे तो सिद्धि जानो ॥ धनुष को टंकोर कर अभिमंत्रण कर जिज्ञासा करे तो—धनुष के बाण फेकने से सिद्धि जानना ॥ जल भरे घट में दूध डालकर अभिमंत्रण कर चिन्तन करे, बढ़ जाने से सिद्धि ॥ कमण्डलु में जल भर कर उसमें दूध डाल कर अभिमंत्रण करे-बढ़ जाने से सिद्धि जानो ॥ दर्भ स्तम्ब अभिमंत्रण कर जिज्ञासा करे सम विषम होने से सिद्धि ॥ काम्पील शाखा को शिर पर धारण कर अभिमंत्रण कर पूछे ( मनमें ) यदि इष्ट दिशा में गिर जावे तो सिद्धि ॥ गाड़ी के युग को अभिमंत्रण कर पूछे इष्ट दिशापतन से सिद्धि । धान्य को अभिमंत्रण कर चिन्ता करे-अग्नि में डाले—यदि प्रदक्षिण क्रम से जले तो सिद्धि ॥ दोनों हाथ की दो अङ्गुलियों को अभिमंत्रण कर चिन्ता करे, बिन जाने हुए पुरुष के हाथ में २१ शर्करा को अभिमंत्रण कर चिन्ता करे—यदि बढ़ जावे तो सिद्धि, यदि सम या विषम हो तो ठीक २ सिद्धि जानो ॥२-३॥ अब नष्ट द्रव्य १२

९० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ष्ट्वाधाय शयने विकृते सम्पातानतिनयति ॥४॥ अनती- काशमवच्छाद्यारजोवित्ते कुमार्यौ येन हरेतां ततो नष्टम् ॥५॥ एवं सीरे साक्षे ॥६॥ लोष्टानां कुमारीमाह यमि- च्छसि तमादत्स्वेति ॥७॥ आकृतिलोष्टवल्मीकौ कल्या- णम् ॥ ८ ॥ चतुष्पथाद्बहुचारिणी ॥ ९ ॥ श्मशानान्न- चिरं जीवति ॥१०॥ उदकाञ्जलिं निनयेत्याह ॥११॥ प्रा- चीनमपक्षिपन्त्यां कल्याणम् ॥१२॥१॥३७॥ जरायुज इति दुर्द्दिनमायन्प्रत्युत्तिष्ठति ॥१॥ अन्वृ- चमुदवञ्जैः॥२॥ अस्युल्मुककिष्कुरूनादाय ॥३॥ नग्नो लला- की परीक्षा करने में यह कर्म करे— "वेनस्तत्०॥ सूक्त से घड़े को अखण्ड नये वस्त्र से लपेट कर शयनी के पास धर देवे और चिन्ता करे । यदि घड़े को अत्यन्त वेष्टन होजावे तो कार्य सिद्धि ॥४॥ "वेनस्तत्०" सूक्त से अखण्ड नये वस्त्र द्वारा हलको लपेट कर धरे एवं अभिमंत्रण कर अनतीकाश को अवच्छादन कर दो कुमारी जिसके द्वारा हरण करे- उसीसे नष्ट हुआ जाने ॥ ५ ॥ अक्ष को कुम्भ की तरह करके धरे, दो कुमारी जिसके द्वारा हरण करे—उससे नष्ट जानो ॥ ६ ॥ चार मट्टी के ढेले को ग्रहण करके "वेनस्तत्०" सूक्त से अभिमंत्रण करके कुमारी को कहे कि तुम इनमें से जिसे चाहो लेलो ॥ यदि दोनों ग्रहण कर लेवे तो अभीष्ट सिद्धि जानो ॥ ७ ॥ आकृतिलोष्ट, दीमक, चतुष्पथ, मरघट इन चार ढेलों में से यदि कुमारी पहिले दो ढेलों को ग्रहण करे तो जानना कल्याण है । चौराही के ढेला लेने से व्यभिचारिणी होगी, मरघट के ढेले लेने से अल्पायु होगी ॥ ८ ॥ ६ ॥ १० ॥ यह कुमारी विज्ञान हुआ ॥ कुमारी से कहे कि पूर्व दिशा में अंजलि में जल लेकर के फेको तो अभिप्रेत फल होगा ॥ ११ ॥ १२ ॥ १ ॥ ३७ ॥ यह सैंतीसवीं कंडिका समाप्त हुई ॥ ३७ ॥ अब नैमित्तिक कर्म्मों को कहते हैं । अब दुर्द्दिन के विनाश करने के कर्मों को कहेंगे । दुर्द्दिन के सम्मुख—"जरायुज०" सूक्त का जप कर उपस्थान करे ॥१॥ और प्रत्येक ऋचा से जल देवे ॥२॥ तलवार लेकर

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ९१ टमुन्मृजानः॥४॥ उत्साद्य बाह्यतोऽङ्गारकपाले शिग्रुशर्क- रा जुहोति ॥५॥ केराकाँवादधाति ॥६॥ वर्षपरोतः प्रति- लोमकर्षितस्त्रिः परिक्रम्य खदायामर्के क्षिप्रं संवपति ॥७॥ नमस्ते अस्तु यस्ते पृथु स्तनयित्नुरित्यशनियुक्तमपादाय ॥८॥ प्रथमस्य सोमदर्भकेशानीकुष्ठलाक्षामञ्जिष्ठीबद- रिहरिद्रं भूर्जशकलेन परिवेष्ट्य मन्थशिरस्युर्वरामध्ये निखनति ॥ ९ ॥ दधि नवेनाश्नात्या संहरणात् ॥ १० ॥ आशापालीयं तृतीयावर्जं दृंहणानि ॥ ११ ॥ भौमस्य सम्मुख हो सूक्त का जप करता हुआ पूर्ववत् उपस्थान करे । उल्मुक को ग्रहण कर सूर्य्य भगवान् के सम्मुख होकर पूर्ववत् उपस्थान करे । और लकुट ग्रहण करके पूर्ववत् उपस्थान करे ॥३॥ नंगा होकर ललाट को मर्द्दन करता हुआ पूर्ववत् उपस्थान करे ॥४॥ घर के छप्पर के ओलती उजार कर घर के बाहर कपाल में आग के अङ्गारों को धर कर शिग्रु- पत्रों की आहुति देवे या शर्करा की आहुति करे ॥५॥ पटेरक समिध और अकवौन की समिधाओं का आधान करे ॥६॥ वृष्टि के कारण अति पीड़ित होकर खदा खन कर इसकी तीन बार परिक्रमा करके खदा में अर्कवृक्ष को शीघ्रही संवपन करे । ( अर्क वृक्ष को निलुंचन कर सारे सूक्त का जप करे सूक्त के अन्त में डाले । तब धूलि से खदा को भर देवे ) वृष्टि निवारण समाप्त । और ॥७॥ “नमस्ते अस्तु०” सूक्त से अशनि ( वर्षा होते समय बिजुली, पत्थर, उल्का का पात होता है। इसे वृक्ष पर या भूमि पर पत्थर आदि पड़ा हो, या बिजुली से नष्ट काष्ठ में से ) युक्त मट्टी आदि को लेकर सोम, दर्भ, केश, कुष्ठ, लाक्षा, मंजीठ, बैर, हरिद्रा इनको भोजपत्र में लपेट कर उसके नीचे छिद्र करके अभिमं- त्रण कर सस्य ( खेत में ) गाड़ देवे । यह कर्म्म चैत्र में करे । इससे अशनि से रक्षा होती है ॥८॥९॥ दही, मक्खन और नया धान्य न खावे जब तक खेत से अन्न तय्यार होकर घर न आवे ॥१०॥ अतिवृष्टि, अनावृष्टि, कीड़े ( शलभा ), चूहा, शुक, स्वचक्र या परचक्र इन सात को “ईति” ( ईतयः ) कहते हैं । “आशान|माशापालेभ्यः०” इस सूक्त के तीसरे मंत्र को छोड़ कर दृंहण ( दृढीकरण ) कर्म कहे गये ॥११॥ और

९२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । दृतिकर्माणि॥१२॥पुरोडाशानङ्गोत्तरानन्तः स्रक्तिषु निद्- धाति ॥१३॥ उभयान् सम्पातवतः ॥१४॥ सभाभागधा- नेषु च ॥ १५ ॥ असंन्तापे ज्योतिरायतनस्यैकतोऽन्यं शयानो भौमं जपति ॥ १६॥ इयं वीरुदिति मधुघं खाद- न्नपराजितात्परिषदमाव्रजति ॥१७॥ नेच्छत्रुरिति पाटामूलं प्रतिप्राशितम् ॥१८॥ अन्वाह ॥१९॥ बध्नाति ॥२०॥ मालां सप्तपलाशीं धारयति ॥२१॥ ये भक्षयन्त इति परिषेकेक- भक्तमन्वीक्षमाणो भुङ्क्ते ॥२२॥ ब्रह्म जज्ञानमित्यध्या- ज्योतिरायतन का भौम सम्बन्ध होने से दृति कर्म कहे जाते हैं ॥१२॥ चार पुरोडाशों को घर के भीतर कोणों में एक २ कर पत्थर पर धरे और पुरोडाश एवं पत्थर को सम्पात वाला करके निखनन पूर्व की भाँति जानो । सभा और महाधन गृह के कोणों में सू० ११ से १६ सू० तक दृंहण और दृति कर्म कहे गये ॥१३॥१४॥१५॥ एकाग्नि के आयतन का असंताप युक्त देश में अन्य पुरुष पत्थर पर नीचा मुख हुआ भौम सूक्त का जप करे। और दूसरी ओर सोता हुआ भौम सूक्त का ही दूसरा जप करे ॥१६॥ और “इयं वीरुत्०” से जेठी मधु खाता हुआ जन समूह बगल में पर्य्यावर्त्त कर पश्चिम से आवे ॥१७॥ सभा जीतने का कर्म्म समाप्त हुआ । “नेच्छत्रुः०” को पश्चिम से जपता हुआ पाटामूल को प्राशित करता हुआ सभा में आवे ॥१८॥ पाटामूल को मुँह में डाल कर मंत्र जपे ॥१९॥ पाटामूल को बांधे ॥२०॥ पाटा के फूलों की माला को अभिमंत्रण करके धारण कर शिर पर धारण करे । पाटालासी सात पत्ते की माला बना कर पहिने ॥२१॥ अब वृष्टि निवारण भक्ष-भोजन कर्म्म को कहते हैं। “ये भक्षयन्तः०” सूक्त से भात (शाकादि) को अभिमंत्रण करके भात को देखता हुआ खावे ॥२२॥ यह कर्म्म समाप्त हुआ । “ब्रह्म जज्ञानम्०” सूक्त से प्रथम काण्डादि सहित सूक्त को या वेद को या अनुवाक या कल्प या ब्राह्मण इनको अध्ययन करने की इच्छा करे तब २ सूक्त का जप करके अध्ययन करे । कलह शमन समाप्त हुआ । विवाद में जय के लिये सूक्त का जप करे । “ब्रह्म जज्ञानम्०” सूक्त का जप करके मीमांसा, व्याकरणादि शास्त्र वाद को करे । तब

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ९३ यानुपाकरिष्यन्नभिष्याहारयति ॥२३॥ प्राशमारुक्ष्यास्यन् ॥२४ ॥ ब्रह्मोद्यं वदिष्यन् ॥ २५ ॥ ममाग्ने वर्च इति विमुडुक्ष्यमाणः प्रमत्तरज्जुं बध्नाति ॥२६॥ सभा च मेति भक्षयति ॥२७॥ स्थूणे गृह्णात्युपतिष्ठते ॥२८॥ यद्व- दामीति मन्त्रोक्तम् ॥२९॥ अहमस्मीत्यपराजितात्परिष- दमाव्रजति ॥३०॥२॥३८॥ दूष्या दूषिरसीति स्रक्त्यं बध्नाति ॥१॥ पुरस्तादग्नेः पिशङ्गं गां कारयति ॥२॥ पश्चादग्नेर्लोहिताजम् ॥३॥ यूषपिशितार्थम् ॥४॥ मन्त्रोक्ताः॥५॥वाशाकाम्पीलसिती- वारसदम्पुष्पा अवधाय ॥६॥ दूष्या दूषिरसि ये पुरस्तादी- शानां त्वा समं ज्योतिरृतो अस्यबन्ध

९४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । चक्ररयं प्रतिसरो यां कल्पयन्तोति महाशान्तिमावपते॥७॥ निष्ट्यवमुच्योष्णीष्यग्रतः प्रोक्षन्व्रजति ॥८॥ यतायै यतायै शान्तायै शान्तायै शान्तिवायै भद्रायै भद्रावति स्योनायै शग्मायै शिवायै सुमङ्गलि प्रजावति सुसीमेऽहं वामा- भूरिति ॥ ९ ॥ अभावादपविध्यति ॥१०॥ कृत्यामित्र- चक्षुषा समीक्षन् कृतव्यधनीत्यवलिसं कृत्यया विध्यति ॥११॥ उक्तावलेखनीम् ॥१२॥ दूष्या दूषिरसीति दर्व्या त्रिः सारूपवत्सेनापोदकेन मथितेन गुल्फान् परिषिञ्चति ॥१३ ॥ शकलेनावसिच्य यूषपिशितान्याशयति ॥१४॥ यष्टिभिश्चर्म पिनह्य प्रैषकृत्परिक्रम्य बन्धान्मुञ्चति पात्र में चिति आदि का आधान करे मंत्रोक्त क्रिया में—

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ९५ संदंशेन ॥१५॥ अन्यत्पार्श्वं संवेशयति ॥१६॥ शकले- नोक्तम् ॥१७॥ अभ्यक्तेति नवनीतेन मन्त्रोक्तम् ॥१८॥ दर्भरज्ज्वा संनह्योत्तिष्ठैवेत्युत्थापयति ॥१९॥ सव्येन दीपं दक्षिणेनोदकालाम्बवादाय वाग्यताः ॥२०॥ प्रैषकृदग्रतः ॥२१॥ अनावृतम् ॥२२॥ अगोषपदम् ॥२३॥ अनुदक- खातम् ॥२४॥ दक्षिणाप्रवणे वा स्वयंदीर्णे वा स्वकृते वेरिणेऽन्याशायां वा निदधाति ॥२५॥ अलाबुना दीप- मवसिच्य यथा सूर्य इत्यावृत्याव्रजति ॥२६॥ तिष्ठं- स्तिष्ठन्तीं महाशान्तिमुच्चैरभिनिगदति ॥२७॥ मर्माणि सम्प्रोक्षन्ते ॥२८॥ कृष्णसीरेण कर्षति ॥२९॥ अधि सीरेभ्यो दश दक्षिणा ॥३०॥ अभिचारदेशा मंत्रेषु विज्ञायन्ते तानि मर्माणि ॥३१॥३॥३९॥ यददः सम्प्रयतीरिति येनेच्छेन्नदी प्रतिपद्येतेति प्रसि- को खिलावे ॥१६॥१७॥ नवनीत से दोनों आँखों ( कृत्या की ) को आँज देवे ॥१८॥ अधोमुखी हुई कृत्या को कुश की रस्सी से बाँध देवे और प्रैषकृत् से उसे “उत्तिष्ठ०” इस आधी ऋचा से उठवावे ॥१९॥ बायें हाथ में दीप एवं दहिने हाथ से जलपूर्ण तुम्बरी लेकर उसे उठावे ॥२०॥ प्रैषकृत् से आगे २ चले॥२१॥ वृत्ति विसर्जित हो उस स्थान में जावे, जहां गौ के पैर का चिन्ह न हो ॥२२॥२३॥ बिना जल के खात हो ॥२४॥ जिस स्थान का जल दक्षिण में आकर गिरे, जिसको किसी ने खोदवाया न हो, या ऊषर भूमि में या अन्य शाला में डाल देवे ॥२६॥ कर्त्ता स्वयं खड़ा हो कृत्या को भी खड़ी कर महाशान्ति उच्च स्वर से बोले ॥२७॥ उसके मर्म स्थानों का संप्रोक्षण करे ॥२८॥ कृत्या स्थान को काले बैलों द्वारा हल से जोतवा देवे ॥२९॥ ब्राह्मण कर्त्ता को दश गौयें दक्षिणा देवे ॥३०॥ अभिचार देशों का पता मंत्रों से लगता है—वे ही मर्म हैं ॥३१॥३॥३९॥ यह उनतालीसवीं कण्डिका समाप्त हुई ॥३९॥ अब नदी के प्रवाह विधि को कहते हैं। जो चाहे कि नदी के प्रवाह

अन्वजति ॥१॥ काशादिविधुवकवेतसान्निमिनोति ॥२॥ इदं व आपइति हिरण्यमपिदधाति ॥३॥ अयं वत्स.इती- षीकाञ्जिमण्डूकं नीललोहिताभ्यां सकक्षंबद्ध्वा ॥४॥ इहे- त्थमित्यवक्या प्रच्छादयति ॥५॥ यत्रेदमिति निनयति ॥६॥ मारुतं क्षीरौदनं मारुतश्रुतं मारुतैः परिस्तीर्य मारु- तेन स्रुवेण मारुतेनाज्येन वरुणाय त्रिर्जुहोति ॥७॥ उक्त- मुपमन्थनम् ॥८॥ दधिमन्थं बलिं हृत्वा सम्प्रोक्षणीभ्यां


को अपने अनुकूल करे—अर्थात् जिस ओर होकर चाहें उस ओर प्रवाह को बहा देवे—वह “यददः संप्रयतीति०” सूक्त से अभिमंत्रण कर पूरे जल से—इष्ट देश होकर जल को सिंचन करता जावे ॥१॥ काश को अभिमंत्रण कर खात में रोपे । दिन में बालपर्णी को अभिमंत्रण करके नदी प्रवाह में रोपण करावे । पाटरक को अभिमंत्रण करके नदी मार्ग में गाड़ देवे । वेतस शाखा को अभिमंत्रण करके नदी प्रवाह में गाड़ देवे ॥२॥ “इदं व आप०” सूक्त से नदी प्रवाह में सोने को स्थापित करे ॥३॥ “अयं वत्स०” से इषीकाञ्जि ( इषिका की सी रेखा जिसके ) को नीले और लाल सूत से उसके बगल में मण्डूक को बाँध कर “इहेत्थं” सूक्त से शिपाल (सेमार) से मण्डूक को ढाँक देवे ॥४॥५॥ और “यत्रेद्” से मण्डूक पर जल को निनयन करे ॥६॥ यह इच्छा हो कि नदी का प्रवाह पूर्व को न हो तो नव प्रकार के प्रवाह में यह कर्म करे । वरुण देवता के पाकयज्ञ विधान से आज्यभागान्त तक करके “यददः संप्रयच्छतीः० सूक्त से तीन प्रकार अलग २ करके आहुति देवे । तब उत्तर तंत्र करे । काला धान्य, काली गौ के घृत, वेतसकाष्ठ की इन्धन से क्षीरौदन पका करके वेतस पत्रों से स्तरण करे, वधूक पटेरक का स्तरण करे, या इस तन्त्र में सब ही कर्म मारुत करे । उदक प्रवाह में, उदक प्रवाह भय में, नदी भय में, ग्राम में, नगर में, जहाँ उदक या नदी भय हो वहाँ सब ही जगह वारुण होम करना चाहिये । वैतसस्रुव से मारुत आज्य से वरुण देवता के लिये तीन आहुतियाँ देवे ॥७॥ वैतस का उपमंथन । दही को मह कर उसीकी बलि उपहार देवे—प्रोक्षणी से सिंचन करता हुआ जावे ॥८॥ बलिहरण करे । इसके अनन्तर “अति

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ९७ प्रसिञ्चन्व्रजति ॥६॥ पाणिना वेत्रेण वा प्रत्याहृत्योपरि निपद्यते ॥१०॥ अयं ते योनिरित्यरण्योरग्निं समारोप- यति ॥११॥ आत्मनि वा ॥१२॥ उपावरोह जातवेदः पुनर्देवो देवेभ्यो हव्यं वह प्रजानन् ॥ आनन्दिनो मोदमानाः सुवीरा इन्धीमहि त्वा शरदां शतानीत्युपावरोहयति ॥ १३ ॥ यां त्वा गन्धर्वो अखनद्वृषणस्ते खनितारो वृषा त्वमस्यो- षधे । वृषासि वृष्ण्यावति वृषणे त्वा खनामसीत्युच्छु- ष्मापरिव्याधावायसेन खनति ॥ १४ ॥ दुग्धे फाण्टाव- षिच्योपस्थ आधाय पिषति ॥ १५ ॥ मयूखे मुसले वा- सोनो यथासित इत्येकार्कसूत्रमार्कं बध्नाति ॥ १६ ॥ यावदङ्गीनमित्यसितस्कन्धमसितबालेन ॥ १७ ॥ आवृ- षायस्वेत्युभयमप्येति ॥१८॥४॥४०॥ धन्वान०” इन दो मंत्रों से मन्त्रोदक नहीं होता है। नदी प्रवाह में जल सिंचन करता हुआ जावे । नदी दूर गमन कर्म समाप्त हुआ ॥९॥ हाथ या वेत जल को मार कर उसके ऊपर जावे । “अयं ते योनिः०” आर- ण्य अग्नि को स्थापन करे या अपने शरीर ही में स्थापन करे ॥१०॥११॥ “उपावरोह जातवेदः०” इत्यादि से कार्य काल समीप आने पर उपाव- रोहण करे ॥१३॥ “यां त्वा गन्धर्वो०” इत्यादि से पुरुष के वीर्य्य को करने के लिये विधि को कहते हैं । कपिकच्छु के जड़ को औषधि की भाँति खन कर सुरवालक ओषधि की भाँति खनकर दूध में पका कर या गर्म करके उपविष्ट धेनु के बगल में धरकर दूध को अभिमंत्रण कर पिवे ॥१४॥१५॥ मयूख या मुसल पर बैठ कर “यां त्वा०” ऋचा से सुरवालक को दूध में काथ बना कर पीकर कीलक पर बैठे । कपि- कच्छु को मुसल पर बैठ कर पीवे । अब शिश्न को मोटा करने की प्रक्रिया को कहते हैं । “यथासित०” सूक्त से एक शाखावाले अर्क ( आक ) मणि को धर कर अभिमंत्रण करके अर्क सूत्रं से बान्धे । “यावदङ्गीनं०” इस ऋचा से काले मृग के चर्म मणि बनाकर काले बाल से बान्धे । “आवृषायस्व०” सूक्त से हरिण के स्कन्धचर्म का १३

९८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । समुत्पतन्तु प्र नभस्वेति वर्षकामो द्वादशरात्रमनु- शुष्येत् ॥१॥ सर्वव्रत उपश्राम्यति ॥२॥ मरुतो यजते यथा वरुणं जुहोति ॥ ३ ॥ ओषधीः सम्पातवतीः प्रवे- श्याभिन्युब्जति ॥४॥ विप्रावयेत ॥५॥ श्वशिरएटक- शिरःकेशरजरदुपानहो वंशाग्रे प्रबध्य योधयति ॥ ६ ॥ उदपात्रेण सम्पातवता सम्प्रोक्ष्यामपात्रं त्रिपादेऽश्मान- मणि बनाकर काले बाल से बान्धे । इससे वीर्य्य करण, उत्थापन (शिश्न का) स्थूल करण और रेत का नाश भी होता है ॥१६॥१७॥१८॥-४॥ ४०॥ यह चालीसवीं कण्डिका समाप्त हुई ॥४०॥ अब वृष्टि कर्म विधि को कहेंगे । वर्षा की कामनावाला पुरुष “समुत्पतन्तु प्रनभस्व०” इत्यादि सूक्त से १२ रात्रि अनुशोषण करे अर्थात् ३ दिन प्रातःकाल, ३ दिन सायंकाल इस प्रकार १२ रात्रि तक करे । तेरहवें दिन पाकयज्ञिक तन्त्रानुसार व्रतोत्थापनान्त तक करके “देवस्य त्वा सवितुः०” इत्यादि “मरुद्भ्यो जुष्टं निर्वपामि मरुद्भ्य- स्त्वा जुष्टं प्रोक्षामि०” इस यजु मंत्र से तब तक समान करे, जब तक आज्यभाग की दो आहुतियाँ करे । तब क्षीरौदन की आहुति देवे । “समुत्पतन्तु०” इत्यादि सूक्त की ५ ऋचाओं से एक आहुति करे, फिर ५ ऋचा से दूसरी, छः ऋचा से तीसरी आहुति देवे । इसके अनन्तर पार्वणादि उत्तर तन्त्र कर पाकयज्ञिक क्रिया कर आज्यभागान्त तक करके “प्रनभस्व०” से क्षीरौदन की एक आहुति करे । “न धंनस्तताप०” इस ऋचा से दूसरी आहुति “युक्ताभ्यां०” से तीसरी आहुति करे । और पार्वण आदि उत्तर तंत्र को बर्हिर्होम में “मरुतो गच्छतु हविः स्वाहा” से करे ॥ सब ही वृष्टि कर्मों में काली गौ का घृत, उसीका दूध, काला धान्य, वेत का खुवा, वेत की समिद्, वेतका इंधन करे ॥१॥ २॥ काश, दिविधुवक, वेतस, इनको इकट्ठा करके जल में पात्र को औंधे मुख कर लावे ॥ जल में उसै प्लावन करे ॥३॥४॥५॥ कुत्ते के शिर को अभिमंत्रण कर जल में विप्लावन करे । भेड़ के शिर को अभिमंत्रण करके जल में डाले । मनुष्य के केश, रज्जु, पुराने जूते बाँस के अग्रभाग में बान्धकर योधयति का जप करता हुआ ॥६॥ जल-

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ९९ मवधायाप्सु निदधाति ॥७॥ अयं ते योनिरा नो भर धीतो वेत्स्यर्थमुत्थास्यन्नुपदधीत ॥८॥जपति ॥६॥ पूर्वास्व- षाढासु गर्तं खनति ॥१०॥ उत्तरासु सञ्चिनोति ॥११॥ आदेवनं संस्तीर्य ॥१२॥ उद्भिन्दतीं सञ्जयन्तीं यथा वृक्षमशनिरिद्मुग्रायेति वासितानक्षानिवपति ॥ १३ ॥ अम्बयो यन्ति शम्भुमयोभू हिरण्यवर्णा यददः पुनन्तु मा सस्रुषीर्हिमवतः प्रस्रवन्ति वायोः पूतः पवित्रेण शं पात्र से ढालुआ करके संप्रोक्षण करके मट्टी के कच्चे पात्र में पत्थर को डाल कर सब को जल में फेक देवे ॥७॥ जमीन में गड़े हुए धन को उत्थापन करने में विघ्न की शान्ति कहेंगे । अर्थ उपार्जन के उद्योग करना चाहने वाले, द्रव्य, हाथी, घोड़ा, रत्न, सोना, धन-धान्यादि की कामना वाले, यदि वणिज आदि उद्योग करें, जो घर बनाना आरम्भ करते हैं परन्तु वह घर आदि तैयार नहीं हो पाता ; इन पूर्वोक्त सब ही कामना वाले इस कर्मको अर्थात् “अयं ते योनिरा नो भर धीती वा०” इत्यादि से हवि की आहुति करें । यथाविधि सूत्रोक्त मंत्रों का जप करें । और उपस्थान करें ॥८॥६॥ अब द्यूतजय कर्म कहते हैं । पूर्वाषाढा नक्षत्र में गर्त्त खनन करे और उत्तराषाढ़ नक्षत्र में उसे भर देवे ॥१०॥ ११॥ द्यूतशाला (जुआ खेलने का घर) को छा बनाकर “उद्भिन्दतीं यथा वृक्षमशनिरिद्मुग्राय०” से त्रयोदशी, चतुर्दशी, अमावास्या तीन तिथियों में दही, मधु से अक्षों (पासों) को या कौडियों को (खेलने की) वासित करके इन वासित पासों या कौडियों से जूआ खेले ॥१३॥ और “अम्बयो यन्ति०” इत्यादि सूक्तद्वारा अभि- वर्षण और अवसेचन करे ॥ १४ ॥ अब अर्थोपार्जन के उद्यम करने में विघ्न के शान्तिकर्म को कहते हैं । स्पष्टीकरण-उपयुक्त औषधियों को सम्पादन कर औंधे धर कर जल में विप्लावन करे ॥ कुत्ते का शिर, भेड़ का शिर, मनुष्य के केश, पुराना जूता, जलपात्र, ये अभिवर्षण कर्म होते हैं, एक २ सूक्त के ॥ कोई २ आचार्य मारुत के स्थान में मन्त्रोक्त देवता याग करे, जैसे वरुण को; ऐसा कहते हैं । औषधिहोम समान ही है, जैसे वर्षा कर्मोंका । जल घट को लाकर

१०० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । च नो मद्यश्च नोऽनडुद्ध्यस्त्वं प्रथमं मह्यमापो वैश्वानरो रश्मिभिरित्यभिवर्षणानवसेचनानाम् ॥१४॥ उत्तमेन वा- चस्पतिलिङ्गाभिरुद्यन्तमुपतिष्ठते ॥१५॥ स्नातोऽहतवस- नो निकृत्वाहतमाच्छादयति ॥१६॥ ददाति ॥ १७॥ यथा मां- समिति वननम् ॥ १८॥ वत्सं सन्धाव्य गोमूत्रेणावसिच्य त्रिः परिणीयोपचृतति ॥ १९ ॥ शिरःकर्णमभिमन्त्रयते ॥२०॥वातरंहा इति स्नातेऽश्वे सम्पातानभ्यतिनयति॥२१॥ पलाश चूर्णैषूत्तरान् ॥२२॥ आचमयति ॥२३॥ आप्लावयति ॥२४॥ चूर्णैरेव किरति ॥२५॥ त्रिरेकया चेति ॥२६॥५॥४१॥ भद्रादधीति प्रवत्स्यन्नुपदधीत ॥१॥ जपति ॥२॥ अभिमंत्रण करके तब आप्लुवन करे और अवसेचन करे ॥ विघ्नशमन काम अभिवर्षण और अवसेचन कर्म्म समाप्त हुए ॥ १४ ॥ “वैश्वानरो रश्मिभिः” इस सूक्त के “उद्देहि वाजिनं” बीस ऋचाओं से स्नान कर उगते हुए सूर्य का उपस्थान करे ( अर्थ उत्थापन कामनावाला ) ॥ १५ ॥ स्नान कर अखण्ड नये वस्त्र पहन कर नये वस्त्र को लाकर ढाक देवे और वस्त्र को देवे ॥ विद्रावणादि विषय में शान्ति करने वाला पुरुष उक्त कर्म करे ॥ विघ्नशमन कर्म समाप्त हुए ॥१६॥ १७॥ “यथामांसम्०” सूक्त से गो वत्स के मिलाप का कर्म करे ॥१८॥ बछरे को गौ के पास बान्धे और गोमूत्र से उसे अवसेचन करे । तीन बार भ्रमण कराके जल पीने को छोड़ देवे ॥ १९ ॥ एवं गौ के शिर और कानों को अभिमंत्रण करे ॥२०॥ अब अश्वशान्ति विधि को कहेंगे । घोड़े को नहाने पर “वातरंहा” मंत्र से उसपर जल गिरावे ॥२१॥ पलाश के पत्तों का चूर्ण करके जलमें मिलाकर घोड़े पर उसे ढाक देवे ॥२२॥ और घोड़े के मुख के भीतर जल देकर आचमन करावे ॥२३॥ उक्त चूर्णों को घोड़े पर छिड़के, तीन ऋ० एक और दश ऋ० से ॥२४॥ २५॥२६॥५॥४१॥ अश्वशान्ति से घोड़े तेजस्वि, निरुपद्रव, शीघ्रगामी और आरोग्य होते हैं ॥ यह एकतालिसवी कण्डिका समाप्त हुई ॥४१॥ प्रवास में धनोपार्जनार्थ जाने में चोरभय, जलभय, मार्गमें भय,

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १०१ यानं सम्प्रोक्ष्य विमोचयति ॥३॥ द्रव्यं सम्पातवदुत्थापयति ॥४॥ निर्मृज्योपयच्छति ॥५॥ उभा जिग्यथुरित्यार्द्रेपा- दाभ्यां सांमनस्यम् ॥६॥ यानेन प्रत्यञ्चौ ग्रामान्प्रति- पाय प्रयच्छति ॥७॥ आयातस् समिध आदायोर्जं बि- भ्रदित्यसङ्कल्पयन्नेत्य सकृदादधाति ॥८॥ ऋचं सामेत्य- नुप्रवचनीयस्य जुहोति ॥९॥ युक्ताभ्यां तृतीयाम् ॥१०॥ आनुमतीं चतुर्थीम् ॥११॥ समावर्तनीयसमापनीययो- इत्यादि न हों इस लिये तत्सम्बन्धि कर्मको कहेंगे ॥ “भद्राद्दधि०” से प्रवास में जाने वाला जो अर्थ की चेष्टा करना चाहता है—आहु- तियाँ देवे या मंत्रों का जप करे ॥२॥ जिस सवारी पर जावे उसका सम्प्रोक्षण करके सवारी से उतरे और घोड़े आदि को उससे छुड़ा देवे ॥३॥ वाणिज, द्रव्य, वस्त्र, घोड़ा आदि सब ही वस्तु जब बेचने को ले जावे तो यह कर्म करे ॥४॥ कीने हुए द्रव्य को भली भाँति बुझ कर लेवे ॥५॥ “उभा जिग्यथुः” इत्यादि से आगत पुरुष की प्रसन्नता, मित्र बनाने के लिये समयोचित सत्कार, हाथ, पैर धोने को जल, खाने की वस्तु, आसनादि से सत्कार करे । प्रत्येक पदार्थ के देने में उक्त मंत्र का जप कर लेवे ॥६॥ हाथी आदि सवारी को मंगाकर अभिमंत्रण करके उस सवारी पर सब ही आगतशिष्ट पुरुषों को बैठावे और आप चढ़लेवे और ग्राम से पश्चिम दिशा की ओर जावे और फिर वहाँ से वापस आवें । इसके पश्चात् भात को अभिमंत्रण करके उनके साथ ही भोजन करे या मन्थ पीवें ॥ सांमनस्य समाप्त हुआ । युद्ध में एक साथ लड़ने के लिये प्रवृत्त होने में सहागत के कर्म हुए और अन्य का साधारण हुआ ॥ पहिले पैरों को पखाड़ कर तब कर्म करे ॥७॥ यदि घर में परस्पर विरोध हो तो सांमनस्य कर्म करे । उसकी विधि-कर्त्ता वन में जाकर समिधाओं को लेकर तूष्णीं घर पर आकर “उर्जं बिभ्रत्०” इस आधी ऋचा से ( संकल्प न करके ) किसी घर या साधारण देश में एक वार आधान करे ॥८॥ वेदज्ञ का कर्म “ऋचं साम०” इत्यादि दो ऋ० से प्रत्येक ऋचा से आज्य की आहुति देवे ॥९॥ दोनों ऋ० से तीसरी आहुति करे । अनुमतये स्वाहा से चौथी आहुति करे ॥१०॥११॥ साधारण

श्रैषज्या ॥१२॥ अपो दिव्या इति पर्यवेतव्रत उदकान्ते शान्त्युदकमभिमन्त्रयते ॥१३॥ अस्तमिते समित्पाणि- रेत्य तृतीयावर्जं समिध आदधाति ॥१४॥ इदावत्सरा- येति व्रतविसर्जनमाज्यं जुहुयात् ॥१५॥ समिधोऽभ्या- दध्यात् ॥१६॥ इदावत्सराय परिवत्सराय संवत्सराय प्रतिवेदयाम एनत् । यद्धूतेषु दुरितं निजग्मिमो दुर्हार्दं तेन शमलेनाङ्ग्मः ॥ यन्मे व्रतं व्रतपते लुलोभाहोरात्रे समधातां म एनत् ॥ उद्यन्पुरस्ताद्द्वि- षगस्तु चन्द्रमाः सूर्यो रश्मिभिरभिगृणात्वेनत् ॥ यद्धूत- मतिपेदे चित्त्या मनसा हृदा । आदित्या रुद्रास्त- न्मयि वसवश्च समिन्धताम् ॥ व्रतानि व्रतपतय उपाकरो- म्यग्नये । स मे द्युम्नं बृहद्यशो दीर्घमायुः कृणोतु म इति व्रतसमापनीरादधाति ॥१७॥ त्रिरात्रमरसाशी स्नात- व्रतं चरति ॥१८॥ निर्लक्ष्म्यमिति पापलक्षणाय मुख- मुक्षत्यन्वृचं दक्षिणात्केशस्तुकात् ॥१९॥ पलाशेन फली- करणान्हुत्वा शेषं प्रध्यानायति ॥२०॥ फलीकरणतुष-

समावर्तन करने वाला ब्रह्मचारी एवं वेदार्थविज्ञ ब्रह्मचारी दोनों के लिये उपरोक्त क्रिया कर्त्तव्य है ॥ १२ ॥ “आपो हि ष्ठा०” इन ऋ० से शान्ति के जल को अभिमंत्रण करके “अपो दिव्या०” का अनुयोग करे ॥१३॥ सूर्यास्त होने पर हाथ में समिद् लेकर “अपो दिव्या०” इन दो ऋ० से “एधोऽसि०” से 'एक यों तीन समिधाओं की आहुति करे ॥ १४ ॥ “इदावत्सराय०” इत्यादि, कल्पजा से ४ आहुतियाँ देवे और समिधाओं का आधान करे ॥ १५ ॥ १६ ॥ “इदावत्सराय” इत्यादि से व्रतसमापनी, समिधाओं का आधान करे ॥ १७ ॥ तीन रात तक बिना लवण के भोजन करे ॥ १८ ॥ जो स्त्री पापलक्षणवाली होती है उसको देखने से अशुभ होता है । इसलिये उसको देखने पर “निर्लक्ष्म्यं०” सूक्त से प्रत्येक मंत्र से उसके शिर के दक्षिण भाग के

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १०३ बुसावतक्षणानि सव्यायां पादपाष्ण्र्यां निदधाति ॥२१॥ अपनॊदनापाघाभ्यामन्वीक्षं प्रतिजपति ॥२२॥ दीर्घा- युत्वायति मन्त्रोक्तं बध्नाति ॥२३॥६॥४२॥ कर्शफस्येति पिशङ्गसूत्रमरल्डुदण्डं यदाययुधम् ॥ १ ॥ फलीकरणैर्धूपयति ॥ २ ॥ अतिधन्वानीत्यवसाननिवेश- केशस्तुक से लेकर उत्तर भाग तक के पलाश के पत्र से चावल के गुण्डे से आहुति देकर शेष को वापस लावै ॥ १९ ॥ २०॥ चावलका गुण्डा, तुष, बुस, काठ का अवतक्षण सव्य पैर के पाष्र्णी में घरे और अपनॊदन “आरे असौ०” और “अप नः शोशुचदघं०” इन दो सूक्तों का जप करता हुआ पाप लक्षणा को देखे तो उसके पाप लक्षण नष्ट हो जायंगे ॥२२॥ “दीर्घायुत्वाय” मंत्र से जंगिड मणि को बान्धे तो रोग रहित होकर चिरजीवी होगा ॥२३॥६॥४२॥ यह बयालीसवीं कण्डिका समाप्त हुई ॥ ४२ ॥ अब पुनर्विघ्नशमन कर्म को कहते हैं । पिङ्गलवर्ण सूत्र में बांधकर, अरल्डुमणि को लाकर अभिमंत्रण करके बान्धे । विस्कन्ध विघ्नशमन मणिको बांधने से स्पर्धमान पुरुष की स्पर्धा को नाश करता है । वेणु दण्डादि को लाकर सूक्तोक्त मंत्रों से मार्जन करके धारण करे । चित्र दण्ड, ध्वज दण्ड, लकुट आदि दण्ड आदि सब दण्डों को सम्पादन कर सूक्त से मार्जित कर धारण करने से सर्प, श्रृङ्गि, दण्डादि विघ्न नहीं होता है ॥ आयुध (हथियार कोई) लाकर अभिमंत्रण करके सूक्त से मार्जन करके धारण करे । सब ही शस्त्रों को सम्पादन कर अभिमंत्रण करके मायादिक का माया जाल युद्ध में निवारण होता है, संग्राम में इन्द्रजाल का निवारण होता है । युद्ध में विघ्न नहीं होता है। शत्रु हव का निवारण करता है ॥ शत्रु लोग जाते हैं । स्पर्द्धमान शत्रु को जीतता है। हव की विनाश करता है ॥ १ ॥ विघ्न गृहीत पुरुष को चावल के गुण्डे से धूप करे तो शत्रु के आरम्भ कार्य सिद्ध नहीं होते ॥२॥ अवसान (निधान देश) और निवेशन (घर) । अवसान में अनुचरण होता है और निवेशन में निनयन होता है ॥ निन- यन नाम शान्तिजल से संप्रोक्षण करना । “अति धन्वानि०” इन दो ऋचाओं से अवसान, निवेशन, अनुचरण और निनयन

१०४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । नानुचरणानि निनयनेज्या ॥३॥ वास्तोष्पतीयैः कुलि- जकृष्टे दक्षिणतोऽग्नेःसम्भारमाहरति ॥४॥ वास्तोष्पत्या- दीनि महाशान्तिमावपते ॥५॥ मध्यमे गर्ते दर्भेषु व्रीहि- यवमावपति ॥६॥ शान्त्युदकशष्पशर्करमन्येषु॥७॥ इहैव ध्रुवामिति मीयमानामुच्छ्रीयमाणामनुमन्त्रयते ॥ ८ ॥ अभ्यज्यतेनेति मन्त्रोक्तम् ॥ ९ ॥ पूर्णं नारीत्युदकुम्भ- मग्निमादाय प्रपद्यन्ते ॥१०॥ ध्रुवाभ्यां दृंहयति ॥११॥ शम्भुमयोभुभ्यां विष्यन्दयति ॥१२॥ वास्तोष्पते प्रति- जानीह्यस्मान् स्वावेशो अनमीवो न एधि ॥ यत्त्वेमहे प्रति नस्तज्जुषस्व चतुष्पदो द्विपद आवेशयेह ॥ अन- मीवो वास्तोष्पते विश्वा रूपाण्याविशन् ॥ सखा सु- शेव एधि न इति, वास्तोष्पतये क्षीरौदनस्य जुहोति ॥१३॥ सर्वान्नानि ब्राह्मणान् भोजयति ॥१४॥ मङ्गल्यानि ॥१५॥ से यज्ञ करे ॥ ३॥ अब शाला कर्म को कहते हैं ॥ जल पात्र को अभिमंत्रण करके जिस भूमि में घर बनाना हो वहाँ जल लावे । उसी भूमि पर चरु पकावे या इयेन याग करे और वास्तोष्पतीय गणों से कुलिज कृष्ट भूमि पर अग्नि के दक्षिण भाग में गृह सम्बन्धि सामानों को इकट्ठा कर घरे ॥ ४॥ "इहैव ध्रुवां०” इत्यादि पांच गणों के तृप्र- प्रभृति प्रतीकों से आवपन करे ॥ ५॥ वास्तुभूमि के बीच के गर्त्त में कुशोपर धान्य, यव डाले ॥ ६॥ और अन्य गर्तों में शान्तिजल, विरूढ शर्करा डाले ॥ ७॥ "इहैव ध्रुवां०” से नापे जाने वाले बीच के स्थूणा और शाला को अनुमंत्रण करे ॥ ८ ॥ “अभ्यज्यर्तेन०” से बाँस को आरोपण करे ( स्थूणा के बास को ) ॥ ९ ॥ "पूर्ण नारी०” से जल- पूर्ण घट को पकड़ कर दूसरी ऋचा से अग्नि को लेकर दूसरे लोग घर में प्रवेश करें ॥१०॥ "इहैव ध्रुवाभ्यां०” इन दो ऋचाओं से दृढ़ करे ॥११॥ "शम्भुमयोभुभ्यां०” से जल से वास्तुभूमि को गीला करे, जल कुम्भ को घर में ढक देवे ॥१२॥ "वास्तोष्पते प्रति०” इत्यादि से वास्तोष्पति देवता के लिये क्षीरौदन की आहुति देवे ॥१२॥ और सब

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १०५ ये अग्नय इति क्रव्यादादुपहत इति पालाशं बध्नाति ॥१६॥ जुहोति ॥१७॥ आदधाति ॥१८॥ उदञ्चनेनोदपात्र्यां यवानङ्गिारानीयोल्लोपम् ॥१९॥ ये अग्नय इति पाला- श्या दर्व्या मन्थमुपमथ्य काम्पीलीभ्यामुपमन्थनीभ्याम् ॥२०॥ शमनञ्च ॥२१॥७॥४३॥ य आत्मदा इति वशाशमनम् ॥ १ ॥ पुरस्तादग्नेः प्रतीचीं धारयन्ति ॥२॥ पश्चादग्नेः प्राङ्मुख उपविश्यान्वा- रब्धायै शान्त्युदकं करोति ॥ ३ ॥ तत्रैतत्सूक्तमनुयोजय- ति ॥ ४ ॥ तेनैनामाचामयति च सम्प्रोक्षति च ॥ ५ ॥ अन्न ब्राह्मणों को भोजन करावे ॥ १४ ॥ और बूढ़ी स्त्रियां गीत मङ्गल्यादि करें, ब्राह्मण गण पुण्याह वाचन करे ॥ जहां घर, मण्डप या कुटी आदि हो चाहे पत्थर, ईंट, मट्टी, टट्टी, काष्ठ अदि के क्यों न हों सब ही दशा में इसी विधि से वास्तु याग करना चाहिये ॥१५॥ “ये अग्नय०” “क्रव्यादादुपहत०” इत्यादि ७ ऋचासे पालाश मणि को बान्धे । और आज्य की आहुति देवे ॥१७॥ और यहीं आधान करे ॥१८॥ उत्तर से जलपात्र में यवों को डाल कर लाकर आलो पात्री से यव की आहु- ति देवे ॥ १९ ॥ “ये अग्नय०” से पलाशी दर्वी से मन्थको काम्पीली की दो मन्थनियों से मथकर ॥ वशा (जो गौ गर्भ धारण नहीं करती) शमन विधान को कहते हैं ॥ “ये अग्नय०” इन १० ऋचाओं से वशा को अभिमंत्रण करके तब ब्राह्मण को देवे ॥ जिस घर में वशा रहती है वह गृह दैवहत होता है ॥२१॥७॥४३॥ यह तेतालीसवीं कण्डिका समाप्त हुई ॥ “य आत्मदा०” से वशाशमन कर्म करे जिससे तज्जन्य दोष दूर होवे ॥ १ ॥ अग्नि के पूर्व भाग में वशा को पश्चिम मुँह कर खड़ी रक्खे ॥ और अग्नि के पश्चिमभाग में पूर्वमुख बैठकर अन्वा- रब्धा वशाके लिये शान्ति उदक को करे ॥ ३ ॥ उस शान्ति उदक में “य आत्मदा०” सूक्त का अनुयोग करे ॥४॥ उस शान्ति उदक से ( मातली–अन्त. से ) आचमन करावे एवं प्रोक्षण करे ॥ ५ ॥ १४

१०६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । तिष्ठंस्तिष्ठन्तीं महाशान्तिमुच्चैरभिनिगदति ॥६॥ य ईशे पशुपतिः पशूनामिति हुत्वा वशामनक्ति शिरसि ककुदे जघनदेशे ॥ ७ ॥ अन्यतरां स्वधितिधारामनक्ति ॥८॥ अक्तया वपामुत्खनति ॥ ९ ॥ दक्षिणे पार्श्वे दर्भा- भ्यामधिक्षिप्त्यमुष्मै त्वा जुष्टमिति यथादेवतम् ॥ १०॥ निस्सालामित्युल्मुकेन त्रिः प्रसव्यं परिहरत्यनभिपरिहर- न्नात्मानम् ॥११॥ दर्भाभ्यामन्वारभते ॥१२॥ पश्चादुत्तर- तोऽग्नेः प्रत्यक्शीर्षीमुदक्पादीं निविध्यति ॥१३॥ सम- स्यै तन्वा भवेत्यन्यतरं दर्भमवास्यति ॥१४॥ अथ प्राणा- नास्थापयति प्रजानन्त इति ॥ १५ ॥ दक्षिणतस्तिष्ठन् रक्षोहणं जपति ॥१६॥ संज्ञप्तायां जुहोति—यद्वशा मायु- मक्रतोरो वा पद्भिराहत ॥ अग्निर्मा तस्मादेनसो वि- श्वान् मुञ्चत्वंहस इति ॥१७॥ उदपात्रेण पत्न्यभिव्रज्य वशा को करने वाला खड़ा होकर वास्तोष्पत्यादि चतुर्गणी महाशान्ति को उच्चैः, तीसरे सवन में, वशा के सम्मुख होकर जप करे ॥ ६ ॥ “य ईशे पशुपतिः पशूनां०” से आहुति करके वशा को शिर में लगावे ककुद में और जघन देश में ॥७॥ दोनों धारा के छुरिका की अन्य धारा को फेंके ॥८॥ अधिक्षिप्तधारा से वशा के वपा को निकाले ॥९॥ वशा के दक्षिण पार्श्व में डाभों से “प्रजापतये त्वा जुष्टमधिक्षिपामि” से यथा दैवत-अधिक्षिप्त करे ॥१०॥ “निस्सालां०”—से उल्मुक द्वारा तीन बार बायें होकर—वशा को लेवे ॥११॥ डाभों से शामित्र देश को ली जाती हुई पश्चात् अवस्थिता वशा को डाभों से स्पर्श करे ॥१२॥ अग्नि के पश्चिम उत्तर-पश्चिम की ओर शिर कियी हुई और उत्तर को पैर कियी हुई गिरवावे ॥१३॥ “समस्यै तन्वा भव०” जिन डाभों से वशा अन्वारब्धा हुई । उन दोनों से अलग एक अन्य विधि करे । वशा के नीचे डाले ॥१४॥ मारी जाने वाली वशा के दक्षिण भाग में खड़ा रह कर रक्षोहण अनुवाक का जप करे ॥१५॥॥१६॥ मारे जाने पर “यद्व शा०” इत्यादि से आहुति देवे ॥१७॥ जलपात्र लेकर पत्नी जाकर