कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । स्वेन जुहोति ॥१६॥ इमं जीवेभ्य इति द्वारे निदधाति ॥१७॥ जुहोत्येतयर्चा आयुर्दावा धनदावा बलदावा पशुदावा पुष्टिदावा प्रजापतये स्वाहेति ॥१८॥ षट्सम्पातं माता पुत्रान्नाशयते ॥१९॥ उच्छिष्टं जायाम् ॥२०॥ संवत्सर- मग्निं नोद्वायान्न हरेन्नाहरेयुः ॥२१॥ द्वादशरात्र इत्येके ॥२२॥ दश दक्षिणा ॥२३॥ पश्चादग्नेर्वाग्यतः संविशति ॥२४॥ अपरेद्युरग्निं चेन्द्राग्नी च यजेत ॥२५॥ स्थाली- पाकाभ्यामग्निं चाग्नीषोमौ च पौर्णमास्याम् ॥२६॥ सायंप्रातर्व्रीहीनावपेद्यवान्वाग्नये स्वाहा प्रजापतये स्वाहेति ॥२७॥ सायं सूर्याय स्वाहा प्रजापतये स्वाहेति ॥२८॥ प्रातर्द्वादशरात्रेऽग्निं पशुना यजेत ॥२९॥ स्थाली- पाकेन वोभयोर्विरिष्यति ॥३०॥ संवत्सरतम्यां शान्त्यु- दकं कृत्वा ॥३१॥ घृताहुतिर्नो भवाग्ने अक्रव्याहुति- स्वयं आहुति करे ॥१६॥ “इमं जीवेभ्यः” से द्वार पर धरे ॥१७॥ “जु- होति०” इस ऋचा से और “आयुर्दावा” इत्यादि से आहुति देवे ॥१८॥ छः सम्पातों को माता पुत्रों को खिलावे ॥१९॥ यजमान स्वयं खाकर उच्छिष्ट अपनी पत्नी को देवे ॥२०॥ यह आवसथ्याधान पूरा हुआ । साल भर तक अग्नि को पुतावे और न किसी को देवे और न आप लेवे ॥२१॥ कोई २ बारह रात्रि में कहते हैं ॥२२॥ दश दक्षिणा देवे ॥२३॥ यजमान अग्नि के पश्चिम भाग में बैठे ॥२४॥ और दूसरे दिन अग्नि और इन्द्राग्नी को यजन करे ॥२५॥ सायं प्रातः स्थालीपाक से अग्नि और अग्नीषोम को पौर्णमासी तिथि में आहुतियाँ करे ॥२६॥ “सायं प्रातः व्रीहियों या यवों से” “अग्नये स्वाहा। प्रजापतये स्वाहा” से सायंकाल में और “सूर्याय स्वाहा। प्रजापतये स्वाहा” से प्रातःकाल में आहुतियाँ देवे ॥२७॥२८॥ १२ रात्रि के प्रातःकाल में अग्नि को पशु से यजन करे । ॥३० ॥ स्थालीपाक से या दोनों से अलग २ करे ॥३०॥ वर्ष के अन्त में उस अग्नि में शान्त्युदक करके । 'घृताहुतिर्नो' इत्यादि से घी की आहुति