भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्र० ४३ : अ० २७ ] वेश्यालयों का अध्यक्ष २११

(१) गणिकापुत्रान् रंगोपजीविनश्च मुख्यान् निष्पादयेयुः सर्वतालावचराणां च ।
(२) संज्ञाभाषान्तरज्ञाश्च स्त्रियस्तेषामनात्मसु ।
चारघातप्रमादार्थं प्रयोज्या बन्धुवाहनाः ॥

इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे गणिकाध्यक्षो नाम सप्तविंशोऽध्यायः,
आदितः सप्तचत्वारिंशः ।

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( १ ) वेश्यापुत्रों, नाचने-गाने वालों और इसी प्रकार के अन्य लोगों को वेश्याओं का शिक्षक नियुक्त करना चाहिए ।

( २ ) नट-नर्तक आदि पुरुषों को धन का लालच देकर राजा अपने वश में कर ले और तब, अनेक भाषायें बोलने वाली तथा अनेक प्रकार के वेश बनाने वाली उनकी स्त्रियों को शत्रु के गुप्तचरों का वध करने अथवा उनको विषयवासनाओं में फँसाने के लिये नियुक्त कर दे ।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में गणिकाध्यक्ष नामक सत्ताईसवाँ अध्याय समाप्त ।

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