कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| प्रकरण ४४ | ## नावध्यक्षः ## |
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| अध्याय २८ |
(१) नावध्यक्षः समुद्रसंयाननदीमुखतरप्रचारान् देवसरोविसरोनदी-तरांश्च स्थानीयादिष्ववेक्षेत । (२) तद्वेलाकूलग्रामाः क्लृप्तं दद्युः । (३) मत्स्यबन्धका नौकाभाटकं षड्भागं दद्युः । पत्तनानुवृत्तं शुल्क-भागं वणिजो दद्युः । यात्रावेतनं राजनौभिः सम्पन्तन्तः शंखमुक्ताग्राहिणो नौभाटकं दद्युः, स्वनौभिर्वा तरेयुः । (४) अध्यक्षश्चैषां खन्यध्यक्षेण व्याख्यातः । (५) पत्तनाध्यक्षनिबन्धं पण्यपत्तनचारित्रं नावध्यक्षः पालयेत् । (६) मूढवाताहतां तां पितेवानुगृह्णीयात् । उदकप्राप्तं पण्यशुल्कमर्ध-शुल्कं वा कुर्यात् ।
नौकाध्यक्ष
(१) नौका-परिवहन के अधिकारी (नौकाध्यक्ष) को चाहिये कि वह समुद्र-तट की समीपवर्ती नदी को, समुद्र के नौका-मार्गों को, झीलों, तालाबों और गाँव के छोटे-छोटे जलीय मार्गों को भली-भांति देखता रहे ।
(२) समुद्र, झील तथा नदियों के किनारों पर बसे हुए ग्रामीणों को चाहिए कि वे राजा को नियत कर दें ।
(३) मछुओं को चाहिए कि वे अपनी आमदनी का छठा हिस्सा कररूप में राजा को दें । समुद्रतट के व्यापारी, बन्दरगाहों के नियमानुसार माल के मूल्य का पाचवां या छठा भाग टैक्स दें । सरकारी नौकाओं द्वारा माल लाने-लेजाने का भाड़ा वे अलग से दें । इसी प्रकार शंख और मोती लेजाने वाले व्यापारी नाव का भाड़ा अलग से दें, अथवा सरकारी नौकाओं का उपयोग न कर वे निजी नौकाओं से पार उतरें ।
(४) मछली, मोती और शंख आदि सामुद्रिक वस्तुओं के सम्बन्ध में खानों के अध्यक्ष की ही भांति, नाव का अध्यक्ष भी प्रबन्ध करे या उसी व्यवस्था को लागू करे ।
(५) नगराध्यक्ष द्वारा नियत किये गये बन्दरगाह-सम्बन्धी नियमों को नावध्यक्ष भली-भांति पालन करें ।
(६) दिशाओं का अन्दाज न रह जाने के कारण या तूफान में फँस जाने के कारण डूबती हुई नौका को अध्यक्ष, पिता के समान अनुग्रह करके बचाये । पानी