कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 361, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्र० ६१ : अ० ५ ] दायभाग ( १ ) २७७
(१) सन्निविष्टसममसन्निविष्टेभ्यो नैवेशनिकं दद्युः । कन्याभ्यश्च प्रादानिकम् । (२) ऋणरिक्थयोः समो विभागः । (३) उदपात्राण्यपि निष्किञ्चना विभजेरन्, इत्याचार्याः । छलमेतदिति कौटिल्यः । सतोऽर्थस्य विभागो नासतः । (४) एतावानर्थः सामान्यस्तस्यैतावान् प्रत्यंशः, इत्यनुभाष्य ब्रुवन् साक्षिषु विभागं कारयेत् । दुर्विभक्तमन्योन्यापहृतमन्तर्हितमविज्ञातोत्पन्नं वा पुनर्विभजेरन् । (५) अदायादकं राजा हरेत् स्त्रीवृत्तिप्रेतकार्यवर्जम्, अन्यत्र श्रोत्रियद्रव्यात् । तत् त्रैविद्येभ्यः प्रयच्छेत् । (६) पतितः पतिताज्जातः क्लीबश्चानंशः, जडोन्मत्तान्धकुष्ठिनश्च । सति भार्यार्थे तेषामपत्यमतद्विधं भागं हरेत् । ग्रासाच्छादनमितरे पतितवर्जाः ।
( १ ) विवाहित बड़े भाइयों का कर्तव्य है कि वे अपने छोटे अविवाहित भाइयों के विवाह के लिए खर्च दें और अपनी छोटी बहिनों के विवाह में दहेज आदि के लिए यथोचित धन दें ।
( २ ) सभी भाइयों को चाहिए कि वे ऋण और आभूषण तथा नगदी आदि रिक्थ धन को आपस में बराबर बांट लें ।
( ३ ) प्राचीन आचार्यों का मत है कि 'दरिद्र लोग अपने पानी पीने आदि के बर्तनों को भी आपस में बांट लें', किंतु आचार्य कौटिल्य के मत से 'ऐसा करना छल-कपट है,' क्योंकि उनके मत से, 'विद्यमान संपत्ति ही बँटवारे के योग्य होती है अविद्यमान संपत्ति नहीं ।'
( ४ ) 'सारी संपत्ति इतनी है और प्रत्येक भाई का इतना-इतना हिस्सा है', यह बात साक्षियों के सामने स्पष्ट करके बँटवारा कराया जाय । यदि बँटवारा ठीक न हुआ हो, या उस संपत्ति में से किसी हिस्सेदार ने कुछ चुरा लिया हो, या बँटवारे के समय कोई चीज रह गई हो, अथवा बँटवारे के बाद अकस्मात् ही कोई चीजें अधिक आ गई हों, तो उस संपत्ति का फिर से बँटवारा किया जाना चाहिए ।
( ५ ) जिस संपत्ति का कोई उत्तराधिकारी न हो उसे राजा ले ले, उस संपत्ति में से वह मृतक की विधवा के भरण-पोषण योग्य तथा मृतक के श्राद्धकर्म आदि के योग्य धन छोड़ दे । श्रोत्रिय के धन को राजा कदापि न ले, बल्कि उस संपत्ति को वह वेदविद् ब्राह्मणों में वितरित कर दे ।
( ६ ) पतित को, पतित से पैदा हुई संपति को और नपुंसक को दाय-भाग नहीं मिलता है । मूर्ख, उन्मत्त, अंधा और कोढ़ी आदि भी दाय भाग के अधिकारी नहीं हैं । मूर्ख, कोढ़ी आदि की भली संतान को उनकी माता की संपत्ति का उत्तराधिकार