कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
(१). तेषां च कृतदाराणां लुप्ते प्रजनने सति । सृजेयुर्बान्धवाः पुत्रांस्तेषामंशान् प्रकल्पयेत् ॥
इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे दायविभागे दायक्रमो नाम पञ्चमोऽध्यायः, आदित एकषष्टितमः ।
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दिया जाना चाहिए । पतितों को छोड़ कर दूसरे सभी मूर्ख आदि को केवल भोजन-वस्त्र के लिए उस संपत्ति में से दिया जाना चाहिए ।
(१) यदि उक्त पतित, मूर्ख आदि पुरुषों की स्त्रियाँ हों, किन्तु अशक्त होने से उनसे वे संतान पैदा न कर सकें, तो उनके बंधु-बांधव उनकी ( मूर्ख आदि की ) पत्नियों से संतान पैदा करें । वे संतान अपनी परंपरागत संपत्ति के उत्तराधिकारी माने जाने चाहिएँ ।
धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में दायविभाग-दायक्रम नामक पाँचवाँ अध्याय समाप्त ।
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