भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्र० ७६ : अ० १६ ] दण्डपारुष्य ३३५

(१) शूद्रो येनाङ्गेन ब्राह्मणमभिहन्यात् तदस्य छेदयेत् । अवगूर्णे निष्क्रयः स्पर्शेऽर्धदण्डः । तेन चण्डालाशुचयो व्याख्याताः । (२) हस्तेनावगूर्णे त्रिपणावरो द्वादशपणपरो दण्डः । पादेन द्विगुणः । दुःखोत्पादनेन द्रव्येण पूर्वः साहसदण्डः । प्राणाबाधिकेन मध्यमः । (३) काष्ठलोष्टपाषाणलोहदण्डरज्जुद्रव्याणामन्यतमेन दुःखमशोणित-मुत्पादयतश्चतुर्विंशतिपणो दण्डः । शोणितोत्पादने द्विगुणः । अन्यत्र दुष्ट-शोणितात् । (४) मृतकल्पमशोणितं घ्नतो हस्तपादपारश्विकं वा कुर्वतः पूर्वः साहसदण्डः । पाणिपाददन्तभङ्गे कर्णनासाच्छेदने व्रणविदारणे च अन्यत्र दुष्टव्रणेभ्यः । (५) सक्थिग्रीवाभञ्जने नेत्रभेदने वा वाक्यचेष्टाभोजनोपरोधेषु च मध्यमः साहसदण्डः । समुत्थानव्ययश्च । विपत्तौ कण्टकशोधनाय नीयेत ।


( १ ) शूद्र जिस अंग से ब्राह्मण पर प्रहार करे उसका वह अंग काट देना चाहिए। शूद्र यदि ब्राह्मण का हाथ या पैर झटक दे तो उस पर यथोचित दंड किया जाय और केवल छू दे तो उक्त दंड का आधा दंड किया जाय । इसी प्रकार चाण्डाल आदि नीच जातियों के सम्बन्ध में दंड-व्यवस्था समझनी चाहिए ।

( २ ) हाथ से ढकेलने या झटकने पर तीन पण से बारह पण तक का दंड होना चाहिए। पैर से प्रहार करने पर दुगुना दंड दिया जाय । कांटा, सूई आलपीन आदि चुभा देने पर प्रथम साहस दंड और प्राणघातक वस्तु द्वारा चोट पहुँचाने पर मध्यम साहस दंड दिया जाय ।

( ३ ) लकड़ी, ढेला, पत्थर, लोहे की छड़ तथा रस्सी आदि किसी एक वस्तु से मारने पर यदि खून न निकले तो चौबीस पण और खून निकले तो अठतालीस पण दंड दिया जाय । यदि वह खून कोढ, फोड़ा, फुंसी आदि के कारण निकला हो तो दुगुना दंड न दिया जाय ।

( ४ ) यदि बिना खून निकाले ही मारते-मारते किसी को अधमरा कर दिया जाय या उसके हाथ-पैरों के जोड़ तोड़ दिये जाँय तो मारने वाले को प्रथम साहस दण्ड दिया जाय । हाथ, पैर तथा दाँत तोड़ देने पर कान तथा नाक काट देने पर और घावों को फाड़ देने पर भी प्रथम साहस दण्ड दिया जाय । किन्तु वे घाव यदि फोड़े, फुंसी आदि के कारण न हुए हों, उसी दशा में प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ।

( ५ ) गोड़ या गर्दन तोड़ने पर आँख फोड़ने पर, जीभ, हाथ, पैर और मुँह आदि को काट देने पर मध्यम साहस दण्ड दिया जाय और अपराधी को चाहिए कि तब तक वह उस अपंग व्यक्ति की दवा-दारु, खाने-पीने तथा आवश्यक व्यय का