भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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पृष्ठ 420

३३६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण

(१) महाजनस्यैकं घ्नतः प्रत्येकं द्विगुणो दण्डः । (२) पर्युषितः कलहोऽनुप्रवेशो वा नाभियोज्य इत्याचार्याः । नास्त्यपकारिणो मोक्ष इति कौटल्यः । (३) कलहे पूर्वगतो जयति, अक्षममाणो हि प्रधावति । इत्याचार्याः । (४) नेति कौटल्यः । पूर्वं पश्चाद्वागतस्य साक्षिणः प्रमाणम् । असाक्षिके घातः कलहोपलिङ्गनं वा । (५) घाताभियोगमप्रतिब्रुवतः तदहरेव पश्चात्कारः । (६) कलहे द्रव्यमपहरतो दशपणो दण्डः । (७) क्षुद्रकद्रव्यहिंसायां तच्च तावच्च दण्डः ।


इन्तजाम करे जब तक वह पूर्ण स्वस्थ न हो जाय । यदि अपराधी को इस प्रकार का दंड देने में देश-काल बाधक सिद्ध हो तो उसे कंटक शोधन अधिकरण में बताये गए नियमों के अनुसार दंड दिया जाय ।

(१) यदि बहुत-से आदमी मिलकर एक आदमी को मारें तो उनमें से प्रत्येक आदमी को उससे दुगुना दंड दिया जाय, जितना दंड एक आदमी द्वारा मारने पर दिया जाता है ।

(२) पुरातन आचार्यों का कहना है कि 'बहुत पुराने झगड़ों तथा चोरियों पर मुकदमा दायर न किया जाय ।' किन्तु आचार्य कौटिल्य का मत है कि 'अपकारी व्यक्ति को कभी भी न छोड़ा जाय ।'

(३) पुरातन आचार्यों का अभिमत है कि 'फौजदारी के मामले में जो व्यक्ति पहिले अदालत में दरखास्त दे, उसी की जीत समझी जाय क्योंकि दूसरे से सताये जाने के कारण, दुःख को बरदास्त न करके ही वह पहिले अदालत की शरण में आता है ।'

(४) किन्तु आचार्य कौटिल्य का कथन है कि 'यह उचित नहीं है; अदालत में कोई आगे आये या पीछे, साक्षियों के कथनानुसार ही मुकदमे का फैसला दिया जाय । यह साक्षी न हों तो चोट आदि से और चोट भी यदि भीतरी हो तो अन्य लक्षणों से झगड़े की असलियत जानकर फैसला करना चाहिये ।'

(५) फौजदारी के मामलों में यदि प्रतिवादी उसी दिन जवाब न दे तो उसकी हार समझी जाय ।

(६) दो आदमियों को झगड़े में फँसा हुआ जानकर उनकी वस्तुओं को यदि कोई तीसरा ही व्यक्ति उड़ाकर ले जाय तो उसे दस पण दंड दिया जाय ।

(७) यदि झगड़े में कोई किसी की छोटी-छोटी वस्तुओं को नष्ट कर दे तो वह उसका मूल्य मालिक को दे और उतना ही दंड राजकोष में जमा करे ।