कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ
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विषय-सूची
( १ ) विनयाधिकारिक : पहला अधिकरण
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| प्रकरण और अधिकरण का निरूपण | १ |
| १ : विद्या-विषयक विचार : आन्वीक्षकी | ८ |
| २ : विद्या-विषयक विचार : त्रयी | १० |
| ३ : विद्या-विषयक विचार : वार्ता और दण्डनीति | १२ |
| ४ : वृद्धजनों की संगति | १४ |
| ५ : काम-क्रोधादि छह शत्रुओं का परित्याग | १६ |
| ६ : साधु स्वभाव राजा की जीवनचर्या | १८ |
| ७ : अमात्यों की नियुक्ति | २० |
| ८ : मन्त्री और पुरोहित की नियुक्ति | २३ |
| ९ : गुप्त उपायों से अमात्यों के आचरणों की परीक्षा | २५ |
| १० : गुप्तचरों की नियुक्ति ( स्थायी गुप्तचर ) | २९ |
| ११ : गुप्तचरों की नियुक्ति ( भ्रमणशील गुप्तचर ) | ३२ |
| १२ : अपने देश में कृत्य-अकृत्य पक्ष की सुरक्षा | ३७ |
| १३ : शत्रु-देश के कृत्य-अकृत्य पक्ष को मिलाना | ४० |
| १४ : मन्त्राधिकार | ४३ |
| १५ : सन्देश देकर राजदूतों को शत्रुदेश में भेजना | ४९ |
| १६ : राजपुत्रों से राजा की रक्षा | ५३ |
| १७ : नजरबन्द राजकुमार और राजा का पारस्परिक व्यवहार | ५८ |
| १८ : राजा के कार्य-व्यापार | ६१ |
| १९ : राज-भवन का निर्माण और राजा के कर्तव्य | ६५ |
| २० : आत्मरक्षा का प्रबन्ध | ६९ |
( २ ) अध्यक्षप्रचार : दूसरा अधिकरण
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| १ : जनपदों की स्थापना | ७७ |
| २ : ऊसर भूमि को उपयोगी बनाने का विधान | ८२ |
| ३ : दुर्गों का निर्माण | ८५ |
| ४ : दुर्ग से सम्बन्धित राजभवनों तथा नगर के प्रमुख स्थानों का निर्माण | ९१ |
| ५ : कोष-गृह का निर्माण और कोषाध्यक्ष के कर्तव्य | ९५ |