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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ
४३६कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ पाँचवां अधिकरण

मित्रपक्षम् । विनयकर्मणि च कुमारस्य प्रयतेत । कन्यायां समानजातीयादपत्यमुत्पाद्य वाभिषिञ्चेत् । मातृश्चित्तक्षोभभयात् कुल्यमल्पसत्त्वं छात्रं च लक्षण्यमुपनिदध्यात् । ऋतौ चैनां रक्षेत् । न चात्मार्थं कञ्चिदुत्कृष्टमुपभोगं कारयेत् । राजार्थं तु यानवाहनाभरणवस्त्रस्त्रीवेश्मपरिवापान् कारयेत् ।

(१) यौवनस्थं च याचेत विश्रमं चित्रकारणात् ।
परित्यजेददुष्यन्तं तुष्यन्तं चानुपालयेत् ॥
(२) निवेद्य पुत्ररक्षार्थं गूढसारपरिग्रहान् ।
अरण्यं दीर्घसत्रं वा सेवेतारुच्यतां गतः ॥
(३) मुख्यैरवगृहीतं वा राजानं तत्प्रियाश्रितः ।
इतिहासपुराणाभ्यां बोधयेदर्थशास्त्रवित् ॥


करेगा' । यही आश्वासन वह दुर्ग तथा राज्य के अन्य कर्मचारियों को भी दे, और मित्र तथा शत्रुपक्ष के लोगों से भी यथोचित वार्तालाप करे । राजकुमार की विद्या, विनय और दूसरी प्रकार की शिक्षाओं का भी वह यथोचित प्रबंध करे । अथवा किसी समानजातीय पुरुष से राजकन्या में पुत्र उत्पन्न कराके उसे राज्यसिंहासन पर बैठाये । यदि वह महारानी हो तो उसका चित्त खिन्न न हो, इस अर्थ उसके पास कुलीन, अल्पवयस्क, सौम्य वेदाध्यायी व्यक्ति को नियुक्त कर दे, जिससे कि वह धर्मशास्त्र तथा पुराणों की बातों को सुनाकर उसके ( महारानी के ) चित्त को शान्त बनाये रखे । ऋतुकाल ( मासिक धर्म ) में उसकी पूरी रक्षा की जाय । अमात्य को चाहिए कि वह अपने लिए किसी प्रकार की उत्तम सामग्री संचित न करे । राजा के लिए रथ, घोड़े, आभूषण, वस्त्र, स्त्री, मकान और बढ़िया शयनागार का प्रबन्ध करे ।

( १ ) जब राजकुमार युवा हो जाय और राज्यभार संभाल सके तब उसके मनोभावों को जानने के लिए अमात्य उससे अपना मंत्रिपद छोड़ने के लिए कहे । यदि वह स्वीकार कर ले तो अमात्य को वहाँ से चला जाना चाहिए । यदि वह न जाने को कहें तो फिर उसी के पास रहकर पूर्ववत् राजकाज की व्यवस्था करता रहे ।

( २ ) अमात्य पद पर कार्य करने की इच्छा न होने पर अथवा राजा की ओर से कुछ मन-मुटाव हो जाने पर अमात्य को चाहिए कि वह राजा के पूर्वजों द्वारा स्थापित गुप्तचरों और खजाना आदि राजकुमार को बताकर तपस्या करने के लिए जंगल में चला जाय, अथवा दीर्घकाल तक चलने वाले यज्ञकर्मों का अनुष्ठान करे ।

( ३ ) अथवा मामा, फूफा, आदि मुख्य संबंधियों के वश में हुए राजकुमार को उसके हितेच्छु पुरुषों के आश्रित रहता हुआ ही, तत्त्वविद् अमात्य इतिहास और पुराणों के द्वारा धर्म-अर्थ के तत्त्वों को समझाता रहे ।

योगवृत्त नामक पंचम अधिकरण में राजप्रतिसन्धान-एकैश्वर्य नामक

प्र० ९४-९५ : अ० ६ ] राजा के प्रति व्यवहार ४३७

(१) सिद्धव्यञ्जनरूपो वा योगमास्थाय पार्थिवम् ।
लभेत लब्ध्वा दूष्येषु दाण्डकर्मिकमाचरेत् ॥

इति योगवृत्ते पञ्चमेऽधिकरणे राजप्रतिसन्धानमेकैश्वर्यं नाम षष्ठोऽध्यायः;
आदितः पञ्चनवतितमोऽध्यायः ॥ ९६ ॥
समाप्तमिदं योगवृत्तं नाम पञ्चममधिकरणम् ।
—: ० :—


( १ ) यदि इस प्रकार भी राजा धर्म-अर्थ के तत्त्वों को ग्रहण न कर सके तो सिद्ध पुरुष का वेष बनाकर वह राजा को अपने वश में करे, और तदनंतर मामा आदि दूष्य पुरुषों पर दाण्डकर्मिक प्रकरण में निर्दिष्ट उपायों से उनको दण्डित करे ।

योगवृत्त नामक पंचम अधिकरण में राजप्रतिसन्धान-एकैश्वर्य नामक
छठा अध्याय समाप्त

—: ० :—

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छठा अधिकरण

छठा अधिकरण

मण्डलयोनि

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प्रकरण ९६
अध्याय १

प्रकृतिसम्पदः


(१) स्वाम्यमात्यजनपददुर्गकोशदण्डमित्राणि प्रकृतयः ।

(२) तत्र स्वामिसम्पत्—महाकुलीनो दैवबुद्धिसत्त्वसम्पन्नो वृद्धदर्शी धार्मिकः सत्यवागविसंवादकः कृतज्ञः स्थूललक्षो महोत्साहोऽदीर्घसूत्रः शक्य-सामन्तो दृढबुद्धिरक्षुद्रपरिषदको विनयकाम इत्याभिगामिका गुणाः ।

(३) शुश्रूषाश्रवणग्रहणधारणविज्ञानोहापोहतत्त्वाभिनिवेशाः प्रज्ञा-गुणाः ।

(४) शौर्यममर्षः शीघ्रता दाक्ष्यं चोत्साहगुणाः ।

(५) वाग्मी प्रगल्भः स्मृतिमतिबलवानुदग्रः स्ववग्रहः कृतशिल्पो व्यसने दण्डनाव्युपकारापकारयोर्दृष्टप्रतिकारी ह्रीमानापत्प्रकृत्योर्विनियोक्ता


प्रकृतियों के गुण

( १ ) प्रकृतियां : १. स्वामी, २. अमात्य, ३. जनपद, ४. दुर्ग, ५. कोष, ६. दण्ड ( सेना ), और ७. मित्र, ये सात प्रकृतियाँ है ।

( २ ) स्वामी के गुण : महाकुलीन, दैवबुद्धि, धैर्यसम्पन्न, दूरदर्शी, धार्मिक, सत्यवादी, सत्यप्रतिज्ञ, कृतज्ञ, उच्चाभिलाषी, बड़ा उत्साही, शीघ्र कार्य करने वाला ( अदीर्घ सूत्र ), समन्तों को वश में करने वाला, दृढ़बुद्धि गुणसंपन्न परिवार वाला ओर शास्त्र बुद्धि, राजा के ये गुण अभिगामिक गुण कहलाते हैं ।

( ३ ) शास्त्रचर्चा, शास्त्रज्ञान, प्रत्येक बात को ग्रहण कर लेना, ग्रहण की हुई बात को याद रखना, ग्रहण की हुई बात का विशेष ज्ञान रखना, तर्क-वितर्क द्वारा किसी बात की तह को पकड़ना, बुरे पक्ष को त्यागना, और गुणियों के पक्ष को ग्रहण करना, आदि राजा के प्रज्ञागुण कहलाते हैं ।

( ४ ) शौर्य, अमर्ष, क्षिप्रकारिता और दक्षता, ये चार गुण उसके उत्साहगुण कहलाते हैं ।

( ५ ) वाग्मी, प्रगल्भ, स्मरणशील, बलवान्, उन्नतमन, संयमी, निपुण सवार, विपत्तिग्रस्त शत्रु पर आक्रमण करने वाला, विपत्ति के समय सेना की रक्षा करने वाला, किसी के उपकार या अपकार का यथोचित प्रतीकार करने वाला, लज्जावान्, दुर्भिक्ष-सुभिक्ष के समय अन्न आदि का उचित विनियोग करने वाला, दीर्घदर्शी-दूरदर्शी

४४२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ छठा अधिकरण

दीर्घदूरदर्शी देशकालपुरुषकारकार्यप्रधानः सन्धिविक्रमतयागसंयमपणपर- च्छिद्रविभागी संवृतादीनाभिहास्यजिह्यभ्रुकुटीक्षणः कामक्रोधलोभस्तम्भ- चापलोपतापपैशुन्यहीनः शक्यः स्मितोग्राभिभाषी वृद्धोपदेशाचार इत्यात्म- सम्पत् । (१) अमात्यसम्पदुक्ता पुरस्तात् । (२) मध्ये चान्ते च स्थानवानात्मधारणः परधारणश्चापदि स्वारक्षः स्वाजीवः शत्रुद्वेषी शक्यसामन्तः पङ्कपाषाणोषरविषमकण्टकश्रेणीव्याल- मृगाटवीहीनः कान्तः सीताखनिद्रव्यहस्तिवनवान् गव्यः पौरुषेयो गुप्तगोचरः पशुमान् अदेवमातृको वारिस्थलपथाभ्यामुपेतः सारचित्रबहुपण्यो दण्डकर- सहः कर्मशीलकर्षकोऽबालिशस्वाम्यवरवर्णप्रायो भक्तशुचिमनुष्य इति जनपदसम्पत् ।


अपनी सेना के युद्धोचित देश-काल-उत्साह एवं कार्य को स्वयं देखने वाला, संधि के प्रयोगों को समझने वाला, युद्ध में चतुर, सुपात्र को दान देने वाला, प्रजा को कष्ट दिए बिना ही कोष को बढाने वाला, शत्रु के व्यसनों से लाभ उठाने वाला, अपने मन्त्र को गुप्त रखने वाला, दूसरे की हँसी न उड़ाने वाला, टेढी भौंहें करके न देखने वाला, काम-क्रोध-लोभ-मोह चपलता-उपताप एव चुगलखोरी ( पैशुन्य ) से सदा अलग रहने वाला, प्रियभाषी, हँसमुख, उदारभावी और वृद्धजनों के उपदेशों एवं आचारों को मानने वाला इन गुणों से युक्त राजा आत्मसंपन्न कहा जाता है ।

( १ ) अमात्य के गुण : अमात्य संपत के सम्बन्ध में विनयाधिकारिक नामक अधिकरण में पहिले कहा जा चुका है ।

( २ ) जनपद के गुण : जनपद की स्थापना ऐसी होनी चाहिए कि जिसके बीच में तथा सीमान्तों में किले बने हों, जिसमें यथेष्ट अन्न पैदा होता हो, जिसमें विपत्ति के समय वनपर्वतों के द्वारा आत्मरक्षा की जा सके, जिसमें थोड़े श्रम से ही अधिक धान्य पैदा हो सके, जिसमें शत्रुराजा के विरोधियों की संख्या अधिक हो, जिसके पास-पड़ोस के राजा दुर्बल हों, जो कीचड़, कंकड़, पत्थर, असर, चोर-जुआरी ( विषम कंटक ), छोटे-छोटे शत्रु, हिंसक जानवर एवं घने जङ्गलों से रहित हो, जो नदी तलाबों से सज्जित हो, जिसमें खेती, खान, लकड़ियों तथा हाथियों के जङ्गल हों, जो गायों के लिए हितकर हो, जिसका जल-वायु अच्छा हो, जो लुब्धकों से रहित हो, जिसमें गाय, भैंस, नदी, नहर, जल, थल, आदि सभी उपयोगी वस्तुएँ हों, जिसमें बहुमूल्य वस्तुओं का विक्रय हो, जो दण्ड तथा कर को सहन कर सके, जहाँ के किसान बड़े मेहनती हों, जहाँ के मालिक समझदार हों, जहाँ नीचवर्ण की आबादी अधिक

प्र० ९६ : अ० १ ] प्रकृतियों के गुण ४४३

(१) दुर्गसम्पदुक्ता पुरस्तात् । (२) धर्माधिगतः पूर्वैः स्वयं वा हेमरूप्यप्रायश्चित्रस्थूलरत्नहिरण्यो दीर्घामप्यापदमनायतिं सहेतेति कोशसम्पत् । (३) पितृपैतामहो नित्यो वश्यस्तुष्टभृतपुत्रदारः प्रवासेष्वविसम्पादितः सर्वत्राप्रतिहतो दुःखसहो बहुयुद्धः सर्वयुद्धप्रहरणविद्याविशारदः सहवृद्धिक्षयिकत्वादद्वैध्यः क्षत्रप्राय इति दण्डसम्पत् । (४) पितृपैतामहं नित्यं वश्यमद्वैध्यं महल्लघुसमुत्थमिति मित्रसम्पत् । (५) अराजबीजी लुब्धः क्षुद्रपरिषदको विरक्तप्रकृतिरन्यायवृत्तिरयुक्तो व्यसनी निरुत्साहो दैवप्रमाणो यत्किञ्चनकार्यगतिरननुबन्धः क्लीबो नित्यापकारी चेत्यमित्रसम्पत् । एवम्भूतो हि शत्रुः सुखः समुच्छेत्तुं भवति ।


हो और जहाँ प्रेमी एवं शुद्ध स्वभाव वाले लोग वसते हों, इन गुणों से युक्त देश जनपद संपन्न कहा जाता है।

(१) दुर्ग के गुण: दुर्ग विधान नामक प्रकरण में दुर्ग-गुणों पर प्रकाश डाला जा चुका है ।

(२) कोष के गुण : राजकोष ऐसा होना चाहिए जिसमें पूर्वजों की तथा अपनी धर्म की कमाई संचित हो, इस प्रकार धान्य; सुवर्ण, चाँदी, नाना प्रकार के बहुमूल्य रत्न तथा हिरण्य से भरा-पूरा हो, जो दुर्भिक्ष एवं आपत्ति के समय सारी प्रजा की रक्षा कर सके । इन गुणों से युक्त खजाना कोष संपन्न कहलाता है ।

(३) दण्ड ( सेना ) के गुण : सेना ऐसी होनी चाहिए जिसमें वंशानुगत, स्थायी एवं वश में रहने वाले सैनिक भर्ती हों, जिनके स्त्री-पुत्र राजवृत्ति को पाकर पूरी तरह सन्तुष्ट हों, युद्ध के समय जिसको आवश्यक सामग्री से लैस किया जा सके, जो कहीं भी हार न खाता हो, दुःख को सहने वाला हो, युद्धकौशलों से परिचित हो, हर तरह के युद्ध में निपुण हो, राजा के लाभ तथा हानि में हिस्सेदार हो और क्षत्रियों की अधिकता हो । इन गुणों से युक्त सेना दण्डसंपन्न कही जाती है ।

(४) मित्र के गुण : मित्र ऐसे होने चाहिएँ, जो वंशपरम्परागत हों, स्थायी हों, अपने वश में रह सकें, जिनसे विरोध की संभावना न हो, प्रभु-मन्त्र-उत्साह आदि शक्तियों से युक्त जो समय आने पर सहायता कर सकें । मित्रों में इन गुणों का होना मित्रसंपन्न कहा जाता है ।

(५) शत्रु के गुण : जो शुद्ध राजवंश का न हो, लोभी हो, दुष्ट परिवार वाला हो, अमात्य आदि प्रकृतियाँ जिसके अनुकूल न हों, शास्त्र प्रतिकूल आचरण करने वाला हो, अयोग्य हो, व्यसनी हो, जिसमें उत्साह न हो, जो भाग्यवादी हो, विना विचारे कार्य करने वाला हो । शत्रु में इन गुणों का होना शत्रुसंपन्न कहा जाता है । इस प्रकार का शत्रु आसानी से उखाड़ा जा सकता है ।

४४४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ छठा अधिकरण

४४४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ छठा अधिकरण

(१) अरिवर्जाः प्रकृतयः सप्तैताः स्वगुणोदयाः । उक्ताः प्रत्यङ्गभूतास्ताः प्रकृता राजसम्पदः ॥ (२) सम्पादयत्यसम्पन्नाः प्रकृतीरात्मवान्नृपः । विवृद्धाश्चानुरक्ताश्च प्रकृतीर्हन्त्यनात्मवान् ॥ (३) ततः स दुष्टप्रकृतिश्चातुरन्तोऽप्यनात्मवान् । हन्यते वा प्रकृतिभिर्याति वा द्विषतां वशम् ॥ (४) आत्मवांस्त्वल्पदेशोऽपि युक्तः प्रकृतिसम्पदा । नयज्ञः पृथिवीं कृत्स्नां जयत्येव न हीयते ॥

इति मण्डलयोनौ षष्ठेऽधिकरणे प्रकृतिसम्पदं नाम प्रथमोऽध्यायः, आदितः षण्णवतितमः ।

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( १ ) आत्मसंपन्न राजा : शत्रु को छोड़कर ( क्योंकि वह राजा होने से स्वामिप्रकृति है ) शेष सात प्रकृतियाँ अपने-अपने गुणों से युक्त बता दी गई हैं । परस्पर सहायक ये अंगभूत प्रकृतियाँ अपने-अपने कार्यों में लगी हुई राजसम्पत्ति नाम से कही जाती हैं ।

( २ ) आत्मसम्पन्न राजा गुणहीन प्रकृतियों को भी गुणी बना लेता है, और आत्मसम्पन्नहीन राजा गुणसमृद्ध तथा अनुरक्त प्रकृतियों को भी नष्ट कर देता है ।

( ३ ) यही कारण है कि दुष्ट प्रकृति राजा चारों समुद्र पर्यन्त पृथ्वी का अधिपति होता हुआ भी या तो अपनी प्रकृतियों द्वारा ही विनष्ट हो जाता है या शत्रु के कब्जे में चला जाता है ।

( ४ ) किन्तु आत्मसंपन्न नीतिज्ञ राजा थोड़ी भूमि का स्वामी होता हुआ भी आत्मप्रकृति के द्वारा सारी पृथ्वी का आधिपत्य प्राप्त कर लेता है और कभी भी क्षीण नहीं होता है ।

मण्डलयोनि नामक षष्ठ अधिकरण में प्रकृतिसम्पदा नामक पहला अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ९७
अध्याय २

शमव्यायामिकम्

(१) शमव्यायामौ योगक्षेमयोर्योनिः ।
(२) कर्मारम्भाणां योगाराधनो व्यायामः । कर्मफलोपभोगानां क्षेमाराधनः शमः ।
(३) शमव्यायामयोर्योनिः षाड्गुण्यम् ।
(४) क्षयस्थानं वृद्धिरित्युदयास्तस्य ।
(५) मानुषं नयापनयौ दैवमयानयौ ।
(६) दैवमानुषं हि कर्म लोकं यापयति । अदृष्टकारितं दैवम् । तस्मिन्निष्टेन फलेन योगोदयः । अनिष्टेनानयः ।
(७) दृष्टकारितं मानुषम् । तस्मिन् योगक्षेमनिष्पत्तिर्नयः । विपत्तिरपनयः । तच्चिन्त्यम् । अचिन्त्यं दैवमिति ।


शांति और उद्योग

( १ ) क्षेम का कारण शांति और योग का कारण व्यायाम है ।

( २ ) दुर्ग संबन्धी तथा संधि आदि कार्यों में कुशल व्यक्तियों को नियुक्त करना ही व्यायाम कहलाता है । दुर्ग तथा सन्धि आदि कर्मफलों के उपयोग में विघ्नों के नाश का साधन ही शुभ ( शांति ) है ।

( ३ ) शम और व्यायाम के कारण हैं—संधि, विग्रह, यान, आसन, संश्रय और द्वैधीभाव आदि छह गुण ।

( ४ ) उन्नति ( वृद्धि ), अवनति ( क्षय ) और समानगति ( स्थान ) ये तीन, उक्त छह गुणों के फल हैं ।

( ५ ) इन तीन फलों को प्राप्त करने वाले दो प्रकार के कर्म हैं : मानुष और दैव । नय तथा अपनय मानुषकर्म हैं और अय तथा अनय दैवकर्म हैं ।

( ६ ) ये दैव और मानुष कर्म ही लोक-जीवन को चलाने वाले दो पहिये हैं । अदृष्ट द्वारा कराया हुआ धर्म तथा अधर्म रूप कर्म दैव कहाता है । उससे इष्ट फल का संबंध जुड़ जाने की स्थिति को अय कहते हैं । यदि प्रतिकूल फल के साथ सम्बन्ध हुआ तो वही अनय की स्थिति है ।

( ७ ) प्रभुशक्ति, मन्त्रशक्ति या उत्साहशक्ति आदि के कारण, संधि, विग्रह

४४६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ छठा अधिकरण

(१) राजा आत्मद्रव्यप्रकृतिसम्पन्नो नयस्याधिष्ठानं विजिगीषुः । तस्य समन्ततो मण्डलीभूता भूम्यनन्तरा अरिप्रकृतिः । तथैव भूम्येकान्तरा मित्रप्रकृतिः ।

(२) अरिसम्पद्युक्तः सामन्तः शत्रुः । व्यसनी यातव्यः । अनपाश्रयो दुर्बलाश्रयो वोच्छेदनीयः । विपर्यये पीडनीयः कर्शनीयो वा । इत्यरिविशेषाः ।

(३) तस्मान्मित्रममित्रं मित्रामित्रम् अरिमित्रमित्रं चानन्तर्येण भूमीनां प्रसज्यते पुरस्तात् । पश्चात्पाष्णिग्राह आक्रन्दः पाष्णिग्राहासार आक्रन्दासार इति ।

(४) भूम्यनन्तरः प्रकृत्यमित्रः तुल्याभिजनः सहजः । विरुद्धो विरोधयिता वा कृत्रिमः ।


आदि गुणों के प्रयोग द्वारा जो कार्य कराया जाय वही मानुषकर्म कहलाता है । उसके होने पर यदि योग, क्षेम की सिद्धि हो जाय तो नय है, और विपत्ति आ जाय तो अपनय कहा जाता है । योग-क्षेम की सिद्धि और विपत्ति के प्रतीकार का साधनभूत मानुषकर्म के संबंध में ही यहाँ विचार किया जायेगा । अचिंत्य दैवकर्म के सम्बन्ध में कुछ कहना सर्वथा असंभव है ।

( १ ) जो राजा आत्मसंपन्न, अमात्य आदि द्रव्यप्रकृतिसंपन्न और नीति का आश्रय लेने वाला हो उसको विजिगीषु कहते हैं । विजिगीषु राजा के चारों ओर के राजा अरिप्रकृति कहलाते हैं । अरिप्रकृति राजाओं की सीमाओं से लगे हुए राजा मित्रप्रकृति कहलाते हैं ।

( २ ) शत्रु के गुणों से युक्त सामन्त शत्रु कहलाता है । व्यसनी शत्रु-राजा पर आक्रमण कर देना चाहिए । आश्रयहीन अथवा दुर्बल शत्रु-राजा पर भी आक्रमण कर देना चाहिए । आश्रययुक्त और सबल शत्रु राजा किसी अपकारक द्वारा तंग किया जाना चाहिए अथवा अन्य उपायों से उसकी सेना और उसके धन की क्षति करनी चाहिए । शत्रु राजा के ये चार भेद हैं ।

( ३ ) विजिगीषु राजा की विजय-यात्रा में आगे क्रमशः शत्रु, मित्र, अरिमित्र, मित्रमित्र और अरिमित्र-मित्र ये पाँच राजा आते हैं । इसी प्रकार उसके पीछे क्रमशः पाष्णिग्राह, आक्रंद, पाष्णिग्राहासार और आक्रंदासार ये चार राजा होते हैं । विजिगीषु राजा के सहित आगे-पीछे के राजाओं को मिलाकर एक राज-मंडल कहलाता है ।

( ४ ) विजिगीषु राजा सीमा से लगा हुआ स्वाभाविक शत्रु और विजिगीषु के वंश में उत्पन्न दायभागी, ये दोनों सहजशत्रु कहलाते हैं । स्वयं विरुद्ध होने वाला अथवा किसी दूसरे को विरोधी बना देने वाला कृत्रिम शत्रु कहलाता है ।

प्र० ६७ : अ० २ ] शान्ति और उद्योग ४४७

(१) भूम्येकान्तरं प्रकृतिमित्रं मातृपितृसम्बन्धं सहजं धनजीवितहेतो-
राश्रितं कृत्रिममिति ।
(२) अरिविजिगीष्वोर्भूम्यनन्तरः संहतासंहतयोरनुग्रहसमर्थो निग्रहे
चासंहतयोर्मध्यमः ।
(३) अरिविजिगीषुमध्यानां बहिः प्रकृतिभ्यो बलवत्तरः संहतासंह-
तानामरि‌विजिगीषुमध्यमानामनुग्रहे समर्थो निग्रहे चासंहतानामुदासीनः ।
इति प्रकृतयः ।
(४) विजिगीषुमित्रं मित्रमित्रं वास्य प्रकृतयस्तिस्रः । ताः पञ्चभि-
रमात्यजनपददुर्गकोशदण्डप्रकृतिभिरेकैकशः संयुक्ता मण्डलमष्टादशकं
भवति । अनेन मण्डलपृथक्त्वं व्याख्यातमरिमध्यमोदासीनानाम् ।
(५) चतुर्मण्डलसंक्षेपः । द्वादश राजप्रकृतयः, षष्टिर्द्रव्यप्रकृतयः,
संक्षेपेण द्विसप्ततिः ।
(६) तासां यथास्वं सम्पदः ।
(७) शक्तिः सिद्धिश्च । बलं शक्तिः । सुखं सिद्धिः ।


( १ ) विजिगीषु के राज्य से एक राज्य को छोड़ कर उसके बाद का स्वभावतः मित्र राजा और विजिगीषु का ममेरा या फुफेरा भाई, ये सहजमित्र हैं । धन या जीवन-जीविका के लिए आश्रय लेने वाला कृत्रिममित्र कहलाता है ।

( २ ) अरि और विजिगीषु राजाओं की संधि में संधि का समर्थक और विग्रह में विग्रह का समर्थक राजा मध्यम कहलाता है ।

( ३ ) अरि विजिगीषु और मध्यम की प्रकृतियों के अतिरिक्त, शक्तिशाली मध्यम राजा से भी बलवान्, अरि, विजिगीषु और मध्यम की संधि में संधि का समर्थक और उनके विग्रह में विग्रह का समर्थक राजा उदासीन कहलाता है । इस प्रकार बारह राजप्रकृतियों का निरूपण किया गया ।

( ४ ) विजिगीषु, मित्र और मित्रमित्र ये तीन प्रकृति हैं । इन तीनों की अलग-अलग अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोष और दण्ड, ये पाँच प्रकृतियाँ, एक साथ मिलकर अठारह प्रकृतियों का एक मंडल होता है । अरि, मध्यम और उदासीन आदि के मंडलों का यही क्रम समझना चाहिए ।

( ५ ) इस प्रकार चार मंडलों का संक्षेप में निरूपण किया गया । बारह राज-प्रकृतियाँ और साठ अमात्य आदि द्रव्य प्रकृतियाँ मिलकर बहत्तर प्रकृतियाँ कही जाती हैं ।

( ६ ) उनकी संपत्तियों का विवेचन पहिले किया जा चुका है ।

( ७ ) इसी प्रकार शक्ति और सिद्धि के संबंध में भी समझना चाहिए । शक्ति को बल और सिद्धि को सुख कहा जाता है ।

४४८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ छठा अधिकरण

(१) शक्तिस्त्रिविधा-ज्ञानबलं मन्त्रशक्तिः, कोशदण्डबलं प्रभुशक्तिः, विक्रमबलमुत्साहशक्तिः। (२) एवं सिद्धिस्त्रिविधैव मंत्रशक्तिसाध्या मंत्रसिद्धिः, प्रभुशक्तिसाध्या प्रभुसिद्धिः उत्साहशक्तिसाध्या उत्साहसिद्धिरिति। ताभिरभ्युच्चितो ज्यायान् भवति। अपचितो हीनः। तुल्यशक्तिः समः। तस्माच्छक्तिं सिद्धिं च घटेतात्मन्यावेशयितुम्। साधारणो वा द्रव्यप्रकृतिष्वानन्तर्येण शौचवशेन वा दूष्यामित्राभ्यां वाऽपकृष्टुं यतेत। (३) यदि वा पश्येत्—'अमित्रो मे शक्तियुक्तो वाग्दण्डपारुष्यार्थदूषणैः प्रकृतिरुपहनिष्यति, सिद्धियुक्तो वा मृगयाद्यूतमद्यस्त्रीभिः प्रमादं गमिष्यति, स विरक्तप्रकृतिरुपक्षीणः प्रमत्तो वा साध्यो मे भविष्यति, विग्रहाभियुक्तो वा सर्वसन्दोहेनैकस्थो दुर्गस्थो वा स्थास्यति, स संहतसैन्यो मित्रदुर्गवियुक्तः साध्यो मे भविष्यति, बलवान् वा राजा परतः शत्रुमुच्छेत्तुकामस्तमुच्छिद्य-मानमुच्छिन्द्यात्' इति। 'बलवता प्रार्थितस्य मे विपन्नकर्मारम्भस्य वा


(१) शक्ति अर्थात् बल के तीन भेद हैं : ज्ञानवल, कोषबल और विक्रमवल। ज्ञानबल ही मंत्रशक्ति है, कोष-सेना बल ही प्रभुशक्ति है और विक्रमवल ही उत्साह-शक्ति है।

(२) इसी प्रकार सिद्धि के भी तीन भेद हैं : मंत्रसिद्धि, प्रभुसिद्धि और उत्साह-सिद्धि। मंत्रशक्ति से होने वाली सिद्धि मंत्रसिद्धि, प्रभुशक्ति से होने वाली सिद्धि प्रभु-सिद्धि और उत्साहशक्ति से होने वाली सिद्धि उत्साहसिद्धि कहलाती है। इन शक्तियों से संपन्न राजा श्रेष्ठ; उनसे रहित अधम और समान शक्ति वाला मध्यम कहा जाता है। इसलिए राजा को चाहिए कि वह अपनी शक्ति तथा सिद्धि को बढ़ाने के लिये निरंतर यत्नशील रहे। जो राजा स्वयं अपनी शक्ति-सिद्धि को बढ़ाने में असमर्थ हो वह इस कार्य को अपनी अमात्य आदि द्रव्य प्रकृतियों के द्वारा या अपनी सुविधा के अनुसार संपन्न करे; और दूष्य तथा शत्रु की शक्ति-सिद्धि को नष्ट करने का यत्न करे।

(३) यदि वह राजा ऐसा देखे कि : मेरा शक्तिशाली शत्रुराजा वाक्पारुष्य, दण्डपारुष्य और अर्थदोष से अपनी अमात्य आदि द्रव्यप्रकृतियों से रुष्ट कर देगा; अथवा वह मृगया, द्यूत और स्त्रियों में आसक्त होकर प्रमादी बन जायेगा; तब निश्चित ही वह प्रकृतियों से विरक्त और प्रमादी शत्रुराजा को 'मैं आसानी से जीत सकूंगा, अथवा जब मैं अपनी संपूर्ण सैन्यशक्ति को लेकर उससे युद्ध करने जाऊँगा तो वह अपनी शक्ति पर गर्वित हो कर किसी स्थान या दुर्ग में अकेला मेरे मुकाबले की प्रतीक्षा में रहेगा'—ऐसी स्थिति में वह मेरी सेना से घिर जायेगा तथा उसको मित्र एवं दुर्ग से कोई सहायता न मिल पावेगी और तब उसे मैं आसानी से जीत सकूंगा,

मण्डलयोनि नामक षष्ठ अधिकरण में शमव्यायामिक नामक दूसरा अध्याय समाप्त ।

प्र० ६७ : अ० २ ] शान्ति और उद्योग ४४९

साहाय्यं दास्यति, मध्यमलिप्सायां च' इति । एवमादिषु कारणेष्वप्यमित्रस्यापि शक्ति सिद्धिं चेच्छेत् ।

(१) नेमिमेकान्तरान् राज्ञः कृत्वा चानन्तरानरान् । नाभिमात्मानमायच्छेन्नेता प्रकृतिमण्डले ॥ (२) मध्ये ह्युपहितः शत्रुर्नेतुर्मित्रस्य चोभयोः । उच्छेद्यः पीडनीयो वा बलवानपि जायते ॥

इति मण्डलयोनौ षष्ठाधिकरणे शमव्यायामिकं नाम द्वितीयोऽध्यायः, आदितः सप्तनवतितमः ।

समाप्तमिदं मण्डलयोनिर्नाम षष्ठमधिकरणम्

—: ० :—


अथवा वह बलवान् शत्रुराजा अपने दूसरे शत्रु का उच्छेद करके ही रुक जायेगा, अथवा किसी दूसरे बलवान् के साथ युद्ध करने पर मुझे क्षीणशक्ति देख कर, मुझे मध्यम राजा बनाने की अभिलाषा से, वह मेरी सहायता करेगा' इस प्रकार की विशेष स्थितियों में वह शत्रु की शक्ति-सिद्धि की भी सम्भावना करें ।

( १ ) नेता विजिगीषु को चाहिए कि वह राजमंडल रूपी चक्र में अपने मित्र राजाओं को नेमि, पास के राजाओं को अरा और स्वयं को नाभि स्थान में समझे ।

( २ ) जो बलवान् शत्रु विजिगीषु और मित्र के बीच में आ जाय वह जीत लिया जाता है या बहुत तंग किया जाता है ।

मण्डलयोनि नामक षष्ठ अधिकरण में शमव्यायामिक नामक दूसरा अध्याय समाप्त ।

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२९ कौ०

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सातवाँ अधिकरण

सातवाँ अधिकरण

षाड्गुण्य

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प्रकरण ९८-९९षाड्गुण्यसमुद्देशः,
अध्याय १क्षयस्थानवृद्धिनिश्चयश्च

(१) षाड्गुण्यस्य प्रकृतिमण्डलं योनिः।
(२) सन्धिविग्रहासनयानद्वैधीभावाः षाड्गुण्यमित्याचार्याः।
(३) द्वैगुण्यमिति वातव्याधिः, सन्धिविग्रहाभ्यां हि षाड्गुण्यं सम्पद्यत इति।
(४) षाड्गुण्यमेवैतदवस्थाभेदादिति कौटिल्यः।
(५) तत्र पणबन्धः सन्धिः, अपकारो विग्रहः, उपेक्षणमासनम्, अभ्युच्चयो यानं, परार्पणं संश्रयः, सन्धिविग्रहोपादानं द्वैधीभाव इति षड्गुणाः।
(६) परस्माद्धीयमानः सन्दधीत। अभ्युच्चीयमानो विगृह्णीयात्। न मां परो नाहं परमुपहन्तुं शक्त इत्यासीत्। गुणातिशययुक्तो यायात्। शक्तिहीनः संश्रयेत। सहायसाध्ये कार्ये द्वैधीभावं गच्छेत्।


छह गुणों का उद्देश और क्षय, स्थान तथा वृद्धि का निश्चय

(१) सात प्रकृतियाँ और बारह राजमंडल ही छह गुणों के आधार हैं।

(२) पुरातन आचार्यों ने १. संधि, २. विग्रह, ३. यान, ४. आसन, ५. संश्रय और ६. द्वैधीभाव ये छह गुण बताये हैं।

(३) आचार्य वातव्याधि का कहना है कि गुण तो दो ही हैं : संधि और विग्रह, बाकी तो उन्हीं के अवांतर भेद हैं।

(४) किन्तु आचार्य कौटिल्य का अभिमत है कि गुण तो छह ही हैं, संधि और विग्रह से बाकी चार गुण सर्वथा भिन्न हैं, इसलिए इन दोनों में उनका अन्तर्भाव कैसे संभव है ?

(५) उनमें दो राजाओं का कुछ शर्तों पर मेल हो जाना सन्धि, शत्रु का कोई अपकार करना विग्रह, उपेक्षा करना आसन, चढ़ाई करना यान, आत्मसमर्पण करना संश्रय, और संधि-विग्रह दोनों से काम लेना द्वैधीभाव कहलाता है—यही छह गुण हैं।

(६) शत्रु की तुलना में अपने को निर्बल समझने पर संधि कर लेनी चाहिए। यदि शत्रु की तुलना में स्वयं को बलवान् समझा जाय तो विग्रह.कर देना चाहिए। यदि शत्रुबल और आत्मबल में कोई अन्तर न समझे तो आसन को अपना लेना

४५४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण

४५४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण

(१) इति गुणावस्थापनम् । (२) तेषां यस्मिन् वा गुणे स्थितः पश्येत् 'इहस्थः शक्ष्यामि दुर्गसेतु-कर्मवणिक्पथशून्यनिवेशखनिद्रव्यहस्तिवनकर्माण्‍यात्मनः प्रवर्तयितुं परस्य चैतानि कर्माण्युपहन्तुम्' इति तमातिष्ठेत्, सा वृद्धिः । (३) 'आशुतरा मे वृद्धिर्भूयस्तरा वृद्ध्युदयतरा वा भविष्यति विप-रीता परस्य' इति ज्ञात्वा परवृद्धिमुपेक्षेत । तुल्यकालफलोदयायां वृद्धौ सन्धिमुपेयात् । (४) यस्मिन् वा गुणे स्थितः स्वकर्मणामुपघातं पश्येन्नेतरस्य तस्मिन्न तिष्ठेत् । एष क्षयः । (५) 'चिरतरेणाल्पतरं वृद्ध्युदयतरं वा क्षेष्ये, विपरीतं परः' इति ज्ञात्वा क्षयमुपेक्षेत । (६) तुल्यकालफलोदये वा क्षये सन्धिमुपेयात् ।


चाहिए। यदि स्वयं को सर्वसंपन्न एवं शक्तिसंपन्न समझे तो चढ़ाई ( यान ) कर देनी चाहिए। अपने को निरा अशक्त समझने पर संश्रय से काम लेना चाहिए। यदि सहायता की अपेक्षा समझे तो द्वैधीभाव को अपनाना चाहिए।

( १ ) यहाँ तक छह गुणों का निरूपण किया गया ।

( २ ) उक्त गुणों में जिस गुण का आश्रय प्राप्त करने पर वह समझे कि, 'मैं इस को अपना कर अपने दुर्ग, सेतुकर्म, व्यापार, नई बस्ती बसाना, खान, लकड़ी के जंगल, हाथियों के जंगल आदि कार्यों को कर सकूँगा और शत्रु के इन कार्यों को नष्ट कर सकूँगा उसका ही आश्रय ले'—इस प्रकार के गुण का आलंबन ही वृद्धि है।

( ३ ) यदि वह समझे कि 'मेरी वृद्धि शीघ्र होगी और शत्रु की देर से, मेरी वृद्धि अधिक होगी और शत्रु की कम, हम दोनों की एक ही समय में बराबर वृद्धि होने पर भी शत्रु की वृद्धि ह्रासोन्मुख होगी और मेरी उदयोन्मुख', ऐसी अवस्था में शत्रु की वृद्धि की कोई चिंता न करे । यदि वह देखे कि शत्रु की वृद्धि भी समानरूप से उदय की ओर अग्रसर हो तो उसके साथ सन्धि कर ले ।

( ४ ) जिस गुण को अपनाने से अपने कार्यों का नाश और शत्रुकार्यों की कोई क्षति न हो, उसको कदापि न अपनाना चाहिए। इस प्रकार के गुण का अवलंबन ही क्षय है।

( ५ ) यदि वह ऐसा समझे कि 'मेरा क्षय बहुत दिनों बाद होगा और शत्रु का जल्दी, मेरा क्षय थोड़ा होगा और शत्रु का अधिक मेरा क्षय उदयोन्मुख होगा और शत्रु का क्षीणोन्मुख,' तो अपने क्षय की कोई परवाह न करे।

( ६ ) यदि शत्रु का क्षय अपने ही समान उदयोन्मुख समझे तो उससे सन्धि कर ले ।

प्र० ९८-९९ : अ० १ ] सन्ध्यादि छह गुण ४५५

(१) यस्मिन् वा गुणे स्थितः स्वकर्मवृद्धिं क्षयं वा नाभिपश्येत्, एतत्तस्थानम्।

(२) 'ह्रस्वतरं वृद्धद्युदयतरं वा स्थास्यामि विपरीतं पर' इति ज्ञात्वा स्थानमुपेक्षेत।

(३) तुल्यकालफलोदये वा स्थाने सन्धिमुपेयादित्याचार्याः।

(४) नैतद्विभाषितमिति कौटिल्यः।

(५) यदि वा पश्येत्—'सन्धौ' स्थितो महाफलैः स्वकर्मभिः परकर्माण्युपहनिष्यामि, महाफलानि वा स्वकर्माण्युपभोक्ष्ये, परकर्माणि वा, सन्धिविश्वासेन वा योगोपनिषत्प्रणिधिभिः परकर्माण्युपहनिष्यामि, सुखं वा सानुग्रहपरिहारसौकर्यं फललाभभूयस्त्वेन स्वकर्मणा परकर्मयोगावहं जनमास्रावयिष्यामि, बलिनातिमात्रेण वा संहितः परः स्वकर्मोपघातं प्राप्स्यति, तेन वा विगृहीतो मया सन्धत्ते, तेन अस्य विग्रहं दीर्घं करिष्यामि, मया वा संहितस्य मद्द्वेषिणो जनपदं पीडयिष्यति, परोपहतो वास्य जन-


(१) अथवा जिस गुण का आश्रय लेने पर अपनी वृद्धि और अपना क्षय कुछ भी न देखे, ऐसी समान स्थिति को स्थान कहते हैं।

(२) यदि वह समझे कि 'मेरी ऐसी दशा थोड़े समय तक रहेगी और शत्रु की बहुत दिनों तक; मेरी यह दशा उदयोन्मुख होगी और शत्रु की क्षयोन्मुख', ऐसी स्थिति में अपनी उस दशा की कोई चिन्ता न करे।

(३) पुरातन आचार्यों का सुझाव है कि 'यदि शत्रु राजा का भी स्थान समकालीन और उदयोन्मुखी हो तो उसके साथ सन्धि कर लेनी चाहिए।'

(४) किन्तु आचार्य कौटिल्य का कहना है कि 'पूर्वाचार्यों का यह सुझाव बहुत ही अनुपयुक्त है।'

(५) किसी विशेष स्थिति में यदि विजिगीषु राजा यह देखे कि 'सन्धि कर लेने पर अपने शक्तिशाली कर्मों से मैं शत्रु के कर्मों का उन्मूलन कर दूँगा; या अपने ही महान फलदायक कर्मों की भाँति शत्रु के कर्मों का उपभोग भी संधि-विश्वास से कर सकूँगा अथवा संधि के बहाने गुप्तचरों तथा विष प्रयोगों द्वारा शत्रु के कर्मों को नष्ट कर सकूँगा, या सन्धि के बहाने शत्रु के कार्यकुशल व्यक्तियों को उत्तम फल तथा पर्याप्त लाभ का प्रलोभन देकर अपने देश में खींच लाऊँगा, जिससे मेरे कृष्य आदि कार्य अधिक लाभदायी होंगे, अथवा अधिक बलवान् शत्रु के साथ संधि करने पर शत्रु को बहुत धन देना पड़ेगा और कोष को क्षीण करने पर वह अपने कर्मों को क्षीण कर लेगा, अथवा शत्रु का जिसके साथ विग्रह हो उसके साथ संधि करके मैं अपने शत्रु के साथ होने वाले विग्रह को अधिक दिनों तक बनाये रखूँगा, अथवा