भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 209

सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [प्रथम यदभावात् कर्तृकर्मणी क्रियां न जनयतः, तत्करणम् । तेन यदभावात् प्रमातृ- प्रमेये प्रमां न जनयतः, तत्प्रमाणमिति लक्षणमित्यपि न युक्तम् । किं प्रमातृप्रमेये सती यत्र न जनयतः, उताऽसती अपि ? आद्ये अतीतानागतानुमानादिकरणा- व्याप्तिः । नापि द्वितीयः ; प्रमातृप्रमेययोरपि प्रसङ्गात् । यथा हि तत्र चक्षुराद्य- भावात् प्रमा न जायते, तथा प्रमातृप्रमेययोरप्यभावात् ; अन्यथा तयोः कारणत्वमेव न स्यात् । एतेन सामान्यतोऽभिधानं प्रत्युक्तम् । अस्मदादिकर्तृसापेक्षेश्वरलैङ्गे च अस्मदादिज्ञाने अस्मदादिकर्तृकरणतापत्तेः । एवञ्च सति प्रकारभेदेनापि प्रमाण- प्रमात्रादिव्यवस्थासमर्थना कृता न स्यात्, येनैव रूपेण कर्तृत्वादिना तस्य प्रमायामन्वयस्तेनैव तद्व्यतिरेकस्य प्रमानुत्पत्तौ प्रयोजकत्वादिति । समर्थन—‘जिसके अभाव से कर्ता और कर्म क्रिया को उत्पन्न न कर सकें, वह करण है । इसी तरह जिसके अभाव से प्रमाता और प्रमेय प्रमिति को उत्पन्न न कर सके’ वह प्रमाण है, खंडन—क्या प्रमाता और प्रमेय के स्वयं रहते ‘जिसके अभाव से’ इत्यादि अभिप्रेत है अथवा उनके न रहने पर भी ? प्रथम पक्ष युक्त नहीं, कारण अतीतअनागतविषयक अनुमितिस्थल में सत् प्रमेय प्रमिति का जनक नहीं होता । अतः वहां अव्याप्ति हो जायगी । द्वितीय पक्ष भी अयुक्त है, कारण कर्ता प्रमाता प्रमेय या कर्म अपने अभाव में भी प्रमा को नहीं कर सकते । अतः प्रमाता और प्रमेय में अतिव्याप्ति हो जायगी । जैसे चक्षुरादि के अभाव में प्रमा नहीं होती, वैसे ही प्रमाता और प्रमेय के अभाव में वह नहीं होती । अन्यथा वे कारण ही नहीं कहे जायेंगे । जैसे कर्ता कर्तृत्वरूपसे क्रिया का कारण है, वैसे ही कर्तृत्वरूप से कर्ता का अभाव भी क्रिया के अभाव का प्रयोजक है । समर्थन – सत्त्व, असत्त्व का निवेश न कर सामान्य रूप से ‘प्रमाता और प्रमेय जिसके अभाव से प्रमा को न कर सकें, वह करण है’ यह लक्षण करेंगे । खंडन—इस सामान्यलक्षण में भी कर्ता और कर्म ‘स्व’ के बिना भी प्रमा को नहीं करते, अतः कर्ता और कर्म में ही अतिव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—हम लोग अपने चाक्षुषादि ज्ञान में स्वयं करण हो जायेंगे, कारण ईश्वर हम लोगों द्वारा ही ज्ञान को उत्पन्न करता है, हम लोगों के बिना नहीं । किञ्च—‘जिसके बिना क्रिया न हो’, यह जैसे ‘करण’ का लक्षण हो सकता है, वैसे ही कर्ता और कर्म का भी लक्षण हो सकता है । अतः यदि करण का उक्त लक्षण करें, तो प्रवृत्तिनिमित्त के भेद से कारकों का परस्पर भेद न हो सकेगा ।