भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

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परिच्छेद ] चरम-व्यापारवत्त्व का खण्डन चरम-व्यापारवत्त्व-खण्डनम् चरमव्यापारवत्त्वं करणत्वमित्यपि न; व्यापाराभावात् लिङ्गपरामर्शस्याकरण- त्वापातात् । न च सविकल्पकव्यापारवतो निर्विकल्पकस्य तत्र प्रामाण्यम्; केवल- विकल्पनीयलिङ्गविषये तदनुपपत्तेः । संस्कारादिपर्यन्तानुसरणे चानुमितेस्त- ज्जन्यत्वे प्रमाणाभावात्, कार्यहितोश्च कारकाव्यापारत्वात्, अपि चाज्ञातकरण- त्वापातात् । न च लिङ्गमेव परामर्शव्यापारवत्तया करणमिति युक्तम्; अनुमितानुमानादौ परामर्शस्यालिङ्गजत्वेन तद्व्यापारत्त्वानुपपत्तेः । आप्तोक्त्यादिभिः 'तत्रासी- चरम-व्यापारवत्त्व का खण्डन समर्थन—चरम व्यापार जिसमें हो, वह करण है। खंडन—लिङ्गपरामर्श में व्यापार न होने से वह करण न कहा जायगा । समर्थन—सविकल्पक लिङ्गपरामर्शरूप व्यापार होने से निर्विकल्पक लिङ्गपरामर्श ही करण है। खंडन—जिन नित्यसाकाङ्क्ष अभाव, समवाय आदि का निर्विकल्पक ज्ञान होता ही नहीं, वे पदार्थ जहां लिङ्ग हों, वहां करणत्व का अभाव हो जायगा । समर्थन—स्वजन्य संस्कार या 'स्व' का ध्वंस ही लिङ्गपरामर्श का व्यापार क्यों न माना जाय ? खंडन—केवल स्वजन्यत्व व्यापार का लक्षण नहीं है; किन्तु स्वजन्य होकर जो स्वजन्य का जनक हो वही व्यापार है। संस्कार या ध्वंस के अनुमिति- कारणत्व में कुछ प्रमाण नहीं है। अतः संस्कार या ध्वंस व्यापार नहीं हो सकता । किञ्च—यदि ध्वंस या संस्कार को उनका व्यापार मानें, तो उनके अतीन्द्रिय होने से ध्वंसादिविशिष्ट परामर्शरूप करण भी अतीन्द्रिय हुआ। फलतः अनुमिति अज्ञातकरणक हो जायगी । समर्थन—धूम आदि लिङ्ग ही परामर्शरूप व्यापार होने से करण हैं। खंडन—'महत्त्वं क्वचित् प्राप्तकाष्ठाकम् , धर्मत्वात्' इस प्रकार अनुमित परममहत्त्व से जहाँ 'आकाशः सर्वगतः परममहत्त्वात्' इस रीति से आकाश में सर्वगतत्व की अनुमिति करते हैं, वहाँ परममहत्त्व स्वविषयक परामर्श का अजनक होने से करण न होगा। कारण, पारिमाण्डल्य, परममहत्त्व आदि स्वविषयक ज्ञान के भी कारण नहीं होते तथा प्रत्यक्ष से अन्य ज्ञान में विषय भी कारण नहीं होते। किञ्च—आप्त की उक्ति से 'वहाँ धूम था' २५