भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

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१६४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम धूमः' इति प्रतीत्य 'तदा तत्र वह्निरप्यासीदि'ति यदनुमानं तत्रासत्त्वात् धूमस्य परामर्शव्यापारवत्तया करणताया दूरनिरस्तत्वात् । किञ्च-यत्किञ्चिदपेक्षया चरमव्यापारवत्त्वस्य सर्वकारकसाधारणात्, सर्वकारकापेक्षया चरमव्यापारवत्त्वस्य स्वापेक्षया चरमत्वानुपपत्त्या सर्वत्रासिद्धेः । कर्त्रपेक्षयेति चेन्न । कर्तृ धर्मिमात्रामपेक्षया विवक्षितत्वे कर्तरि प्रसङ्गतादवस्थ्यात्, व्यापारवत्कर्त्रपेक्षाभिप्राये च कर्तरि स एव प्रसङ्गः । एकव्यापारवत्कर्त्रपेक्षया अपरापरकर्तृव्यापारस्य चरमभावित्वात् । यावद्व्यापारवत्कर्त्रपेक्षापत्तौ तु विवक्षितमपि करणं न स्यात्, आफलसिद्धेः कर्तृव्यापाराविरामात् । व्यापारस्य विच्छेदे तद्धेतुत्वलक्षणक्षीणतापत्तेः । यद्व्यापारानन्तरं कारकान्तरं न व्याप्रीयते, तत् चरमव्यापारमिष्टमिति चेन्न । यह जानकर जहाँ 'तब तो वहाँ वह्नि भी था ही' इत्याकारक जो अनुमिति होती है, उस अनुमिति में धूम के अविद्यमान होने से धूम में परामर्शरूप व्यापारवत्त्व न होने के कारण करणत्व न हो सकेगा। किञ्च-व्यापार में चरमत्व यदि किञ्चित् व्यापार की अपेक्षा विवक्षित हो, तो सभी कारकों के व्यापारों में यत्किञ्चित् की अपेक्षा चरमत्व होने से कारकमात्र में अति- व्याप्ति हो जायगी। यदि सभी कारकों के व्यापार की अपेक्षा चरमत्व की विवक्षा करें, तो स्व में स्व की अपेक्षा चरमत्व न होने से सर्वत्र अव्याप्ति हो जायगी। अथवा यदि कर्ता की अपेक्षा चरमत्व की विवक्षा करें, तो वह चाहे धर्मिमात्र की अपेक्षा विवक्षित हो या व्यापारवत् धर्मी की अपेक्षा, उभयथा कर्ता में अतिप्रसङ्ग हो जायगा। कारण, कर्ता की अपेक्षा या यत्किंचित् व्यापारवत् कर्ता की अपेक्षा अपर कर्तृव्यापार चरम ( उत्तर ) है ही। यदि यावद्व्यापारवत् कर्ता की अपेक्षा चरमत्व की विवक्षा करें, तो कुठारादि भी करण न हो सकेंगे, कारण फल की सिद्धिपर्यन्त कर्ता के व्यापार का विराम नहीं होता । यदि कहें कि करण के व्यापार उत्पन्नकर कर्तृव्यापार निवृत्त हो जाता है, तो करण-व्यापार में चरितार्थ कर्ता प्रधान क्रिया में [ घट में कुलालपिता के तुल्य ] कारण ही न हो सकेगा। समर्थन-जिस व्यापार के अनन्तर अन्य कारक का व्यापार न होता हो, वह चरम व्यापार है। खण्डन-ईश्वरवादी के मत में फलसिद्धिपर्यन्त ईश्वररूप कर्ता के व्यापार का विराम न होने और ईश्वर के व्यापार के अनन्तर अन्य व्यापार न होने