खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] चरम-व्यापारवत्त्व का खण्डन १६५ सेश्वरपक्षे कर्तृव्यापाराविरमात्, तदानन्तर्यासिद्धेस्तत्करणत्वापातात् । अनीश्वर- पक्षे चाक्षसंयोगादिभिरेव सव्यापारे कर्मण्यपि प्रसङ्गात् । छेद्यादेर्हि करणसंयोगादि- व्यापारश्चरम एवेति कुतस्तद्व्यवच्छेदः, हस्ताद्यव्याप्तेश्चेति । अनन्तरफलं करणमित्यपि न । अविशेषितानन्तर्यस्य सर्वकारणसाधारण्यात् । अव्यवहितानन्तर्यस्य व्यापार्यपेक्षस्य यागाद्यव्यापनात् । व्यापारापेक्षस्य च हस्ता- द्यव्यापनात् । व्यापारपरम्परापेक्षस्य सर्वकारकव्यापनात् । किञ्च तत्कार्यो यदि क्रियाहेतुस्तद्व्यापार इष्टः, तदा इन्द्रियकार्यो लिङ्गपरा- मर्headerर्शोऽनुमितिक्रियाहेतुरिति इन्द्रियकरणिकाऽनुमितिः प्राप्ता । से ईश्वर का व्यापार चरम व्यापार है, अतः ईश्वर को करणत्व हो जायगा । अनीश्वर- वादी के मत में विषयेन्द्रिय-सन्निकर्षरूप व्यापार जैसे इन्द्रिय में है, वैसे ही विषय (कर्म) में भी है । अतः कर्म भी करण हो जायगा । काष्ठ-कुठार-संयोगरूप यापार जैसे कुठार में है, वैसे ही काष्ठ में भी है । अतः काष्ठ का व्यवच्छेद कैसे होगा ? किञ्च— हस्त-व्यापार के अनन्तर भी वह्न्यादि का व्यापार होता ही है, अतः हस्त-व्यापार चरम न होने से हस्त में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'जिस कुठारादि के व्यापार के अनन्तर (उत्तर) छिदादि फल होते हों, वह करण है ।' खंडन—यदि अव्यवहित विशेषण से रहित अनन्तरमात्र की विवक्षा करें, तो कर्ता, कर्म आदि के अनन्तर भी फल होने से वे भी करण हो जायेंगे । यदि अव्यवहित अनन्तर की या व्यापारी की अपेक्षा आनन्तर्य की विवक्षा करें, तो क्रियाकलापरूप याग में अव्याप्ति हो जायगी; क्योंकि उसके अव्यवहित उत्तरक्षण में फल नहीं होता, किन्तु कालव्यवधान से होता है । यदि व्यापार की अपेक्षा आनन्तर्य की विवक्षा करें, तो हस्त में अव्याप्ति हो जायगी, कारण वहाँ शर के व्यापार से व्यवधान है । यदि कहें कि हस्तव्यापार से प्रयोज्य होने के कारण शर का व्यापार भी हस्त का ही व्यापार है और उस व्यापारपरम्परा से अनन्तर फल होता है, अतः अव्याप्ति नहीं होगी, तो कर्तादि के व्यापार से प्रयोज्य होने के कारण और उस व्यापारपरम्परा के कर्तृव्यापार होने से कर्ता में अतिव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—'जो जिससे जन्य हो तथा प्रधान क्रिया का जनक हो, वह उसका व्यापार है'—यदि ऐसा व्यापार का लक्षण करें, तो लिङ्गपरामर्श इन्द्रियजन्य है तथा अनुमिति- रूप क्रिया का जनक है, अतः लिङ्गपरामर्श इन्द्रिय का व्यापार हो जायगा और इन्द्रियाँ भी अनुमिति की करण हो जायँगी ।