खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
परिच्छेद ] चरम-व्यापारवत्त्व का खण्डन १६५ सेश्वरपक्षे कर्तृव्यापाराविरमात्, तदानन्तर्यासिद्धेस्तत्करणत्वापातात् । अनीश्वर- पक्षे चाक्षसंयोगादिभिरेव सव्यापारे कर्मण्यपि प्रसङ्गात् । छेद्यादेर्हि करणसंयोगादि- व्यापारश्चरम एवेति कुतस्तद्व्यवच्छेदः, हस्ताद्यव्याप्तेश्चेति । अनन्तरफलं करणमित्यपि न । अविशेषितानन्तर्यस्य सर्वकारणसाधारण्यात् । अव्यवहितानन्तर्यस्य व्यापार्यपेक्षस्य यागाद्यव्यापनात् । व्यापारापेक्षस्य च हस्ता- द्यव्यापनात् । व्यापारपरम्परापेक्षस्य सर्वकारकव्यापनात् । किञ्च तत्कार्यो यदि क्रियाहेतुस्तद्व्यापार इष्टः, तदा इन्द्रियकार्यो लिङ्गपरा- मर्headerर्शोऽनुमितिक्रियाहेतुरिति इन्द्रियकरणिकाऽनुमितिः प्राप्ता । से ईश्वर का व्यापार चरम व्यापार है, अतः ईश्वर को करणत्व हो जायगा । अनीश्वर- वादी के मत में विषयेन्द्रिय-सन्निकर्षरूप व्यापार जैसे इन्द्रिय में है, वैसे ही विषय (कर्म) में भी है । अतः कर्म भी करण हो जायगा । काष्ठ-कुठार-संयोगरूप यापार जैसे कुठार में है, वैसे ही काष्ठ में भी है । अतः काष्ठ का व्यवच्छेद कैसे होगा ? किञ्च— हस्त-व्यापार के अनन्तर भी वह्न्यादि का व्यापार होता ही है, अतः हस्त-व्यापार चरम न होने से हस्त में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'जिस कुठारादि के व्यापार के अनन्तर (उत्तर) छिदादि फल होते हों, वह करण है ।' खंडन—यदि अव्यवहित विशेषण से रहित अनन्तरमात्र की विवक्षा करें, तो कर्ता, कर्म आदि के अनन्तर भी फल होने से वे भी करण हो जायेंगे । यदि अव्यवहित अनन्तर की या व्यापारी की अपेक्षा आनन्तर्य की विवक्षा करें, तो क्रियाकलापरूप याग में अव्याप्ति हो जायगी; क्योंकि उसके अव्यवहित उत्तरक्षण में फल नहीं होता, किन्तु कालव्यवधान से होता है । यदि व्यापार की अपेक्षा आनन्तर्य की विवक्षा करें, तो हस्त में अव्याप्ति हो जायगी, कारण वहाँ शर के व्यापार से व्यवधान है । यदि कहें कि हस्तव्यापार से प्रयोज्य होने के कारण शर का व्यापार भी हस्त का ही व्यापार है और उस व्यापारपरम्परा से अनन्तर फल होता है, अतः अव्याप्ति नहीं होगी, तो कर्तादि के व्यापार से प्रयोज्य होने के कारण और उस व्यापारपरम्परा के कर्तृव्यापार होने से कर्ता में अतिव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—'जो जिससे जन्य हो तथा प्रधान क्रिया का जनक हो, वह उसका व्यापार है'—यदि ऐसा व्यापार का लक्षण करें, तो लिङ्गपरामर्श इन्द्रियजन्य है तथा अनुमिति- रूप क्रिया का जनक है, अतः लिङ्गपरामर्श इन्द्रिय का व्यापार हो जायगा और इन्द्रियाँ भी अनुमिति की करण हो जायँगी ।
१६६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अथ हेतोः सतः कार्यः क्रियाहेतुस्तद्व्यापारः, तथा सति अनुमित्यहेतोरिन्द्रियस्य कुतः करणत्वं स्यादिति । मैवम् ; किं तद्धेतुत्वं यन्नास्त्यनुमितौ इन्द्रियस्य । नियतपूर्वभावित्वमिति चेत् ; अस्ति तावत् पूर्वभावित्वम् । नियतत्वमपि यदि कारणतायां प्रयोजकमिच्छसि, तदा भवतैव यतितव्यं केनचिद्रूपेणेन्द्रियादेर्नियतत्वं प्रति । अन्यथा लिङ्गेन्द्रियादेः परस्परव्यभिचारादकरणिकैव प्रमा स्यात् । मनःसंयोगादेरेव तथात्वे चाऽप्रमासाधारण्यम् । अपि चाक्षादेरकरणत्वापातः ; यत्सामान्ये यत्सामान्यं प्रयोजकं तद्विशेषस्यैव तद्विशेषे प्रयोजकत्वनियमदर्शनात् । ततो येन केनापि रूपेणेन्द्रियस्य प्रमायां नियतत्वमुपपाद्यते तेनैव रूपेण प्रसङ्गोपपत्तिः । समर्थन—'उस क्रिया का हेतु होकर उससे जो जन्य हो तथा उस क्रिया का जो हेतु हो, वह उस क्रिया का व्यापार है'—ऐसा लक्षण करेंगे। एवञ्च इन्द्रिय अनुमितिरूप क्रिया का हेतु नहीं है, अतः लिङ्गपरामर्श इन्द्रिय का व्य पार नहीं और न इन्द्रिय ही अनुमिति की करण है। खंडन—वह हेतुत्व क्या है, जो अनुमिति में इन्द्रिय को नहीं है ? समर्थन—नियम से पूर्ववृत्तित्व ही वह है, इन्द्रिय अनुमिति में नियम से पूर्व- वर्ती नहीं है। खंडन—जहां 'वह्निव्याप्यो धूमः, तद्वांश्च अयं पर्वतः' इत्याकारक प्रत्यक्ष-ज्ञानरूप परामर्श होता है, वहां इन्द्रिय अनुमिति से पूर्ववर्ती तो अवश्य है। रहा नियम से रहना। यदि उसे भी कारणत्व का प्रयोजक मानना चाहते हों, तो आपको ही यत्न करना चाहिए कि किसी रूप से इन्द्रिय नियतपूर्ववर्ती हो। अर्थात् 'प्रमां प्रति प्रमाणं कारणम्' ऐसा कार्यकारणभाव होने से प्रमाणत्वरूप से इन्द्रिय भी प्रमात्वरूप से अनुमिति के नियतपूर्ववर्ती ही है। अन्यथा (यदि सामान्यरूप से कार्यकारणभाव न मानें तो) परस्पर व्यभिचार होने से इन्द्रियादि करण न कहलायेंगे, अर्थात् प्रमा करणरहित हो जायगी। 'आत्म-मनःसंयोग ही प्रमा का करण है, अतः प्रमा करणरहित नहीं होगी', ऐसा भी नहीं कह सकते; क्योंकि आत्म-मनःसंयोग अप्रमा का भी करण है। किञ्च—यदि 'प्रमां प्रति प्रमाणं कारणम्' ऐसा सामान्यरूप से कार्यकारणभाव न मानें, तो 'प्रत्यक्षप्रमां प्रति इन्द्रियप्रमाणं कारणम्' ऐसा विशेष कार्यकारणभाव भी नहीं मान सकते। कारण, जिस सामान्य की 'जिस सामान्य में कारणता होती है, उस विशेष की ही उस विशेष में कारणता होती है' ऐसा नियम है। तस्मात् आप जिस प्रमाणत्व रूप से इन्द्रिय के [ प्रमा में ] कारणत्व का उपपादन करेंगे, उसी प्रमाणत्वरूप से इन्द्रिय के करणत्व का अनुमिति के प्रति हम भी प्रसञ्जन करेंगे ।
५ परिच्छेद ] चरम-व्यापारवत्त्व का खण्डन १६७ अथ प्रमात्वे तत् प्रयोजकम्, न त्वनुमितित्वादाविति चेन्न । निरुपाधित्वा- विशेषेणोक्तार्थानधिक्यात् । सामान्यप्रयोजकत्वेन विशेषत्यागानवकाशादिति । अन्यथा व्यक्तेरकारणकत्वापत्तेः । अथान्यत्रास्तु यद्वा तद्वा करणम् प्रमाविवक्षितजातिविशेषव्यपदेशकं प्रमा- णम् । चतस्रः खल्विमाः प्रत्यक्षादिप्रमितयो भिन्नव्यपदेशभाजः । न च प्रमाता प्रमेयं वा तद्धेतुः, प्रमाणानि तु यथायथं चतसृष्वसाधारणानीति भिन्नबुद्धि- व्यपदेशनिबन्धनानीति । मैवम्; विवक्षितपदं तावल्लक्षणे भण्डालेख्यमिव, पुरुषेच्छानामनियतविषय- त्वात् । अर्थजत्वस्य च साक्षात्कारित्वं प्रति इन्द्रियजत्वाविशिष्टतया अर्थस्यापि समर्थन—प्रमाणत्वरूप से इन्द्रिय प्रमा का प्रयोजक है, अनुमिति का प्रयोजक नहीं । खण्डन—यदि प्रमाणत्वरूप से इन्द्रिय का प्रमा में निरुपाधिक (नियत) सम्बन्ध है, तो प्रमाविशेष (अनुमिति) में है ही। अतः आपने उक्त अर्थ से अधिक कुछ नहीं कहा । कारण, जब इन्द्रियाँ प्रमासामान्य की प्रयोजक हैं तो उनके प्रमाविशेष के प्रयोजकत्व का त्याग नहीं हो सकता। अन्यथा विशेष व्यक्ति अकारणक हो जायगी। अर्थात् तन्तुत्वाक्रान्त तन्तु पटव्यक्ति के प्रति अप्रयोजक हो जायगा । समर्थन—प्रमा से अन्यत्र छिदादि क्रियाओं में करण का जो भी कोई लक्षण करें । प्रस्तुत प्रमास्थल में तो करण का यही लक्षण करेंगे कि 'प्रमा में विवक्षित प्रत्यक्षत्व, अनुमितित्वादि जातियों के व्यवहार या बुद्धि का जो हेतु हो, वह प्रमाण (प्रमिति का करण) है।' देखिये—चार प्रकार की प्रत्यक्षादि प्रमाएँ भिन्न-भिन्न व्यपदेश या बुद्धि की विषय होती हैं। प्रमाता या प्रमेय इस भेद के कारण नहीं हैं; किन्तु इन्द्रिय, परामर्श आदि ही यथायोग्य चारों प्रमितियों में असाधारण हेतु हैं। अतः वे ही भिन्न-बुद्धि या भिन्न-व्यपदेश के कारण हो सकते हैं । खण्डन — लक्षण में 'विवक्षित' पद भण्डालेख्यवत् है, क्योंकि पुरुष की इच्छाएँ अनियतविषयक हुआ करती हैं। अर्थात् किसीके सन्तान-विशेषविषयक प्रश्न करने पर कोई भण्ड (धूर्त) 'पुत्रो न पुत्री' कह देता है। वहाँ नञ् का पुत्र या पुत्री दोनों में अन्वय हो सकने से जिस प्रकार सन्तान-विशेष का निश्चय नहीं हो पाता, उसी प्रकार यहाँ भी विवक्षित वस्तु का निश्चय न हो सकने से यह लक्षण नहीं बन सकता । किञ्च—जैसे इन्द्रियाँ प्रत्यक्षप्रमात्व-व्यवहार की हेतु हैं, वैसे अर्थ (विषय) भी हैं। इसी तरह जैसे शब्द शाब्द-व्यवहार का हेतु है, वैसे ही आप्तवक्ता भी है। अतः
१६८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम करणत्वप्रसङ्गात् । आप्तोक्तौ तु कर्तुरपि शाब्दप्रमाजातिविशेषकत्वेन आप्तेप्रसङ्गात्, ओमित्युत्तरे च पूर्वमेवोक्तमिति । विवक्षितजातिभेदौपयिकत्वेन प्रमित्यसमवायिकारणविशेषकं प्रमाणमित्यपि अत एव प्रयुक्तम् । प्रथम-प्रत्यक्षलक्षण-खण्डनम् एवं विशेषतोऽपि प्रमाणलक्षणानि प्रतिवक्तव्यानि । तथा हि—प्रत्यक्षमिन्द्रि- यार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यभिचारीत्याहुः । किमर्थमिदमुच्यते, किं सजातीय- विजातीयव्यवच्छिन्नतत्प्रतीत्यर्थम्, उत साक्षात्कारित्वप्रतीतये तच्चिह्नोपदर्शन- मिदम्, उत व्यवहारार्थम्, उत प्रत्यक्षादिशब्दप्रवृत्तिनिमित्तावधारणार्थम्, उत अन्यत्किञ्चिदर्थमेव ? अर्थरूप कर्म तथा आप्तरूप कर्ता भी प्रमाण होने लगेंगे । किन्तु कहीं भी कर्म और कर्ता में करणत्व-व्यवहार कभी नहीं होता । अतः आप यह स्वीकार नहीं कर सकते । समर्थन—विवक्षित प्रत्यक्षत्वादि जातिभेदों के उपायभूत होने से प्रमिति के असमवायी कारण आत्ममनःसंयोग के विशेषक ( अप्रमास्थल से व्यावर्तक ) इन्द्रिय, परामर्शादि प्रमाण हैं । खण्डन—'विवक्षित' पद से घटित होने से यह लक्षण भी भण्डालेख्य के तुल्य ही है । किञ्च—प्रत्यक्षस्थल में अर्थ तथा शाब्दस्थल में आप्त भी असमवायी कारण के विशेषक प्रमाण हो जायँगे । प्रथम प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन इस रीति से प्रमाणविशेष के लक्षण भी खण्डनीय हैं । देखिये—'इन्द्रिय तथा अर्थ के सन्निकर्ष (सम्बन्ध) से उत्पन्न तथा अर्थ से अव्यभिचारी ज्ञान प्रत्यक्ष प्रमा है' ऐसा प्रत्यक्ष का लक्षण न्यायसूत्रकार ने किया है । किन्तु प्रश्न है कि आखिर यह लक्षण किसलिए किया—क्या सजातीय ( सदृश ), और विजातीय ( असदृश ) से व्यावृत्त ( भेदयुक्त ) लक्ष्य के स्वरूपज्ञान के लिए लक्ष्यभूत प्रत्यक्ष के ज्ञानार्थ चिह्न-हेतु- प्रदर्शन के लिए, व्यवहार के लिए, प्रत्यक्ष, साक्षात्कारी आदि शब्दों के प्रवृत्तिनिमित्त ( शक्यतावच्छेदक ) के प्रदर्शन के लिए अथवा अन्य ही किसी प्रयोजन के लिए ? )
परिच्छेद ] प्रथम प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन १६६ तत्र नाद्यः । तथा हि—किं सजातीयेति प्रत्यक्षत्वेन साजात्यमपेक्षितम्, रूपा- न्तरेण वा ? नाद्यः ; तस्माद् व्यवच्छेदावधेः सजातीयाद्व्यावृत्तत्वेन व्यवच्छेद- कत्वानुपपत्त्या व्यावृत्तत्वस्वीकारेण अव्यापकत्वात् । नापि द्वितीयः ; विजातीय- पदोपादानवैयर्थ्यात् । अस्ति हि प्रमेयत्वादिना सर्वसाजात्यम् । अथ प्रमाणत्वादिना विशेषेण साजात्यं विवक्षितंवेदमुच्यते; तर्हि लक्ष्य- स्यापि प्रमाणत्वेन साजात्याद् व्यवच्छेद्यकोटिप्रविष्टतया सङ्ग्राह्याभावप्रसङ्गः । लक्ष्यस्य यत्प्रमाणत्वादिभिः सजातीयं तद्व्यवच्छेद्यम् । न च लक्ष्यस्य लक्ष्यं सजातीयम् षष्ठ्यर्थस्य भेदव्यवस्थितत्वादिति चेत्; एवं तर्हि लक्ष्यापेक्षया भिन्नात् व्यवच्छेद इत्येवोच्यताम्, कृतं प्रमाणत्वादिना साजात्येन प्रकृतानु- पयोगिना वर्णितेन ? यद्वा च लक्ष्यादन्यत्वं परेषामवगतं तदा परस्मादन्यत्वमपि लक्ष्यस्यार्थादवगम्यत इति सिद्धमग्रत एव लक्षणप्रयोजनमिति वैयर्थ्यमेव स्यात् लक्षणाख्यानस्येति । इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं है । देखिये—सजातीयत्व ( सादृश्य ) प्रत्यक्षत्वरूप से इष्ट है या रूपान्तर से ? यदि प्रत्यक्षत्वरूप से साजात्य लें, तो उस व्यवच्छेद के अवधिभूत सजातीय प्रत्यक्ष से व्यवच्छेद ( भेद ) न हो, तो लक्षण न होगा । यदि सजातीय से व्यवच्छेद हो, तो जिस सजातीय से व्यवच्छेद होगा, उसमें लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । यदि अन्यरूप से साजात्य लें, तो विजातीय पद व्यर्थ होगा । कारण, प्रमेयत्वरूप से तो प्रत्यक्ष के सभी सजातीय ही हैं । समर्थन—प्रमाणत्व आदि धर्म से साजात्य की विवक्षाकर विजातीय पद का उपादान करेंगे । खण्डन—प्रत्यक्ष भी प्रमाणत्वरूप से सजातीय है । अतः लक्ष्य की भी व्यावृत्ति होने से संग्राहा ( लक्ष्य ) का अभाव हो जायगा । समर्थन—लक्ष्य से जो प्रमाणत्वरूप से सजातीय हो, वह व्यवच्छेद्य है । लक्ष्य लक्ष्य का सजातीय नहीं है, कारण सादृश्य भेद में ही होता है । अतः 'स्व' में स्व का सादृश्य नहीं होता । खंडन—यदि ऐसा है, तो 'लक्ष्य से जो भिन्न हो, उससे व्यवच्छेद के लिए लक्षण है' इतना ही कहें, प्रकृत में अनुपयोगी प्रमाणत्व आदि से साजात्य की विवक्षा व्यर्थ है । यदि लक्ष्य से अन्यत्व पर में अवगत है, तो पर से अन्यत्व भी लक्ष्य
२०० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अस्तु वा विवक्षावैचित्रीवशात् कथमपीदृशमभिधानम् ; तथापि न तावदनेन लक्षणेनानवगतेनैव व्यवच्छिन्नप्रतीतिसम्भवः ; अतिप्रसङ्गात् । नापि ज्ञातेन ; दुरवधारणत्वात् । तथा हि—न तावदिन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पत्तिः , प्रत्यक्षाऽप्रत्यक्ष- विशेषणत्वात् । नापि कार्येण लिङ्गेन तदुपपत्त्या वा तदवगमः ; ताभ्यां सामान्यतः कारणमात्राक्षेपेण कारणगतानुगतरूपासिद्धौ एकरूपलक्षणासिद्धेः । कार्यस्यैकजात्यात् एकजातीयकारणसिद्धिरिति चेत् ; तर्हि कार्यगतैकजात्यस्य में अवगत ही है। अतः लक्षण करने से पहले ही लक्षण के प्रयोजन व्यावृत्ति की- सिद्धि होने से लक्षण करना व्यर्थ हो जायगा । समर्थन—जैसे घट से पट के अन्यत्व के अज्ञानकाल में भी पट से अन्यत्वरूप से घट का प्रत्यक्षज्ञान होता है, वैसे ही लक्ष्य से अन्यत्वरूप से अज्ञात अलक्ष्य से अन्यत्वरूप से लक्ष्य का ज्ञान लक्षणरूप व्यतिरेकी हेतु से हो सकता है, अतः लक्षण व्यर्थ नहीं है। खण्डन—इस रीति से यदि आप कथञ्चित् विवक्षा-वैचित्र्य अर्थात् लक्ष्य से भिन्न लक्ष्य की व्यावृत्ति या सजातीय विजातीय, लक्ष्य से लक्ष्य की व्यावृत्ति के लिए लक्षण की सार्थकता कहें, तो वह भी युक्त नहीं है। कारण, अज्ञात लक्षण से इतरव्यावृत्तत्वरूप से लक्ष्य का ज्ञान नहीं हो सकता । यदि अज्ञात लक्षण से इतर-व्यावृत्तत्व- रूप से लक्ष्य की प्रतीति हो, तो सर्वदा व्यावृत्तत्वरूप से लक्ष्य की प्रतीति होनी चाहिए, पर वह होती नहीं। ज्ञात लक्षण से भी इतरव्यावृत्तत्वरूप से लक्ष्य की प्रतीति नहीं हो सकती, क्योंकि लक्षण का ज्ञान इन्द्रियरूप अतीन्द्रिय पदार्थ से घटित होने से वह चक्षुरादि इन्द्रियों से हो नहीं सकता । कार्यरूप लिङ्ग से या कार्य की अनुपपत्ति से भी लक्षण का ज्ञान संभव नहीं, क्योंकि कार्य से कारणमात्र की अनुमिति या आक्षेप करें, तो भी कारणगत अनुगतरूप की असिद्धि होने से एकरूप लक्षण भी असिद्ध ही होगा । समर्थन—प्रत्यक्षरूप कार्य एकजातीय है, अतः उससे एकजातीय इन्द्रियार्थों के सन्निकर्षरूप कारण का आक्षेप संभव होने से वही लक्षण हो जायगा। खंडन—यदि ऐसा है, तो कार्यगत ऐकजात्य साक्षात्कारित्व का प्रथम ज्ञान अवश्य मानेंगे। उसीसे सजातीय- विजातीय-व्यावृत्त लक्ष्य की प्रतीति हो जायगी। अतः यह परम्परा-कुसृष्टि ( साक्षात्का-
परिच्छेद ] प्रथम प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन २०१ पूर्वमवश्यं प्रत्येत्तव्यत्वाङ्गीकारे तत एव सजातीयविजातीयव्यवच्छेदप्रतिपत्तिरस्तु, कृतमनया पारम्पर्यकुसृष्ट्या । नन्वेतावताऽपि न प्रकृतलक्षणखण्डनं भवति, अव्याप्तेरतिव्याप्तेर्वाऽनुद्भावनात् । मैवम्; प्रथमभावितयाऽवश्यानुष्ठेयतया च लघोरुपायात् साध्यसिद्धौ सम्भवन्त्यां चरमभावितयाऽवश्यानुष्ठेयत्वाभावेन च गुरुपाये प्रवर्तमानस्य तवैवेदं दोषोद्भावनं प्रदीपे प्रदीपान्तरं प्रज्वाल्य तमोनाशाय यतमानस्येव पुंसः। न हि तस्य दीपा- न्तरस्य कश्चिद्दोषः , किन्तु तथाकारी पुरुष एव पर्य्यनुयोज्यः । सर्वसाधनसाधा- रणोऽयं वा दोषो यत्सम्भवदेवंविधलघूपायत्वं नाम, स्वरूपासिद्धिरिव सर्व- प्रमाणानाम् । तस्मान्मा नाम भूदतिव्याप्त्यादिदोषः , सामान्यदोषादेवेदं लक्षणं दुष्टमिति । रित्व के ज्ञान से इन्द्रियार्थसन्निकर्षजत्व का ज्ञान और उससे सजातीय-विजातीय की व्यावृत्ति ) की कल्पना व्यर्थ है । समर्थन—इससे भी इन्द्रियार्थसन्निकर्षजत्वरूप लक्षण का खण्डन नहीं होता, क्योंकि आपने लक्षणमें अव्याप्ति, अतिव्याप्ति आदि कोई दोष तो दिया ही नहीं । खण्डन—कार्यगत ऐकरूप्य साक्षात्कारित्व ( इन्द्रियार्थसन्निकर्षजत्व ) का अनुमापक होने से पूर्व में ज्ञेय तथा अवश्य स्वीकारणीय है और कारणगत ऐकरूप्य अनुमेय होने से पश्चात् ज्ञेय है। सिवा इसके कार्यगत वैरूप्य से ही व्यावृत्तिरूप स्वकार्य की सिद्धि होने से वह अवश्य स्वीकर्त्तव्य भी नहीं है। अतः जब लघु उपाय से कार्य की सिद्धि हो रही हो, तो गुरु उपाय में आपकी प्रवृत्ति गौरव दोषयुक्त ही कही जायगी । जैसे—समीप में एक प्रदीप के प्रज्वलित रहते तमोनाश के लिए दूरस्थ अन्य प्रदीप के प्रज्वालन में यत्न करनेवाले पुरुष का उद्योग गौरव दोष से युक्त होता है, वैसी ही स्थिति यहाँ भी है। प्रस्तुत दृष्टान्त में अन्य प्रदीप का कुछ दोष नहीं, किन्तु एक प्रदीप के रहते भी अन्य प्रदीप के लिए उद्योगकारी पुरुष का ही दोष है। जैसे स्वरूपासिद्धि सर्वप्रमाण-साधारण दोष है, वैसे ही लघु उपाय होते हुए भी गुरु उपाय का अवलम्बन भी सर्वसाधन-साधारण दोष है। तस्मात् अतिव्याप्ति आदि दोष न होने पर भी गौरवरूप दोष से यह लक्षण दुष्ट ही है । २६
२०२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [प्रथम एतेन द्वितीयोऽपि निरस्तः, साक्षात्कारित्वावगममन्तरेण तदवगमानुपपत्तेः । तदवगमाच्चास्य प्रतीतावन्ग्योन्याश्रयप्रसङ्गः । अस्तु वा अन्यदपि किञ्चिदिन्द्रियजत्वे लिङ्गम्, तथापि तदेव साक्षात्कारित्वा- विनाभूततया प्रत्यक्षलक्षणमुपन्यस्यतां सन्निहितप्रतिपत्तिकत्वात् । न च तदवश्यं व्यापकं वक्तव्यम्, लिङ्गस्य तद्व्याप्यत्वेनैवोपपत्तेरिति चेन्न । यत्र लिङ्गमव्यापकत्वान्नास्ति तत्रेन्द्रियजत्वस्य प्रमाणाभावात् प्रत्त्येतुमशक्यत्वेन कथं ततः साक्षात्कारित्वावगमः । यदा च क्वचित्प्रत्यक्षजातीय एव प्रमाणा- भावादिन्द्रियजत्वमनवधारणीयतया साक्षात्कारित्वव्यापकत्वेनानवगतमपि लक्षणम्, तदा किमपराद्धं लिङ्गान्तरेणाव्यापकेन । 'साक्षात्त्व के अनुमितिरूप ज्ञान के हेतु-प्रदर्शन के लिए लक्षण है' यह द्वितीय कल्प भी अयुक्त है । कारण, ज्ञात हेतु ही अनुमिति का कारण होता है और हेतु का प्रत्यक्षात्मक ज्ञान पूर्वोक्त रीति से हो नहीं सकता । यदि साक्षात्कारित्व से लक्षणरूप हेतु की अनुमिति करें, तो उक्त लक्षणरूप हेतुज्ञान से साक्षात्कारित्व की अनुमिति और साक्षात्त्व के ज्ञान से उक्त हेतु का ज्ञान होने से अन्योन्याश्रय हो जायगा । समर्थन—साक्षात्त्व से उक्त लक्षणरूप हेतु की अनुमिति नहीं होती; किन्तु अपरोक्षव्यवहारहेतु ज्ञानत्वरूप हेतु से होती है। अतः अन्योन्याश्रय नहीं है। खंडन—तब साक्षात्कारित्व का व्याप्य अपरोक्षव्यवहारहेतु-ज्ञानत्व ही लक्षण हो, कारण इन्द्रियार्थसन्निकर्षजत्वरूप हेतुज्ञान के लिए वह प्रथम ज्ञेय है । समर्थन—लक्षण लक्ष्य का अवश्य व्यापक होता है । अतः प्रत्यक्ष का व्यापक होने से इन्द्रियार्थ-सन्निकर्षजत्व ही लक्षण है । अपरोक्ष-व्यवहारहेतु-ज्ञानत्व लक्ष्य का व्यापक नहीं है, कारण 'ग्रामं गच्छन् तृणं स्पृशति' इस स्थल में तृण का त्वाच-प्रत्यक्ष होने पर भी अपरोक्षव्यवहार नहीं होता । प्रत्युत वह व्याप्य है और व्याप्य ही हेतु होता है । अतः अपरोक्ष्यव्यवहारहेतुत्व उक्त लक्षण का अनुमापक हेतु ही है, प्रत्यक्ष का लक्षण नहीं। खंडन—जहां उपेक्ष्य तृणादि-ज्ञान में अपरोक्ष्यव्यवहारहेतुत्वरूप हेतु के न होने से इन्द्रियार्थ-सन्निकर्षजत्व का अवगम नहीं होता, वहां उक्त हेतु से साक्षात्कारित्वरूप लक्ष्य का अवगम कैसे होगा ? किञ्च—जब उपेक्ष्य तृणादि के त्वाच- प्रत्यक्ष में ज्ञापक हेतु के न होने से साक्षात्कारित्व के व्यापकत्वरूप से अनवगत भी इन्द्रियार्थ-सन्निकर्षजत्व लक्षण हो सकता है, तब अव्यापक अपरोक्ष्यव्यवहारहेतुत्व का क्या अपराध है कि वह लक्षण न हो । कारण, अज्ञात-दशा में व्यापकत्व भी अकिञ्चित्कर है।
परिच्छेद ] प्रथम प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन २०३ अथ यत्र तदिन्द्रियजत्वे लिङ्गं नास्ति तत्र लिङ्गान्तरात्तत्प्रत्येतव्यम् । तथापि तदेवास्तां साक्षात्कारित्वे लिङ्गम्, कृतमिन्द्रियजत्वानुमानपूर्वकतदनुमानकल्पनया। अथ तथा लिङ्गद्वयं तत् प्रत्येकमव्यापकतया न लक्षणम्, इन्द्रियजत्वन्तु तथात्वात् लक्षणमिति चेन्न । साक्षात्कारित्वानुमानस्य लक्षणप्रयोजनस्योभाभ्यामेव सिद्धेः कृतं व्यापकेन तेन । नापि तृतीयः ; स ह्येवंरूपो यदिन्द्रियार्थसन्निकर्षजनितं तत्प्रत्यक्षमिति व्यवह- र्तव्यमिति। अयमप्यर्थोऽनुपपन्नः ; लक्षणस्य ज्ञातुमशक्यत्वात् । साक्षात्कारित्वा- त्तदवगमे साक्षात्कारित्वमेवास्तु व्यवहारनियमनिदानम्, अव्यवहितप्रतिपत्तिकत्वा- दित्यावेदितम् । अत एव न चतुर्थः , कल्पनागौरवदोषाधिकः । समर्थन—जिस स्थल में अपरोक्ष्यव्यवहारहेतुत्व नहीं है, वहाँ अन्य लिंग ( सविशेषार्थप्रधानत्व ) से इन्द्रियार्थसन्निकर्षजत्व की अनुमिति होगी । खण्डन-तब तो सविशेषार्थप्रधानत्व ही साक्षात्कारित्व का साक्षात् हेतु हो, इन्द्रियार्थसन्निकर्षजत्व की अनुमिति द्वारा साक्षात्त्व की अनुमिति व्यर्थ है । समर्थन-अपरोक्ष्यव्यवहारहेतुत्व तथा सविशेषार्थप्रधानत्व प्रत्येक में अव्यापक हैं। अर्थात् अपरोक्ष्यव्यवहारहेतुत्व उपेक्ष्य तृण के त्वचा में तथा सविशेषार्थप्रधानत्व 'प्रमेयवत्त्वम्' इत्याकारक प्रत्यक्ष में अव्यापक है । अतः वे लक्षण नहीं हो सकते । किन्तु इन्द्रियजत्व ही व्यापक होने से लक्षण है । खंडन—लक्षण का प्रयोजन साक्षात्कारित्व का ज्ञान होना है। वह ज्ञान दोनों से हो जायगा, फिर व्यापक इन्द्रियार्थसन्निकर्षजत्वरूप लक्षण व्यर्थ ही है । 'साक्षात्कारिप्रमिति प्रत्यक्षस्वरूप से व्यवहर्तव्य है, इन्द्रियार्थसन्निकर्षजन्य होने से' यह तृतीय कल्प भी अयुक्त है । कारण, उक्त लक्षण का ज्ञान ही नहीं हो सकता । यदि साक्षात्कारित्वरूप कार्यगत ऐक्यरूप से उक्त लक्षण की अनुमिति करें, तो अच्छा है कि साक्षात्कारित्व से उक्त लक्षण द्वारा व्यवहारानुमिति की अपेक्षा लाघवात् साक्षात् साक्षात्कारित्व से ही प्रत्यक्षत्वव्यवहार की अनुमिति करें । 'प्रत्यक्ष, साक्षात्कारी आदि शब्दों का इन्द्रियार्थ-सन्निकर्षजत्व प्रवृत्तिनिमित्त ( शक्य- तावच्छेदक ) है, इस बात के निश्चय के लिए लक्षण है' यह चतुर्थ कल्प भी अयुक्त है । कारण, उक्त लक्षण का ज्ञान साक्षात्कारित्व से होगा । अतः उपस्थित होने तथा अनेक विशेषणयुक्त उक्त गुरु लक्षण की अपेक्षा लघु होने के कारण साक्षात्त्व को ही प्रवृत्तिनिमित्त मानना उचित है ।
नापि पञ्चमः ; तादृशस्य दर्शयितुमशक्यत्वात् । द्वितीय-प्रत्यक्ष-लक्षण-खण्डनम् एतेन भासमानाकारेन्द्रियसंयोगजं प्रत्यक्षमित्यपि निरस्तम् । किञ्च—प्रमाणविशेषलक्षणमिदं प्रमाणलक्षणोपसङ्गृहीतस्य कियतः सङ्ग्रा- हकम्, कियतश्च प्रतिषेपकं वक्तव्यम्, प्रमाणलक्षणेन च व्यभिचारिणो निवृत्तिः प्रदर्श्यते । तथा च सति यथाश्रुतमिदमलक्षणम्, व्यभिचार्यपि हि भासमानस्य सत्तादेशाकारस्येन्द्रियसंयोगादुत्पद्यते । अथ विशेषाभिप्रायेणेदं लक्षणं वाच्यम् ; तथाऽप्यसङ्गतिः । तथा हि—किं कियन्मात्रभासमानेन्द्रियसम्प्रयोगजत्वं विवक्षितम्, उत यावद्भासमानेन्द्रियसम्प्र- योगजत्वम् ? आद्ये व्यभिचार्यव्यवच्छेदः, निर्विकल्पकासङ्ग्रहश्च । पञ्चम कल्प ( अन्य ही किसी प्रयोजन के लिए ) भी युक्त नहीं है, क्योंकि उसे दिखा नहीं सकते । द्वितीय प्रत्यक्षलक्षण का खण्डन 'भासमान आकार से इन्द्रिय का जो सम्प्रयोग ( सन्निकर्ष ) है, तज्जन्य ज्ञान प्रत्यक्ष है' यह लक्षण भी पूर्वोक्त रीति से ( निष्प्रयोजन होने से ) ही अयुक्त है । किञ्च—प्रमाणविशेष ( प्रत्यक्ष ) का यह लक्षण प्रमाण-लक्षण द्वारा उपसंगृहीत कुछ लक्ष्यों का संग्राहक तो कुछ का व्यवच्छेदक मानना होगा । प्रमाणसामान्य का लक्षण व्यभिचारी शुक्ति-रजतज्ञान का व्यवच्छेदक है, तो विशेष लक्षण को भी ऐसा होना चाहिए । किन्तु 'भासमान आकार तथा इन्द्रिय-सम्प्रयोगजन्यत्व'रूप यथाश्रुत यह लक्षण उक्त व्यभिचारी ज्ञान में भी है। कारण, व्यभिचारी ज्ञान भी भासमान इदन्तरूप आकार से इन्द्रिय के सन्निकर्ष से ही उत्पन्न होता है । अतः ऐसा यथाश्रुत लक्षण नहीं हो सकता । यदि घटत्व-पटत्वादि विशेष आकार के अभिप्राय से लक्षण करें और व्यभिचारी में रजतत्वरूप विशेष आकार के न होने से उसका व्यवच्छेद मान लें, तो वह भी असङ्गत ही है। देखिये—क्या कियन्मात्र भासमान आकार और इन्द्रिय का सम्प्रयोग विवक्षित है या यावत् भासमान आकार और इन्द्रिय का सम्प्रयोग ? प्रथम पक्ष अयुक्त है, कारण व्यभिचारिज्ञान भी कियन्मात्र भासमान आकार ( इदमाकार ) तथा इन्द्रिय के सम्प्रयोग से जन्य है ही, अतः उसमें अतिव्याप्ति बनी ही रहेगी । सिवा, निर्विकल्पक ज्ञानमें अव्याप्ति भी हो जायगी । कारण, निर्विकल्पक ज्ञान में वस्तुमात्र भासता है और वह निर्भाग है । अतः निर्विकल्पक ज्ञान भासमान सकल आकार तथा इन्द्रिय के सम्प्रयोग से ही होता है, कियन्मात्र भासमान आकार से नहीं ।
परिच्छेद ] द्वितीय प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन २०५ नापि द्वितीयः; विकल्पासहत्वात् । तथा हि—किं भासमानताविशिष्टस्येन्द्रिय- सम्प्रयोगः, उत भासमानतोपलक्षितस्य ? नाद्यः; पूर्वं भासमानत्वाभावात् कारणस्य च पूर्वभावित्वात् । द्वितीये लटोऽविवक्षितार्थत्वम्, विवक्षितार्थत्वं वा ? नाद्यः; तथा हि—यावद्भासमानाकारेन्द्रियसंयोगजमपि भवति घटोऽयमिति विज्ञानम् । न च तदात्मनि प्रत्यक्षम्, आत्मनस्तदीयाविषयत्वात्, प्रामाण्यस्य च विषयनियतत्वात् । यत्र प्रामाण्यं तत्रैव विषये तद्विशेषस्य प्रत्यक्षत्वस्य वक्तव्यत्वात् । अन्यथा पटास्तित्वे घटोऽयमिति प्रत्यक्षं प्रमाणयतः किमुत्तरम् ? नन्विदमुत्तरम्—घटविज्ञानं पटे न प्रत्यक्षम्, न हि तदिन्द्रियसन्निकर्षेणो- त्पन्नमिति । तत् किमात्मेन्द्रियसन्निकर्षजं घटज्ञानमात्मनि प्रत्यक्षमेव ? कथमेवं स्यात्, आत्मेन्द्रियसन्निकर्षाद् घटज्ञानस्योत्पादेऽपि आत्मनोऽनवभासमानत्वादिति ‘भासमान यावत् आकार और इन्द्रिय के सम्प्रयोग से जन्य ज्ञान प्रत्यक्ष है’ यह द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं । कारण, यह विकल्प को सहन नहीं कर सकता । देखिये— क्या भासमानताविशिष्ट में इन्द्रिय का सम्प्रयोग विवक्षित है या भासमानता से उपलक्षित में ? प्रथम पक्ष युक्त नहीं, कारण इन्द्रिय-सम्प्रयोग से पूर्व भासमानता का अभाव है। भासमानता के कारणीभूत इन्द्रिय-सम्प्रयोग की स्थिति भासमानता से पूर्व ही होनी चाहिए । ‘भासमानता से उपलक्षित में इन्द्रिय का सम्प्रयोग हो,’ इस द्वितीय कल्प में भी लट् का अर्थ अविवक्षित है या विवक्षित ? प्रथम पक्ष युक्त नहीं, क्योंकि ‘घटोऽयम्’ यह ज्ञान यावत् भासमान आकार तथा इन्द्रिय के सम्प्रयोग से जन्य होता है । अतः वह आत्मा में भी प्रत्यक्ष हो जायगा । किन्तु आत्मा में ‘घटोऽयम्’ यह प्रत्यक्ष नहीं हो सकता, क्योंकि आत्मा उस ज्ञान का विषय नहीं है और प्रामाण्य विषय से नियत है । अर्थात् जिस विषय में जो प्रमाण हो, उसी विषय में वह प्रमाणविशेष प्रत्यक्ष कहा जाता है । यदि यह न मानें, तो पट के अस्तित्व में ‘घटोऽयम्’ इस प्रत्यक्ष ज्ञान को कोई प्रमाण दे तो क्या उत्तर होगा ? समर्थन—ऐसा उत्तर देंगे कि घटज्ञान पट और इन्द्रिय के सन्निकर्ष से जन्य नहीं है । अतः पट में वह ज्ञान प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं हो सकता । खंडन—क्या आत्मा और मनोरूप इन्द्रिय के सन्निकर्ष से जायमान घटज्ञान आत्मा में प्रत्यक्ष है ? समर्थन—घटज्ञान आत्मा में प्रत्यक्ष कैसे हो सकता है, क्योंकि यद्यपि वह आत्मा तथा इन्द्रिय ( मन ) के सन्निकर्ष से उत्पन्न है, तथापि आत्मा भासमान नहीं है। खण्डन—‘भासमान’
२०६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम चेन्न । भासमानेत्यत्र लटोऽविवक्षितार्थत्वपक्षमधिकृत्येदं भवतोच्यत इति स्मर्तव्यम् । अस्ति ह्यात्मनो भासमानत्वं कदाचित् केनचिद्, अन्यथा अप्रमेयत्वप्रसङ्गात् । उक्तलक्षणकं स्वविषये प्रत्यक्षम् , न त्वन्यत्राऽपीति चेन्न । स्वशब्देन यदि ज्ञानमात्रं विवक्षितं तदा स दोषस्तदवस्थः । अथ ज्ञानव्यक्तिरपेक्षिता, तदा लक्ष्यस्वरूपस्यासाधारणतया तत्परित्यागेन लक्षणस्यान्यत्र गन्तत्वादतिव्याप्तिः । व्यक्त्यन्तरस्य लक्षणाश्रयस्य एकव्यक्त्यभिहितलक्ष्यीभूतासाधारणरूपत्वाभावात् । व्यक्त्यन्तरमपि लक्ष्यमेव, अलक्ष्ये च लक्षणस्य गमनादतिव्याप्तिरिति चेन्न । यदेकत्रासाधारणस्वरूपं लक्ष्यत्वेन निरूच्यते भवता, न तदन्यस्य स्वरूपम् । अतः कथं 'तदपि लक्ष्यमि'ति अपिशब्देनानेकं साधारणीकृत्य समुचेतुं शक्यम् । यदपि साधारणं रूपं तदूध्र्वव्यक्त्यन्तरव्यवच्छेदकस्वविषयपदं विशेषणं प्रक्षिपता भवतैवासाधारणीकृतम् । स्वशब्दस्य ज्ञानमात्रार्थत्वे दोषस्योक्तत्वात् । स्वत्वस्य इस विशेषण में लट् का अर्थ अविवक्षित है, इस कल्प का आश्रयणकर आप उत्तर कह रहे हैं, इसका स्मरण कीजिये । कदाचित् किसी कारण आत्मा का भी भान होता ही है । अन्यथा आत्मा अप्रमेय हो जायगी । समर्थन—'भासमान आकार और इन्द्रिय के संप्रयोग से जन्य ज्ञान स्वविषय में प्रत्यक्ष है' ऐसा लक्षण करने पर घटज्ञान आत्मा में प्रत्यक्ष न होगा । खण्डन— यदि 'स्व' शब्द को ज्ञानसामान्यपरक मानें, तो आत्मा भी यत्किञ्चित् ज्ञान का विषय होती ही है । अतः पुनः घटज्ञान आत्मा में प्रमाण होने लगेगा । यदि ज्ञानव्यक्तिपरक मानें, तो जो ज्ञानव्यक्ति 'स्व' शब्द से गृहीत होगी, वही लक्ष्य हुई, अन्य व्यक्ति नहीं; क्योंकि लक्ष्य का असाधारणरूप तद्व्यक्तित्व उस व्यक्ति में नहीं है और लक्षण अन्यव्यक्ति-साधारण है । अतः अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—अन्य व्यक्ति भी लक्ष्य ही है, अलक्ष्य में लक्षण का गमन ही अतिव्याप्ति है । खंडन—आप स्वविषयक प्रत्यक्ष को लक्ष्य कहते हैं, वह रूप अन्यत्र नहीं है । अतः 'वह भी लक्ष्य है' इस प्रकार अपि (भी) शब्द से उस व्यक्ति का समुच्चय कैसे कर सकते हैं। जो प्रत्यक्षत्व अन्यव्यक्तिसाधारण था, उसे भी 'स्वविषय में' यह विशेषण देकर आपने ही असाधारण कर दिया । यदि 'स्व' शब्द ज्ञानमात्रपरक मानें, तो 'घटज्ञान आत्मा में भी प्रत्यक्ष हो जायगा' यह दोष हम कह ही आये हैं । किञ्च—सम्पूर्ण ज्ञान में अनुगत स्वत्व का निर्वचन भी नहीं हो सकता,
परिच्छेद ] द्वितीय प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन २०७ चानुगतस्वरूपस्य निर्वक्तुमशक्यत्वात् । अन्यथा अन्यव्यक्तिविषयस्यान्यत्र तथात्वापत्तेः । नापि द्वितीयः पक्षः ; विकल्पासहत्वात् । किं सम्प्रयोगापेक्षया वर्तमानत्वम् , अथ यत्किञ्चिदपेक्षया ? प्रथमे विशेषणत्वपक्षान्न विशेष इत्युक्तदोषापत्तिः । द्वितीये तु लटोऽविवक्षितार्थत्वमेव स्यात्, व्यवच्छेद्ययोर्भासितभासिष्यमाणयोरपि तदा तदा भासमानत्वस्वीकारात् । इन्द्रियसम्प्रयोगानन्तरं भासमानत्वमपेक्षितम्, अतो विवक्षितार्थमिति चेन्न । आत्मनोऽपीन्द्रियसंयोगानन्तरं भासमानत्वमस्ति । न हि स यदा मनसा गृह्यते तदा नेन्द्रियसंयोगानन्तरम् । जिससे उसे स्वस्वरूप से संग्रहकर 'स्व' शब्द को ज्ञानमात्र का वाच्य मानें । यदि कथञ्चित् स्वत्व का निर्वचन भी करें, तो ज्ञानमात्र के 'स्व'शब्दवाच्य होने से अन्यविषयक ज्ञान अन्य में, अर्थात् घटज्ञान आत्मा में प्रत्यक्ष हो जायगा । "भासमान' इस पद में 'लट्' का अर्थ विवक्षित है" यह द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं । कारण, वह विकल्प को सह नहीं सकता । देखिये—क्या सम्प्रयोग की अपेक्षा वर्तमानत्व विवक्षित है अथवा जिस किसीकी अपेक्षा ? इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं, कारण सम्प्रयोग-काल में [ कारण के कार्य से पूर्ववर्ती होने से ] भासमानता हो ही नहीं सकती । अतः इस पक्ष में भी विशेषण पक्ष में कथित दोष हो जायगा । यदि यत्किञ्चित् की अपेक्षा वर्तमानता का ग्रहण करें, तो अर्थतः वर्तमानत्व अविवक्षित ही हुआ । कारण, भासिष्यमाण ( भासित होनेवाला ) और भासित भी यदा कदाचित् वर्तमान भासन का विषय ही हैं। अतः उनका व्यवच्छेद नहीं होगा । समर्थन—"इन्द्रिय-सम्प्रयोग के अनन्तर जायमान जो भासन तद्विषय आकार और इन्द्रिय के सम्प्रयोग से जन्य ज्ञान प्रत्यक्ष है" ऐसा लक्षण करने पर घटज्ञान आत्मा में प्रत्यक्ष नहीं होगा । कारण, चक्षुःसंयोग के अनन्तर आत्मा भासमान नहीं है । खंडन—आत्मा का भासन भी मनोरूप इन्द्रिय के संयोग के अनन्तर ही होता है, मनोरूप इन्द्रिय के संयोग के बिना आत्मा का ग्रहण भी नहीं होता । अतः उक्त रूप से परिष्कार करने पर भी घटज्ञान आत्मा में प्रत्यक्ष हो जायगा ।
२०८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम नेन्द्रियसंयोगमात्रं विवक्षितम्, किं नाम ? यदनन्तरं भासमानतोत्पत्तिरिति चेन्न । तदनन्तरमपि भासमानतोत्पत्तेः । भासमानतान्तरं तत्, न त्विदं भासमानत्वमिति चेन्न । अव्याप्तिप्रसङ्गात्, एकभासनमात्रव्यवस्थितत्वात् लक्षणस्य । अथ मन्यसे यद्भासनं यस्य विषयस्येन्द्रियसंयोगादुत्पन्नं तत्तत्र प्रत्यक्षं प्रमाणमिति निरुक्तौ न दोष इति । मैवम् ; यद्भासनं घटोऽयमिति यस्य विषय- स्यात्मन इन्द्रियेण सह सन्निकर्षादुत्पन्नं तद्भासनं तस्मिन्नात्मनि प्रमाणं स्यात् । नात्मा तस्य विषयः, तत्कथमेवं स्यादिति चेत् । न हि भवता तदीयविषय- स्येत्युक्तम्, किन्तु सामान्यतो विषयस्येति, तेनेदमभिहितम् । यदि तु तदीयता- विशेषणमुपादत्ते भवान्, तदा यदि तच्छब्देन ज्ञानजातीयमात्रपरामर्शस्तदा स समर्थन—'जिस इन्द्रियसंयोग के अनन्तर भासन होता हो, उस इन्द्रियसंयोग के अनन्तर जायमान जो भासन, उसका विषय आकार तथा इन्द्रिय के सम्प्रयोग से जन्य ज्ञान प्रत्यक्ष है' ऐसा परिष्कार करेंगे, तो घटज्ञान आत्मा में प्रत्यक्ष नहीं होगा । कारण, चक्षुःसंयोग के अनन्तर आत्मज्ञान नहीं होता । खण्डन--यद्यपि चक्षुःसंयोग के अनन्तर आत्मज्ञान नहीं होता, तथापि आत्मा का ज्ञान तो होता ही है । अतः आपके लक्षण का समन्वय होने से घटज्ञान आत्मा में प्रत्यक्ष हो जायगा । समर्थन--आत्म-मनःसंयोग के अनन्तर आत्मा का भासन होता है, घट का भासन तो नहीं होता । अतः घटज्ञान आत्मा में प्रत्यक्ष नहीं होगा । खंडन--तत्र तो 'जिस इन्द्रियसम्प्रयोग के अनन्तर घट का भासन होता हो, उस इन्द्रिय के सम्प्रयोग से जन्य ( घट) ज्ञान प्रत्यक्ष है' ऐसा लक्षण होने से घटज्ञान में ही लक्षण का समन्वय होगा, अन्यत्र पटादि-ज्ञान में सर्वत्र अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'जो ज्ञान जिस विषय और इन्द्रिय के संयोग के अनन्तर होता है, वह ज्ञान उस विषय में प्रत्यक्ष है' ऐसा लक्षण करेंगे । एवञ्च घटज्ञान आत्मा में प्रत्यक्ष नहीं है । खंडन—'घटोऽयम्' यह भासन जिस विषय आत्मा और मन के संयोग के अनन्तर उत्पन्न होता है, अतः वह 'घटोऽयम्' भासन आत्मा में प्रत्यक्ष हो जायगा । इसलिए ऐसा परिष्कार भी असङ्गत है । समर्थन—आत्मा 'घटोऽयम्' इस ज्ञान का विषय नहीं है, अतः घटज्ञान-आत्मा में प्रत्यक्ष कैसे हो सकता है ? खंडन—आपने 'तद्-ज्ञान का विषय' ऐसा निवेश न कर सामान्यरूप से विषय का निवेश किया है, इसीलिए यह दोष होता है । यदि तद्-ज्ञानका
परिच्छेद ] द्वितीय प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन २०६ दोषस्तदवस्थः । यदि तु ज्ञानजातीयमात्रव्यक्तिविशेषपरामर्शः, तदाऽव्यापकत्वम्, प्रतिज्ञानं तच्छब्दार्थस्य भेदात् । नहि यत्त्वं तत्त्वं वा किञ्चिदनुगतं रूपमस्ति । अत एवात्मविषयत्वानुयोगवत् त्रिपुटीप्रत्यक्षवादिनि घटज्ञानस्य घटादौ प्रत्यक्षतया प्रामाण्यानुयोगो द्रष्टव्यः, चक्षुःसन्निकर्षाभावात् । अन्यथा तस्येष्ट- प्रसङ्गकत्वात् । तदर्थं यदिन्द्रियसन्निकर्षोत्पन्नमिति विशेषणप्रक्षेपे यत्तच्छब्दार्थस्यासाधा- रण्यादव्याप्यापत्तेः । यदि तु यत्तच्छब्दार्थावनुगतौ स्यातां पुनरप्यन्यत्र ‘घटो- ऽयमि’ति ज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वेन प्रमाणता प्रसज्येत । अथ ‘अन्यव्यतिरिक्त’ इति विशेषणं प्रक्षिपसि, तदाऽन्यविषयस्य प्रत्यक्षता विषय' ऐसा निवेश करें—‘यत्, तत्’ को ज्ञानमात्रपरक मानें, तो फिर भी घटज्ञान आत्मा में प्रत्यक्ष हो जायगा । कारण, यत्-ज्ञान पद से आत्मज्ञान का भी ग्रहण हो सकता है । यदि घटज्ञान व्यक्तिपरक हो, तो घटज्ञान में तो समन्वय हो जायगा; पर अन्यत्र सर्वत्र अव्याप्ति हो जायगी । कारण, निखिल ज्ञानों में वृत्ति यत्त्व-तत्त्व कोई अनुगत धर्म नहीं है, जिसे प्रवृत्तिनिमित्त मानकर ज्ञानमात्र का यत्-शब्द से ग्रहण हो सके । जो प्रभाकर आदि ज्ञान में त्रिपुटी ( ज्ञाता, ज्ञान ज्ञेय, इन तीनों ) का भान मानते हैं, उनके मत में घटज्ञान आत्मा में प्रत्यक्ष इष्ट ही है । अतः उनके मत में घटज्ञान पट में प्रत्यक्ष हो जायगा, यह दोष जानना चाहिए । समर्थन—‘जिस वस्तु और इन्द्रिय के सन्निकर्ष से उत्पन्न जो ज्ञान हो, वह ज्ञान उस वस्तु में प्रत्यक्ष है ।’ अतः घटज्ञान पट में प्रत्यक्ष नहीं है । खंडन—यदि यत्-शब्द को अनुगत तत्-तत् ज्ञानव्यक्तिपरक मानें, तो अन्य ज्ञान में अव्याप्ति हो जायगी । यत्त्व-तत्त्व को अनुगत मान भी लें, तब भी ‘घटोऽयम्’ यह ज्ञान पट में प्रत्यक्ष हो जायगा । समर्थन—‘जिस वस्तु तथा इन्द्रिय के सन्निकर्ष से जो ज्ञान होता है, वह ज्ञान उससे जो अन्य, उस अन्य से व्यतिरिक्त वस्तु में प्रत्यक्ष है ।’ अतः घटज्ञान पट में प्रत्यक्ष नहीं है । खंडन—अन्यविषयक प्रत्यक्ष के लक्ष्य न होने से वह प्रत्यक्ष न कहा जायगा । अथवा लक्ष्यभूत अन्यविषयक प्रत्यक्ष में भी उक्त लक्षण का समन्वय हो जाने से अतिव्याप्ति होगी । तत्-शब्द को किसी अनुगमक रूप से २७
न स्यात् । तच्छब्देनानुगतार्थाभिधाने व्यवच्छेदकत्वाभावात् । घटज्ञानस्य च पटे प्रत्यक्षतया प्रामाण्यं प्रसज्येत । एतेन—इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यभिचारि प्रत्यक्षमित्यत्रापि दोषोऽय- मुक्तो द्रष्टव्यः, तादृशस्यापि ज्ञानस्य विषयान्तरे प्रत्यक्षत्वेन प्रामाण्यप्रसङ्गात् । यस्यार्थस्य सन्निकर्षात् यदुत्पद्यते ज्ञानं तत्तत्र प्रत्यक्षतया प्रमाणमित्यभिधाने तु यच्छब्दतच्छब्दसाधारणासाधारणार्थाभिधानविकल्पोक्तदोषप्रसङ्गः । अव्यभिचारिपदञ्च व्यर्थम् । न हि शुक्तौ रजतज्ञानं रजतेन्द्रियसन्निकर्षा- दुत्पन्नम् । संस्कारलक्षणा प्रत्यासत्ती रजतत्वेऽप्यस्तीति चेन्न । पूर्वानुभूतरजत- तादात्म्यस्य संस्काराभावादुक्तदोषतादवस्थ्यात् । गुरुमतानुसारेण सुतरां सन्निकर्षज ज्ञानपरक मान भी लें, तो व्यवच्छेद के न होने से घटज्ञान पट में प्रमाण हो जायगा । कारण, तत्-शब्द से पटज्ञान का भी परामर्श कर सकते हैं । 'इन्द्रियार्थ सन्निकर्षोत्पन्न अव्यभिचारिज्ञान प्रत्यक्ष है' इस लक्षण में भी घटज्ञान आत्मा में या पट में प्रत्यक्ष हो जायगा—यह दोष जानना चाहिए । यदि 'जिस वस्तु के सन्निकर्ष से जो ज्ञान उत्पन्न हो, वह ज्ञान उस विषय में प्रत्यक्ष है' ऐसा लक्षण करें, तो यत्-यत् शब्द को एकज्ञानपरक मानें या ज्ञानसामान्यपरक, उभयथा पूर्वोक्त दोष होगा । यदि यत्-तद्घटित लक्षण करें, तो रजत के सन्निकर्ष से शुक्ति में रजतभ्रम न होने से रजत में प्रत्यक्ष नहीं होगा । फिर, 'अव्यभिचारी' विशेषण भी व्यर्थ हो जायगा; क्योंकि शुक्ति में रजतज्ञान रजत और इन्द्रिय के सन्निकर्ष से उत्पन्न नहीं है । अतः 'सन्निकर्षजत्व' विशेषण से ही उसकी व्यावृत्ति हो जायगी । संस्काररूप (चक्षुःसंयुक्त-आत्मसमवेत-पूर्वरजतप्रत्यय-संस्कारविषयत्व- रूप) प्रत्यासत्ति रजत में है, यह भी नहीं कह सकते । कारण, पूर्वानुभूत का ही संस्कार हुआ करता है । शुक्ति और रजततादात्म्य पूर्व में अनुभूत न होने से उसका संस्कार संभव ही नहीं है । यह तो भट्टमत में अव्यभिचारी विशेषण की व्यर्थता हुई । गुरुमत के अनुसार तो सुतरां उक्त विशेषण व्यर्थ है । कारण, वे तो भ्रमज्ञान मानते ही नहीं । किञ्च—शुक्ति में रजततया अवगाह्यमान ज्ञान का व्यवच्छेद करते हैं अथवा रजतत्वमात्र ज्ञान का ? पहले का व्यवच्छेद व्यर्थ है, पुरोवर्ती शुक्ति- निष्ठ रजतत्ववैशिष्ट्य (तादात्म्य) में संस्काररूप प्रत्यासत्ति न होने से सन्निकर्षजत्व
परिच्छेद ] द्वितीय प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन २११ विशेषणवैयर्थ्याच्चैन व्यभिचारानङ्गीकारात् । रजतत्ववैशिष्ट्ये पुरोवर्तिनस्तदभावात् । तस्मिन्नेव वांशेऽप्रामाण्यम्, न तु रजतत्वमात्रे, तस्यान्यत्र सत्त्वात् । अथ साक्षात्कारित्वं प्रत्यक्षलक्षणमुच्यते तदा साक्षात्कारिभ्रमेऽपि प्रसङ्गः । अव्यभिचारित्वेन विशेषितं तल्लक्षणमिति वा भेदाग्रहव्यतिरिक्तविभ्रमाभावो वेति चेत् । न ; विकल्पानसहत्वात् । किमवगतमिदं लक्षणं फलहेतुः , अनवगतं वा ? न तावच्चरमः ; तदभिधानवैयर्थ्यप्रसङ्गात् । अभिधानस्य ज्ञानोत्पादोपयोगित्वात् तस्य चानवगतस्यैव फलसाधकत्वाभ्युपगमात् । आद्ये किमन्यस्मात्तदवगमः , उत त्वदीयाल्लक्षणवाक्यात् ? यद्यन्यस्मात् , कृतममुना लक्षणाभिधानप्रयासेन । अभिधानस्य ज्ञानोत्पादातिरिक्तप्रयोजनाभावात् विशेषण से ही उसका व्यवच्छेद हो जायगा । दूसरे का भी व्यवच्छेद संभव नहीं । उक्त ज्ञान वैशिष्ट्यांश (तादात्म्य) में ही भ्रम में रजतत्व नहीं है । कारण, रजतत्व देशान्तर में भी होने से तद्गोचर ज्ञान भी प्रमाण होने के कारण व्यवच्छेद्य ही नहीं है । समर्थन—साक्षात्कारित्व ही प्रत्यक्ष का लक्षण कहेंगे । खंडन—प्रत्यक्ष-भ्रम में अतिप्रसङ्ग होने से वह लक्षण अयुक्त है । समर्थन—भ्रम में अतिव्याप्ति के वारणार्थ लक्षण में 'अव्यभिचारित्व' का भी निवेश कर देंगे । अथवा प्रभाकर के मत में भेदाग्रह से भिन्न भ्रमज्ञान होता नहीं, अर्थात् ज्ञानमात्र प्रमा ही है । तब तो अव्यभिचारी विशेषण देने का भी कुछ काम नहीं है । खण्डन—यह लक्षण भी विकल्प को सह नहीं सकता । देखिये—क्या अवगत (ज्ञात) लक्षण व्यावृत्ति या व्यवहाररूप फल का कारण है या अनवगत (अज्ञात), अर्थात् साक्षात्कारित্বরূপ लक्षण स्वयं ज्ञात होकर इतरव्यवच्छेद-ज्ञान का कारण है अथवा अपनी सत्तामात्र से कारण है ? यदि अन्तिम पक्ष मानें, तो लक्षण का अभिधान ही व्यर्थ हो जायगा । केवल ज्ञानोत्पादकत्वेन अभिधान की सार्थकता होने पर भी प्रकृत में आपने अज्ञात लक्षण को ही इतरव्यवच्छेदक प्रतीति का जनक मान लिया है । अतः यहाँ लक्षण का अभिधान व्यर्थ ही है । यदि प्रथम मानें, अर्थात् अवगत लक्षण ही व्यावृत्ति या व्यवहार का जनक है, तो वह भी विकल्पासह ही है । अर्थात् लक्षण का अवगम प्रमाणान्तर से मानेंगे या अपने लक्षण-वाक्य से ही ? यदि प्रमाणान्तर से, तो आपका यह लक्षणाभिधान-प्रयास व्यर्थ
५१२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [प्रथम तस्य चान्यत एव सिद्धेः । अन्त्ये किं त्वदभिधानमाप्तोपदेशतया साक्षात्कारित्वं बोधयति, उत लिङ्गादिभावेन ? न तावच्चरमः ; त्वद्वचनस्य साक्षात्कारित्वाविना- भावादेर्दर्शयितुमशक्यत्वात् । नापि प्रथमः ; वादिनं प्रति भवत आप्तत्वासिद्धेः । सिद्धौ हि प्रतिज्ञामात्रादेव साध्यसिद्धेर्हेत्वाद्यभिधानमनर्थकं सर्वत्र स्यात् । अथ मन्यसे यः साक्षात्कारित्वमन्यतो जानाति, प्रत्यक्षव्यवहारनिदानतया च न जानाति, तं प्रति प्रत्यक्षव्यवहारनिदानत्वमस्य ज्ञाप्यते लक्षणवादिना । तच्चानुमानभावेनैव, नाप्तोपदेशतया । अत एव च लक्षणं केवलव्यतिरेक्यनु- मानमाचक्ष्महे । तथथा—श्रावणादिप्रमितयः साक्षात्कारिप्रमितयो वा प्रत्यक्षत्वेन व्यवहर्तव्याः, साक्षात्कारिप्रमितित्वात् ; न यत्प्रत्यक्षतया व्यवह्रियते न तत्साक्षात्कारि, यथानुमितिः ; तथा चैताः ; तस्मात्तथा । एतदनुमानप्रतिपादकश्च है । कारण, अभिधान का प्रयोजन लक्षण-ज्ञान से अतिरिक्त कुछ भी नहीं है और उसे आपने साधनान्तर से मान लिया है । एवञ्च पुनरपि आपका लक्षणाभिधान व्यर्थ ही है । यदि आप अपने लक्षण-वाक्य से लक्षण का अवगम मानें, तो पूछा जा सकता है कि क्या वह लक्षण-वाक्य आप्तोपदेश के रूप में साक्षात्कारित्व-लक्षण का बोध कराता है या हेत्वादिविधया ? अन्तिम पक्ष नहीं मान सकते; आपके वचन का साक्षात्कारित्व से अविनाभाव न होने से उसे लिङ्गत्वेन बोधक नहीं कहा जा सकता । 'लिङ्गादि' यहाँ 'आदि'पद से अर्थापत्ति, उपमान आदि का भी ग्रहण है । एवञ्च कोई अनुपपत्ति या सादृश्यज्ञान न होने से आपका वचन अर्थापत्ति, उपमान आदि रूप से भी बोधक न हो सकेगा । यदि आप्तोपदेशरूप में आपका वचन लक्षण का बोध कराता है, तो वह भी ठीक नहीं । कारण, वादी आपको आप्त ही नहीं मानता । यदि वह आपको आप्त मान ले, तो प्रतिज्ञामात्र से ही साध्य-सिद्धि हो जाने से सर्वत्र हेत्वादि का अभिधान व्यर्थ ही हो जायगा । समर्थन— जो पुरुष साक्षात्कारित्व को अन्य हेतु ( प्रत्यक्ष आदि ) से जानते हैं, किन्तु उसमें प्रत्यक्षत्व-व्यवहार की कारणता नहीं जानते, उनके प्रति प्रत्यक्षत्व- व्यवहार की कारणता लक्षण से बोधित होती है । वह बोधन भी आप्तवाक्यरूप से नहीं, किन्तु परार्थ-अनुमानरूप से होता है । अतएव हम लोग लक्षण को 'व्यतिरेकी अनुमान' कहते हैं । वह अनुमान इस प्रकार है—'श्रावण आदि प्रमितियाँ या साक्षात्कारी प्रमितियाँ प्रत्यक्षत्वरूप से व्यवहर्तव्य हैं, साक्षात्कारिप्रमितित्व से युक्त होने से; जो
परिच्छेद ] द्वितीय प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन २१५ वाक्यं नाप्तवाक्यत्वेन प्रयुज्यते वादिना । किन्तु व्याप्त्यादेः प्रतिपन्नस्यैव स्मारकम्, पूर्वाप्रतिपन्नस्य वा जिज्ञासोत्पादनद्वारेणेदानीमेव वादिनि प्रमाणोत्पा- दकमित्युक्तदोषानवकाश इति । न ; 'प्रत्यक्षतया व्यवहर्त्तव्याः' इति व्यवहारस्य किं विषयभेदो विशेषः, उत शब्दभेदः ? आद्ये यद्यसौ विषयविशिष्टं व्यवहारं नाज्ञासीत् , कथं साक्षात्कारिणि तस्य स्वकर्त्तव्यतां लक्षणवाक्यादप्यवगच्छेत् । न ह्यविदिताग्नि- रनुमानादप्यग्निसम्बन्धं बोधयितुं शक्यः । अथाज्ञासीत् तदा ज्ञातज्ञापन- वैयर्थ्यालक्षणरूपमनुमानं निष्प्रयोजनम् । अथ सामान्यतो जानाति—अस्ति कश्चिद्विषयः प्रत्यक्षव्यवहारस्य । विशेषतस्तु न जानाति , तं प्रतीदमुच्यते । न; किं सामान्यतो निमित्तवत्तां व्यवहारमात्रस्य जानाति, उत व्यवहारविशेषस्य ? आद्ये प्रकृतानुपयोगः, व्यवहारविशेषस्य प्रत्यक्षत्वरूप से व्यवहर्तव्य नहीं है, वह साक्षात्कारिप्रमिति नहीं है, जैसे अनुमिति । साक्षात्कारिप्रमितिरूप पक्ष साक्षात्कारिप्रमितित्वरूप हेतु से युक्त है; तस्मात् उक्त साध्य ( प्रत्यक्षत्व से व्यवहर्तव्यता ) से युक्त है।' इस पञ्चावयव वाक्य को वादी आप्तवाक्यरूप से प्रयोग नहीं करता; किन्तु पूर्वज्ञात व्याप्ति के स्मरणार्थ या पूर्व अज्ञात व्याप्ति के ( जिज्ञासा के उत्पादन द्वारा ) उस काल में ही ज्ञान के लिए प्रयोग करता है । अतः कोई दोष नहीं है । खण्डन — 'प्रत्यक्षत्वरूप से व्यवहर्तव्य है' इस वाक्य का क्या 'प्रत्यक्षत्वप्रकारक ज्ञानविषयत्व' अर्थ है या 'प्रत्यक्ष शब्द से अभिधेय' यह अर्थ है ? प्रथम पक्ष में यदि यह पुरुष प्रत्यक्षत्वप्रकारक ज्ञानविषयत्व को प्रथम से नहीं जानता, तो लक्षण-वाक्य से साक्षात्कारिप्रमिति में उसे कैसे जानेगा ? कारण जो अग्नि को नहीं जानता, वह धूम से पर्वत में अग्नि को जान नहीं सकता । यदि वह पहले से ही प्रत्यक्षत्वप्रकारक ज्ञानविषयत्व को जानता है, तो ज्ञात का ज्ञापन होने से अनुमान व्यर्थ है । समर्थन — जो पुरुष सामान्यरूप से जानता है कि प्रत्यक्ष-व्यवहार का कुछ विषय है । किन्तु विशेष रूप से यह नहीं जानता कि प्रत्यक्ष-व्यवहार का अमुक विषय है, उसके प्रति यह अनुमान-प्रयोग है, ऐसा कहेंगे। खण्डन — क्या वह व्यवहार- मात्र के विषय को सामान्यरूप से जानता है या व्यवहार-विशेष ( प्रत्यक्षत्व-व्यवहार ) के सामान्य से निमित्तवत्ता को जानता है ? प्रथम पक्ष में व्यवहारमात्र की निमित्तवत्ता सामान्य से जानता भी हो, तो उसका प्रकृत में कोई उपयोग नहीं है। कारण इदानीं
सानुवाद खण्डनखण्डखाद्ये [ प्रथम , द्वितीये किं कृतोऽसौ व्यवहारस्य विशेष इति विकल्पित- न्तरेण न निस्तारः । एतेन सर्वस्यैव लक्ष्यस्य स्वीकारः परासनीयः । तथा हि— नाव्यापत्त्या प्रमामात्रात्ते तेऽर्थाः स्वीक्रियोचिताः । तद्वियस्तदुरीकारे स्वाश्रयं कश्चिकित्सतु ॥ ३५ ॥ अथान्यः स विशेषश्चेत् तद्धीत्वं कश्चिदिष्यते । दत्तः साकारवादाय विष्टरः स्पष्टमेव तत् ॥ ३६ ॥ व्यवहारविशेष ( प्रत्यक्षत्व-व्यवहार ) की चिन्ता है । द्वितीय पक्ष में अर्थात् यदि कहें कि प्रत्यक्ष-व्यवहार के सामान्य से निमित्तवत्ता जानता है, तो यह विकल्प होता है कि प्रत्यक्ष-व्यवहार से जो विशेष है, वह प्रत्यक्षज्ञानकृत है या प्रत्यक्षशब्दकृत ? ऐसा विकल्प होने पर दोनों पक्षों में मूलकथित दोष हो जायगा । इस अग्रिम युक्ति से भी लक्षणमात्र खण्डित हो जाता है । देखिये—'इयं पृथिवीति व्यवहर्तव्या गन्धवत्त्वात्, व्यतिरेकेण अबाविवत्' इत्यादि लक्षण से लक्ष्य का स्वीकार संभव नहीं । कारण, लक्षण से जायमान प्रमामात्र से तत्तत् लक्ष्य का स्वीकार करेंगे या पृथिव्यादि लक्ष्यविशिष्ट प्रमा से ? पहला नहीं कह सकते, अर्थात् लक्षण से जायमान अनुमितिरूप प्रमामात्र से लक्ष्य की सिद्धि नहीं हो सकती । कारण, प्रमामात्र समस्त अर्थसाधारण है; अतः एक प्रमा से सभी अर्थों की सिद्धि हो जायगी । द्वितीय पक्ष भी संभव नहीं, अर्थात् लक्ष्यविशिष्ट प्रमा से भी लक्ष्य की सिद्धि नहीं हो सकती । कारण, लक्ष्यविशिष्ट प्रमा में लक्ष्य भी विशेषण है, अतः अंशतः लक्ष्य से लक्ष्य की सिद्धि होने से आत्माश्रय हो जायगा ॥ ३५ ॥ समर्थन— लक्ष्यविशिष्टबुद्धित्व बुद्धि का ही धर्मविशेष है, लक्ष्य का वैशिष्ट्य नहीं । अतः लक्ष्यविशिष्ट प्रमा से लक्ष्य की सिद्धि में आत्माश्रय नहीं है । खण्डन— यदि तद्विषयवैशिष्ट्य को बुद्धि का धर्म मानें, तो बुद्धि साकार हो जायगी, निराकार न रहेगी । कारण जबतक साकार घटादि से बुद्धि का अभेद न मानें, तबतक घटादि- विषयवैशिष्ट्य बुद्धि का धर्म नहीं हो सकता । एवञ्च 'अर्थेनैव विशेषो हि निराकारतया धिया' इस स्वसिद्धान्त की हानि और 'सहोपलम्भनियमादभेदो नीलतद्धियोः' इस बौद्ध-सिद्धान्त का अभ्युपगम हो जायगा ॥ ३६ ॥