भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 216

परिच्छेद ] प्रथम प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन १६६ तत्र नाद्यः । तथा हि—किं सजातीयेति प्रत्यक्षत्वेन साजात्यमपेक्षितम्, रूपा- न्तरेण वा ? नाद्यः ; तस्माद् व्यवच्छेदावधेः सजातीयाद्व्यावृत्तत्वेन व्यवच्छेद- कत्वानुपपत्त्या व्यावृत्तत्वस्वीकारेण अव्यापकत्वात् । नापि द्वितीयः ; विजातीय- पदोपादानवैयर्थ्यात् । अस्ति हि प्रमेयत्वादिना सर्वसाजात्यम् । अथ प्रमाणत्वादिना विशेषेण साजात्यं विवक्षितंवेदमुच्यते; तर्हि लक्ष्य- स्यापि प्रमाणत्वेन साजात्याद् व्यवच्छेद्यकोटिप्रविष्टतया सङ्ग्राह्याभावप्रसङ्गः । लक्ष्यस्य यत्प्रमाणत्वादिभिः सजातीयं तद्व्यवच्छेद्यम् । न च लक्ष्यस्य लक्ष्यं सजातीयम् षष्ठ्यर्थस्य भेदव्यवस्थितत्वादिति चेत्; एवं तर्हि लक्ष्यापेक्षया भिन्नात् व्यवच्छेद इत्येवोच्यताम्, कृतं प्रमाणत्वादिना साजात्येन प्रकृतानु- पयोगिना वर्णितेन ? यद्वा च लक्ष्यादन्यत्वं परेषामवगतं तदा परस्मादन्यत्वमपि लक्ष्यस्यार्थादवगम्यत इति सिद्धमग्रत एव लक्षणप्रयोजनमिति वैयर्थ्यमेव स्यात् लक्षणाख्यानस्येति । इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं है । देखिये—सजातीयत्व ( सादृश्य ) प्रत्यक्षत्वरूप से इष्ट है या रूपान्तर से ? यदि प्रत्यक्षत्वरूप से साजात्य लें, तो उस व्यवच्छेद के अवधिभूत सजातीय प्रत्यक्ष से व्यवच्छेद ( भेद ) न हो, तो लक्षण न होगा । यदि सजातीय से व्यवच्छेद हो, तो जिस सजातीय से व्यवच्छेद होगा, उसमें लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । यदि अन्यरूप से साजात्य लें, तो विजातीय पद व्यर्थ होगा । कारण, प्रमेयत्वरूप से तो प्रत्यक्ष के सभी सजातीय ही हैं । समर्थन—प्रमाणत्व आदि धर्म से साजात्य की विवक्षाकर विजातीय पद का उपादान करेंगे । खण्डन—प्रत्यक्ष भी प्रमाणत्वरूप से सजातीय है । अतः लक्ष्य की भी व्यावृत्ति होने से संग्राहा ( लक्ष्य ) का अभाव हो जायगा । समर्थन—लक्ष्य से जो प्रमाणत्वरूप से सजातीय हो, वह व्यवच्छेद्य है । लक्ष्य लक्ष्य का सजातीय नहीं है, कारण सादृश्य भेद में ही होता है । अतः 'स्व' में स्व का सादृश्य नहीं होता । खंडन—यदि ऐसा है, तो 'लक्ष्य से जो भिन्न हो, उससे व्यवच्छेद के लिए लक्षण है' इतना ही कहें, प्रकृत में अनुपयोगी प्रमाणत्व आदि से साजात्य की विवक्षा व्यर्थ है । यदि लक्ष्य से अन्यत्व पर में अवगत है, तो पर से अन्यत्व भी लक्ष्य