भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 217

२०० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अस्तु वा विवक्षावैचित्रीवशात् कथमपीदृशमभिधानम् ; तथापि न तावदनेन लक्षणेनानवगतेनैव व्यवच्छिन्नप्रतीतिसम्भवः ; अतिप्रसङ्गात् । नापि ज्ञातेन ; दुरवधारणत्वात् । तथा हि—न तावदिन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पत्तिः , प्रत्यक्षाऽप्रत्यक्ष- विशेषणत्वात् । नापि कार्येण लिङ्गेन तदुपपत्त्या वा तदवगमः ; ताभ्यां सामान्यतः कारणमात्राक्षेपेण कारणगतानुगतरूपासिद्धौ एकरूपलक्षणासिद्धेः । कार्यस्यैकजात्यात् एकजातीयकारणसिद्धिरिति चेत् ; तर्हि कार्यगतैकजात्यस्य में अवगत ही है। अतः लक्षण करने से पहले ही लक्षण के प्रयोजन व्यावृत्ति की- सिद्धि होने से लक्षण करना व्यर्थ हो जायगा । समर्थन—जैसे घट से पट के अन्यत्व के अज्ञानकाल में भी पट से अन्यत्वरूप से घट का प्रत्यक्षज्ञान होता है, वैसे ही लक्ष्य से अन्यत्वरूप से अज्ञात अलक्ष्य से अन्यत्वरूप से लक्ष्य का ज्ञान लक्षणरूप व्यतिरेकी हेतु से हो सकता है, अतः लक्षण व्यर्थ नहीं है। खण्डन—इस रीति से यदि आप कथञ्चित् विवक्षा-वैचित्र्य अर्थात् लक्ष्य से भिन्न लक्ष्य की व्यावृत्ति या सजातीय विजातीय, लक्ष्य से लक्ष्य की व्यावृत्ति के लिए लक्षण की सार्थकता कहें, तो वह भी युक्त नहीं है। कारण, अज्ञात लक्षण से इतरव्यावृत्तत्वरूप से लक्ष्य का ज्ञान नहीं हो सकता । यदि अज्ञात लक्षण से इतर-व्यावृत्तत्व- रूप से लक्ष्य की प्रतीति हो, तो सर्वदा व्यावृत्तत्वरूप से लक्ष्य की प्रतीति होनी चाहिए, पर वह होती नहीं। ज्ञात लक्षण से भी इतरव्यावृत्तत्वरूप से लक्ष्य की प्रतीति नहीं हो सकती, क्योंकि लक्षण का ज्ञान इन्द्रियरूप अतीन्द्रिय पदार्थ से घटित होने से वह चक्षुरादि इन्द्रियों से हो नहीं सकता । कार्यरूप लिङ्ग से या कार्य की अनुपपत्ति से भी लक्षण का ज्ञान संभव नहीं, क्योंकि कार्य से कारणमात्र की अनुमिति या आक्षेप करें, तो भी कारणगत अनुगतरूप की असिद्धि होने से एकरूप लक्षण भी असिद्ध ही होगा । समर्थन—प्रत्यक्षरूप कार्य एकजातीय है, अतः उससे एकजातीय इन्द्रियार्थों के सन्निकर्षरूप कारण का आक्षेप संभव होने से वही लक्षण हो जायगा। खंडन—यदि ऐसा है, तो कार्यगत ऐकजात्य साक्षात्कारित्व का प्रथम ज्ञान अवश्य मानेंगे। उसीसे सजातीय- विजातीय-व्यावृत्त लक्ष्य की प्रतीति हो जायगी। अतः यह परम्परा-कुसृष्टि ( साक्षात्का-