खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 218, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] प्रथम प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन २०१ पूर्वमवश्यं प्रत्येत्तव्यत्वाङ्गीकारे तत एव सजातीयविजातीयव्यवच्छेदप्रतिपत्तिरस्तु, कृतमनया पारम्पर्यकुसृष्ट्या । नन्वेतावताऽपि न प्रकृतलक्षणखण्डनं भवति, अव्याप्तेरतिव्याप्तेर्वाऽनुद्भावनात् । मैवम्; प्रथमभावितयाऽवश्यानुष्ठेयतया च लघोरुपायात् साध्यसिद्धौ सम्भवन्त्यां चरमभावितयाऽवश्यानुष्ठेयत्वाभावेन च गुरुपाये प्रवर्तमानस्य तवैवेदं दोषोद्भावनं प्रदीपे प्रदीपान्तरं प्रज्वाल्य तमोनाशाय यतमानस्येव पुंसः। न हि तस्य दीपा- न्तरस्य कश्चिद्दोषः , किन्तु तथाकारी पुरुष एव पर्य्यनुयोज्यः । सर्वसाधनसाधा- रणोऽयं वा दोषो यत्सम्भवदेवंविधलघूपायत्वं नाम, स्वरूपासिद्धिरिव सर्व- प्रमाणानाम् । तस्मान्मा नाम भूदतिव्याप्त्यादिदोषः , सामान्यदोषादेवेदं लक्षणं दुष्टमिति । रित्व के ज्ञान से इन्द्रियार्थसन्निकर्षजत्व का ज्ञान और उससे सजातीय-विजातीय की व्यावृत्ति ) की कल्पना व्यर्थ है । समर्थन—इससे भी इन्द्रियार्थसन्निकर्षजत्वरूप लक्षण का खण्डन नहीं होता, क्योंकि आपने लक्षणमें अव्याप्ति, अतिव्याप्ति आदि कोई दोष तो दिया ही नहीं । खण्डन—कार्यगत ऐकरूप्य साक्षात्कारित्व ( इन्द्रियार्थसन्निकर्षजत्व ) का अनुमापक होने से पूर्व में ज्ञेय तथा अवश्य स्वीकारणीय है और कारणगत ऐकरूप्य अनुमेय होने से पश्चात् ज्ञेय है। सिवा इसके कार्यगत वैरूप्य से ही व्यावृत्तिरूप स्वकार्य की सिद्धि होने से वह अवश्य स्वीकर्त्तव्य भी नहीं है। अतः जब लघु उपाय से कार्य की सिद्धि हो रही हो, तो गुरु उपाय में आपकी प्रवृत्ति गौरव दोषयुक्त ही कही जायगी । जैसे—समीप में एक प्रदीप के प्रज्वलित रहते तमोनाश के लिए दूरस्थ अन्य प्रदीप के प्रज्वालन में यत्न करनेवाले पुरुष का उद्योग गौरव दोष से युक्त होता है, वैसी ही स्थिति यहाँ भी है। प्रस्तुत दृष्टान्त में अन्य प्रदीप का कुछ दोष नहीं, किन्तु एक प्रदीप के रहते भी अन्य प्रदीप के लिए उद्योगकारी पुरुष का ही दोष है। जैसे स्वरूपासिद्धि सर्वप्रमाण-साधारण दोष है, वैसे ही लघु उपाय होते हुए भी गुरु उपाय का अवलम्बन भी सर्वसाधन-साधारण दोष है। तस्मात् अतिव्याप्ति आदि दोष न होने पर भी गौरवरूप दोष से यह लक्षण दुष्ट ही है । २६