खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [प्रथम एतेन द्वितीयोऽपि निरस्तः, साक्षात्कारित्वावगममन्तरेण तदवगमानुपपत्तेः । तदवगमाच्चास्य प्रतीतावन्ग्योन्याश्रयप्रसङ्गः । अस्तु वा अन्यदपि किञ्चिदिन्द्रियजत्वे लिङ्गम्, तथापि तदेव साक्षात्कारित्वा- विनाभूततया प्रत्यक्षलक्षणमुपन्यस्यतां सन्निहितप्रतिपत्तिकत्वात् । न च तदवश्यं व्यापकं वक्तव्यम्, लिङ्गस्य तद्व्याप्यत्वेनैवोपपत्तेरिति चेन्न । यत्र लिङ्गमव्यापकत्वान्नास्ति तत्रेन्द्रियजत्वस्य प्रमाणाभावात् प्रत्त्येतुमशक्यत्वेन कथं ततः साक्षात्कारित्वावगमः । यदा च क्वचित्प्रत्यक्षजातीय एव प्रमाणा- भावादिन्द्रियजत्वमनवधारणीयतया साक्षात्कारित्वव्यापकत्वेनानवगतमपि लक्षणम्, तदा किमपराद्धं लिङ्गान्तरेणाव्यापकेन । 'साक्षात्त्व के अनुमितिरूप ज्ञान के हेतु-प्रदर्शन के लिए लक्षण है' यह द्वितीय कल्प भी अयुक्त है । कारण, ज्ञात हेतु ही अनुमिति का कारण होता है और हेतु का प्रत्यक्षात्मक ज्ञान पूर्वोक्त रीति से हो नहीं सकता । यदि साक्षात्कारित्व से लक्षणरूप हेतु की अनुमिति करें, तो उक्त लक्षणरूप हेतुज्ञान से साक्षात्कारित्व की अनुमिति और साक्षात्त्व के ज्ञान से उक्त हेतु का ज्ञान होने से अन्योन्याश्रय हो जायगा । समर्थन—साक्षात्त्व से उक्त लक्षणरूप हेतु की अनुमिति नहीं होती; किन्तु अपरोक्षव्यवहारहेतु ज्ञानत्वरूप हेतु से होती है। अतः अन्योन्याश्रय नहीं है। खंडन—तब साक्षात्कारित्व का व्याप्य अपरोक्षव्यवहारहेतु-ज्ञानत्व ही लक्षण हो, कारण इन्द्रियार्थसन्निकर्षजत्वरूप हेतुज्ञान के लिए वह प्रथम ज्ञेय है । समर्थन—लक्षण लक्ष्य का अवश्य व्यापक होता है । अतः प्रत्यक्ष का व्यापक होने से इन्द्रियार्थ-सन्निकर्षजत्व ही लक्षण है । अपरोक्ष-व्यवहारहेतु-ज्ञानत्व लक्ष्य का व्यापक नहीं है, कारण 'ग्रामं गच्छन् तृणं स्पृशति' इस स्थल में तृण का त्वाच-प्रत्यक्ष होने पर भी अपरोक्षव्यवहार नहीं होता । प्रत्युत वह व्याप्य है और व्याप्य ही हेतु होता है । अतः अपरोक्ष्यव्यवहारहेतुत्व उक्त लक्षण का अनुमापक हेतु ही है, प्रत्यक्ष का लक्षण नहीं। खंडन—जहां उपेक्ष्य तृणादि-ज्ञान में अपरोक्ष्यव्यवहारहेतुत्वरूप हेतु के न होने से इन्द्रियार्थ-सन्निकर्षजत्व का अवगम नहीं होता, वहां उक्त हेतु से साक्षात्कारित्वरूप लक्ष्य का अवगम कैसे होगा ? किञ्च—जब उपेक्ष्य तृणादि के त्वाच- प्रत्यक्ष में ज्ञापक हेतु के न होने से साक्षात्कारित्व के व्यापकत्वरूप से अनवगत भी इन्द्रियार्थ-सन्निकर्षजत्व लक्षण हो सकता है, तब अव्यापक अपरोक्ष्यव्यवहारहेतुत्व का क्या अपराध है कि वह लक्षण न हो । कारण, अज्ञात-दशा में व्यापकत्व भी अकिञ्चित्कर है।