खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 220, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] प्रथम प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन २०३ अथ यत्र तदिन्द्रियजत्वे लिङ्गं नास्ति तत्र लिङ्गान्तरात्तत्प्रत्येतव्यम् । तथापि तदेवास्तां साक्षात्कारित्वे लिङ्गम्, कृतमिन्द्रियजत्वानुमानपूर्वकतदनुमानकल्पनया। अथ तथा लिङ्गद्वयं तत् प्रत्येकमव्यापकतया न लक्षणम्, इन्द्रियजत्वन्तु तथात्वात् लक्षणमिति चेन्न । साक्षात्कारित्वानुमानस्य लक्षणप्रयोजनस्योभाभ्यामेव सिद्धेः कृतं व्यापकेन तेन । नापि तृतीयः ; स ह्येवंरूपो यदिन्द्रियार्थसन्निकर्षजनितं तत्प्रत्यक्षमिति व्यवह- र्तव्यमिति। अयमप्यर्थोऽनुपपन्नः ; लक्षणस्य ज्ञातुमशक्यत्वात् । साक्षात्कारित्वा- त्तदवगमे साक्षात्कारित्वमेवास्तु व्यवहारनियमनिदानम्, अव्यवहितप्रतिपत्तिकत्वा- दित्यावेदितम् । अत एव न चतुर्थः , कल्पनागौरवदोषाधिकः । समर्थन—जिस स्थल में अपरोक्ष्यव्यवहारहेतुत्व नहीं है, वहाँ अन्य लिंग ( सविशेषार्थप्रधानत्व ) से इन्द्रियार्थसन्निकर्षजत्व की अनुमिति होगी । खण्डन-तब तो सविशेषार्थप्रधानत्व ही साक्षात्कारित्व का साक्षात् हेतु हो, इन्द्रियार्थसन्निकर्षजत्व की अनुमिति द्वारा साक्षात्त्व की अनुमिति व्यर्थ है । समर्थन-अपरोक्ष्यव्यवहारहेतुत्व तथा सविशेषार्थप्रधानत्व प्रत्येक में अव्यापक हैं। अर्थात् अपरोक्ष्यव्यवहारहेतुत्व उपेक्ष्य तृण के त्वचा में तथा सविशेषार्थप्रधानत्व 'प्रमेयवत्त्वम्' इत्याकारक प्रत्यक्ष में अव्यापक है । अतः वे लक्षण नहीं हो सकते । किन्तु इन्द्रियजत्व ही व्यापक होने से लक्षण है । खंडन—लक्षण का प्रयोजन साक्षात्कारित्व का ज्ञान होना है। वह ज्ञान दोनों से हो जायगा, फिर व्यापक इन्द्रियार्थसन्निकर्षजत्वरूप लक्षण व्यर्थ ही है । 'साक्षात्कारिप्रमिति प्रत्यक्षस्वरूप से व्यवहर्तव्य है, इन्द्रियार्थसन्निकर्षजन्य होने से' यह तृतीय कल्प भी अयुक्त है । कारण, उक्त लक्षण का ज्ञान ही नहीं हो सकता । यदि साक्षात्कारित्वरूप कार्यगत ऐक्यरूप से उक्त लक्षण की अनुमिति करें, तो अच्छा है कि साक्षात्कारित्व से उक्त लक्षण द्वारा व्यवहारानुमिति की अपेक्षा लाघवात् साक्षात् साक्षात्कारित्व से ही प्रत्यक्षत्वव्यवहार की अनुमिति करें । 'प्रत्यक्ष, साक्षात्कारी आदि शब्दों का इन्द्रियार्थ-सन्निकर्षजत्व प्रवृत्तिनिमित्त ( शक्य- तावच्छेदक ) है, इस बात के निश्चय के लिए लक्षण है' यह चतुर्थ कल्प भी अयुक्त है । कारण, उक्त लक्षण का ज्ञान साक्षात्कारित्व से होगा । अतः उपस्थित होने तथा अनेक विशेषणयुक्त उक्त गुरु लक्षण की अपेक्षा लघु होने के कारण साक्षात्त्व को ही प्रवृत्तिनिमित्त मानना उचित है ।