भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 221

नापि पञ्चमः ; तादृशस्य दर्शयितुमशक्यत्वात् । द्वितीय-प्रत्यक्ष-लक्षण-खण्डनम् एतेन भासमानाकारेन्द्रियसंयोगजं प्रत्यक्षमित्यपि निरस्तम् । किञ्च—प्रमाणविशेषलक्षणमिदं प्रमाणलक्षणोपसङ्गृहीतस्य कियतः सङ्ग्रा- हकम्, कियतश्च प्रतिषेपकं वक्तव्यम्, प्रमाणलक्षणेन च व्यभिचारिणो निवृत्तिः प्रदर्श्यते । तथा च सति यथाश्रुतमिदमलक्षणम्, व्यभिचार्यपि हि भासमानस्य सत्तादेशाकारस्येन्द्रियसंयोगादुत्पद्यते । अथ विशेषाभिप्रायेणेदं लक्षणं वाच्यम् ; तथाऽप्यसङ्गतिः । तथा हि—किं कियन्मात्रभासमानेन्द्रियसम्प्रयोगजत्वं विवक्षितम्, उत यावद्भासमानेन्द्रियसम्प्र- योगजत्वम् ? आद्ये व्यभिचार्यव्यवच्छेदः, निर्विकल्पकासङ्ग्रहश्च । पञ्चम कल्प ( अन्य ही किसी प्रयोजन के लिए ) भी युक्त नहीं है, क्योंकि उसे दिखा नहीं सकते । द्वितीय प्रत्यक्षलक्षण का खण्डन 'भासमान आकार से इन्द्रिय का जो सम्प्रयोग ( सन्निकर्ष ) है, तज्जन्य ज्ञान प्रत्यक्ष है' यह लक्षण भी पूर्वोक्त रीति से ( निष्प्रयोजन होने से ) ही अयुक्त है । किञ्च—प्रमाणविशेष ( प्रत्यक्ष ) का यह लक्षण प्रमाण-लक्षण द्वारा उपसंगृहीत कुछ लक्ष्यों का संग्राहक तो कुछ का व्यवच्छेदक मानना होगा । प्रमाणसामान्य का लक्षण व्यभिचारी शुक्ति-रजतज्ञान का व्यवच्छेदक है, तो विशेष लक्षण को भी ऐसा होना चाहिए । किन्तु 'भासमान आकार तथा इन्द्रिय-सम्प्रयोगजन्यत्व'रूप यथाश्रुत यह लक्षण उक्त व्यभिचारी ज्ञान में भी है। कारण, व्यभिचारी ज्ञान भी भासमान इदन्तरूप आकार से इन्द्रिय के सन्निकर्ष से ही उत्पन्न होता है । अतः ऐसा यथाश्रुत लक्षण नहीं हो सकता । यदि घटत्व-पटत्वादि विशेष आकार के अभिप्राय से लक्षण करें और व्यभिचारी में रजतत्वरूप विशेष आकार के न होने से उसका व्यवच्छेद मान लें, तो वह भी असङ्गत ही है। देखिये—क्या कियन्मात्र भासमान आकार और इन्द्रिय का सम्प्रयोग विवक्षित है या यावत् भासमान आकार और इन्द्रिय का सम्प्रयोग ? प्रथम पक्ष अयुक्त है, कारण व्यभिचारिज्ञान भी कियन्मात्र भासमान आकार ( इदमाकार ) तथा इन्द्रिय के सम्प्रयोग से जन्य है ही, अतः उसमें अतिव्याप्ति बनी ही रहेगी । सिवा, निर्विकल्पक ज्ञानमें अव्याप्ति भी हो जायगी । कारण, निर्विकल्पक ज्ञान में वस्तुमात्र भासता है और वह निर्भाग है । अतः निर्विकल्पक ज्ञान भासमान सकल आकार तथा इन्द्रिय के सम्प्रयोग से ही होता है, कियन्मात्र भासमान आकार से नहीं ।