भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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परिच्छेद ] द्वितीय प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन २०५ नापि द्वितीयः; विकल्पासहत्वात् । तथा हि—किं भासमानताविशिष्टस्येन्द्रिय- सम्प्रयोगः, उत भासमानतोपलक्षितस्य ? नाद्यः; पूर्वं भासमानत्वाभावात् कारणस्य च पूर्वभावित्वात् । द्वितीये लटोऽविवक्षितार्थत्वम्, विवक्षितार्थत्वं वा ? नाद्यः; तथा हि—यावद्भासमानाकारेन्द्रियसंयोगजमपि भवति घटोऽयमिति विज्ञानम् । न च तदात्मनि प्रत्यक्षम्, आत्मनस्तदीयाविषयत्वात्, प्रामाण्यस्य च विषयनियतत्वात् । यत्र प्रामाण्यं तत्रैव विषये तद्विशेषस्य प्रत्यक्षत्वस्य वक्तव्यत्वात् । अन्यथा पटास्तित्वे घटोऽयमिति प्रत्यक्षं प्रमाणयतः किमुत्तरम् ? नन्विदमुत्तरम्—घटविज्ञानं पटे न प्रत्यक्षम्, न हि तदिन्द्रियसन्निकर्षेणो- त्पन्नमिति । तत् किमात्मेन्द्रियसन्निकर्षजं घटज्ञानमात्मनि प्रत्यक्षमेव ? कथमेवं स्यात्, आत्मेन्द्रियसन्निकर्षाद् घटज्ञानस्योत्पादेऽपि आत्मनोऽनवभासमानत्वादिति ‘भासमान यावत् आकार और इन्द्रिय के सम्प्रयोग से जन्य ज्ञान प्रत्यक्ष है’ यह द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं । कारण, यह विकल्प को सहन नहीं कर सकता । देखिये— क्या भासमानताविशिष्ट में इन्द्रिय का सम्प्रयोग विवक्षित है या भासमानता से उपलक्षित में ? प्रथम पक्ष युक्त नहीं, कारण इन्द्रिय-सम्प्रयोग से पूर्व भासमानता का अभाव है। भासमानता के कारणीभूत इन्द्रिय-सम्प्रयोग की स्थिति भासमानता से पूर्व ही होनी चाहिए । ‘भासमानता से उपलक्षित में इन्द्रिय का सम्प्रयोग हो,’ इस द्वितीय कल्प में भी लट् का अर्थ अविवक्षित है या विवक्षित ? प्रथम पक्ष युक्त नहीं, क्योंकि ‘घटोऽयम्’ यह ज्ञान यावत् भासमान आकार तथा इन्द्रिय के सम्प्रयोग से जन्य होता है । अतः वह आत्मा में भी प्रत्यक्ष हो जायगा । किन्तु आत्मा में ‘घटोऽयम्’ यह प्रत्यक्ष नहीं हो सकता, क्योंकि आत्मा उस ज्ञान का विषय नहीं है और प्रामाण्य विषय से नियत है । अर्थात् जिस विषय में जो प्रमाण हो, उसी विषय में वह प्रमाणविशेष प्रत्यक्ष कहा जाता है । यदि यह न मानें, तो पट के अस्तित्व में ‘घटोऽयम्’ इस प्रत्यक्ष ज्ञान को कोई प्रमाण दे तो क्या उत्तर होगा ? समर्थन—ऐसा उत्तर देंगे कि घटज्ञान पट और इन्द्रिय के सन्निकर्ष से जन्य नहीं है । अतः पट में वह ज्ञान प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं हो सकता । खंडन—क्या आत्मा और मनोरूप इन्द्रिय के सन्निकर्ष से जायमान घटज्ञान आत्मा में प्रत्यक्ष है ? समर्थन—घटज्ञान आत्मा में प्रत्यक्ष कैसे हो सकता है, क्योंकि यद्यपि वह आत्मा तथा इन्द्रिय ( मन ) के सन्निकर्ष से उत्पन्न है, तथापि आत्मा भासमान नहीं है। खण्डन—‘भासमान’