खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम चेन्न । भासमानेत्यत्र लटोऽविवक्षितार्थत्वपक्षमधिकृत्येदं भवतोच्यत इति स्मर्तव्यम् । अस्ति ह्यात्मनो भासमानत्वं कदाचित् केनचिद्, अन्यथा अप्रमेयत्वप्रसङ्गात् । उक्तलक्षणकं स्वविषये प्रत्यक्षम् , न त्वन्यत्राऽपीति चेन्न । स्वशब्देन यदि ज्ञानमात्रं विवक्षितं तदा स दोषस्तदवस्थः । अथ ज्ञानव्यक्तिरपेक्षिता, तदा लक्ष्यस्वरूपस्यासाधारणतया तत्परित्यागेन लक्षणस्यान्यत्र गन्तत्वादतिव्याप्तिः । व्यक्त्यन्तरस्य लक्षणाश्रयस्य एकव्यक्त्यभिहितलक्ष्यीभूतासाधारणरूपत्वाभावात् । व्यक्त्यन्तरमपि लक्ष्यमेव, अलक्ष्ये च लक्षणस्य गमनादतिव्याप्तिरिति चेन्न । यदेकत्रासाधारणस्वरूपं लक्ष्यत्वेन निरूच्यते भवता, न तदन्यस्य स्वरूपम् । अतः कथं 'तदपि लक्ष्यमि'ति अपिशब्देनानेकं साधारणीकृत्य समुचेतुं शक्यम् । यदपि साधारणं रूपं तदूध्र्वव्यक्त्यन्तरव्यवच्छेदकस्वविषयपदं विशेषणं प्रक्षिपता भवतैवासाधारणीकृतम् । स्वशब्दस्य ज्ञानमात्रार्थत्वे दोषस्योक्तत्वात् । स्वत्वस्य इस विशेषण में लट् का अर्थ अविवक्षित है, इस कल्प का आश्रयणकर आप उत्तर कह रहे हैं, इसका स्मरण कीजिये । कदाचित् किसी कारण आत्मा का भी भान होता ही है । अन्यथा आत्मा अप्रमेय हो जायगी । समर्थन—'भासमान आकार और इन्द्रिय के संप्रयोग से जन्य ज्ञान स्वविषय में प्रत्यक्ष है' ऐसा लक्षण करने पर घटज्ञान आत्मा में प्रत्यक्ष न होगा । खण्डन— यदि 'स्व' शब्द को ज्ञानसामान्यपरक मानें, तो आत्मा भी यत्किञ्चित् ज्ञान का विषय होती ही है । अतः पुनः घटज्ञान आत्मा में प्रमाण होने लगेगा । यदि ज्ञानव्यक्तिपरक मानें, तो जो ज्ञानव्यक्ति 'स्व' शब्द से गृहीत होगी, वही लक्ष्य हुई, अन्य व्यक्ति नहीं; क्योंकि लक्ष्य का असाधारणरूप तद्व्यक्तित्व उस व्यक्ति में नहीं है और लक्षण अन्यव्यक्ति-साधारण है । अतः अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—अन्य व्यक्ति भी लक्ष्य ही है, अलक्ष्य में लक्षण का गमन ही अतिव्याप्ति है । खंडन—आप स्वविषयक प्रत्यक्ष को लक्ष्य कहते हैं, वह रूप अन्यत्र नहीं है । अतः 'वह भी लक्ष्य है' इस प्रकार अपि (भी) शब्द से उस व्यक्ति का समुच्चय कैसे कर सकते हैं। जो प्रत्यक्षत्व अन्यव्यक्तिसाधारण था, उसे भी 'स्वविषय में' यह विशेषण देकर आपने ही असाधारण कर दिया । यदि 'स्व' शब्द ज्ञानमात्रपरक मानें, तो 'घटज्ञान आत्मा में भी प्रत्यक्ष हो जायगा' यह दोष हम कह ही आये हैं । किञ्च—सम्पूर्ण ज्ञान में अनुगत स्वत्व का निर्वचन भी नहीं हो सकता,