खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
२०६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम चेन्न । भासमानेत्यत्र लटोऽविवक्षितार्थत्वपक्षमधिकृत्येदं भवतोच्यत इति स्मर्तव्यम् । अस्ति ह्यात्मनो भासमानत्वं कदाचित् केनचिद्, अन्यथा अप्रमेयत्वप्रसङ्गात् । उक्तलक्षणकं स्वविषये प्रत्यक्षम् , न त्वन्यत्राऽपीति चेन्न । स्वशब्देन यदि ज्ञानमात्रं विवक्षितं तदा स दोषस्तदवस्थः । अथ ज्ञानव्यक्तिरपेक्षिता, तदा लक्ष्यस्वरूपस्यासाधारणतया तत्परित्यागेन लक्षणस्यान्यत्र गन्तत्वादतिव्याप्तिः । व्यक्त्यन्तरस्य लक्षणाश्रयस्य एकव्यक्त्यभिहितलक्ष्यीभूतासाधारणरूपत्वाभावात् । व्यक्त्यन्तरमपि लक्ष्यमेव, अलक्ष्ये च लक्षणस्य गमनादतिव्याप्तिरिति चेन्न । यदेकत्रासाधारणस्वरूपं लक्ष्यत्वेन निरूच्यते भवता, न तदन्यस्य स्वरूपम् । अतः कथं 'तदपि लक्ष्यमि'ति अपिशब्देनानेकं साधारणीकृत्य समुचेतुं शक्यम् । यदपि साधारणं रूपं तदूध्र्वव्यक्त्यन्तरव्यवच्छेदकस्वविषयपदं विशेषणं प्रक्षिपता भवतैवासाधारणीकृतम् । स्वशब्दस्य ज्ञानमात्रार्थत्वे दोषस्योक्तत्वात् । स्वत्वस्य इस विशेषण में लट् का अर्थ अविवक्षित है, इस कल्प का आश्रयणकर आप उत्तर कह रहे हैं, इसका स्मरण कीजिये । कदाचित् किसी कारण आत्मा का भी भान होता ही है । अन्यथा आत्मा अप्रमेय हो जायगी । समर्थन—'भासमान आकार और इन्द्रिय के संप्रयोग से जन्य ज्ञान स्वविषय में प्रत्यक्ष है' ऐसा लक्षण करने पर घटज्ञान आत्मा में प्रत्यक्ष न होगा । खण्डन— यदि 'स्व' शब्द को ज्ञानसामान्यपरक मानें, तो आत्मा भी यत्किञ्चित् ज्ञान का विषय होती ही है । अतः पुनः घटज्ञान आत्मा में प्रमाण होने लगेगा । यदि ज्ञानव्यक्तिपरक मानें, तो जो ज्ञानव्यक्ति 'स्व' शब्द से गृहीत होगी, वही लक्ष्य हुई, अन्य व्यक्ति नहीं; क्योंकि लक्ष्य का असाधारणरूप तद्व्यक्तित्व उस व्यक्ति में नहीं है और लक्षण अन्यव्यक्ति-साधारण है । अतः अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—अन्य व्यक्ति भी लक्ष्य ही है, अलक्ष्य में लक्षण का गमन ही अतिव्याप्ति है । खंडन—आप स्वविषयक प्रत्यक्ष को लक्ष्य कहते हैं, वह रूप अन्यत्र नहीं है । अतः 'वह भी लक्ष्य है' इस प्रकार अपि (भी) शब्द से उस व्यक्ति का समुच्चय कैसे कर सकते हैं। जो प्रत्यक्षत्व अन्यव्यक्तिसाधारण था, उसे भी 'स्वविषय में' यह विशेषण देकर आपने ही असाधारण कर दिया । यदि 'स्व' शब्द ज्ञानमात्रपरक मानें, तो 'घटज्ञान आत्मा में भी प्रत्यक्ष हो जायगा' यह दोष हम कह ही आये हैं । किञ्च—सम्पूर्ण ज्ञान में अनुगत स्वत्व का निर्वचन भी नहीं हो सकता,
परिच्छेद ] द्वितीय प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन २०७ चानुगतस्वरूपस्य निर्वक्तुमशक्यत्वात् । अन्यथा अन्यव्यक्तिविषयस्यान्यत्र तथात्वापत्तेः । नापि द्वितीयः पक्षः ; विकल्पासहत्वात् । किं सम्प्रयोगापेक्षया वर्तमानत्वम् , अथ यत्किञ्चिदपेक्षया ? प्रथमे विशेषणत्वपक्षान्न विशेष इत्युक्तदोषापत्तिः । द्वितीये तु लटोऽविवक्षितार्थत्वमेव स्यात्, व्यवच्छेद्ययोर्भासितभासिष्यमाणयोरपि तदा तदा भासमानत्वस्वीकारात् । इन्द्रियसम्प्रयोगानन्तरं भासमानत्वमपेक्षितम्, अतो विवक्षितार्थमिति चेन्न । आत्मनोऽपीन्द्रियसंयोगानन्तरं भासमानत्वमस्ति । न हि स यदा मनसा गृह्यते तदा नेन्द्रियसंयोगानन्तरम् । जिससे उसे स्वस्वरूप से संग्रहकर 'स्व' शब्द को ज्ञानमात्र का वाच्य मानें । यदि कथञ्चित् स्वत्व का निर्वचन भी करें, तो ज्ञानमात्र के 'स्व'शब्दवाच्य होने से अन्यविषयक ज्ञान अन्य में, अर्थात् घटज्ञान आत्मा में प्रत्यक्ष हो जायगा । "भासमान' इस पद में 'लट्' का अर्थ विवक्षित है" यह द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं । कारण, वह विकल्प को सह नहीं सकता । देखिये—क्या सम्प्रयोग की अपेक्षा वर्तमानत्व विवक्षित है अथवा जिस किसीकी अपेक्षा ? इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं, कारण सम्प्रयोग-काल में [ कारण के कार्य से पूर्ववर्ती होने से ] भासमानता हो ही नहीं सकती । अतः इस पक्ष में भी विशेषण पक्ष में कथित दोष हो जायगा । यदि यत्किञ्चित् की अपेक्षा वर्तमानता का ग्रहण करें, तो अर्थतः वर्तमानत्व अविवक्षित ही हुआ । कारण, भासिष्यमाण ( भासित होनेवाला ) और भासित भी यदा कदाचित् वर्तमान भासन का विषय ही हैं। अतः उनका व्यवच्छेद नहीं होगा । समर्थन—"इन्द्रिय-सम्प्रयोग के अनन्तर जायमान जो भासन तद्विषय आकार और इन्द्रिय के सम्प्रयोग से जन्य ज्ञान प्रत्यक्ष है" ऐसा लक्षण करने पर घटज्ञान आत्मा में प्रत्यक्ष नहीं होगा । कारण, चक्षुःसंयोग के अनन्तर आत्मा भासमान नहीं है । खंडन—आत्मा का भासन भी मनोरूप इन्द्रिय के संयोग के अनन्तर ही होता है, मनोरूप इन्द्रिय के संयोग के बिना आत्मा का ग्रहण भी नहीं होता । अतः उक्त रूप से परिष्कार करने पर भी घटज्ञान आत्मा में प्रत्यक्ष हो जायगा ।
२०८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम नेन्द्रियसंयोगमात्रं विवक्षितम्, किं नाम ? यदनन्तरं भासमानतोत्पत्तिरिति चेन्न । तदनन्तरमपि भासमानतोत्पत्तेः । भासमानतान्तरं तत्, न त्विदं भासमानत्वमिति चेन्न । अव्याप्तिप्रसङ्गात्, एकभासनमात्रव्यवस्थितत्वात् लक्षणस्य । अथ मन्यसे यद्भासनं यस्य विषयस्येन्द्रियसंयोगादुत्पन्नं तत्तत्र प्रत्यक्षं प्रमाणमिति निरुक्तौ न दोष इति । मैवम् ; यद्भासनं घटोऽयमिति यस्य विषय- स्यात्मन इन्द्रियेण सह सन्निकर्षादुत्पन्नं तद्भासनं तस्मिन्नात्मनि प्रमाणं स्यात् । नात्मा तस्य विषयः, तत्कथमेवं स्यादिति चेत् । न हि भवता तदीयविषय- स्येत्युक्तम्, किन्तु सामान्यतो विषयस्येति, तेनेदमभिहितम् । यदि तु तदीयता- विशेषणमुपादत्ते भवान्, तदा यदि तच्छब्देन ज्ञानजातीयमात्रपरामर्शस्तदा स समर्थन—'जिस इन्द्रियसंयोग के अनन्तर भासन होता हो, उस इन्द्रियसंयोग के अनन्तर जायमान जो भासन, उसका विषय आकार तथा इन्द्रिय के सम्प्रयोग से जन्य ज्ञान प्रत्यक्ष है' ऐसा परिष्कार करेंगे, तो घटज्ञान आत्मा में प्रत्यक्ष नहीं होगा । कारण, चक्षुःसंयोग के अनन्तर आत्मज्ञान नहीं होता । खण्डन--यद्यपि चक्षुःसंयोग के अनन्तर आत्मज्ञान नहीं होता, तथापि आत्मा का ज्ञान तो होता ही है । अतः आपके लक्षण का समन्वय होने से घटज्ञान आत्मा में प्रत्यक्ष हो जायगा । समर्थन--आत्म-मनःसंयोग के अनन्तर आत्मा का भासन होता है, घट का भासन तो नहीं होता । अतः घटज्ञान आत्मा में प्रत्यक्ष नहीं होगा । खंडन--तत्र तो 'जिस इन्द्रियसम्प्रयोग के अनन्तर घट का भासन होता हो, उस इन्द्रिय के सम्प्रयोग से जन्य ( घट) ज्ञान प्रत्यक्ष है' ऐसा लक्षण होने से घटज्ञान में ही लक्षण का समन्वय होगा, अन्यत्र पटादि-ज्ञान में सर्वत्र अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'जो ज्ञान जिस विषय और इन्द्रिय के संयोग के अनन्तर होता है, वह ज्ञान उस विषय में प्रत्यक्ष है' ऐसा लक्षण करेंगे । एवञ्च घटज्ञान आत्मा में प्रत्यक्ष नहीं है । खंडन—'घटोऽयम्' यह भासन जिस विषय आत्मा और मन के संयोग के अनन्तर उत्पन्न होता है, अतः वह 'घटोऽयम्' भासन आत्मा में प्रत्यक्ष हो जायगा । इसलिए ऐसा परिष्कार भी असङ्गत है । समर्थन—आत्मा 'घटोऽयम्' इस ज्ञान का विषय नहीं है, अतः घटज्ञान-आत्मा में प्रत्यक्ष कैसे हो सकता है ? खंडन—आपने 'तद्-ज्ञान का विषय' ऐसा निवेश न कर सामान्यरूप से विषय का निवेश किया है, इसीलिए यह दोष होता है । यदि तद्-ज्ञानका
परिच्छेद ] द्वितीय प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन २०६ दोषस्तदवस्थः । यदि तु ज्ञानजातीयमात्रव्यक्तिविशेषपरामर्शः, तदाऽव्यापकत्वम्, प्रतिज्ञानं तच्छब्दार्थस्य भेदात् । नहि यत्त्वं तत्त्वं वा किञ्चिदनुगतं रूपमस्ति । अत एवात्मविषयत्वानुयोगवत् त्रिपुटीप्रत्यक्षवादिनि घटज्ञानस्य घटादौ प्रत्यक्षतया प्रामाण्यानुयोगो द्रष्टव्यः, चक्षुःसन्निकर्षाभावात् । अन्यथा तस्येष्ट- प्रसङ्गकत्वात् । तदर्थं यदिन्द्रियसन्निकर्षोत्पन्नमिति विशेषणप्रक्षेपे यत्तच्छब्दार्थस्यासाधा- रण्यादव्याप्यापत्तेः । यदि तु यत्तच्छब्दार्थावनुगतौ स्यातां पुनरप्यन्यत्र ‘घटो- ऽयमि’ति ज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वेन प्रमाणता प्रसज्येत । अथ ‘अन्यव्यतिरिक्त’ इति विशेषणं प्रक्षिपसि, तदाऽन्यविषयस्य प्रत्यक्षता विषय' ऐसा निवेश करें—‘यत्, तत्’ को ज्ञानमात्रपरक मानें, तो फिर भी घटज्ञान आत्मा में प्रत्यक्ष हो जायगा । कारण, यत्-ज्ञान पद से आत्मज्ञान का भी ग्रहण हो सकता है । यदि घटज्ञान व्यक्तिपरक हो, तो घटज्ञान में तो समन्वय हो जायगा; पर अन्यत्र सर्वत्र अव्याप्ति हो जायगी । कारण, निखिल ज्ञानों में वृत्ति यत्त्व-तत्त्व कोई अनुगत धर्म नहीं है, जिसे प्रवृत्तिनिमित्त मानकर ज्ञानमात्र का यत्-शब्द से ग्रहण हो सके । जो प्रभाकर आदि ज्ञान में त्रिपुटी ( ज्ञाता, ज्ञान ज्ञेय, इन तीनों ) का भान मानते हैं, उनके मत में घटज्ञान आत्मा में प्रत्यक्ष इष्ट ही है । अतः उनके मत में घटज्ञान पट में प्रत्यक्ष हो जायगा, यह दोष जानना चाहिए । समर्थन—‘जिस वस्तु और इन्द्रिय के सन्निकर्ष से उत्पन्न जो ज्ञान हो, वह ज्ञान उस वस्तु में प्रत्यक्ष है ।’ अतः घटज्ञान पट में प्रत्यक्ष नहीं है । खंडन—यदि यत्-शब्द को अनुगत तत्-तत् ज्ञानव्यक्तिपरक मानें, तो अन्य ज्ञान में अव्याप्ति हो जायगी । यत्त्व-तत्त्व को अनुगत मान भी लें, तब भी ‘घटोऽयम्’ यह ज्ञान पट में प्रत्यक्ष हो जायगा । समर्थन—‘जिस वस्तु तथा इन्द्रिय के सन्निकर्ष से जो ज्ञान होता है, वह ज्ञान उससे जो अन्य, उस अन्य से व्यतिरिक्त वस्तु में प्रत्यक्ष है ।’ अतः घटज्ञान पट में प्रत्यक्ष नहीं है । खंडन—अन्यविषयक प्रत्यक्ष के लक्ष्य न होने से वह प्रत्यक्ष न कहा जायगा । अथवा लक्ष्यभूत अन्यविषयक प्रत्यक्ष में भी उक्त लक्षण का समन्वय हो जाने से अतिव्याप्ति होगी । तत्-शब्द को किसी अनुगमक रूप से २७
न स्यात् । तच्छब्देनानुगतार्थाभिधाने व्यवच्छेदकत्वाभावात् । घटज्ञानस्य च पटे प्रत्यक्षतया प्रामाण्यं प्रसज्येत । एतेन—इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यभिचारि प्रत्यक्षमित्यत्रापि दोषोऽय- मुक्तो द्रष्टव्यः, तादृशस्यापि ज्ञानस्य विषयान्तरे प्रत्यक्षत्वेन प्रामाण्यप्रसङ्गात् । यस्यार्थस्य सन्निकर्षात् यदुत्पद्यते ज्ञानं तत्तत्र प्रत्यक्षतया प्रमाणमित्यभिधाने तु यच्छब्दतच्छब्दसाधारणासाधारणार्थाभिधानविकल्पोक्तदोषप्रसङ्गः । अव्यभिचारिपदञ्च व्यर्थम् । न हि शुक्तौ रजतज्ञानं रजतेन्द्रियसन्निकर्षा- दुत्पन्नम् । संस्कारलक्षणा प्रत्यासत्ती रजतत्वेऽप्यस्तीति चेन्न । पूर्वानुभूतरजत- तादात्म्यस्य संस्काराभावादुक्तदोषतादवस्थ्यात् । गुरुमतानुसारेण सुतरां सन्निकर्षज ज्ञानपरक मान भी लें, तो व्यवच्छेद के न होने से घटज्ञान पट में प्रमाण हो जायगा । कारण, तत्-शब्द से पटज्ञान का भी परामर्श कर सकते हैं । 'इन्द्रियार्थ सन्निकर्षोत्पन्न अव्यभिचारिज्ञान प्रत्यक्ष है' इस लक्षण में भी घटज्ञान आत्मा में या पट में प्रत्यक्ष हो जायगा—यह दोष जानना चाहिए । यदि 'जिस वस्तु के सन्निकर्ष से जो ज्ञान उत्पन्न हो, वह ज्ञान उस विषय में प्रत्यक्ष है' ऐसा लक्षण करें, तो यत्-यत् शब्द को एकज्ञानपरक मानें या ज्ञानसामान्यपरक, उभयथा पूर्वोक्त दोष होगा । यदि यत्-तद्घटित लक्षण करें, तो रजत के सन्निकर्ष से शुक्ति में रजतभ्रम न होने से रजत में प्रत्यक्ष नहीं होगा । फिर, 'अव्यभिचारी' विशेषण भी व्यर्थ हो जायगा; क्योंकि शुक्ति में रजतज्ञान रजत और इन्द्रिय के सन्निकर्ष से उत्पन्न नहीं है । अतः 'सन्निकर्षजत्व' विशेषण से ही उसकी व्यावृत्ति हो जायगी । संस्काररूप (चक्षुःसंयुक्त-आत्मसमवेत-पूर्वरजतप्रत्यय-संस्कारविषयत्व- रूप) प्रत्यासत्ति रजत में है, यह भी नहीं कह सकते । कारण, पूर्वानुभूत का ही संस्कार हुआ करता है । शुक्ति और रजततादात्म्य पूर्व में अनुभूत न होने से उसका संस्कार संभव ही नहीं है । यह तो भट्टमत में अव्यभिचारी विशेषण की व्यर्थता हुई । गुरुमत के अनुसार तो सुतरां उक्त विशेषण व्यर्थ है । कारण, वे तो भ्रमज्ञान मानते ही नहीं । किञ्च—शुक्ति में रजततया अवगाह्यमान ज्ञान का व्यवच्छेद करते हैं अथवा रजतत्वमात्र ज्ञान का ? पहले का व्यवच्छेद व्यर्थ है, पुरोवर्ती शुक्ति- निष्ठ रजतत्ववैशिष्ट्य (तादात्म्य) में संस्काररूप प्रत्यासत्ति न होने से सन्निकर्षजत्व
परिच्छेद ] द्वितीय प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन २११ विशेषणवैयर्थ्याच्चैन व्यभिचारानङ्गीकारात् । रजतत्ववैशिष्ट्ये पुरोवर्तिनस्तदभावात् । तस्मिन्नेव वांशेऽप्रामाण्यम्, न तु रजतत्वमात्रे, तस्यान्यत्र सत्त्वात् । अथ साक्षात्कारित्वं प्रत्यक्षलक्षणमुच्यते तदा साक्षात्कारिभ्रमेऽपि प्रसङ्गः । अव्यभिचारित्वेन विशेषितं तल्लक्षणमिति वा भेदाग्रहव्यतिरिक्तविभ्रमाभावो वेति चेत् । न ; विकल्पानसहत्वात् । किमवगतमिदं लक्षणं फलहेतुः , अनवगतं वा ? न तावच्चरमः ; तदभिधानवैयर्थ्यप्रसङ्गात् । अभिधानस्य ज्ञानोत्पादोपयोगित्वात् तस्य चानवगतस्यैव फलसाधकत्वाभ्युपगमात् । आद्ये किमन्यस्मात्तदवगमः , उत त्वदीयाल्लक्षणवाक्यात् ? यद्यन्यस्मात् , कृतममुना लक्षणाभिधानप्रयासेन । अभिधानस्य ज्ञानोत्पादातिरिक्तप्रयोजनाभावात् विशेषण से ही उसका व्यवच्छेद हो जायगा । दूसरे का भी व्यवच्छेद संभव नहीं । उक्त ज्ञान वैशिष्ट्यांश (तादात्म्य) में ही भ्रम में रजतत्व नहीं है । कारण, रजतत्व देशान्तर में भी होने से तद्गोचर ज्ञान भी प्रमाण होने के कारण व्यवच्छेद्य ही नहीं है । समर्थन—साक्षात्कारित्व ही प्रत्यक्ष का लक्षण कहेंगे । खंडन—प्रत्यक्ष-भ्रम में अतिप्रसङ्ग होने से वह लक्षण अयुक्त है । समर्थन—भ्रम में अतिव्याप्ति के वारणार्थ लक्षण में 'अव्यभिचारित्व' का भी निवेश कर देंगे । अथवा प्रभाकर के मत में भेदाग्रह से भिन्न भ्रमज्ञान होता नहीं, अर्थात् ज्ञानमात्र प्रमा ही है । तब तो अव्यभिचारी विशेषण देने का भी कुछ काम नहीं है । खण्डन—यह लक्षण भी विकल्प को सह नहीं सकता । देखिये—क्या अवगत (ज्ञात) लक्षण व्यावृत्ति या व्यवहाररूप फल का कारण है या अनवगत (अज्ञात), अर्थात् साक्षात्कारित্বরূপ लक्षण स्वयं ज्ञात होकर इतरव्यवच्छेद-ज्ञान का कारण है अथवा अपनी सत्तामात्र से कारण है ? यदि अन्तिम पक्ष मानें, तो लक्षण का अभिधान ही व्यर्थ हो जायगा । केवल ज्ञानोत्पादकत्वेन अभिधान की सार्थकता होने पर भी प्रकृत में आपने अज्ञात लक्षण को ही इतरव्यवच्छेदक प्रतीति का जनक मान लिया है । अतः यहाँ लक्षण का अभिधान व्यर्थ ही है । यदि प्रथम मानें, अर्थात् अवगत लक्षण ही व्यावृत्ति या व्यवहार का जनक है, तो वह भी विकल्पासह ही है । अर्थात् लक्षण का अवगम प्रमाणान्तर से मानेंगे या अपने लक्षण-वाक्य से ही ? यदि प्रमाणान्तर से, तो आपका यह लक्षणाभिधान-प्रयास व्यर्थ
५१२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [प्रथम तस्य चान्यत एव सिद्धेः । अन्त्ये किं त्वदभिधानमाप्तोपदेशतया साक्षात्कारित्वं बोधयति, उत लिङ्गादिभावेन ? न तावच्चरमः ; त्वद्वचनस्य साक्षात्कारित्वाविना- भावादेर्दर्शयितुमशक्यत्वात् । नापि प्रथमः ; वादिनं प्रति भवत आप्तत्वासिद्धेः । सिद्धौ हि प्रतिज्ञामात्रादेव साध्यसिद्धेर्हेत्वाद्यभिधानमनर्थकं सर्वत्र स्यात् । अथ मन्यसे यः साक्षात्कारित्वमन्यतो जानाति, प्रत्यक्षव्यवहारनिदानतया च न जानाति, तं प्रति प्रत्यक्षव्यवहारनिदानत्वमस्य ज्ञाप्यते लक्षणवादिना । तच्चानुमानभावेनैव, नाप्तोपदेशतया । अत एव च लक्षणं केवलव्यतिरेक्यनु- मानमाचक्ष्महे । तथथा—श्रावणादिप्रमितयः साक्षात्कारिप्रमितयो वा प्रत्यक्षत्वेन व्यवहर्तव्याः, साक्षात्कारिप्रमितित्वात् ; न यत्प्रत्यक्षतया व्यवह्रियते न तत्साक्षात्कारि, यथानुमितिः ; तथा चैताः ; तस्मात्तथा । एतदनुमानप्रतिपादकश्च है । कारण, अभिधान का प्रयोजन लक्षण-ज्ञान से अतिरिक्त कुछ भी नहीं है और उसे आपने साधनान्तर से मान लिया है । एवञ्च पुनरपि आपका लक्षणाभिधान व्यर्थ ही है । यदि आप अपने लक्षण-वाक्य से लक्षण का अवगम मानें, तो पूछा जा सकता है कि क्या वह लक्षण-वाक्य आप्तोपदेश के रूप में साक्षात्कारित्व-लक्षण का बोध कराता है या हेत्वादिविधया ? अन्तिम पक्ष नहीं मान सकते; आपके वचन का साक्षात्कारित्व से अविनाभाव न होने से उसे लिङ्गत्वेन बोधक नहीं कहा जा सकता । 'लिङ्गादि' यहाँ 'आदि'पद से अर्थापत्ति, उपमान आदि का भी ग्रहण है । एवञ्च कोई अनुपपत्ति या सादृश्यज्ञान न होने से आपका वचन अर्थापत्ति, उपमान आदि रूप से भी बोधक न हो सकेगा । यदि आप्तोपदेशरूप में आपका वचन लक्षण का बोध कराता है, तो वह भी ठीक नहीं । कारण, वादी आपको आप्त ही नहीं मानता । यदि वह आपको आप्त मान ले, तो प्रतिज्ञामात्र से ही साध्य-सिद्धि हो जाने से सर्वत्र हेत्वादि का अभिधान व्यर्थ ही हो जायगा । समर्थन— जो पुरुष साक्षात्कारित्व को अन्य हेतु ( प्रत्यक्ष आदि ) से जानते हैं, किन्तु उसमें प्रत्यक्षत्व-व्यवहार की कारणता नहीं जानते, उनके प्रति प्रत्यक्षत्व- व्यवहार की कारणता लक्षण से बोधित होती है । वह बोधन भी आप्तवाक्यरूप से नहीं, किन्तु परार्थ-अनुमानरूप से होता है । अतएव हम लोग लक्षण को 'व्यतिरेकी अनुमान' कहते हैं । वह अनुमान इस प्रकार है—'श्रावण आदि प्रमितियाँ या साक्षात्कारी प्रमितियाँ प्रत्यक्षत्वरूप से व्यवहर्तव्य हैं, साक्षात्कारिप्रमितित्व से युक्त होने से; जो
परिच्छेद ] द्वितीय प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन २१५ वाक्यं नाप्तवाक्यत्वेन प्रयुज्यते वादिना । किन्तु व्याप्त्यादेः प्रतिपन्नस्यैव स्मारकम्, पूर्वाप्रतिपन्नस्य वा जिज्ञासोत्पादनद्वारेणेदानीमेव वादिनि प्रमाणोत्पा- दकमित्युक्तदोषानवकाश इति । न ; 'प्रत्यक्षतया व्यवहर्त्तव्याः' इति व्यवहारस्य किं विषयभेदो विशेषः, उत शब्दभेदः ? आद्ये यद्यसौ विषयविशिष्टं व्यवहारं नाज्ञासीत् , कथं साक्षात्कारिणि तस्य स्वकर्त्तव्यतां लक्षणवाक्यादप्यवगच्छेत् । न ह्यविदिताग्नि- रनुमानादप्यग्निसम्बन्धं बोधयितुं शक्यः । अथाज्ञासीत् तदा ज्ञातज्ञापन- वैयर्थ्यालक्षणरूपमनुमानं निष्प्रयोजनम् । अथ सामान्यतो जानाति—अस्ति कश्चिद्विषयः प्रत्यक्षव्यवहारस्य । विशेषतस्तु न जानाति , तं प्रतीदमुच्यते । न; किं सामान्यतो निमित्तवत्तां व्यवहारमात्रस्य जानाति, उत व्यवहारविशेषस्य ? आद्ये प्रकृतानुपयोगः, व्यवहारविशेषस्य प्रत्यक्षत्वरूप से व्यवहर्तव्य नहीं है, वह साक्षात्कारिप्रमिति नहीं है, जैसे अनुमिति । साक्षात्कारिप्रमितिरूप पक्ष साक्षात्कारिप्रमितित्वरूप हेतु से युक्त है; तस्मात् उक्त साध्य ( प्रत्यक्षत्व से व्यवहर्तव्यता ) से युक्त है।' इस पञ्चावयव वाक्य को वादी आप्तवाक्यरूप से प्रयोग नहीं करता; किन्तु पूर्वज्ञात व्याप्ति के स्मरणार्थ या पूर्व अज्ञात व्याप्ति के ( जिज्ञासा के उत्पादन द्वारा ) उस काल में ही ज्ञान के लिए प्रयोग करता है । अतः कोई दोष नहीं है । खण्डन — 'प्रत्यक्षत्वरूप से व्यवहर्तव्य है' इस वाक्य का क्या 'प्रत्यक्षत्वप्रकारक ज्ञानविषयत्व' अर्थ है या 'प्रत्यक्ष शब्द से अभिधेय' यह अर्थ है ? प्रथम पक्ष में यदि यह पुरुष प्रत्यक्षत्वप्रकारक ज्ञानविषयत्व को प्रथम से नहीं जानता, तो लक्षण-वाक्य से साक्षात्कारिप्रमिति में उसे कैसे जानेगा ? कारण जो अग्नि को नहीं जानता, वह धूम से पर्वत में अग्नि को जान नहीं सकता । यदि वह पहले से ही प्रत्यक्षत्वप्रकारक ज्ञानविषयत्व को जानता है, तो ज्ञात का ज्ञापन होने से अनुमान व्यर्थ है । समर्थन — जो पुरुष सामान्यरूप से जानता है कि प्रत्यक्ष-व्यवहार का कुछ विषय है । किन्तु विशेष रूप से यह नहीं जानता कि प्रत्यक्ष-व्यवहार का अमुक विषय है, उसके प्रति यह अनुमान-प्रयोग है, ऐसा कहेंगे। खण्डन — क्या वह व्यवहार- मात्र के विषय को सामान्यरूप से जानता है या व्यवहार-विशेष ( प्रत्यक्षत्व-व्यवहार ) के सामान्य से निमित्तवत्ता को जानता है ? प्रथम पक्ष में व्यवहारमात्र की निमित्तवत्ता सामान्य से जानता भी हो, तो उसका प्रकृत में कोई उपयोग नहीं है। कारण इदानीं
सानुवाद खण्डनखण्डखाद्ये [ प्रथम , द्वितीये किं कृतोऽसौ व्यवहारस्य विशेष इति विकल्पित- न्तरेण न निस्तारः । एतेन सर्वस्यैव लक्ष्यस्य स्वीकारः परासनीयः । तथा हि— नाव्यापत्त्या प्रमामात्रात्ते तेऽर्थाः स्वीक्रियोचिताः । तद्वियस्तदुरीकारे स्वाश्रयं कश्चिकित्सतु ॥ ३५ ॥ अथान्यः स विशेषश्चेत् तद्धीत्वं कश्चिदिष्यते । दत्तः साकारवादाय विष्टरः स्पष्टमेव तत् ॥ ३६ ॥ व्यवहारविशेष ( प्रत्यक्षत्व-व्यवहार ) की चिन्ता है । द्वितीय पक्ष में अर्थात् यदि कहें कि प्रत्यक्ष-व्यवहार के सामान्य से निमित्तवत्ता जानता है, तो यह विकल्प होता है कि प्रत्यक्ष-व्यवहार से जो विशेष है, वह प्रत्यक्षज्ञानकृत है या प्रत्यक्षशब्दकृत ? ऐसा विकल्प होने पर दोनों पक्षों में मूलकथित दोष हो जायगा । इस अग्रिम युक्ति से भी लक्षणमात्र खण्डित हो जाता है । देखिये—'इयं पृथिवीति व्यवहर्तव्या गन्धवत्त्वात्, व्यतिरेकेण अबाविवत्' इत्यादि लक्षण से लक्ष्य का स्वीकार संभव नहीं । कारण, लक्षण से जायमान प्रमामात्र से तत्तत् लक्ष्य का स्वीकार करेंगे या पृथिव्यादि लक्ष्यविशिष्ट प्रमा से ? पहला नहीं कह सकते, अर्थात् लक्षण से जायमान अनुमितिरूप प्रमामात्र से लक्ष्य की सिद्धि नहीं हो सकती । कारण, प्रमामात्र समस्त अर्थसाधारण है; अतः एक प्रमा से सभी अर्थों की सिद्धि हो जायगी । द्वितीय पक्ष भी संभव नहीं, अर्थात् लक्ष्यविशिष्ट प्रमा से भी लक्ष्य की सिद्धि नहीं हो सकती । कारण, लक्ष्यविशिष्ट प्रमा में लक्ष्य भी विशेषण है, अतः अंशतः लक्ष्य से लक्ष्य की सिद्धि होने से आत्माश्रय हो जायगा ॥ ३५ ॥ समर्थन— लक्ष्यविशिष्टबुद्धित्व बुद्धि का ही धर्मविशेष है, लक्ष्य का वैशिष्ट्य नहीं । अतः लक्ष्यविशिष्ट प्रमा से लक्ष्य की सिद्धि में आत्माश्रय नहीं है । खण्डन— यदि तद्विषयवैशिष्ट्य को बुद्धि का धर्म मानें, तो बुद्धि साकार हो जायगी, निराकार न रहेगी । कारण जबतक साकार घटादि से बुद्धि का अभेद न मानें, तबतक घटादि- विषयवैशिष्ट्य बुद्धि का धर्म नहीं हो सकता । एवञ्च 'अर्थेनैव विशेषो हि निराकारतया धिया' इस स्वसिद्धान्त की हानि और 'सहोपलम्भनियमादभेदो नीलतद्धियोः' इस बौद्ध-सिद्धान्त का अभ्युपगम हो जायगा ॥ ३६ ॥
परिच्छेद ] द्वितीय प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन २१५ अर्थादुत्थास्तनो धर्मा नानुमात्वादयो यथा । तद्धीत्वमपि तद्वत् स्यादित्यर्थोऽनर्थमाविशेत् ॥ ३७ ॥ सोऽपि वा धीविशेषः किं स्वीकार्यस्तद्धियं विना । एवञ्च सोऽपि सोऽपीति नान्तः सोपानधावने ॥ ३८ ॥ समस्तलोकशास्त्रैकमत्यमाश्रित्य नृत्यतोः । का तदस्तु गतिस्तत्तद्वस्तुधीव्यवहारयोः ॥ ३६ ॥ उपपादयितुं तैस्तैर्मतैरशकनीययोः । अनिर्वक्तव्यतावाद-पादसेवागतिस्तयोः ॥ ४० ॥ नापि द्वितीयः । तथा हि, अयमनुमानार्थः स्यात्— 'श्रावणादिप्रतिपत्तयः प्रत्यक्षशब्दाभिधेयाः साक्षात्कारित्वादित्यादिः ।' सोऽपि न ; यद्यसाक्षात्कारिण्य- समर्थन—ज्ञान का स्वभाव केवल प्रकाशरूप है । अतः तद्धीत्व ज्ञान का स्वाभाविक धर्म नहीं है । किन्तु अर्थ के सम्बन्ध से औपाधिक है । जैसे—स्फटिक का लौहित्य । अतः ज्ञानगत विशेषधर्म के उत्पादन के लिए बाह्य अर्थ आवश्यक होने से बौद्धमत का प्रवेश न होगा । खंडन—जैसे अनुमात्व आदि धर्म अर्थजन्य नहीं, किन्तु लिङ्गपरामर्श- जन्य हैं, वैसे ही तदर्थबुद्धित्व भी अर्थजन्य नहीं, किन्तु अन्य जन्य ही है । अतः बुद्धिधर्म के आधान के लिए बाह्य अर्थ का उपयोग नहीं है ॥ ३७ ॥ किञ्च—अतिप्रसङ्ग होने से प्रमामात्र से बुद्धिगत तद्बुद्धित्वरूप धर्म की सिद्धि भी हो नहीं सकती, किन्तु तद्बुद्धित्वविशिष्ट प्रमा से ही होगी । अतः अंशतः आत्माश्रय हो जायगा । इसी तरह तद्बुद्धित्व के भी तद्बुद्धिबुद्धित्वरूप धर्म की सिद्धि तद्बुद्धि से ही होगी, अतः अनवस्था का प्रसङ्ग हो जायगा ॥ ३८ ॥ शंका—यदि बाह्य अर्थ या तद्बुद्धित्व की सिद्धि न हो, तो सम्पूर्ण लोक-शास्त्रमें वर्तमान 'अयं घटः' इस बुद्धि या 'घटेन जलमाहरेयम्' इस व्यवहार की सिद्धि कैसे होगी ? ॥ ३९ ॥ उत्तर—जब बाह्य पदार्थ के माननेवाले मतवादी बाह्य अर्थ का उपपादन नहीं कर सकते, तब बाह्य पदार्थ सत् नहीं हैं । साथ ही प्रतीत होने से वे असत् भी नहीं हैं । किन्तु सत् और असत् से विलक्षण अनिर्वचनीय हैं, इससे अन्य गति नहीं ॥ ४० ॥ द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं है । कारण, द्वितीय कल्प में अनुमान का यह स्वरूप होगा—'श्रावण आदि प्रमाएँ 'प्रत्यक्ष' शब्द से अभिधेय हैं, साक्षात्कारी होने से; जो प्रत्यक्षशब्द का अभिधेय नहीं, वह साक्षात्कारी नहीं, जैसे—अनुमिति ।' किन्तु
२१६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [प्रथम नुमानादौ तच्छब्दाप्रयोगमात्रात् साक्षात्कारिणि तच्छब्दप्रयोगः क्रियते, तर्हि शशविषाण-जबगडदशादिशब्दप्रयोगोऽपि सात्कारिणि कर्तव्य एव, अविशेषात् । अथ जबगडदशादिशब्दाः सामान्यतोऽर्थवत्तया न प्रसिद्धाः , क्वचिदप्य- प्रयोगात् । शशविषाणादिशब्दाश्च असद्विषया एवेति सिद्धाः । प्रत्यक्षादिशब्दास्तु सद्विषयवत्तया सामान्यतः सिद्धाः, 'प्रत्यक्षमस्ती'त्यादिप्रयोगदर्शनादित्यस्ति विशेष इति चेत् । मैवम् ; एतेनापि विशेषेण चाक्षुषादिशब्दानामव्यवच्छेदात् तेषामपि सात्कारिमात्रे प्रयोगप्रसङ्गः । सात्कारित्वे सत्यपि श्रावणादौ चाक्षुषादिशब्दानामप्रयोगः , न त्वेवं प्रत्यक्षादिशब्दानामिति विशेष इति चेत् । एवं तर्हि यत्र सात्कारित्वं नास्ति, यह युक्त नहीं है, क्योंकि असाक्षात्कारी अनुमिति में 'प्रत्यक्ष' शब्द का प्रयोग न होने से ही साक्षात्कारी में 'प्रत्यक्ष' शब्द का प्रयोग हो, तो शशविषाण, 'जबगडदश' आदि शब्दों का भी साक्षात्कारी में प्रयोग करना चाहिए । कारण दोनों में कोई विशेष नहीं है । समर्थन—जबगडदश आदि शब्द सामान्यतः अर्थवत्रूप से प्रसिद्ध नहीं हैं; क्योंकि किसी अर्थ में इनका प्रयोग नहीं होता । शशविषाण शब्द आदि तो असत्- विषय है । किन्तु 'प्रत्यक्ष' आदि शब्द सद्विषयत्वरूप से सामान्यतः सिद्ध हैं, कारण 'प्रत्यक्षमस्ति' यह प्रयोग देखने में आता है । यही दोनों में विशेष है । अर्थात् सद्वविषय और अर्थवत् होकर अनुमिति आदि में अप्रयुक्त होने से ही प्रत्यक्षशब्द का साक्षात्कारी में प्रयोग होना सिद्ध करेंगे । जबगडदश आदि शब्द ऐसे नहीं हैं, अतः उनका साक्षात्कारी में प्रयोग नहीं होता । खण्डन—ऐसा विशेष होने पर भी चाक्षुषादि शब्दों का व्यवच्छेद न हो सकेगा, अर्थात् उनका साक्षात्कारीमात्र में प्रयोग होने लगेगा । कारण, चाक्षुषादि शब्द अर्थवत् और सद्विषय होकर अनुमिति आदि में अप्रयुक्त ही हैं । यदि कहें कि साक्षात्कारी होने पर भी 'श्रावण' आदि में 'चाक्षुष' शब्द का प्रयोग नहीं होता, पर 'प्रत्यक्ष'शब्द का प्रयोग होता ही है । यही प्रत्यक्ष और चाक्षुष शब्द में भेद है । अर्थात् प्रत्यक्ष शब्द अर्थवत, सद्विषय तथा साक्षात्कारीमात्र में प्रयुक्त होकर अनुमिति आदि में प्रयुक्त नहीं होता, अतः वह साक्षात्कारीमात्र का वाचक है । तब
परिच्छेद ] द्वितीय प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन २१७ तत्र प्रत्यक्षशब्दप्रयोगो नास्ति यत्र साक्षात्कारित्वमस्ति तत्र सर्वत्रास्तीति यो जानीते, तं प्रति लक्षणाभिधानमिति स्यात् । स च व्यवहारान्तरवदन्वय- व्यतिरेकाभ्यामेव वाच्यवाचकभावमवधारितवानिति व्यर्थं लक्षणम् । एतेन—अनुमित्यादिव्यवच्छिन्नतया व्यवहर्त्तव्यमित्यप्युक्तानुमानसाध्यतया अभिधीयमानमपास्तं वेदितव्यम् । पूर्वप्रतिपन्नमेव वाच्यवाचकभावं लक्षणाभिधानेन स्मार्यत इति चेन्न । अवगत- समयस्य प्रत्यक्षशब्दादेव तत्स्मरणसम्भवात् व्यर्थता लक्षणाभिधानस्य स्यात् । अवगतशब्दार्थसम्बन्धः शब्दादेव स्मरन् यदि लक्षणेन स्मार्यते, तदा लक्षणा- वाक्यगत-पदकदम्बार्थस्मरणार्थमपि तल्लक्षणमभिधानीयमविशेषात् । एवं तल्लक्षणवाक्येऽपीत्यपर्यवसानं स्यात् । तो यही अर्थ हुआ कि 'जिस अर्थ में साक्षात्कारित्व नहीं, वहां प्रत्यक्ष शब्द का प्रयोग नहीं होता और जहां साक्षात्कारित्व है, वहाँ सर्वत्र प्रत्यक्ष शब्द का प्रयोग होता है' यह जो जानता है, उसीके लिए लक्षण का अभिधान है। एवञ्च वह पुरुष घट-पट आदि शब्दों के तुल्य अन्वय-व्यतिरेक से ही प्रत्यक्ष शब्द के भी वाच्यवाचकभाव का ज्ञान कर सकता है । फिर लक्षण का अभिधान व्यर्थ है । इसी प्रकार 'साक्षात्कारी प्रमितियाँ अनुमित्यादि-व्यवच्छिन्नत्वरूप से व्यवहर्तव्य हैं, साक्षात्कारित्वयुक्त होने से' इत्यादि निषेध्यव्यवहारसाधक अनुमान का भी खण्डन जानना चाहिए । कारण, अन्वय-व्यतिरेक से ही उक्त अर्थ सिद्ध हो जाने से लक्षण-कथन व्यर्थ हो जायगा । समर्थन—लक्षण के अभिधान से पुरुष को पूर्वज्ञात वाच्यवाचकभाव का स्मरण कराया जाता है । एवञ्च लक्षणाभिधान व्यर्थ नहीं है । खंडन—जिस पुरुष को समय ( संकेत ) का ज्ञान हो चुका है, वह तो 'प्रत्यक्ष' शब्द के श्रवण से ही संकेत का स्मरण कर सकता है । अतः उसके संकेतस्मरणार्थ लक्षण का अभिधान व्यर्थ ही है । यदि शब्द के श्रवण से ही संकेत का स्मर्ता पुनः लक्षणवाक्य से भी संकेत का स्मरण करता है—ऐसा मानें, तो अविशेषात् लक्षणवाक्यगत पदसमुदाय के अर्थ का स्मरण कराने के लिए भी उन-उनके लक्षणों का अभिधान करना होगा । इसी प्रकार उक्त पदार्थों के लक्षणवाक्यगत अनेक पदार्थों के भी लक्षण करने होंगे । अतः कहीं भी लक्षण के निर्माण की समाप्ति ही न होगी ।
२१८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम ननु प्रतिवादिनं प्रति लक्षणाभिधानं नार्थवत्, तेन वाद्याप्तभावानङ्गीकारात् । किन्तु शिष्यार्थं लक्षणमुच्यते शास्त्रे । स हि शास्त्रस्य कर्तारमाप्तमेव मन्यते । तस्मात् शिष्यं प्रत्याप्तवचनतयैव लक्षणवाक्यमर्थं प्रतिपादयिष्यति गुरुणा गीयमानम्—'यस्त्वया साक्षात्कारीशब्दार्थः प्रतीतः, स एव प्रत्यक्षशब्दार्थः' इति । मैवम्; यदि वादिनं प्रति न शास्त्रं किन्तु शिष्यं प्रति, तदा प्रतिज्ञामात्रा- देवाऽऽप्तवचनात् शिष्यस्यार्थनिश्चयोत्पत्तेः हेत्वाद्यभिधानमनर्थकमापन्नं शास्त्रे । अथ भवतु तत्प्रतिवादिनमपि प्रति शास्त्रे वाक्यं यत्र हेत्वादुपात्तम् । लक्षणवाक्यन्तु शिष्यमेव प्रति प्रयोजकं प्रतिपन्नशास्त्रकाराप्तभावमिति मन्यसे । तदप्यनुपपन्नम्; शास्त्रान्तरसाध्यत्वादस्यार्थस्य । अस्ति समयग्राहकं शास्त्रं मुनिभिः प्रणीतं नामलिङ्गानुशासन-व्याकरणादि । यदि च शास्त्रान्तरसाध्योऽप्यर्थो भवदीयशास्त्रस्य विषयः, तर्हि प्रकृतिप्रत्ययविभागेन साधनमपि शब्दानां कुतो न व्युत्पाद्यते, लिङ्गं वा शब्दानां कुतो नाभिधीयते ? तदज्ञानेऽपि पराजयो जायत एव । समर्थन—प्रतिवादी के लिए लक्षण का अभिधान नहीं है, क्योंकि वह वादी को आप्त ही नहीं मानता । किन्तु शिष्य के लिए ही शास्त्र में लक्षण कहा जाता है । वही शास्त्रकर्ता को आप्त मानता है । अतः गुरु के द्वारा कहा गया लक्षणवाक्य आप्तवचन रूप से ही इस प्रकार अर्थ-प्रतिपादन करता है कि 'तुम साक्षात्कारी शब्द का जो अर्थ जानते हो, वही प्रत्यक्ष शब्द का अर्थ है ।' खण्डन—यदि शास्त्र वादी के लिए नहीं, अपितु शिष्य के लिए है, तो प्रतिज्ञामात्र से ही आप्तवचनत्वेन शिष्य अर्थ का निश्चय कर लेगा । एवञ्च शास्त्र में हेतु आदि का अभिधान अनर्थक हो जायगा । समर्थन—जिस शास्त्रीय वाक्य में हेतु आदि का अभिधान हो, वह भले ही प्रतिवादी के लिए रहे । किन्तु लक्षणवाक्य तो उसी शिष्य के लिए है, जो शास्त्रकर्ता को आप्त जानता है । खंडन—आपके इस कथन के अनुसार तो लक्षणनिर्माण का प्रयोजन संकेतग्रह ही हुआ । वह युक्त नहीं, क्योंकि यह प्रयोजन शास्त्रान्तरसाध्य है । मुनियों द्वारा प्रणीत नामलिङ्गानुशासन (कोश), व्याकरण आदि बहुत से शास्त्र शक्तिग्राहक हैं ही । यदि अन्य शास्त्र से बोध्य अर्थ भी आपके शास्त्र के विषय हों, तो आप प्रकृति-प्रत्यय के विभाग द्वारा शब्दों का साधन क्यों नहीं करते और शब्दों के लिङ्ग भी क्यों नहीं बताते ? कारण, उनके अज्ञान से भी तो पराजय होती ही है ।
परिच्छेद ] द्वितीय प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन २१६ अथ वाऽस्तु व्याकरणादिविषयं विहाय नामव्युत्पादनं कथमपि भवच्छास्त्रस्य विषयः ; तथापि न्यूनतरत्वमस्मिन् विषये भवदीयशास्त्रस्य — बहूनि नामानि विद्यन्ते कोषान्तरवर्तीनि, कुतो न व्युत्पादितानि तानीति । प्रथास्मिन् शास्त्रे येषां शब्दानामुपयोगस्तेषामनेन व्युत्पादनम् , न सर्वेषामित्युच्यते; तथापि यथैक- वाक्यगतस्य पदस्य लक्षणव्युत्पादनमेवं तल्लक्षणवाक्यगतपदस्यापीति अप्रर्य- वसानमापतितं शास्त्रस्य, तत्तल्लक्षणवाक्यप्रयोग एव तेषां तेषां पदानां शास्त्रे जातोपयोगत्वात् । अथ नानालक्षणप्रणेतॄणां वादिनां विप्रतिपत्तेः प्रत्यक्षादिशब्दार्थ एव व्युत्पाद्यते संशयनिरासाय, नान्येोऽसंशयत्वादिति मन्यसे; तथाप्यनुपपत्तिः । अस्ति हि वाऽऽदीनामर्थे वाच्यता-द्योत्यताविवादः । अस्ति च छिदुरादिपदाना मर्थे कर्मकर्तृत्वाकर्मकर्तृत्वे विवादः । अस्ति च भावशब्दस्य स्वरूपसत्त्वसत्तासामान्या- द्यर्थत्वे । अस्ति चाधिकरणशब्दार्थस्य पतनप्रतिबन्धकत्वसमवायित्वादौ । अथवा शब्द-साधुत्वादि व्याकरण शास्त्र के विषयों को छोड़ दें और केवल नामव्युत्पादन ही कथञ्चित् आपके शास्त्र का विषय मान लें, तो भी इस विषय में आपके शास्त्र की न्यूनता ही रही कि अन्य भी बहुत से नाम कोशों में हैं, उनका व्युत्पादन आपने क्यों नहीं किया ? यदि कहें कि 'जिन शब्दों का प्रकृत शास्त्र में उपयोग है, उन्हींका निरूपण यहाँ किया गया है, अन्य का नहीं', तो जैसे 'अव्यभिचारि- साक्षात्कारिज्ञानं प्रत्यक्षम्' इस वाक्यगत 'प्रत्यक्ष' पद का लक्षण (अर्थ-व्युत्पादन) किया जाता है, वैसे ही उस लक्षणवाक्यगत पदों के भी लक्षणान्तर करने होंगे । इस रीति से शास्त्र का कहीं पर्यवसान ही न होगा । पदान्तर-व्युत्पादन का कोई उपयोग नहीं, ऐसी भी बात नहीं; उन-उन लक्षणवाक्यों के प्रयोग में ही उन-उन पदों का उपयोग है ही । समर्थन—नाना प्रकार के लक्षण-प्रणेता वादियों की प्रत्यक्षादि-लक्षणों में विप्रतिपत्तियाँ होने से सन्देह के निराशार्थ ही प्रत्यक्षादि शब्दों के अर्थों का निरूपण करते हैं, अन्य का नहीं । कारण, अन्यत्र सन्देह ही नहीं है । खंडन—यदि सन्दिग्ध का ही निरूपण करना है, तो 'च, वा' आदि निपातों के अर्थों में भी वाच्यत्व-द्योत्यत्व का विवाद है । 'छिदुर' आदि शब्दों में कर्तृप्रत्यय है या कर्मकर्तृ-प्रत्यय यह विवाद है । इसी तरह 'भाव' शब्द स्वरूपसत् का या सत्तासामान्यविशिष्ट का वाचक है, यह विप्रतिपत्ति है तथा 'अधिकरण' शब्द द्रव्यसमवायी का वाचक है या पतनप्रतिबन्धक
२२० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम एवमन्यस्मिन्नपि बहौ पदार्थे जाग्रति विप्रतिपत्तयः, तल्लक्षणानि कस्मान्नोक्तानि ? तदास्तामेकत्र विस्तराभिनिवेशः । तृतीय प्रत्यक्षलक्षण-खण्डनम् किञ्च तत्साक्षात्कारित्वम् ? सविशेषार्थप्रकाशत्वमिति चेन्न । सविशेषत्वस्योपलक्षणत्वेऽनुमानादिव्याप्तिः। विशेषणत्वे च यदि विशेषशृङ्खलाया विश्रान्तिस्तदा शेषविशेषस्य बोधे प्रत्यक्षलक्षणहीनत्वेन आमूलमप्रत्यक्षतापातः। यद्यविश्रान्तिस्तदा तादृशस्यैव व्याप्तिग्रहादनुमायामपि तादृशीसिद्धिरिति साक्षात्कारित्वापत्तिः । वस्तु का वाचक, यह विवाद है। ऐसे ही अन्य बहुत-से पदार्थों में विप्रतिपत्तियाँ हैं। फिर उन सबका निरूपण आप क्यों नहीं करते ? तस्मात् एकत्र ( प्रत्यक्ष- लक्षणमात्र में ) विस्तार का अभिनिवेश व्यर्थ ही है। तृतीय प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन किञ्च—जिस ‘साक्षात्कारित्व’ को आप प्रत्यक्ष का लक्षण कहते हैं, वह साक्षात्कारित्व ही क्या है ? अर्थात् विकल्पसह होने से उसका निर्वचन ही नहीं किया जा सकता। समर्थन—वर्तुलत्व, पृथुबुध्नोदरत्व आदि विशेषों से सहित जो घटादि विषय हैं, उनका ज्ञान ही साक्षात्कारी पदार्थ है। खंडन—विशेष के साहित्य को यदि उपलक्षण मानें, अर्थात् विशेष जिसमें स्वरूप से रहता हो—विशेष भी ज्ञान में भासता हो, यह नियम नहीं है—यदि ऐसा मानें, तो अनुमिति आदि में लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी। कारण अनुमिति के विषय वह्नि आदि में भी वस्तुरूप से विशेष विद्यमान ही है। यदि विशेष के साहित्य को विशेषण मानें, तो विशेषशृङ्खला (परम्परा) का कहीं विश्राम मानते हैं या नहीं ? कहीं विश्राम मानें, तो जिस विशेष में अन्य विशेष नहीं है, उस विशेष का ज्ञान प्रत्यक्ष न होगा। अतः उस विशेष अंश में उस विशेष से विशिष्ट का ज्ञान भी प्रत्यक्ष न कहलायेगा। इसी तरह मूलप्रत्यक्ष- पर्यन्त उस विशेष अंश में प्रत्यक्षता नहीं होगी। यदि विशेषशृङ्खला का विश्राम न मानें, तो अनवस्था दोष का प्रसङ्ग होगा। किञ्च—सभी विशेष स्वविशेष के साथ ही प्रत्यक्ष में भासेंगे। एवञ्च यावत् विशेषविशिष्ट साध्य-साधन में ही व्याप्तिग्रह होने से अनुमिति में भी यावत् विशेषों का भान हो जायगा। अतः अनुमिति में भी साक्षात्कारित्व ( प्रत्यक्षत्व ) हो जायगा।
परिच्छेद ] तृतीय प्रत्यक्ष-लक्षण का खंडन २२१ अथाननुगमान्न तदनुमा; तर्हि तदनुगतप्रतीत्याद्यनुपपत्तिः, व्यक्तेरनु- मानादसिद्ध्यापत्तिश्च । यथा हि व्यक्तिं विना सामान्यस्य, तथा तावत् तं विशेषं विना व्यक्तेरप्यनुपपत्यविशेषात् । यदि च प्रतीत्यपर्यवसानाभावात् पक्षधर्मतया नानन्तविशेषसिद्धिरिति मन्यसे; तदा प्रतीतापर्यवसानात् तद्बुद्धिः साक्षात्प्रकाशः स्यात् । अप्रतिपद्यमानानन्तविशेषप्रकाशकल्पनाच्च एकाकिसाक्षात्त्वनामकविशेष- कल्पनैवाल्पत्वात् श्रेयसितरा । साक्षात्त्वव्यवहारान्यथानुपपत्तेः कल्पनाबीजस्य तावताऽपि चरितार्थत्वादिति कृत्वा तत्कल्पनाऽपि नात एव । विस्तरश्चात्र वक्ष्यते । समर्थन—विशेष अनन्त हैं, उनमें एक अनुगत रूप नहीं है । अतः अनुमिति में उनका भान नहीं होगा । खण्डन—यदि विशेष का अनुमिति में भान नहीं होता, तो व्यापक विशेषविषयक 'अग्निमान् अयम्' इत्याकारक प्रतीति या व्यवहार भी अनुपपन्न हो जायगा । किञ्च—अनुमान से व्यक्ति की सिद्धि भी नहीं होगी । यदि कहें कि व्यक्ति का भान सामान्य के भान के बिना अनुपपन्न है, अतः सामान्यविषयक अनुमिति में व्यक्ति भी भासती है, तो अविशेषात् तावद्-विशेष के बिना व्यक्ति भी अनुपपन्न ही है । इसलिए व्यक्तिविषयक अनुमिति में तावद्-विशेष के भान का प्रसङ्ग हो जायगा । यदि कहें कि विशेष के भान के बिना भी व्यक्ति का भान हो सकता है, अतः अनुपपत्ति के न होने से अनुमिति में विशेष का भान नहीं होता, तब व्यक्ति भी विशेष के बिना अनुपपन्न है; अतः व्यक्ति की अनुपपत्ति से विशेष की जो कल्पना है, वह विशेषविषयक होने से प्रत्यक्ष हो जायगी । किञ्च—साक्षात्त्व-व्यवहार की उपपत्ति लाघवात् विषयनिष्ठ एक साक्षात्त्वधर्म की कल्पना से ही सिद्ध है । फिर अनन्त विशेषों की कल्पना में कुछ भी प्रमाण नहीं है । समर्थन—विशेष की सिद्धि अप्रस्तुत है, अतः उसकी असिद्धि से कोई हानि नहीं है । प्रस्तुत प्रत्यक्ष का लक्षण है, उसकी उपपत्ति साक्षात्त्व की कल्पना से हो सकती है । खंडन—यदि आप प्रत्यक्षत्व-व्यवहार की अन्यथानुपपत्ति से अर्थगत साक्षात्त्व की कल्पना या अनुमिति करें, तो वह कल्पना या अनुमिति साक्षात्त्वविषयक होने से प्रत्यक्ष हो जायगी । किञ्च—अनिर्वचनीय साक्षात्त्व से ही साक्षात्-व्यवहार की उपपत्ति हो जाती है, अतः अर्थगत वस्तुभूत साक्षात्त्व में कुछ प्रमाण भी नहीं है । इस विषय को विस्तार से आगे कहेंगे ।
विशेषश्च यदि व्यवच्छेदस्तदा निर्विकल्पकाव्याप्तिः । यदि च विश्वव्यावृत्त- स्वरूपप्रकाशात् सोऽपि तथा, तदा दूरे सामान्यप्रत्यक्षस्याप्रत्यक्षत्वापातः, तत्र जगद्वैलक्षण्यप्रकाशे संशयाद्यनुपपत्तेः । यदि तत्रापि प्रतिपत्त्रादिव्यवच्छेदमात्र- प्रकाशाद् विशेषप्रकाशत्वमेव, तदाऽनुमित्यादिव्याप्तिः । चतुर्थ-प्रत्यक्षलक्षण-खण्डनम् अथ इन्द्रियकरणकानुभूतित्वम् । तत्र साक्षात्कारीधीकरणस्यैवेन्द्रियत्वेन अन्योन्याश्रयत्वापत्तिरिति केचित् । तन्न; अज्ञातप्रमाकरणत्वस्य भावत्वविशेषितस्ये- न्द्रियत्वनिरुक्तेः सम्भवात् । विना कार्यगतविशेषसिद्धिं किं प्रति करणत्वमेव ज्ञेयमिति तु बाधः साधीयान् । किञ्च—यदि ‘स्व से जो इतर, उससे व्यवच्छेद’ (भेद) को विशेष कहें, तो निर्विक- ल्पक ज्ञान में अव्याप्ति हो जायगी; क्योंकि उसमें इतर-व्यवच्छेद का भान नहीं होता। यदि इतरव्यावृत्तस्वरूप को विशेष कहें और निर्विकल्पक में इतरव्यावृत्तस्वरूप का भान होने से अव्याप्ति नहीं है—ऐसा मानें, तो भी दूरतः सामान्यरूप से प्रतीत होनेवाले प्रत्यक्ष में अर्थात् ‘चयस्त्विषामित्यवधारितं पुरा’ इत्यादि स्थलों में अव्याप्ति हो जायगी। कारण, वहाँ (सामान्य प्रत्यक्ष में) स्व से इतर यावत् पदार्थ से व्यावृत्तत्व रूप से स्वरूप नहीं भासता । अन्यथा सामान्य प्रत्यक्ष के उत्तर कहीं भी संशय या विपर्यय नहीं होगा । यदि कहें कि किञ्चित् प्रतिपत्ता (ज्ञाता) आदि से व्यावृत्तत्व रूप से स्वरूप की प्रतीति होती है, अतः सामान्यज्ञान प्रत्यक्ष ही है, तो अनुमिति में भी प्रतिपत्त्रादि से व्यावृत्तत्व रूप से ही वह्न्यादि स्वरूप का भान होने के कारण अनुमिति भी प्रत्यक्ष हो जायगी । चतुर्थ प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन समर्थन—कुछ लोग ‘जिस ज्ञान की करण इन्द्रिय हो, वह प्रत्यक्ष है’ इस लक्षण में ‘प्रत्यक्ष ज्ञान का जो करण वह इन्द्रिय है’ ऐसा इन्द्रिय का लक्षण होने से अन्योन्याश्रय दोष देते हैं । किन्तु वह युक्त नहीं, कारण ‘अज्ञात रूप से जो प्रमा की करण हो, वह इन्द्रिय है’ या ‘अज्ञात रूप से भावरूप प्रमा की जो करण हो, वह इन्द्रिय है’ ऐसा इन्द्रिय का लक्षण हो ही सकता है। एवञ्च इस लक्षण में कोई बाधा नहीं। खंडन—यहाँ कार्यभूत प्रमा का भी निवेश है, अतः जबतक प्रमा का ज्ञान न हो, तबतक उक्त लक्षण का ज्ञान नहीं हो सकता। यदि प्रमा का ज्ञान अन्य किसी चिह्न से मानें, तो उसी चिह्न को लक्षण मान लें, यह लक्षण व्यर्थ है । यदि अन्यतः उसका ज्ञान न मानें, तो विशेषण असिद्ध होने से विशिष्ट लक्षण भी असिद्ध ही रह जायगा ।
परिच्छेद ] चतुर्थ प्रत्यक्ष-लक्षण का खंडन २२३ एतेन ज्ञातता काचिद्विलक्षणा, तज्जनकत्वं ज्ञानस्य साक्षात्त्वमिति निरस्तम् । ऐकरूप्याव्यवस्थितौ कारणत्वानवधारणात् । न च ज्ञाततावैलक्षण्यान्यथानुपपत्तेरेव तत्सिद्धिः; कारणान्तरवैलक्षण्यादेव तदुपपत्तेः । नापि मेयजनितत्वम्; अतिप्रसङ्गात् । स्वमेयजत्वे च स्वार्थव्यावृत्त्याऽननु- गमात्, पूर्वदोषानिवृत्तेश्च । अथ येन प्रमिते सति न प्रमित्सा पुनर्भवति, तज्ज्ञानं साक्षात्कारीति । तन्न; प्रत्यक्षावगतेऽपीष्टे तनयादौ प्रमित्सादर्शनात् । अथ यदनन्तरं न विजातीयप्रमित्सा, तद्भावस्तथात्वम् । तन्न; तत्साजात्या- समर्थन—'अपरोक्ष-व्यवहार की जनक अर्थनिष्ठ जो विलक्षण ज्ञातता है, उसका जनक ज्ञान प्रत्यक्ष है।' खंडन—जबतक जनक प्रमा में ऐकरूप्य (अवच्छेदक धर्म) का ज्ञान न हो, तबतक जनकत्व का ज्ञान न होगा। एवञ्च जनकत्वघटित उक्त लक्षण का ज्ञान भी नहीं होगा। यदि कहें कि अनुमिति के विषय में स्थित ज्ञातता से विलक्षण ज्ञातता की अन्यथानुपपत्ति से प्रमागत विलक्षण ऐक्य का आक्षेप होगा, तो वह भी ठीक नहीं। क्योंकि इन्द्रिय, परामर्श आदि कारणों के वैलक्षण्य से ही ज्ञातता के वैलक्षण्य की उपपत्ति हो जाने से वैलक्षण्य की अन्यथानुपपत्ति ही नहीं है। समर्थन—'मेय (अर्थ) से जन्य ज्ञान प्रत्यक्ष है।' खण्डन—आत्मरूप मेय से सभी ज्ञान जन्य हैं, अतः सभी ज्ञान प्रत्यक्ष हो जायेंगे। समर्थन—स्वमेय से जन्य ज्ञान को प्रत्यक्ष कहेंगे। आत्मा स्वमेय नहीं है, अतः अन्य ज्ञानों में अतिव्याप्ति नहीं। खंडन—यदि स्वशब्द को तत्तद् ज्ञानव्यक्तिपरक मानें, तो जिस ज्ञानव्यक्ति का स्वशब्द से उपादान करेंगे, उससे अन्यत्र अव्याप्ति हो जायगी। यदि स्वशब्द से ज्ञानमात्र का उपादान करें, तो यत्किञ्चित् ज्ञान का विषय आत्मा भी है, अतः ज्ञानमात्र प्रत्यक्ष हो जायेंगे। समर्थन—'जिस ज्ञान से प्रमित अर्थ की पुनः प्रमित्सा (यथार्थज्ञान की इच्छा) न हो, वह ज्ञान प्रत्यक्ष है।' खंडन—पुत्र आदि अतिप्रिय वस्तुओं का एकबार अवलोकन होने पर भी पुनः अवलोकन की इच्छा होती है। अतः पुत्र आदि के प्रत्यक्ष में अव्याप्ति हो जायगी। समर्थन—'जिस ज्ञान से प्रमित वस्तु में विजातीय प्रमिति की इच्छा न हो, वह प्रत्यक्ष है। पुत्रदर्शन के बाद पुनः उसके दर्शन की इच्छा होने पर भी विजातीय अनुमिति आदि की इच्छा नहीं होती। अतः पुत्रावलोकन में अव्याप्ति नहीं है। खण्डन—जबतक
२२४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम नवगतौ तद्विजातीयानवगतेः, अरिसम्पद्यनुमादिविषयायां प्रत्यक्षयितुमनिष्टेश्च। प्रत्यक्षावगतेऽपि दहने रक्ताशोकस्तबकसन्देहे धूमदर्शनेन वह्नेरनुमीयमानत्वा- दित्यप्येके। अज्ञायमानासाधारणकारणकानुभवत्वं कारणविशेषणीकृतभावत्वं वा साक्षा- त्कारित्वमिति चेन्न। दीर्घादिप्रत्यक्षाव्यापनात्, तत्रावधिप्रभृतेः प्रतीयमानस्या- पेक्षणात्। नावधिस्तत्र ज्ञायमानस्तथा, अवधिज्ञानं तु स्यात्। अतीतादावप्यवधौ तथा- प्रत्यक्षनिष्ठ समान जाति का ज्ञान न हो, तबतक प्रत्यक्ष के विजातीयत्व से घटित उक्त लक्षण का ज्ञान नहीं हो सकता । यदि उक्त लक्षण से साजात्य का ज्ञान मानें, तो उक्त लक्षण से साजात्यज्ञान तथा साजात्य के ज्ञान से उक्त लक्षण का ज्ञान इस रीति से अन्योन्याश्रय हो जायगा । यदि अन्य से साजात्य का अवगम हो, तो प्रथम उपस्थित ( ज्ञात ) होने से वही लक्षण रहे, यह लक्षण व्यर्थ है। किञ्च—शत्रुधन की अनुमिति होने पर भी विजातीय प्रत्यक्ष ज्ञान की इच्छा नहीं होती, अतः उसकी अनुमिति में अतिव्याप्ति हो जायगी। किंच--जहाँ प्रत्यक्ष से वह्नि का सामान्यतः अवगम हो गया हो, वहाँ भी वह्नि में रक्ताशोक के स्तबक ( गुच्छ ) का सन्देह होने पर धूम से अनुमिति होती है । अतः उस प्रत्यक्ष में अव्याप्ति हो जायगी ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं। समर्थन—'जिस अनुभव का असाधारण कारण अज्ञात हो, वह प्रत्यक्ष है' अथवा 'जिस अनुभव का भावरूप असाधारण कारण अज्ञात हो, वह प्रत्यक्ष है।' [जो अनुपलब्धि को पृथक् प्रमाण मानते हैं, उनके मत में अभाव-प्रमा में प्रत्यक्ष-लक्षण की अव्याप्ति के वारण के लिए असाधारण कारण में भावत्व विशेषण देकर इस द्वितीय लक्षण का प्रणयन है। ] खण्डन—-'अयं दण्डो ह्रस्वः', 'अयं दीर्घः' इस प्रत्यक्ष में अव्याप्ति हो जायगी, क्योंकि इस प्रत्यक्ष में अवधिज्ञान की अपेक्षा है। समर्थन—इस प्रत्यक्ष में ज्ञात अवधि कारण नहीं, किन्तु अवधि का ज्ञान कारण है; क्योंकि अतीत, अनागत अवधि से भी ह्रस्वादि का ज्ञान होता है। खंडन—अतीत, अनागत धूमस्थल में वह्नि की अनुमिति होने से ज्ञात धूम भी अनुमिति का करण नहीं; किन्तु धूम का ज्ञान ही अनुमिति का कारण है। अतः अनुमिति अज्ञातकरणक होने से उसमें प्रत्यक्ष-लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी।
परिच्छेद ] चतुर्थ प्रत्यक्ष-लक्षण का खंडन २२५ प्रत्ययादिति चेत् ; तुल्यं लिङ्गे धूमादावपि, धूमदर्शनात् ‘तत्राग्निर्रासीदि’ति पश्चादप्यनुमानात् । ज्ञानविशेषणतया तु ज्ञेयहेतुता तुल्यैवेति । असाधारणकारणगिरा करणमभिमतमिति चेन्न । अनुमितभाविलिङ्गकभावि- लिङ्गचानुमितौ असतो लिङ्गस्य करणत्वासम्भवेन ज्ञायमानकरणकत्वाभावात् । लिङ्गज्ञानं तावत्करणम्, तच्च स्वप्रकाशवादिनो मम ज्ञायमानमेव तत्रेति चेन्न । तस्यापि ज्ञायमानतया करणकोटिप्रवेशे प्रमाणाभावात् उक्तप्रत्ययानां तथात्वाभावात् । अन्यथासिद्धस्यापि ज्ञायमानत्वस्यावर्जने चक्षुराद्यनुमित्यनन्तरं दैवोपजात- घटादिप्रत्यक्षाव्यापनात् । समर्थन—धूमज्ञान का विशेषण धूम ज्ञात ही अनुमिति का कारण होता है । अतः ज्ञातकरणक होने से अनुमिति में अतिव्याप्ति नहीं होगी । खंडन—अवधिज्ञान का विशेषण अवधि भी ज्ञात ही करण होती है । अतः तुल्ययुक्ति से ह्रस्वादि प्रत्यक्ष में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—‘असाधारण कारण' शब्द ही ‘करण'परक है। ह्रस्वादि-प्रत्यक्ष में अवधि- ज्ञान करण नहीं, किन्तु इन्द्रिय करण हैं और वे अज्ञात ही हैं। अतः ह्रस्वादि-प्रत्यक्ष में अव्याप्ति नहीं होगी। खण्डन—जिस यज्ञशाला में होमसामग्री से भावी धूम की अनुमिति- कर पश्चात् वह्नि की अनुमिति होती है, वहाँ उस काल में असत् धूम करण हो ही नहीं सकता । किन्तु धूमज्ञान ही करण है और वह अज्ञात ही करण होता है । अतः उस अनुमिति में अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—लिङ्गज्ञान ही करण है और ज्ञान को स्वप्रकाश माननेवाले हमारे मत में वह ज्ञात ही करण होता है। अतः अनुमिति के ज्ञातकरणक हो जाने से उसमें अतिव्याप्ति नहीं है। खंडन—लिङ्गज्ञान अनुमिति में ज्ञातरूप से करण है, इसमें कोई प्रमाण नहीं है। यदि कहें कि स्वप्रकाश होने से लिङ्गज्ञान ही . ज्ञातरूप से स्व के करण होने में प्रमाण है, तो वह युक्त नहीं। कारण, स्वप्रकाश होने से इतना ही सिद्ध होगा कि अनुमिति के जननकाल में लिङ्गज्ञान ज्ञात रहता है । ज्ञातरूप से करण है, यह बात सिद्ध नहीं हो सकती । समर्थन—लिङ्गज्ञान ज्ञातरूप से करण न हो, अनुमिति के जननकाल में ज्ञात तो होता ही है । अतएव ज्ञातकरणक हो जाने से अनुमिति में प्रत्यक्षलक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन—जिस स्थल में 'रूप का प्रत्यक्ष करणजन्य है, कार्य होने से, घटादि के तुल्य' इस प्रकार चक्षुरादि की अनुमिति होती है, वहाँ दैववश या रूप- प्रत्यक्षरूप प्रमाण के बल से कदाचित् घटादि प्रत्यक्ष भी हो जाता है । फलतः उस प्रत्यक्ष में अव्याप्ति हो जायगी । अतः आप को कहना होगा कि जिस ज्ञान का करण २६