खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम करणत्वप्रसङ्गात् । आप्तोक्तौ तु कर्तुरपि शाब्दप्रमाजातिविशेषकत्वेन आप्तेप्रसङ्गात्, ओमित्युत्तरे च पूर्वमेवोक्तमिति । विवक्षितजातिभेदौपयिकत्वेन प्रमित्यसमवायिकारणविशेषकं प्रमाणमित्यपि अत एव प्रयुक्तम् । प्रथम-प्रत्यक्षलक्षण-खण्डनम् एवं विशेषतोऽपि प्रमाणलक्षणानि प्रतिवक्तव्यानि । तथा हि—प्रत्यक्षमिन्द्रि- यार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यभिचारीत्याहुः । किमर्थमिदमुच्यते, किं सजातीय- विजातीयव्यवच्छिन्नतत्प्रतीत्यर्थम्, उत साक्षात्कारित्वप्रतीतये तच्चिह्नोपदर्शन- मिदम्, उत व्यवहारार्थम्, उत प्रत्यक्षादिशब्दप्रवृत्तिनिमित्तावधारणार्थम्, उत अन्यत्किञ्चिदर्थमेव ? अर्थरूप कर्म तथा आप्तरूप कर्ता भी प्रमाण होने लगेंगे । किन्तु कहीं भी कर्म और कर्ता में करणत्व-व्यवहार कभी नहीं होता । अतः आप यह स्वीकार नहीं कर सकते । समर्थन—विवक्षित प्रत्यक्षत्वादि जातिभेदों के उपायभूत होने से प्रमिति के असमवायी कारण आत्ममनःसंयोग के विशेषक ( अप्रमास्थल से व्यावर्तक ) इन्द्रिय, परामर्शादि प्रमाण हैं । खण्डन—'विवक्षित' पद से घटित होने से यह लक्षण भी भण्डालेख्य के तुल्य ही है । किञ्च—प्रत्यक्षस्थल में अर्थ तथा शाब्दस्थल में आप्त भी असमवायी कारण के विशेषक प्रमाण हो जायँगे । प्रथम प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन इस रीति से प्रमाणविशेष के लक्षण भी खण्डनीय हैं । देखिये—'इन्द्रिय तथा अर्थ के सन्निकर्ष (सम्बन्ध) से उत्पन्न तथा अर्थ से अव्यभिचारी ज्ञान प्रत्यक्ष प्रमा है' ऐसा प्रत्यक्ष का लक्षण न्यायसूत्रकार ने किया है । किन्तु प्रश्न है कि आखिर यह लक्षण किसलिए किया—क्या सजातीय ( सदृश ), और विजातीय ( असदृश ) से व्यावृत्त ( भेदयुक्त ) लक्ष्य के स्वरूपज्ञान के लिए लक्ष्यभूत प्रत्यक्ष के ज्ञानार्थ चिह्न-हेतु- प्रदर्शन के लिए, व्यवहार के लिए, प्रत्यक्ष, साक्षात्कारी आदि शब्दों के प्रवृत्तिनिमित्त ( शक्यतावच्छेदक ) के प्रदर्शन के लिए अथवा अन्य ही किसी प्रयोजन के लिए ? )