भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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५ परिच्छेद ] चरम-व्यापारवत्त्व का खण्डन १६७ अथ प्रमात्वे तत् प्रयोजकम्, न त्वनुमितित्वादाविति चेन्न । निरुपाधित्वा- विशेषेणोक्तार्थानधिक्यात् । सामान्यप्रयोजकत्वेन विशेषत्यागानवकाशादिति । अन्यथा व्यक्तेरकारणकत्वापत्तेः । अथान्यत्रास्तु यद्वा तद्वा करणम् प्रमाविवक्षितजातिविशेषव्यपदेशकं प्रमा- णम् । चतस्रः खल्विमाः प्रत्यक्षादिप्रमितयो भिन्नव्यपदेशभाजः । न च प्रमाता प्रमेयं वा तद्धेतुः, प्रमाणानि तु यथायथं चतसृष्वसाधारणानीति भिन्नबुद्धि- व्यपदेशनिबन्धनानीति । मैवम्; विवक्षितपदं तावल्लक्षणे भण्डालेख्यमिव, पुरुषेच्छानामनियतविषय- त्वात् । अर्थजत्वस्य च साक्षात्कारित्वं प्रति इन्द्रियजत्वाविशिष्टतया अर्थस्यापि समर्थन—प्रमाणत्वरूप से इन्द्रिय प्रमा का प्रयोजक है, अनुमिति का प्रयोजक नहीं । खण्डन—यदि प्रमाणत्वरूप से इन्द्रिय का प्रमा में निरुपाधिक (नियत) सम्बन्ध है, तो प्रमाविशेष (अनुमिति) में है ही। अतः आपने उक्त अर्थ से अधिक कुछ नहीं कहा । कारण, जब इन्द्रियाँ प्रमासामान्य की प्रयोजक हैं तो उनके प्रमाविशेष के प्रयोजकत्व का त्याग नहीं हो सकता। अन्यथा विशेष व्यक्ति अकारणक हो जायगी। अर्थात् तन्तुत्वाक्रान्त तन्तु पटव्यक्ति के प्रति अप्रयोजक हो जायगा । समर्थन—प्रमा से अन्यत्र छिदादि क्रियाओं में करण का जो भी कोई लक्षण करें । प्रस्तुत प्रमास्थल में तो करण का यही लक्षण करेंगे कि 'प्रमा में विवक्षित प्रत्यक्षत्व, अनुमितित्वादि जातियों के व्यवहार या बुद्धि का जो हेतु हो, वह प्रमाण (प्रमिति का करण) है।' देखिये—चार प्रकार की प्रत्यक्षादि प्रमाएँ भिन्न-भिन्न व्यपदेश या बुद्धि की विषय होती हैं। प्रमाता या प्रमेय इस भेद के कारण नहीं हैं; किन्तु इन्द्रिय, परामर्श आदि ही यथायोग्य चारों प्रमितियों में असाधारण हेतु हैं। अतः वे ही भिन्न-बुद्धि या भिन्न-व्यपदेश के कारण हो सकते हैं । खण्डन — लक्षण में 'विवक्षित' पद भण्डालेख्यवत् है, क्योंकि पुरुष की इच्छाएँ अनियतविषयक हुआ करती हैं। अर्थात् किसीके सन्तान-विशेषविषयक प्रश्न करने पर कोई भण्ड (धूर्त) 'पुत्रो न पुत्री' कह देता है। वहाँ नञ् का पुत्र या पुत्री दोनों में अन्वय हो सकने से जिस प्रकार सन्तान-विशेष का निश्चय नहीं हो पाता, उसी प्रकार यहाँ भी विवक्षित वस्तु का निश्चय न हो सकने से यह लक्षण नहीं बन सकता । किञ्च—जैसे इन्द्रियाँ प्रत्यक्षप्रमात्व-व्यवहार की हेतु हैं, वैसे अर्थ (विषय) भी हैं। इसी तरह जैसे शब्द शाब्द-व्यवहार का हेतु है, वैसे ही आप्तवक्ता भी है। अतः

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