भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 213

१६६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अथ हेतोः सतः कार्यः क्रियाहेतुस्तद्व्यापारः, तथा सति अनुमित्यहेतोरिन्द्रियस्य कुतः करणत्वं स्यादिति । मैवम् ; किं तद्धेतुत्वं यन्नास्त्यनुमितौ इन्द्रियस्य । नियतपूर्वभावित्वमिति चेत् ; अस्ति तावत् पूर्वभावित्वम् । नियतत्वमपि यदि कारणतायां प्रयोजकमिच्छसि, तदा भवतैव यतितव्यं केनचिद्रूपेणेन्द्रियादेर्नियतत्वं प्रति । अन्यथा लिङ्गेन्द्रियादेः परस्परव्यभिचारादकरणिकैव प्रमा स्यात् । मनःसंयोगादेरेव तथात्वे चाऽप्रमासाधारण्यम् । अपि चाक्षादेरकरणत्वापातः ; यत्सामान्ये यत्सामान्यं प्रयोजकं तद्विशेषस्यैव तद्विशेषे प्रयोजकत्वनियमदर्शनात् । ततो येन केनापि रूपेणेन्द्रियस्य प्रमायां नियतत्वमुपपाद्यते तेनैव रूपेण प्रसङ्गोपपत्तिः । समर्थन—'उस क्रिया का हेतु होकर उससे जो जन्य हो तथा उस क्रिया का जो हेतु हो, वह उस क्रिया का व्यापार है'—ऐसा लक्षण करेंगे। एवञ्च इन्द्रिय अनुमितिरूप क्रिया का हेतु नहीं है, अतः लिङ्गपरामर्श इन्द्रिय का व्य पार नहीं और न इन्द्रिय ही अनुमिति की करण है। खंडन—वह हेतुत्व क्या है, जो अनुमिति में इन्द्रिय को नहीं है ? समर्थन—नियम से पूर्ववृत्तित्व ही वह है, इन्द्रिय अनुमिति में नियम से पूर्व- वर्ती नहीं है। खंडन—जहां 'वह्निव्याप्यो धूमः, तद्वांश्च अयं पर्वतः' इत्याकारक प्रत्यक्ष-ज्ञानरूप परामर्श होता है, वहां इन्द्रिय अनुमिति से पूर्ववर्ती तो अवश्य है। रहा नियम से रहना। यदि उसे भी कारणत्व का प्रयोजक मानना चाहते हों, तो आपको ही यत्न करना चाहिए कि किसी रूप से इन्द्रिय नियतपूर्ववर्ती हो। अर्थात् 'प्रमां प्रति प्रमाणं कारणम्' ऐसा कार्यकारणभाव होने से प्रमाणत्वरूप से इन्द्रिय भी प्रमात्वरूप से अनुमिति के नियतपूर्ववर्ती ही है। अन्यथा (यदि सामान्यरूप से कार्यकारणभाव न मानें तो) परस्पर व्यभिचार होने से इन्द्रियादि करण न कहलायेंगे, अर्थात् प्रमा करणरहित हो जायगी। 'आत्म-मनःसंयोग ही प्रमा का करण है, अतः प्रमा करणरहित नहीं होगी', ऐसा भी नहीं कह सकते; क्योंकि आत्म-मनःसंयोग अप्रमा का भी करण है। किञ्च—यदि 'प्रमां प्रति प्रमाणं कारणम्' ऐसा सामान्यरूप से कार्यकारणभाव न मानें, तो 'प्रत्यक्षप्रमां प्रति इन्द्रियप्रमाणं कारणम्' ऐसा विशेष कार्यकारणभाव भी नहीं मान सकते। कारण, जिस सामान्य की 'जिस सामान्य में कारणता होती है, उस विशेष की ही उस विशेष में कारणता होती है' ऐसा नियम है। तस्मात् आप जिस प्रमाणत्व रूप से इन्द्रिय के [ प्रमा में ] कारणत्व का उपपादन करेंगे, उसी प्रमाणत्वरूप से इन्द्रिय के करणत्व का अनुमिति के प्रति हम भी प्रसञ्जन करेंगे ।