खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
परिच्छेद ] द्वितीय करणत्व-लक्षण का खण्डन १७५ करणत्वात् लक्षणोक्तिप्रवृत्तेन त्वया लक्ष्यमात्रमुक्तं भवेत् । न च लक्ष्यपदप्रवृत्ति- निमित्तमेव लक्षणार्थः ; गन्धवत्त्वादेः पृथिव्याद्यलक्षणत्वापत्तेः । अपि चैवं वस्तुमात्रं करणमित्यभिधायैव किं न करणपदप्रवृत्तिनिमित्तमुपा- दर्शि । स्यादेवं यदि सर्वत्र वस्तुनि करणव्यवहारः स्यादिति चेत् ; तर्हि त्वदुक्त- लक्षणमपि भवेत् यदि सर्वत्र कारणे करणव्यवहारः स्यादित्यपि पश्य । नहि कर्तरि कर्मणि वा कस्यचित्करणव्यवहारः । कर्तरि तावदस्ति लोके 'प्रमाणमिह देवदत्तः' इति । शास्त्रेऽपि 'मन्त्रायुर्वेदप्रा- माण्यवच्च तत्प्रामाण्यमाप्तप्रामाण्याद्' इतीति चेन्न । किमयं माणवकेऽग्निव्यवहार इव गौणो मुख्य एव वेति संशये यदि त्वत्परिकल्पितान्निमित्तात् मुख्यः स्यात्ततः कर्मण्यपि स्यात्तत एव निमित्तादिति बाधकदर्शनेन पारिशेष्यात् गौणतयैव तद्व्यवस्थापनाया युक्तत्वात् । का प्रसङ्ग हुआ । यदि कहें कि लक्षण तथा प्रवृत्तिनिमित्त एक ही है, अतः प्रवृत्तिनिमित्त के अभिधान से अर्थान्तर नहीं है, तो गन्धवत्त्व पृथिवी का लक्षण नहीं हो सकेगा । कारण जब आप प्रवृत्तिनिमित्त को ही लक्षण मानते हैं, तो गन्धवत्त्वरूप उपाधि की अपेक्षा लाघव होने से पृथिवीत्व जाति ही प्रवृत्तिनिमित्त होती है, गन्धवत्त्व नहीं । अतः गन्धवत्त्व लक्षण नहीं होगा । अपि च—'वस्तुमात्र करण है' यह कहकर आपने करणपद के प्रवृत्तिनिमित्त का प्रदर्शन क्यों नहीं किया ? यदि कहें कि 'ऐसा तभी कह सकते थे, जब कि वस्तुमात्र में करण व्यवहार होता,' तो हम भी कह सकते हैं कि 'तभी आपका यह लक्षण भी हो पाता, यदि कारणमात्र में करण व्यवहार होता ।' आप भी यही देखें कि कर्ता या कर्म के बीच किसीक करण में भी व्यवहार नहीं होता । समर्थन—लोक में 'प्रमाणमिह देवदत्तः' इस स्थल में कर्ता में करण-व्यवहार देखा ही जाता है। शास्त्र में भी 'मन्त्रायुर्वेदप्रामाण्यवच्च तत्प्रामाण्यमाप्तप्रामाण्यात्' इस स्थलमें कर्ता में करण व्यवहार देखा जाता है। खंडन—'क्या यह व्यवहार 'अग्निर्मााणवकः' के तुल्य गौण है या मुख्य ?, ऐसा सन्देह होने पर यदि तुम्हारे कल्पित निमित्त से इस व्यवहार को मुख्य मानें, तो उसी तुम्हारे कल्पित निमित्त से कर्म में भी करण-व्यवहार होना चाहिए किन्तु कर्म में तो करण-व्यवहार का बाध (अभाव) देखा ही जाता है । अतः परिशेष से कर्म या कर्ता में गौणता से करण-व्यवहार होता है, यही व्यवस्था युक्त है ।
१७६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अस्त्येव कर्मण्यपि तेन रूपेणेति चेन्न । न तावदयं शक्योपदर्शनोदाहरणः शास्त्रलोकयोः । क्व दृश्यते 'घटं पश्यती'त्यर्थे 'घटेन पश्यती'ति । यदि तु त्वच्चेतसि केवलं स्यात्, तन्न च नादरं विधातुमुत्सहामहे । प्रमेयमात्रं करणमिति वदतो वामबुद्धेर्मनसि विपरिवर्तमानं प्रमेयमात्र एव करणव्यवहारास्तित्वमेव- मनुरोद्धव्यं स्यादिति । 'घटेन पश्यती'त्याद्यनभिधानवशान्न प्रयोगः, न हि सर्वं लाक्षणिकं प्रयुज्यत इति चेन्न माऽस्तु, तदभावे काऽन्याऽस्ति तेषु करणव्यवहार इति वक्तव्यः स स्यात्, न चासौ शक्यदर्शन इति । क्रियया अयोगव्यवच्छेदेन सम्बन्धि करणमित्यपि न । तथा हि—अयोग- व्यवच्छेदो योग एव पर्यवस्येदित सम्बन्धेन सम्बन्धीत्युक्तं स्यादिति पौनरुक्त्यम् । समर्थन—कर्म में भी कर्तृव्यापार-विषयत्वरूप से करणत्व-व्यवहार होता ही है । खण्डन—नहीं, लोक या वेद में कहीं भी 'घटं पश्यति' के स्थान पर 'घटेन पश्यति' ऐसा व्यवहार नहीं देखा गया है । यदि केवल आपके चित्त में 'घटं पश्यति' के स्थान पर 'घटेन पश्यति' ऐसा व्यवहार हो, तो उसका आदर करने में हमें उत्साह नहीं होता । कारण यदि आपके वचन का आदर करें, तो 'प्रमेयमात्र करण है' यह कहनेवाले वामबुद्धि आपके वचन का आदरकर प्रमेयमात्र को करण मानना पड़ेगा । समर्थन—अभिधान न होने से 'घटेन पश्यति' यह प्रयोग नहीं होता । कारण यह निश्चय नहीं है कि लक्षण से युक्त या सिद्ध सबका प्रयोग हो । खंडन—कर्म में करण शब्द या विभक्ति का प्रयोग न होने पर उसमें करणत्वप्रयुक्त कौन-सा व्यव- हार होता है, यह कहना होगा किन्तु आप उसको कह नहीं सकते । समर्थन—जो कुठारादि प्रधान क्रिया ( छिदादिरूप फल ) से अयोगव्यवच्छेद ( सम्बन्धाभावका अभाव ) द्वारा सम्बद्ध हो, वह करण है । कुठार का व्यापार होने पर छेदन अवश्य होता है, अतः कुठार में छेदन के अयोग का व्यवच्छेद है । कर्ता का व्यापार होने पर भी सम्भव है कि कदाचित् छेदन न हो । अतः कर्ता में छेदन का सम्बन्ध तो है, किन्तु छिदा के अयोग का व्यवच्छेद नहीं है, इसलिए न कुठार में अव्याप्ति है और न कर्ता में अतिव्याप्ति । खंडन—अभाव का अभाव प्रतियोगि- रूप होता है । अतः अयोग का व्यवच्छेद योगरूप होने से उक्त लक्षणवाक्य का अर्थ हुआ सम्बन्धयुक्त सम्बन्धी । फलतः पुनरुक्तिदोष होने से उक्त लक्षण असङ्गत है ।
परिच्छेद ] द्वितीय करणत्व-लक्षण का खण्डन १७७ यदा सम्बन्धीत्यनेन कालविशेषनियतसम्बन्धिता अभिधीयते, ततोऽन्यस्मि- न्नपि काले सम्बन्धिता अयोगव्यवच्छेदपदेन विवक्षितेति चेन्न । सम्बन्धीत्यनेन न कालविशेषनियता सम्बन्धिताऽभिहिता, येन कालान्तरेऽलब्धसम्बन्धताभिधा- नाय पदान्तरमुपादीयेत । अथोच्यते—सम्बन्धीत्यस्य सामान्यतोऽभिधायिनः कालविशेषनियतं सम्ब- न्धमादायपि पर्यवसाने सार्थक्यं भवत्येवेति कालान्तरेऽसम्बन्धितया व्यवतिष्ठ- मानं कत्राद्यपि करणं प्रसज्येत । तद्व्यवच्छेदाय कालान्तरे सम्बन्धिता पदान्तरेणा- भिधीयत इति । मैवम् ; तर्हि तेनापि क्वचिदेव कालान्तरे सम्बन्धिताऽभिधीयेत, तदापि तस्य सार्थकता सम्बन्धिपदन्यायेन सामान्याभिधायिनो भवेदिति ततोऽपि कालान्तरे असम्बन्धव्यवच्छेदाय विशेषणान्तरमपि निवशनीयं स्यात् । अथ यदा कदाचिदपि योऽयोगस्तस्य सर्वस्य व्यवच्छेदो विवक्षित इति । समर्थन—'सम्बन्ध' शब्द काल-विशेष से नियत सम्बन्ध का वाचक है । अतः काल- विशेष से अन्य काल में सम्बन्धित्व प्रतिपादन करने के लिए 'अयोगव्यवच्छेद' का लक्षण में निवेश है । खण्डन—'सम्बन्धी' पद से काल-विशेष से नियत सम्बन्ध का अभिधान नहीं होता, किन्तु सामान्यतः सम्बन्ध का अभिधान होता है । अतः सम्बन्धी कहने पर अन्य काल में अयोग प्राप्त नहीं होता, फिर उसके व्यवच्छेद के लिए 'अयोगव्यवच्छेद' पद का उपादान व्यर्थ है । समर्थन—यद्यपि 'सम्बन्धी' पद सामान्यतः सम्बन्धमात्र का अभिधान करता है, तथापि कालविशेष से नियत सम्बन्ध में भी सम्बन्धी पद का पर्यवसान हो सकता है । अतः कदाचित् छिदादि प्रधान क्रिया से असम्बद्ध कर्ता में करणत्व के व्यवच्छेद के लिए अयोगव्यवच्छेद पद का लक्षण में निवेश हो सकता है । खण्डन—जैसे सामान्यतः सम्बन्ध का वाचक 'सम्बन्धी' पद कालविशेष से नियत सम्बन्ध में पर्यवसित होता है, वैसे ही अभावाभाव के प्रतियोगी रूप होने से, सामान्य सम्बन्ध के वाचक 'अयोगव्यवच्छेद' शब्द का भी यदि कालविशेष से नियत सम्बन्ध में ही पर्यवसान मान लें, तो फिर भी कर्ता में अतिव्याप्ति हो जायगी । अतः उसमें अति- व्याप्ति के वारण के लिए अन्य विशेषण का निवेश करना होगा । इस प्रकार उत्तरोत्तर विशेषण-निवेश करने पर अनवस्था हो जायगी । समर्थन—अन्य काल में भी जो अयोग हो, उसका व्यवच्छेद अयोगव्यवच्छेद शब्द का अर्थ है । अतः क्रिया से सार्वकालिक कुठार-सम्बन्ध के लाभ के लिए २३
१७८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम तर्हि सम्बन्धिपद एवैषा विवक्षाऽस्तु, कृतमधिकमुपादाय तद्विवक्षया। निषेध- व्यवच्छेदेन सार्वत्रिकत्वलाभ इति चेन्न। निषेधस्यव्यवच्छेदस्य विध्यनतिरेकार्थ- त्वेनाविशेषात्। तद्धर्मिकं सम्बन्धस्य असम्बन्धासामानाधिकरण्यम् 'अयोगव्यवच्छेदेने' त्यने- नोच्यत इति चेन्न। तस्यापि सत्त्वकाले तत्रासत्त्वोपगमात्। सर्वदेति चेन्न। यद्येवं तत् किं करणासत्त्वकालेऽपि योग एव करणेन क्रियायाः? यावत्सत्त्वमिति चेत्; तर्हि सम्बन्धीति व्यर्थम्, यावत् सत्त्वमयोगव्यवच्छेदेन अयोगव्यवच्छेद पद सार्थक है। खंडन—सम्बन्धी पद से ही अन्य काल में अयोग का व्यवच्छेद विवक्षित क्यों न मानें? उसके लिए अयोगव्यवच्छेद शब्द का निवेश क्यों किया जाय? समर्थन—अयोगव्यवच्छेदरूप विशेषण से अयोग का निषेध होने पर सार्वकालि- कत्व का लाभ हो जाता है। खंडन—अभावाभाव प्रतियोगी रूप होने से जब अयोगव्यवच्छेद योगरूप ही है, तो 'अयोगव्यवच्छेद' शब्द से सार्वकालिक सम्बन्ध का लाभ ही कैसे होगा? समर्थन—'जिस कुठारादि में छिदादि प्रधानक्रिया का सम्बन्ध प्रधानक्रिया के सम्बन्धाभाव से समानाधिकरण न हो, वह करण है'—यह अर्थ अयोगव्यवच्छेद शब्द से विवक्षित है। एवञ्च कर्ता में छिदा का सम्बन्ध 'स्व' के असम्बन्ध से समानाधिकरण है, अतः उसमें अतिव्याप्ति नहीं होगी। खंडन—कर्ता में भी छिदा के सम्बन्धकाल में छिदा का असम्बन्ध नहीं है, अतः उसमें उक्त लक्षण की अतिव्याप्ति तदवस्थ ही है। समर्थन—जिस धर्मी में छिदा के सम्बन्ध के अभाव का सदा असत्त्व हो, वह करण है। कर्ता में छिदा के सम्बन्ध-काल में उसके सम्बन्धाभाव का असत्त्व होने पर भी सदा असत्त्व नहीं है, अतः अतिव्याप्ति नहीं है। खंडन—यदि ऐसा है, तो क्या करण के असत्त्वकालमें भी क्रिया के साथ करण का सम्बन्ध विवक्षित है? अर्थात् करण में भी सर्वदा सम्बन्ध नहीं है, अतः लक्षण असम्भवी हो जायगा। समर्थन—यावत् कुठारादि करण का सत्त्व हो, तावत् कुठारादि में छिदा का सत्त्व विवक्षित है। खंडन—ऐसा होने पर सम्बन्धी पद व्यर्थ हो जायगा। अर्थात् "यावत् 'स्व' का सत्त्व हो, तावत् जो धर्मी क्रिया के अयोगव्यवच्छेद से विशिष्ट या
परिच्छेद ] द्वितीय करणत्व-लक्षण का खण्डन १७६ यद्विशिष्टमुपलक्षितं वा तत्करणमित्येवास्तु, सम्बन्धीत्येव वा तथा विवक्ष्यता- मित्युकतमेव । अयमेवार्थः कयाऽपि कुसृष्ट्या सम्बन्धिपदसार्थकतामुपपाद्य यदि विव- क्षितस्तदाप्युच्यते — कृत्तिकोदयक्रियायां रोहिण्यासत्तिरेवेवं करणं स्यात्, अनन्तर- भाविनश्चतुर्दशस्य नक्षत्रस्योदयं प्रति पूर्वभाविचतुर्दशसङ्ख्यनक्षत्रास्तमयस्य च करणत्वं स्यात् । न चैवमेव युक्तम् ; यौगपद्येन कारणत्वानुपपत्त्या कारकत्वस्य दुर्निरस्तत्वेन करणत्वस्य सम्भावनाऽनारोहात् । न च तत्र सम्बन्ध एव नास्ति; व्याप्तेः स्वभावसम्बन्धात्मिकाया दुरपह्नवत्वात् । अथ कार्यकारणभावः सम्बन्धो विवक्षितः । न ; सामग्र्याः करणत्वापत्तेः । उपलक्षित हो, वह करण है,” अथवा “यावत्सत्त्व जो प्रधान छिदादि क्रिया का सम्बन्धी हो, वह करण है” ऐसा ही लक्षण रहे, 'अयोगव्यवच्छेदेन' यह विशेषण व्यर्थ है । यदि कहो कि सम्बन्धी पद से सम्बन्ध-सामान्य विवक्षित है और अयोगव्यवच्छेद पद से यावत्-कारक-सत्त्व विवक्षित है, अतः न पुनरुक्ति है और न विशेषण ही व्यर्थ है, तो यह कल्पना उदक्षर होने से ( अक्षरार्थ न होनेसे ) कुत्सित है । किञ्च — ऐसा निवेश करने पर भी कृत्तिकानक्षत्र की उदयरूप क्रिया में रोहिणी का सामीप्य भी करण हो जायगा । किञ्च — उत्तरभावी चतुर्दश नक्षत्र के उदय के प्रति पूर्वभावी चतुर्दश नक्षत्र का अस्तगमन भी करण हो जायगा । समर्थन — कृत्तिकानक्षत्र के उदय में रोहिणी का सामीप्य करण क्यों नहीं माना जाय ? खण्डन — एक काल में होने से उसमें पूर्वकालवृत्तित्वरूप कारणत्व ही नहीं है, अतः करणत्व की सम्भावना भी नहीं है । समर्थन — कृत्तिकोदय का रोहिणी के सामीप्य में सम्बन्ध नहीं है । अतः क्रिया के साथ अयोगव्यवच्छेद से युक्त सम्बन्धरूप करणत्व लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं है । खंडन — कृत्तिकोदय की रोहिण्यासत्ति ( रोहिणी के सामीप्य ) में स्वभाव ( स्वरूप ) सम्बन्धरूप व्याप्ति ही सम्बन्ध है । उसका अपह्नव नहीं हो सकता । समर्थन — क्रिया के साथ अयोगव्यवच्छेद से युक्त कार्यकारणभावरूप सम्बन्ध जिसमें हो, वह करण है। कृत्तिकोदय का रोहिणी के सामीप्य में कार्यकारणभाव नहीं है, अतः अतिव्याप्ति नहीं है। खण्डन — छिदादि प्रधान क्रिया के साथ अयोगव्यवच्छेद से युक्त सम्बन्धी सामग्री भी है; अतः सामग्री में
१८० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम ओमिति चेत्; तत्किमोमित्यभिधायैव निवृत्तो भवान् ? आकलितं किलास्माभिः सामग्र्यपि करणमित्यत्र न श्रदधतः प्रणवपूर्विकां श्रुतिमेव काञ्चित्पठित्वा श्रद्धा- पयिष्यति भवानस्मानिति । न सामग्री कारणम्, किन्तु तदेकदेशो नानाभूतः प्रत्येकं तथा । सामग्री तु 'यदनन्तरं कार्यं भवत्येव'इत्येतावन्मात्ररूपेति चेन्न । एतादृशस्य सामग्रीलक्षणस्य करणेऽपि सत्त्वात् करणस्यापि सामग्रीत्वापातात्, क्रियाया विभागादौ विभागस्य च संयोगनाशादिं प्रति तथात्वापत्तेः । यच्च प्रतिसामग्र्येकदेशं नियतप्राग्भावादि कारणलक्षणमिष्यते, तत्सामग्र्या- मपीति कथं तदकारणता ? प्राक्कालमन्तर्भाव्य सामग्री, तादृश्याश्च तस्याः प्राक्सत्त्वमेव नास्तीति चेन्न । तत एव प्राक्कालस्याकारणत्वात् कारणसामग्र्यां तदनिवेशात् । करणत्व का प्रसङ्ग हो जायगा । यदि आप 'ओम्' शब्द का उच्चारणकर सामग्री का करणत्व स्वीकार करायें, तो क्या आप 'ओम्' कहकर ही कृतकृत्य हो गये ? हमने तो यही समझा कि बिना किसी युक्ति के सामग्री को करण मानने में श्रद्धा न रखने- वाले हम लोगो को आप प्रणवपूर्वक कोई श्रुतिवचन पढ़कर श्रद्धा करा देंगे । समर्थन—सामग्री कारण नहीं, बल्कि उसका एकदेश जो, कि समवायी, असमवायी आदि अनेकविध है, कुठारादि प्रत्येक कारण है । जिसके अनन्तर उसरकाल में कार्य अवश्य हो, वह सामग्री है । अतः सामग्री में क्रिया के साथ अयोगव्यवच्छेद से युक्त कार्यकारणभावरूप सम्बन्ध न होने से अतिव्याप्ति नहीं है । खण्डन--सामग्री का यह लक्षण करण में भी है, अतः करण में सामग्री के लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—क्रिया विभाग की और विभाग संयोग के नाश की सामग्री हो जायगा । किञ्च—नियतपूर्ववर्तित्वरूप जो कारणत्व-सामग्री के एकदेश में है, वह सामग्री में भी है ही । अतः 'सामग्री कारण नहीं है' यह कथन भी उचित नहीं है । समर्थन—सामग्री में अन्तर्भूत प्राक्काल भी है और उसमें प्राक्सत्त्वरूप कारणत्व नहीं है । अतः प्राक्कालघटित सामग्री में प्राक्सत्त्वरूप कारणत्व नहीं है । खण्डन—प्राक्काल में पूर्वक्षणवृत्तित्व का असत्त्व होने से वह कारण ही नहीं है। अतः कारणसमूहरूप सामग्री में प्राक्काल का प्रवेश हो ही नहीं सकता ।
परिच्छेद ] द्वितीय करणत्व-लक्षण का खण्डन १८४ अपि चैवं विवक्षितमपि करणं न स्यात् । न हि यावत्सत्त्वं व्यापारवतोऽपि तस्य क्रियाजनकत्वम् ; क्रियाकाले क्षणमपि तदनुवृत्तिनिषेधे प्रमाणस्य दुरुपन्या- सतया संशयेनापि लक्षणासिद्धेः । प्रत्युत चिरस्थिरकरसंयोगे स्पृश्ये स्पर्शप्रमा- करणस्पर्शनैन्द्रियसंयोगस्थैर्यस्य मन्तुमुचितत्वात् । यावत्सत्त्वं च कारणमिति भाषायां सर्वस्मिन् तत्सत्त्वकाले करणत्वमित्यर्थः । न च कारणत्वस्य नियतपूर्वकालसम्बन्धात्मकस्य क्वचित्काले सत्त्वम्, कालं प्रति कालान्तराभावादिति । अथ क्रियया अयोगव्यवच्छेदेन सम्बन्धीत्यस्यायमर्थो यस्मिन् सति भवत्येव क्रियेति । कोऽस्यार्थः—किं यस्मादनन्तरं क्रियोत्पद्यत एव, उत यस्मिन् वर्तमाने अपिच—'यावत्सत्त्व ( अवस्थिति ) क्रिया का अयोगव्यवच्छेद से जो सम्बन्धी हो, वह करण है' ऐसा लक्षण होने पर विवक्षित कुठारादि भी [ उद्यमन-निपतन- विशिष्ट कुठार का या कुठार की उद्यमन-निपतन क्रिया का यावत्काल में प्रधानक्रिया छिदादि के साथ जनकत्वरूप सम्बन्ध न होने से ] करण नहीं कहलायेंगे । कारण, कुठारादि के क्रियाकाल में क्षणभर भी प्रधानक्रिया छिदा के असम्बन्ध का निषेध है, इसमें कोई प्रमाण नहीं । अतः असम्भव के सन्देह से भी यह लक्षण असङ्गत है । प्रत्युत देखा यह जाता है कि स्पृश्य द्रव्य में चिर-स्थिर कर-संयोग होने पर त्वगिन्द्रिय और स्पृश्य द्रव्य का संयोगरूप व्यापार तो है; किन्तु चित्त के अन्यत्र व्यासक्त होने पर त्वाच-प्रमा नहीं होती । अतः स्पर्श-प्रमा के साथ त्वगिन्द्रिय का अयोगव्यवच्छेदयुक्त सम्बन्ध न होने से त्वगिन्द्रिय में करण-लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—'यावत्-सत्त्व क्रिया के साथ अयोगव्यवच्छेद से जनकता रूप से जो सम्बन्धी हो, वह करण है' इस वाक्य का यह अर्थ हुआ कि 'सर्वकरणसम्बन्धी काल में विद्यमान कारण करण है।' किन्तु वह अयुक्त है, कारण, काल में काल नहीं रहता । अतः काल से घटित प्राक्कालसत्त्वरूप करणत्व से विशिष्ट कारण काल में भी नहीं रहेगा । समर्थन—'अयोगव्यवच्छेद से युक्त जो क्रिया का सम्बन्धी हो' इस वाक्य का 'जिसके होने पर अवश्य क्रिया होती हो' यह फलित अर्थ है । खण्डन—'जिसके होने पर अवश्य क्रिया होती हो' इस वाक्य का 'जिसके अनन्तर क्षण में क्रिया अवश्य उत्पन्न होती हो' यह अर्थ है, 'जिसके रहते क्रिया अवश्य उत्पन्न हो' यह
१८२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [प्रथम क्रियोत्पद्यत एव, उत यस्मादनन्तरं क्रिया तिष्ठत्येव, उत यस्मिन् वर्तमाने क्रिया तिष्ठत्येव ? नाद्यः; सामग्र्याः करणत्वप्रसङ्गात्, हस्तादीनामकरणत्वप्रसङ्गाच्च, सुखदुःखदेः प्रमेयस्यापि प्रमाकरणत्वप्रसङ्गाच्च । न च प्रमेयमपि प्रमायाः करणं स्यादेवेति वाच्यम्; तत्र तथाव्यवहारस्य कस्यचिदप्यसिद्धेः । नापि द्वितीयः; स्पृश्येन सह स्थिरसंयोगस्य स्पर्शनैन्द्रियस्याव्यापनात् , तत्सत्त्वेऽपि व्यासक्तौ तेन प्रमानुत्पादनात् । नापि तृतीयः ; सामग्र्यादेः करणत्व- प्रसङ्गात्, उत्पत्तेः, स्थिरे करणत्वप्रसङ्गाच्च । नापि चतुर्थः; सहस्थायिनां करणत्वप्रसङ्गात् । अर्थ है, 'जिसके अनन्तर क्रिया अवश्य रहती हो' यह अर्थ है अथवा 'जिसके रहते क्रिया अवश्य रहती हो' यह अर्थ है ? इन चार कल्पों में प्रथम कल्प युक्त नहीं है । कारण, सामग्री के अनन्तर भी अवश्य कार्य उत्पन्न होता है, अतः सामग्री करण हो जायगी । किञ्च - हस्त-व्यापार के अनन्तर कदाचित् पाकादि क्रिया नहीं भी होती, अतः हस्तादि में लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । सुख-दुःख अवश्य वेद्य हैं । अर्थात् सुखादि क्षणभर भी अज्ञात नहीं रहते, किन्तु उत्पत्तिके अनन्तर इनकी प्रमिति अवश्य होती है, अतः सुखादि भी स्व- प्रमिति के करण हो जायेंगे । प्रमेय भी प्रमा का करण होता है, यह तो कभी नहीं कह सकते ; कारण कर्म में करण-व्यवहार देखा नहीं जाता । द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है ; कारण व्यासङ्ग-दशा में त्वगादि इन्द्रिय और स्पृश्यादि विषयोंका संनिकर्ष होने पर भी प्रमिति न होने से त्वगादि इन्द्रियों में अव्याप्ति हो जायगी । तृतीय कल्प भी प्रायः प्रथम कल्प में उक्त दूषण से ही दूषित है । किञ्च - जो कार्यों को स्थिर मानते हैं अर्थात् क्षणिक नहीं मानते, उनके मत में भी घटादि से स्वसत्तारूप क्रिया अनन्तर होती है. अतः घटादि स्वसत्त्वरूप क्रिया में करण हो जायेंगे । चतुर्थ कल्प भी अयुक्त है, कारण एक साथ रहनेवाले रूपादि के रहने पर ही रसादि रहते हैं । अतः सहस्थायी रूपादि भी रसादि के करण हो जायेंगे ।
परिच्छेद ] व्यापार-लक्षण का खण्डन १८३ अथ क्रियया अयोगव्यवच्छेदेन सम्बन्धित्वं करणत्वमित्यस्यायमर्थः— व्यापारवतः फलाव्यभिचारित्वमिति । मैवम् ; हस्ताद्यव्यापनात् । व्यापार-लक्षण-खण्डनम् कश्चायं तद्व्यापारो नाम—किं तज्जन्यं कारणम् , उत तदाश्रयं कारकम् ? नाद्यः ; लिङ्गपरामर्शे तदसम्भवात् । पक्षे प्रथमधूमादिदर्शनस्य व्याप्तिस्मृतिद्वारा द्वितीयलिङ्गपरामर्शव्यापारं जनयतः करणत्वमेष्टव्यम् । एवञ्च परमार्थतो व्याप्यस्य स्वरूपेण प्रमितिर्द्वितीय- व्याप्ततत्परामर्शव्यापारिका अनुमानमिष्यत इति चेन्न । अन्यतो जाताग्निधूमादि- व्याप्तिस्मृतौ सत्यां पक्षगतप्रथमधूमादिदर्शनस्य तद्व्यापारकत्वासिद्धेः । समर्थन—'क्रिया के साथ अयोगव्यवच्छेदयुक्त सम्बन्धी करण है' इसका फलित अर्थ यह है कि 'जिस व्यापार के होने पर फल का अव्यभिचार हो, वह करण है।' खंडन—हस्त का व्यापार होने पर भी कदाचित् फल का व्यभिचार होने से हस्त में अव्याप्ति हो जायगी । व्यापार-लक्षण का खण्डन किञ्च—करण का व्यापार क्या वस्तु है—क्या करण से जन्य कारण व्यापार है अथवा करण का आश्रित कारण व्यापार है ? इनमें प्रथम कल्प युक्त नहीं है; कारण, लिङ्गपरामर्श करणजन्य न होने से व्यापार न कहलायेगा । समर्थन—पक्ष ( पर्वतादि ) में प्रथम जो धूम का चाक्षुष प्रत्यक्ष होता है, वह व्याप्तिस्मृति द्वारा द्वितीय लिङ्गपरामर्श का जनन करता है; अतएव वह करण है। ऐसा होने पर वस्तुतः व्याप्य धूम की स्वरूपतः प्रमा वह्निव्याप्य धूमात्मक परा- मर्शरूप व्यापारयुक्त होने से उसका अनुमान इष्ट है । खण्डन—दैववश जहाँ पूर्वगृहीत व्याप्ति की स्मृति हुई हो, वहाँ द्वितीय लिङ्गपरामर्श उस स्मृति से जन्य ही होता है । प्रथम पक्ष में धूम का जो प्रत्यक्ष हुआ है, उससे जन्य नहीं है । अतः प्रथम लिङ्ग के ज्ञान का द्वितीय लिङ्गपरामर्श व्यापार नहीं कहा जायगा ।
१८४ : सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [प्रथम तत्राप्युभयकर्मजसंयोगवत्तदपि कारणमिति चेन्न । अभावादिसापेक्ष-विशिष्ट- प्रतिपत्तिवत् प्रागुपजातवह्निव्याप्तधूमस्मृतेः प्रथममपि 'योऽसौ वह्निव्याप्तः सोऽयं धूमः' इति परामर्शोपपत्तेः । नित्यसापेक्षेऽर्थेऽस्तु तथा, नान्यत्र प्रथमं तथेति चेन्न । प्राक् तत्कारणोपपत्तौ नान्यत्रैवमिति नियमे प्रमाणास्याभावात् । तस्य व्यापाराभावान् नानुमित्युत्पाद- कत्वमेवेति चेत्; स्यादप्येवं यदि व्यापारवतः करणत्वमित्येव सिद्धं स्यात् । तत्र धूमादिनिर्विकल्पकस्य तद्व्यापारस्य करणत्वमिति चेन्न । नित्यसङ्घटितार्थव- द्विनापि निर्विकल्पकं सविकल्पकोत्पत्तेरविरोथेन त्वदुक्तप्रक्रियानियमे प्रमाणाभावात् । समर्थन—उभयकर्मज संयोग के तुल्य वह परामर्श भी दैववश जात व्याप्ति की स्मृति और प्रथम धूमदर्शन दोनों से जन्य हो सकता है । खंडन—जैसे प्रतियोगी की स्मृति से प्रतियोगिविशिष्ट अभाव की प्रमा होती है, वैसे ही दैववश जात व्याप्ति की स्मृति से प्रथम भी धूमदर्शन के बिना ही ‘जो धूम वह्निव्याप्त है, तद्द्घूमवान् यह पर्वत है’ ऐसा परामर्श हो सकता है । समर्थन—अभावप्रमा के तुल्य धूमत्वविशिष्ट में व्याप्ति के वैशिष्ट्य का भान प्रथम धूमज्ञान के बिना नहीं हो सकेगा; कारण अभाव प्रतियोगी में नित्य साकाङ्क्ष है । अतः प्रतियोगिनिरपेक्ष केवल अभाव की प्रमा नहीं हो सकती । किन्तु प्रथम ही विशिष्टवैशिष्ट्यावगाही अभाव की प्रमा होती है । प्रकृत में नित्य साकाङ्क्ष न होने से वैशिष्ट्यावगाही ज्ञान प्रथम धूमदर्शन के बिना नहीं हो सकेगा । खंडन—जब व्याप्तिस्मृति, धूम तथा चक्षुःसंयोग आदि कारण विद्यमान हैं, तब ‘नित्य सापेक्ष न होने से प्रथमतः धूमदर्शन के बिना विशिष्टवैशिष्ट्यावगाही ज्ञान नहीं हो सकता’ यह कथन निर्युक्तिक है । समर्थन—लिङ्गपरामर्श में कोई व्यापार नहीं है, अतः वह करण नहीं है । खंडन—यह कथन तभी युक्त होता, जब ‘सव्यापार ही करण होता है’ यह नियम
- होता । परन्तु ऐसा नियम नहीं है; कारण, व्यापाररहित व्यापार भी करण होता है । समर्थन—प्रथम धूम का निर्विकल्पक ज्ञान होता है, अनन्तर विशिष्टवैशिष्ट्याव- गाही धूम का परामर्श होता है। अतः धूम का निर्विकल्पक ज्ञान ही परामर्श द्वारा अनुमिति का करण है । खंडन—प्रतियोगी में नित्य सापेक्ष अभाव की प्रमा के तुल्य निर्विकल्पक के बिना भी पूर्वोक्त रीति से व्याप्तिविशिष्ट धूम का परामर्श हो सकता है। अतः ‘निर्विकल्पक ज्ञान के बिना सविकल्पक ज्ञान नहीं हो सकता’—आपकी इस कल्पित प्रक्रिया में कुछ भी प्रमाण नहीं है ।
परिच्छेद ] व्यापार-लक्षण का खण्डन १८५ नित्यसङ्घटितेऽपि निर्विकल्पकं मंस्यस इति चेन्न । कारणान्तरादेव तदुपपत्तौ तत्र निर्विकल्पककल्पनायां प्रमाणाभावात् । प्रत्युत तत्सङ्घटनस्य स्वभा- वानतिरेकोपगमात् । तथापि यत्किञ्चित्जनकं तदेव तत्रानुमितिकरणमास्तामिति चेन्न । तथेन्द्रिया- देरनुमितिकरणत्वापत्तेरिति अलमतिप्रसरेणेति । शब्दश्रोत्रसन्निकर्षस्य च श्रोत्राव्यापारत्वप्रसङ्गात् । अन्यथा श्रोत्रस्य शब्द- प्रतिपत्तावकरणत्वप्रसङ्गात् । सन्निकर्षो हि इन्द्रियव्यापार उच्यत इति व्यापारा- न्तरञ्च तस्य क्षणिकमसिद्धम् , स्थिरे चोक्त एव दोषः । समर्थन—अभाव की प्रमा भी निर्विकल्पकज्ञानपूर्वक ही होती है, ऐसा मानेंगे । खंडन—जब अभाव की प्रमा प्रतियोगी की स्मृति से युक्त इन्द्रिय-सन्निकर्ष से ही हो सकती है, तब उस प्रमा में निर्विकल्पक ज्ञान को कारण मानने में कोई प्रमाण नहीं है । प्रत्युत अभाव आदि नित्यसाकाङ्क्ष पदार्थों का यह स्वभाव है कि निर्विकल्पक ज्ञान के विना भी वे विशिष्टज्ञान ( सविकल्पक ज्ञान ) के विषय होते हैं । समर्थन—व्याप्ति की स्मृति ही परामर्शरूप व्यापार की जनक होने से अनुमिति का करण क्यों न मानी जाय । खण्डन—ऐसा होने पर इन्द्रिय ही अनुमिति- करण क्यों न मानी जाय ? जैसे 'वह्निव्याप्यो धूमः' इत्याकारक व्याप्तिस्मृति, 'योऽयं वह्निव्याप्यो धूमस्तद्वान् अयं पर्वत:' इस परामर्श की जनिका है, वैसे ही इन्द्रिय भी उक्त परामर्श की जनिका है। अतः व्याप्तिस्मृति के तुल्य इन्द्रिय की भी उक्त स्मृति व्यापार हो सकती है। यदि इन्द्रिय को अनुमिति का करण मान लें, तो इन्द्रियजन्य होने से अनुमिति प्रत्यक्ष हो जायगी । एवञ्च प्रत्यक्षत्व तथा अनुमितित्व का साङ्कर्य हो जायगा । इतना० ही बहुत है, विस्तार से कुछ फल साध्य नहीं । किञ्च—यदि करण का व्यापार करण से जन्य कहा जाय, तो शब्द के साक्षात्कार में श्रोत्र का शब्द-समवाय [ अजन्य होने से ] व्यापार नहीं होगा । यदि समवाय को उक्त स्थल में व्यापार न मानें, तो श्रोत्र करण न हो सकेगा । कारण, व्यापारवत् कारण को ही करण कहते हैं और श्रोत्र का शब्द से सन्निकर्ष ही व्यापार हो सकता है । जो क्षणिक जन्य हो, ऐसा अन्य व्यापार शब्द-प्रत्यक्ष में असिद्ध है और स्थिर ( समवाय ) व्यापार [ उक्त लक्षण का समन्वय न होने से ] हो नहीं सकता । २४
१८६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम शब्द एव तद्व्यापारः किन्न स्यादिति चेन्न । तस्य कर्मत्वेन करणकोटि- बहिर्भावात् । क्वचित्तयोरेकत्वेऽपि का क्षतिरिति चेन्न । शब्दबुद्धौ कार्यायामुपधायकत्वेन प्रविष्टस्य शब्दस्य करणव्यापारतया कारणकोटावपि प्रवेशनेऽशतो नियम्यनिया- मकत्वविरोधापत्तेः । घटादिबुद्धौ चक्षुरादेश्चक्षुर्घटादिसंसर्गव्यापारक्त्वेऽपि सम- मिदमिति चेत् किन्न स्यात् । तथा च— बाधेऽदृढेऽन्यसाम्यात् किं दृढेऽन्यदपि बाध्यताम् । क्व ममत्वं मुमुक्षूणामनिर्वचनवादिनाम् ॥ ३३ ॥ तथा हि मिथिलानाथो मुमुक्षुर्निर्ममः पुरा । आहेदं मिथिलादाहे न मे किञ्चन दह्यते ॥ ३४ ॥ समर्थन—श्रोत्र-इन्द्रिय आकाशरूप है और शब्द आकाश का गुण है। अतः श्रोत्र से जन्य तथा शब्द-प्रत्यक्ष का जनक होने से शब्द को ही शब्द-प्रत्यक्ष में व्यापार क्यों न मानें ? खंडन—शब्द [ प्रत्यक्ष प्रमा का ] कर्म है, अतः उक्त प्रमा का करण नहीं हो सकता समर्थन—यद्यपि सर्वत्र कर्म से अन्य ही करण होता है, तथापि शब्द-प्रत्यक्ष में कर्म को ही करण मानें, तो क्या हानि है ? खण्डन—यदि शब्द को व्यापार मानें, तो विषयतासम्बन्ध से शब्दविशिष्ट प्रत्यक्ष में शब्दरूप व्यापारविशिष्ट श्रोत्र के करण होने से विशिष्टवृत्ति धर्म विशेषण में भी अवश्य रहता है। अतः शब्द का कार्य और कारण दोनों दलों में प्रवेश होने से वह कार्य और कारण दोनों हो जायगा, जो आत्माश्रय होने से अनुचित है । समर्थन—ऐसा मानें, तो विषयतासम्बन्ध से घटविशिष्ट प्रमा में घटसंयुक्त चक्षु के कारण होने से विशेषणरूप से घट का कार्य और कारण दोनों दलों में प्रवेश होने के कारण उसमें भी कार्यत्व और कारणत्व का प्रसङ्ग हो जायगा । खण्डन—ऐसा क्यों नहीं ? यदि बाधक (दूषण) दृढ़ (अखण्डनीय) है, तो अन्यत्र भी इसी प्रकार से दोष हो जायगा । ऐस साम्य दिखाने से क्या होगा ? उसे भी उक्त दोष से ही खण्डित जानिये । पदार्थमात्र को अनिर्वचनीय माननेवाले मुमुक्षु पुरुषों का भी क्या किसीमें ममत्व हो सकता है ? स्मरण कीजिये, मुमुक्षु और निर्मम मिथिलेश जनक ने मिथिला-दाह के समय भी कहा था कि 'मिथिला के जलने पर भी मेरा कुछ नहीं जलता।'
परिच्छेद ] व्यापार-लक्षण का खण्डन १८७ नापि द्वितीयः ; लिङ्गपरामर्शस्यानुमितौ अकरणत्वप्रसङ्गात् । निर्विकल्पक- स्यापि तस्योपगमे सविकल्पकानाश्रयत्वात् । अतद्धेत्वाश्रयस्य तद्धेतुव्यापारत्वे चात्यापत्तेः । किञ्च – फलाव्यभिचारित्वं किं तस्मिन्नेव काले फलस्य सत्त्वनियमः , उत तदनन्तरं फलसत्त्वनियमः ? नाद्यः; कारणस्य पूर्वभाविताया अवश्यं वक्तव्यत्वात् । न द्वितीयः ; आनन्तर्यं यद्यव्यवहितानन्तर्यं विवक्षितं तदा यत्किञ्चिद्व्या- पारवतः करणत्वपक्षे हस्तादेरकरणत्वापत्तेः । आफलव्यापारवतस्तथात्वे कर्त्रादिष्वतिव्याप्तिः । अथ व्यवहितस्यापि आनन्तर्यं विवक्षितम्, तदाऽपि यत्किञ्चिद्व्यापाराभिप्राये 'करण में स्थित कारण व्यापार है' यह द्वितीय पक्ष भी अयुक्त है। कारण, लिङ्ग- परामर्श में कोई व्यापार नहीं है, अतः लिङ्गपरामर्श करण नहीं कहा जायगा । साथ ही धूम का निर्विकल्पक ज्ञान भी करण नहीं होगा, क्योंकि सविकल्पक लिङ्गपरामर्श उसमें नहीं, किन्तु आत्मा में रहता है। यदि अन्य कारण में स्थित को भी करण का व्यापार मानें, तो सहकारीमात्र करण के व्यापार हो जायेंगे । किञ्च—'व्यापारवान् कारण का फल के साथ अव्यभिचार' क्या वस्तु है ? क्या वह व्यापारवान् कारण के काल में फल (प्रधान क्रिया ) का अवश्य होना है अथवा व्यापारवान् कारण के अनन्तर काल में फल का अवश्य होना है ? इनमें प्रथम पक्ष अयुक्त है; क्योंकि जिस काल में कारण हो, उस काल में [ कारण-जन्य होने से ] कार्य नहीं रह सकता, क्योंकि जन्य-जनक में पूर्व और परभाव का नियम है । द्वितीय पक्ष में यदि अव्यवहित अनन्तर ( उत्तर) कहें और 'यत्किञ्चित् व्यापारवान् करण है' इस पक्ष का आश्रयण करें, तो हस्त के यत्किञ्चित् व्यापार के अव्यवहित उत्तर क्षण में फल न होने से हस्त में अव्याप्ति हो जायगी । यदि 'फलोत्पत्तिपर्यन्त व्यापार- वान् करण है' इस पक्ष का ग्रहण करें, तो हस्त में अव्याप्ति तो न होगी, क्योंकि काष्ठ, अग्नि आदि के व्यापार भी हस्त से प्रयोज्य होने के कारण हस्त के ही व्यापार हैं और उन व्यापार-समूहों के अव्यवहित अनन्तर फल नियमतः होता ही है । परन्तु इसी तरह कर्ता आदि के व्यापार भी फलपर्यन्त होते हैं और उनके अव्यवहित उत्तरक्षण में फल नियमतः होता है; अतः कर्ता आदि में अतिव्याप्ति हो जायगी । द्वितीय पक्ष में यदि व्यवहित उत्तर कहें और 'यत्किञ्चित् व्यापारवत् करण है' यह मानें, तो जहां अन्तराय ( विघ्न ) होने से हस्त-व्यापार के अनन्तर फल न
१८८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [प्रथम अन्तरायसम्भवात् हस्ताद्यव्याप्तिः । आफलव्यापाराभिप्राये च व्यवधानास- म्भवात् कारकमात्रं करणमित्युक्तं स्यात् । व्यापारवतश्च फलाव्यभिचार इति किं तद्व्यापारस्य फलाव्यभिचारित्वम् , व्यापारविशिष्टस्य वा ? नाद्यः ; हस्ताद्यकरणत्वापातात् । अत एव न द्वितीयः ; यागादेः स्वर्गाद्यकरणत्वापातात् । अपूर्ववाक्यार्थत्ववादिनाऽपि चरमयागस्य फलकरणत्वाभ्युपगमादिति । अथोच्यते--यद्वानेव करोति तत्करणम्, यद्वानेव प्रमिमीते तत्प्रमाणम् । मैवम् ; आत्मधर्मप्रध्वंसादीनामकरणानां प्रमाणत्वप्रसङ्गात् । हो, वहाँ हस्त में अव्याप्ति हो जायगी। यदि 'फलपर्यन्त व्यापारवान् करण है' यह पक्ष मानें, तो फल का अव्यवधान होने से 'व्यवहित उत्तर' यह कथन ही युक्त नहीं है। किञ्च - कारकमात्र में फलपर्यन्त व्यापार होने से कारकमात्र में अतिव्याप्ति हो जायगी। किञ्च—'व्यापारवतः फलाव्यभिचारित्वम्' इस लक्षणवाक्य का क्या अर्थ है, क्या जिस कारण में स्थित व्यापार के अनन्तर फल हो—यह अर्थ है अथवा जिस व्यापारवत् कारण के अनन्तर फल हो—यह अर्थ है ? प्रथम अर्थ में हस्त-व्यापार के उत्तर कदाचित् अन्तराय ( विघ्न ) होने पर फल न होने से हस्त में अव्याप्ति हो जायगी। द्वितीय अर्थ में भी व्यापारवत् हस्त के अनन्तर कदाचित् अन्तरायवश फल न होने से हस्त में ही अव्याप्ति हो जायगी। किञ्च--क्रियाकलापरूप याग के क्षणिक होने से अपूर्वविशिष्ट याग के अनन्तर स्वर्गरूप फल न होने से याग में भी अव्याप्ति हो जायगी। जो आचार्य लिङ् का अर्थ भावना या इष्टसाधनता नहीं मानते, किन्तु अपूर्व को ही लिङर्थ मानते हैं, वे भी 'दर्शपूर्णमासाभ्यां यजेत' इस स्थल में पूर्व-पूर्व अपूर्वविशिष्ट चरम याग को परमापूर्व का कारण मानते ही हैं। समर्थन—जिससे युक्त कर्ता कार्य करता है, वह करण है तथा जिससे युक्त प्रमाता प्रमिति को करता है, वह प्रमाण है। खंडन—अतीत, अनन्त सुखादि के अनन्त ध्वंसों से विशिष्ट ही प्रमाता प्रमिति को करता है। अतः आत्मा के धर्म, सुखादि के ध्वंस में भी प्रमा का करणत्व चला जायगा।
परिच्छेद ] व्यापार-लक्षण का खण्डन १८६ येन क्रियाकारणेन युक्त एव प्रमिमीत इति चेन्न । सुखादिप्रमितौ करण- व्यापारस्याऽपि करणत्वप्रसङ्गात् । ओमिति चेन्न । अव्यापारतयाऽकारकत्वेन तद्विशेषकरणभावानुपपत्तेः । व्यापारवताऽपीति चेन्न । एवं हि व्यापारवत एव करणत्वं न स्यात्, न हि व्यापारवतस्तस्य व्यापारान्तरवत्त्वऽस्ति। अथ व्यापारवतो व्यापारांशमपहाय करणत्वम्, तत्र चास्त्येवेदं लक्षणम् । यस्य करणत्वमस्ति तस्य व्यापारवत्त्वमप्यस्तीति व्यापारवत् करणमुच्यत इति । न; पटमुद्यम्य निपात्य च प्रक्षालयतः स कर्मेव हि करणं स्यात् । किंच—किं तस्य करणत्वमिति लक्ष्यीभूतस्य अवश्यवक्तव्यत्वात् । यद्युक्त- समर्थन—जिस प्रमिति के कारण से युक्त होकर प्रमाता प्रमिति करे, वह प्रमाण है, ऐसा कहेंगे । खंडन—तब तो सुखादि-प्रमिति के कारण आत्ममनः- संयोगरूप व्यापार से युक्त ही प्रमाता सुखादि की प्रमिति करता है। अतः सुखादिप्रमिति में आत्ममनःसंयोग भी करण हो जायगा । 'उक्त प्रमिति में आत्ममनःसंयोग करण है ही' इसे इष्टापत्ति नहीं कह सकते, क्योंकि व्यापार न होने से आत्ममनःसंयोग जब कारक ही नहीं, तो कारकविशेषरूप करण कैसे हो सकेगा ? समर्थन–'जिस क्रिया के व्यापारवान् करण से युक्त होकर प्रमाता प्रमिति करता है, वह करण है' ऐसा लक्षण करेंगे । एवञ्च आत्ममन.संयोग व्यापाररहित है, अतः उसमें अतिव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन--ऐसा होने पर व्यापारवान् कुठारादि भी करण न कहे जा सकेंगे । कारण अंशतः आत्माश्रय दोष होने से व्यापारविशिष्ट कुठार में वह व्यापार तो रह नहीं सकता, जिससे वह विशिष्ट है। फिर उसमें अन्य कोई व्यापार भी नहीं है । समर्थन---व्यापार से उपलक्षित कुठार करण है और उस कुठार में उपलक्षणीभूत व्यापार रहता है, अतः उक्त लक्षण का समन्वय हो जायगा । खण्डन --तब तो पट को उठाकर निपातन करता हुआ रजक जहाँ वस्त्र-प्रक्षालन करता है, वहाँ पटरूप कर्म भी करण हो जायगा । कारण, वहाँ उद्यमन-निपातनरूप व्यापार से युक्त तथा प्रक्षालनरूप क्रिया का कारण जो पट है, उससे युक्त ही कर्ता प्रक्षालन करता है । किञ्च—जिस करण का आप लक्षण करते हैं, वह लक्ष्यभूत करण क्या वस्तु है, यह अवश्य कहना होगा । अन्यथा लक्षणरूप धर्म किस धर्मी में रहेगा ? यदि
१६० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम लक्षणावत्त्वमेव तत् स्यात्, तदाऽऽत्माश्रयापातः स्यात् । स्वरूपमिति चेन्न । स्वरूपस्य प्रतिकरणं भिन्नतया एकपरित्यागेन अपरत्र लक्षणं गतमित्यतिव्यापकं स्यात्, न हि चक्षुषः स्वरूपं श्रोत्रस्येति । किञ्च—एवमिन्द्रियादेः प्रमाणत्वं न स्यात्, अतद्गतोऽप्यनुमात्रादेः प्रमातृत्वात् । नासौ प्रत्यक्षमिति चेन्न । नेदमपि हि प्रत्यक्षमात्रस्य लक्षणं भवता क्रियते । ननु यद्यपीन्द्रियादेर्विशेषतो व्यावृत्तिस्तदपि तज्जातीयकरणमात्रतया तज्जातीयमात्रस्य अव्यावृत्तिरेव । न ह्यनुमित्यादावपि अकरणजातीयवान् प्रमिमीते इति । न ; करणतया साधारणभावस्याद्याऽपि निर्णेतुमशक्यत्वात् । उक्त लक्षणविशिष्ट को ही लक्ष्य कहें, तो विशिष्टवृत्ति धर्म विशेषण में भी रहता है । अतः लक्ष्यवृत्ति लक्षण का लक्ष्य में विशेषणरूप 'स्व' में वृत्तित्व होने से आत्माश्रय हो जायगा । यदि स्वरूप को लक्ष्य कहें, तो प्रतिव्यक्ति स्वरूप व्यावृत्त होने के कारण श्रोत्र के स्वरूप को लक्ष्य मानें, तो चक्षु में अव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—'जिससे युक्त ही प्रमाता प्रमिति करे' इत्यादि सावधारण लक्षण करने पर चक्षुरादि में अव्याप्ति हो जायगी। कारण चक्षु के सहकार के बिना भी लिङ्गपरामर्श आदि से अनुमिति आदि प्रमितियाँ होती हैं। अतः चक्षु से युक्त ही प्रमाता प्रमिति करता है, यह नियम नहीं रहा। समर्थन—यद्यपि चक्षुःसहकार के बिना भी अनुमिति होती है, तथापि प्रत्यक्ष तो चक्षुःसहकार के बिना नहीं होता, अतः व्यभिचार नहीं है। खंडन—यदि आप प्रत्यक्ष प्रमाण का यह लक्षण करते होते तथा लक्षण में प्रत्यक्ष-प्रमा का निवेश होता, तो ऐसा कहना उचित भी था । किन्तु आप तो प्रमाणमात्र का लक्षण करते हैं तथा प्रमितिसामान्य का लक्षण में निवेश है। अतः चक्षुरादि के बिना भी अनुमिति आदि के होने से चक्षुरादि में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'जिस जातीय से युक्त ही प्रमाता प्रमिति करता हो, वह प्रमाण है' ऐसा निवेश करने पर अव्याप्ति नहीं होगी। कारण, अनुमिति में चक्षुरादि की व्यावृत्ति होने पर भी चक्षुर्जातीय परामर्श की व्यावृत्ति नहीं होगी । खंडन—परामर्श में चक्षुर्जातीयत्व करणत्व से अन्य कुछ हो नहीं सकता और उस करणत्व का निर्वचन अभीतक हुआ नहीं है। अतः जातीयत्वघटित लक्षण भी असङ्गत है ।
परिच्छेद ] तृतीय करण-लक्षण का खण्डन १६१ तृतीय-करणलक्षण-खण्डनम् अथ यां प्रमां यद्वानैव जनयति, तस्यां तत्करणमिति । मैवम्; कौपीनाच्छाद- नादेरपि करणत्वप्रसङ्गात् । यज्जातिकामिति चेत् , मैवम् । परोक्षत्वजातिकां प्रमां लिङ्गवानेव शब्दवानेव वा जनयतीति नियमाभावात् तस्याकरणत्वप्रसङ्गात् । साक्षात्कारित्वानुमितित्वादयो जातिभेदा विवक्षिता इति चेन्न । प्रत्येकमुपादाने ऽंशाव्याप्तेः । सम्भूयोपादाने सर्वाव्याप्तेः । अनियमेनोपादाने च लक्षणाननुगमापातादिति ! तृतीय करण-लक्षण का खण्डन समर्थन – प्रमाता जिससे युक्त होकर जिस प्रमा को करता है, उस प्रमा में वह करण है । खंडन---यत्किञ्चित् प्रत्यक्षादि प्रमा कौपीन-आच्छादन से युक्त भी प्रमाता करता है, तब तो कौपीन-आच्छादन में करणत्व-लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—‘यज्जातीय प्रमा को यत्-युक्त ही प्रमाता करे, तज्जातीय प्रमा में वह करण है', ऐसा लक्षण करेंगे । एवञ्च वह प्रत्यक्षजातीय प्रमा कौपीनादि से रहित भी करता है, अतः कौपीनादि में अतिव्याप्ति नहीं होगी । खंडन—परोक्षजातीय शाब्दरूप प्रमा को लिङ्गपरामर्श से रहित भी प्रमाता करता है, अतः लिङ्गपरामर्श में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—इस लक्षण में परोक्षत्व का निवेश नहीं है, किन्तु प्रत्यक्षत्व, अनु- मितित्व, उपमितित्व और शाब्दत्वरूप जातियों का निवेश है । अतः लिङ्गपरामर्श में अव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन—लक्षण में इन जातियों का किसी भी रूप से निवेश नहीं हो सकता । यदि प्रत्यक्षत्वादि एक का निवेश करें, अर्थात् प्रत्यक्षजातीय प्रमा को जिससे युक्त हो प्रमाता करे, वह प्रमाण है—ऐसा लक्षण करें, तो परामर्श में अव्याप्ति हो जायगी । यदि सम्पूर्ण का निवेश करें, 'अर्थात् प्रत्यक्ष-अनुमिति-उपमिति- शाब्दप्रमाओं को जिससे युक्त होकर प्रमाता करे, वह प्रत्यक्ष प्रमा है,' ऐसा लक्षण करें, तो सम्पूर्ण प्रमा को चक्षुरादि किसीसे युक्त प्रमाता नहीं करता । अतः सर्वत्र असम्भव हो जायगा । यदि 'प्रत्यक्ष प्रमा को जिससे युक्त ही प्रमाता करे, अनुमिति प्रमा को जिससे युक्त होकर प्रमाता करे, अथवा उपमिति आदि स्थलों में विशेषरूप से उपादान करे, वह सब प्रमाण हैं'—ऐसा निवेश करें; तो अनेक लक्षण होने से अननुगम हो जायगा ।
सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [प्रथम यदभावात् कर्तृकर्मणी क्रियां न जनयतः, तत्करणम् । तेन यदभावात् प्रमातृ- प्रमेये प्रमां न जनयतः, तत्प्रमाणमिति लक्षणमित्यपि न युक्तम् । किं प्रमातृप्रमेये सती यत्र न जनयतः, उताऽसती अपि ? आद्ये अतीतानागतानुमानादिकरणा- व्याप्तिः । नापि द्वितीयः ; प्रमातृप्रमेययोरपि प्रसङ्गात् । यथा हि तत्र चक्षुराद्य- भावात् प्रमा न जायते, तथा प्रमातृप्रमेययोरप्यभावात् ; अन्यथा तयोः कारणत्वमेव न स्यात् । एतेन सामान्यतोऽभिधानं प्रत्युक्तम् । अस्मदादिकर्तृसापेक्षेश्वरलैङ्गे च अस्मदादिज्ञाने अस्मदादिकर्तृकरणतापत्तेः । एवञ्च सति प्रकारभेदेनापि प्रमाण- प्रमात्रादिव्यवस्थासमर्थना कृता न स्यात्, येनैव रूपेण कर्तृत्वादिना तस्य प्रमायामन्वयस्तेनैव तद्व्यतिरेकस्य प्रमानुत्पत्तौ प्रयोजकत्वादिति । समर्थन—‘जिसके अभाव से कर्ता और कर्म क्रिया को उत्पन्न न कर सकें, वह करण है । इसी तरह जिसके अभाव से प्रमाता और प्रमेय प्रमिति को उत्पन्न न कर सके’ वह प्रमाण है, खंडन—क्या प्रमाता और प्रमेय के स्वयं रहते ‘जिसके अभाव से’ इत्यादि अभिप्रेत है अथवा उनके न रहने पर भी ? प्रथम पक्ष युक्त नहीं, कारण अतीतअनागतविषयक अनुमितिस्थल में सत् प्रमेय प्रमिति का जनक नहीं होता । अतः वहां अव्याप्ति हो जायगी । द्वितीय पक्ष भी अयुक्त है, कारण कर्ता प्रमाता प्रमेय या कर्म अपने अभाव में भी प्रमा को नहीं कर सकते । अतः प्रमाता और प्रमेय में अतिव्याप्ति हो जायगी । जैसे चक्षुरादि के अभाव में प्रमा नहीं होती, वैसे ही प्रमाता और प्रमेय के अभाव में वह नहीं होती । अन्यथा वे कारण ही नहीं कहे जायेंगे । जैसे कर्ता कर्तृत्वरूपसे क्रिया का कारण है, वैसे ही कर्तृत्वरूप से कर्ता का अभाव भी क्रिया के अभाव का प्रयोजक है । समर्थन – सत्त्व, असत्त्व का निवेश न कर सामान्य रूप से ‘प्रमाता और प्रमेय जिसके अभाव से प्रमा को न कर सकें, वह करण है’ यह लक्षण करेंगे । खंडन—इस सामान्यलक्षण में भी कर्ता और कर्म ‘स्व’ के बिना भी प्रमा को नहीं करते, अतः कर्ता और कर्म में ही अतिव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—हम लोग अपने चाक्षुषादि ज्ञान में स्वयं करण हो जायेंगे, कारण ईश्वर हम लोगों द्वारा ही ज्ञान को उत्पन्न करता है, हम लोगों के बिना नहीं । किञ्च—‘जिसके बिना क्रिया न हो’, यह जैसे ‘करण’ का लक्षण हो सकता है, वैसे ही कर्ता और कर्म का भी लक्षण हो सकता है । अतः यदि करण का उक्त लक्षण करें, तो प्रवृत्तिनिमित्त के भेद से कारकों का परस्पर भेद न हो सकेगा ।
परिच्छेद ] चरम-व्यापारवत्त्व का खण्डन चरम-व्यापारवत्त्व-खण्डनम् चरमव्यापारवत्त्वं करणत्वमित्यपि न; व्यापाराभावात् लिङ्गपरामर्शस्याकरण- त्वापातात् । न च सविकल्पकव्यापारवतो निर्विकल्पकस्य तत्र प्रामाण्यम्; केवल- विकल्पनीयलिङ्गविषये तदनुपपत्तेः । संस्कारादिपर्यन्तानुसरणे चानुमितेस्त- ज्जन्यत्वे प्रमाणाभावात्, कार्यहितोश्च कारकाव्यापारत्वात्, अपि चाज्ञातकरण- त्वापातात् । न च लिङ्गमेव परामर्शव्यापारवत्तया करणमिति युक्तम्; अनुमितानुमानादौ परामर्शस्यालिङ्गजत्वेन तद्व्यापारत्त्वानुपपत्तेः । आप्तोक्त्यादिभिः 'तत्रासी- चरम-व्यापारवत्त्व का खण्डन समर्थन—चरम व्यापार जिसमें हो, वह करण है। खंडन—लिङ्गपरामर्श में व्यापार न होने से वह करण न कहा जायगा । समर्थन—सविकल्पक लिङ्गपरामर्शरूप व्यापार होने से निर्विकल्पक लिङ्गपरामर्श ही करण है। खंडन—जिन नित्यसाकाङ्क्ष अभाव, समवाय आदि का निर्विकल्पक ज्ञान होता ही नहीं, वे पदार्थ जहां लिङ्ग हों, वहां करणत्व का अभाव हो जायगा । समर्थन—स्वजन्य संस्कार या 'स्व' का ध्वंस ही लिङ्गपरामर्श का व्यापार क्यों न माना जाय ? खंडन—केवल स्वजन्यत्व व्यापार का लक्षण नहीं है; किन्तु स्वजन्य होकर जो स्वजन्य का जनक हो वही व्यापार है। संस्कार या ध्वंस के अनुमिति- कारणत्व में कुछ प्रमाण नहीं है। अतः संस्कार या ध्वंस व्यापार नहीं हो सकता । किञ्च—यदि ध्वंस या संस्कार को उनका व्यापार मानें, तो उनके अतीन्द्रिय होने से ध्वंसादिविशिष्ट परामर्शरूप करण भी अतीन्द्रिय हुआ। फलतः अनुमिति अज्ञातकरणक हो जायगी । समर्थन—धूम आदि लिङ्ग ही परामर्शरूप व्यापार होने से करण हैं। खंडन—'महत्त्वं क्वचित् प्राप्तकाष्ठाकम् , धर्मत्वात्' इस प्रकार अनुमित परममहत्त्व से जहाँ 'आकाशः सर्वगतः परममहत्त्वात्' इस रीति से आकाश में सर्वगतत्व की अनुमिति करते हैं, वहाँ परममहत्त्व स्वविषयक परामर्श का अजनक होने से करण न होगा। कारण, पारिमाण्डल्य, परममहत्त्व आदि स्वविषयक ज्ञान के भी कारण नहीं होते तथा प्रत्यक्ष से अन्य ज्ञान में विषय भी कारण नहीं होते। किञ्च—आप्त की उक्ति से 'वहाँ धूम था' २५
१६४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम धूमः' इति प्रतीत्य 'तदा तत्र वह्निरप्यासीदि'ति यदनुमानं तत्रासत्त्वात् धूमस्य परामर्शव्यापारवत्तया करणताया दूरनिरस्तत्वात् । किञ्च-यत्किञ्चिदपेक्षया चरमव्यापारवत्त्वस्य सर्वकारकसाधारणात्, सर्वकारकापेक्षया चरमव्यापारवत्त्वस्य स्वापेक्षया चरमत्वानुपपत्त्या सर्वत्रासिद्धेः । कर्त्रपेक्षयेति चेन्न । कर्तृ धर्मिमात्रामपेक्षया विवक्षितत्वे कर्तरि प्रसङ्गतादवस्थ्यात्, व्यापारवत्कर्त्रपेक्षाभिप्राये च कर्तरि स एव प्रसङ्गः । एकव्यापारवत्कर्त्रपेक्षया अपरापरकर्तृव्यापारस्य चरमभावित्वात् । यावद्व्यापारवत्कर्त्रपेक्षापत्तौ तु विवक्षितमपि करणं न स्यात्, आफलसिद्धेः कर्तृव्यापाराविरामात् । व्यापारस्य विच्छेदे तद्धेतुत्वलक्षणक्षीणतापत्तेः । यद्व्यापारानन्तरं कारकान्तरं न व्याप्रीयते, तत् चरमव्यापारमिष्टमिति चेन्न । यह जानकर जहाँ 'तब तो वहाँ वह्नि भी था ही' इत्याकारक जो अनुमिति होती है, उस अनुमिति में धूम के अविद्यमान होने से धूम में परामर्शरूप व्यापारवत्त्व न होने के कारण करणत्व न हो सकेगा। किञ्च-व्यापार में चरमत्व यदि किञ्चित् व्यापार की अपेक्षा विवक्षित हो, तो सभी कारकों के व्यापारों में यत्किञ्चित् की अपेक्षा चरमत्व होने से कारकमात्र में अति- व्याप्ति हो जायगी। यदि सभी कारकों के व्यापार की अपेक्षा चरमत्व की विवक्षा करें, तो स्व में स्व की अपेक्षा चरमत्व न होने से सर्वत्र अव्याप्ति हो जायगी। अथवा यदि कर्ता की अपेक्षा चरमत्व की विवक्षा करें, तो वह चाहे धर्मिमात्र की अपेक्षा विवक्षित हो या व्यापारवत् धर्मी की अपेक्षा, उभयथा कर्ता में अतिप्रसङ्ग हो जायगा। कारण, कर्ता की अपेक्षा या यत्किंचित् व्यापारवत् कर्ता की अपेक्षा अपर कर्तृव्यापार चरम ( उत्तर ) है ही। यदि यावद्व्यापारवत् कर्ता की अपेक्षा चरमत्व की विवक्षा करें, तो कुठारादि भी करण न हो सकेंगे, कारण फल की सिद्धिपर्यन्त कर्ता के व्यापार का विराम नहीं होता । यदि कहें कि करण के व्यापार उत्पन्नकर कर्तृव्यापार निवृत्त हो जाता है, तो करण-व्यापार में चरितार्थ कर्ता प्रधान क्रिया में [ घट में कुलालपिता के तुल्य ] कारण ही न हो सकेगा। समर्थन-जिस व्यापार के अनन्तर अन्य कारक का व्यापार न होता हो, वह चरम व्यापार है। खण्डन-ईश्वरवादी के मत में फलसिद्धिपर्यन्त ईश्वररूप कर्ता के व्यापार का विराम न होने और ईश्वर के व्यापार के अनन्तर अन्य व्यापार न होने