भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 560

तस्मात्तस्य आधेयतया सम्बन्धी घट इत्येवार्थः। अतो घटतदभावयोर्भेदं मनसि कृत्यपि न विप्रतिपत्तव्यमिति। यत्रैकस्यावस्थानं तत्रैकस्यैवेति नियमाभिप्रायेण न पौनरुक्त्यादिरिति चेन्न! नियमस्य यत्किञ्चिदन्यव्यवच्छेदकत्वेऽसिद्धत्वापातात्। विरोधिम्यवच्छेद- कत्वस्य च विरोधानिर्वचनेऽनिर्वचनात्। अभावपक्षे भावव्यवच्छेदो भावपक्षे चाभावव्यवच्छेदो नियमार्थ इति चेन्न। एकरूपानभिधाने अनुगतविरोधानिर्वचनात्। किञ्च—भावाभावव्यवच्छेदयोरभावाभावविधानातिरिक्तयोरनभ्युपगमे पुनरपि च यत्र भावस्तत्र भावो यत्राभावस्तत्राभाव इत्युद्देश्यविधेयभावानुपपत्ति- रभेदादिति पौनरुक्त्याधिकफलाभाव एव। सम्बन्ध घटाभावरूप है और घटाभाव का निषेध घटरूप है। एवञ्च 'उसका आधेयरूप से सम्बन्धी घट है', यही अर्थ हुआ। फलतः घट और उसके अभाव का भेद हृदय में रहते हुए भी [पौनरुक्ति आदि दोष होने से] उन दोनों के विरोध का लक्षण न होने के कारण उक्त पौनरुक्त्यादि में विप्रति पत्ति न कर विरोध का असत्त्व ही मान लेना चाहिए। समर्थन—जहाँ एक का सत्त्व हो, वहाँ एक का ही सत्त्व हो, ऐसा उसका नियमरूप अभिप्राय मानें, तो पुनरुक्ति नहीं होगी। खंडन—नियम से यदि यत्किंचित् अन्य धर्म का व्यवच्छेद करें, तो कहीं भी विरोध की सिद्धि नहीं होगी। कारण भूत- लादि सर्वत्र ही प्रतियोगी या अभाव से अतिरिक्त भूतत्वादि धर्म विद्यमान हैं। नियम से विरोधी धर्म का व्यवच्छेद तो मान नहीं सकते, कारण अद्यावधि विरोध का निर्वचन ही नहीं हुआ है। एवञ्च आत्माश्रय हो जायगा। समर्थन—जहाँ एक शब्द से भाव का अभिधान हो, वहाँ अभाव व्यवच्छेद्य है और जहाँ एक शब्द से अभाव का अभिधान हो, वहाँ भाव व्यवच्छेद है, ऐसा नियमार्थ कहेंगे। एवञ्च आत्माश्रय भी नहीं होगा। खण्डन—भाव और अभाव उभय- स्थलसाधारण एक लक्षण न होने से लक्षण का अनुगम नहीं होगा। किञ्च—'जहाँ एक भाव का सत्त्व हो, वहां एक भाव का ही सत्त्व हो, अभाव का सत्त्व न हो' यहां 'व्यवच्छेद अभाव का सत्त्व न हो' इसका 'भाव का सत्त्व हो' इसी अर्थ में पर्यवसान होने से उद्देश्य-विधेयभाव की अनुपपत्ति तथा पुनरुक्ति दोष बना ही हुआ है।