खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] भावाभाव-विरोध का खण्डनं ५३६ स्यादेतत्—भावाभावयोः स्वरूपमेव विरोधः । न चैवं सत्यविरुद्धतापत्तिः, यथा सत्ता भावरूपैव सती स्वात्मनि सदिति भवितृव्यवहारं करोति, तथा भावा- भावौ विरोधात्मानावेव स्वात्मनि विरुद्धरूपं भवितृव्यवहारं कुरुतः । कस्यैतौ विरोध इति चानुयोगे स्वाश्रयस्येत्युत्तरम् । किं तत्र विरोधफलमिति प्रश्ने भेदव्यव- स्थानमित्यभिधेयम् । यदाह—‘अयमेव हि भेदो भेदहेतुर्वा यद्विरुद्धधर्मा- ध्यासः कारणभेदश्चे’ति । तदेतदनुपपन्नम् ; एतयोर्विरोधत्वं प्रत्येकं वा स्यान्मिलितयोर्वा ? नाद्यः ; प्रत्येकमेवाऽऽश्रयैकत्वभङ्गप्रसङ्गात् । नैकत्वाभावो भेदोऽभिमतः , किन्तु अन्योन्याश्रयापेक्षभेदरूपधर्मवत्त्वमिति चेन्न । तस्याभावात् । कालभेदेनेकस्य भावाभावाश्रयत्वाभ्युपगमान्नतद्भेद इति चेन्न । तदभेदस्य स्वाभाविकस्य विवक्षितत्वे विशेषणवैयर्थ्यात् । समर्थन—भाव-अभाव का स्वरूप ही विरोध है । यदि कहें कि भाव-अभाव का स्वरूप विरोध है, तो भाव-अभाव में विरोध नहीं रहा; फिर उनमें अविरुद्धत्व व्यवहार क्यों न हो ?, तो वह ठीक नहीं। कारण जैसे सत्ता में अन्य सत्ता के न होने पर भी अपने में वह स्वयं ही 'सत्' व्यवहार कराती है, वैसे ही भाव और अभाव दोनों अपने में [अन्य विरोध न होने पर भी] विरोध-व्यवहार कराते हैं । 'यह विरोध किनका है ?' इस प्रश्न पर 'अपने आश्रय का है' यह उत्तर है और 'विरोध का फल क्या है ?' इस प्रश्न पर 'भेद की व्यवस्था' यह उत्तर है। आचार्य ने भी यही कहा है कि ‘जो विरुद्ध धर्म का अवस्थान या कारण का भेद है, वही भेद है या भेद का हेतु है ।’ खंडन—यह मत भी युक्त नहीं; कारण भाव और अभाव प्रत्येक का विरोधत्व ( वैधर्म्यत्व और स्वाश्रय-भेदकत्व ) है या मिलित का ? इनमें प्रथम पक्ष अयुक्त है; कारण प्रत्येक में आश्रय की एकता का भंग हो जायगा । अर्थात् भावत्व और अभावत्व का अन्यानपेक्ष विरोध मानने पर प्रत्येक तदधिकरण में विरुद्ध धर्म का अध्यास होने से स्वयं से भी उसका भेद होने लगेगा । समर्थन—एकत्व का अभाव भेद नहीं है, किन्तु अन्योन्य ( भाव और अभाव ) का आश्रय है प्रतियोगी जिसका, ऐसा भेदरूप जो धर्म, तद्वत्त्व ही वह है । एवञ्च प्रत्येक के आश्रय का भेद नहीं है । खंडन—काल के भेद से एक ही घट में रक्त- रूप और उसका अभाव रहता है और आश्रयभेद भी नहीं है । अतः अन्योन्य का जो आश्रय, तत्प्रतियोगिक भेद विरोध का फल नहीं है ।