खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ एकोपाध्यवच्छिन्नस्य विवक्षितत्वे कालभेदाभिमतेऽपि सम्भवात् । भिन्नो- पाध्यनवच्छिन्नत्वस्य विवक्षितत्वेऽसम्भवात् । असहावस्थितभिन्नोपाध्यनवच्छिन्नत्वस्य वाञ्छितत्वे सहत्वस्यैककाल- रूपत्वेन तत्रापि कालाभेदविकल्पानुवृत्त्यापत्तेः । मिलितत्वं चानयोरेकदेशत्वं वाऽभिमतम्, एककालत्वं वा, एकप्रकारेण समर्थन—एक काल में अन्योन्य ( भाव-अभाव ) का जो आश्रय, तत्प्रतियो- गिक भेद विरोध का फल है। घट-रक्तता-स्थल में कालभेद से भाव-अभाव दोनों के रहने पर भी आश्रय का भेद नहीं होता । खण्डन—काल का अभेद (एकत्व) स्वाभाविक है या औपाधिक ? यदि स्वाभाविक है तो विशेषण व्यर्थ है, कारण काल का भेद तो स्वाभाविक है नहीं। फिर किसकी व्यावृत्ति के लिए लक्षण में अभेद का निवेश है। यदि काल का अभेद औपाधिक है, तो यह अर्थ हुआ कि एक उपाधि से अवच्छिन्न काल में रक्त और उसका अभाव नहीं रहता, अतः आश्रय-भेद नहीं है। किन्तु यह भी युक्त नहीं है; कारण एक ही दिनरूप उपाधि से अवच्छिन्न काल में मुहूर्त, प्रहर आदि उपाधियों के भेद से घट में रक्तरूप और उसका अभाव होने से घटरूप आश्रय का भेद हो जायगा । समर्थन—भिन्न उपाधि से अनवच्छिन्न काल में विद्यमान भाव और तदभाव का अन्योन्य आश्रयप्रतियोगिक भेद विरोध का फल है। उक्त स्थल में मुहूर्त और प्रहररूप उपाधि-भेद होने से दोष नहीं है। खण्डन—सूर्य-चन्द्र-परिस्पंद, कालयंत्र (घड़ी)- परिस्पन्द आदि से एक ही काल अवच्छिन्न होने के कारण भिन्न उपाधियों से अन- वच्छिन्नत्व अप्रसिद्ध होने से असम्भव हो जायगा। समर्थन—असह-अवस्थित जो भिन्न उपाधि, उससे अनवच्छिन्न काल में भाव और तदभाव का अन्योन्याश्रयप्रतियोगिक भेद विरोध का फल है। चन्द्र-सूर्य- परिस्पन्द आदि सह-अवस्थित हैं, अतः असम्भव नहीं है। खण्डन—इस लक्षण में सहशब्द का अर्थ एक काल ही है। उसमें भी काल का एकत्व स्वाभाविक है या औपाधिक ? ऐसा विकल्प करने पर पूर्वोक्त दोष हो जायेंगे। 'भाव और अभाव दोनों का मिलितत्व विरोध है' यह कल्प भी युक्त नहीं है।