खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] भावाभाव-विरोध का खण्डन ५४१ वृत्तिर्वा, वृत्तिप्रकारान्यैकोपाध्यवच्छेदो वा ? नाद्यः ; भावात्यन्ताभावयोस्तदभावात् । न द्वितीयः ; भावस्य प्रध्वंसप्राग्- भावाभ्यां तदनुपपत्तेः । न तृतीयः ; संयोगाद्यव्याप्यवृत्तित्वादिपक्षे गगनादौ संयोगाभावाभावयोस्तदभावात् । अव्याप्यवृत्तिधर्मानभ्युपगन्तृपक्षे भावाभावयोर्वृत्तौ प्रकारान्तराभावे प्रमाणाभावात् । नापि चतुर्थः ; स हि यदि निर्देष्टुं शक्यते, तदाऽपि भावप्रागभावयोर्भाव- प्रध्वंसयोर्व्वैकदाऽनभ्युपगमेन तद्विशेषितयोरपि एकदाऽवश्यमनभ्युपगन्तव्यतया कदा विरोधस्य तदाश्रयतेति वक्तुमशक्यत्वात् । किञ्च—भावप्रागभावयोर्भावप्रध्वंसयोर्वा यदि तथाभावोऽभ्युपगम्यते, तदाऽऽश्रयभेदप्रसङ्गः । अथ नाऽभ्युपगम्यते, तदा भावप्रागभावयोर्भावप्रध्वंसयोश्चा- विरोधापत्तिः । कारण भाव और अभाव का मिलितत्व एकदेश में वृत्तित्व है, एक प्रकार से वृत्तित्व है या इनसे भिन्न उपाधि विशेष से अवच्छिन्नत्व है ? प्रथम कल्प मानें, तो भाव और अत्यन्ताभाव का मिलितत्व नहीं होगा । द्वितीय कल्प मानें, तो भाव और तत्प्रागभाव-तत्प्रध्वंस का मिलितत्व नहीं होगा । तृतीय कल्प कहें, तो भी संयोगादि को अव्याप्यवृत्ति माननेवालों के मत में भी आकाश आदि में संयोग और तदभाव अवच्छेद (देश)-भेद से ही रहते हैं । अतः उनके मत में भी एकप्रकारेण भाव और तदभाव का मिलितत्व अप्रसिद्ध है । जो संयोगादि को व्याप्यवृत्ति मानते हैं, उनके मत में भाव और तद्भाव के वृत्तित्व में प्रकारान्तर (अवच्छेदक-भेद) मानने में कोई प्रमाण न होने से प्रकार में 'एक' विशेषण व्यर्थ है । इनसे अतिरिक्त किसी चतुर्थ कल्प का कथन तो हो ही नहीं सकता । यदि किसी प्रकार हो भी, तो वह युक्त नहीं है। कारण भाव और तत्प्रागभाव तथा भाव और तत्प्रध्वंसाभाव कभी एक काल में नहीं रहते। फिर प्रकार से भिन्न उपाधियों से युक्त भाव और तत्प्रागभाव एक काल में कैसे रहेंगे ? और यदि एक काल में नहीं रहते, तो वे विरोध के आश्रय या स्वरूप भी कैसे और कब होंगे ? किञ्च—यदि भाव, तत्प्रागभाव और भाव, तत्प्रध्वंस का विरोध मानें, तो रक्तरूप और तत्प्रागभाव के अधिकरण घट का भी भेद हो जायगा । भाव और तदत्यन्ताभाव ही परस्पर निषेधरूप हैं। यदि भाव और तद्ध्वंसाभाव तथा भाव और तत्प्रागभाव का परस्पर विरोध न मानें, तो दोनों का अविरोध होने से एक काल और एक अधिकरण में दोनों की प्रतीति हो जायगी ।