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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

परिच्छेद ] भावाभाव-विरोध का खण्डन ५४१ वृत्तिर्वा, वृत्तिप्रकारान्यैकोपाध्यवच्छेदो वा ? नाद्यः ; भावात्यन्ताभावयोस्तदभावात् । न द्वितीयः ; भावस्य प्रध्वंसप्राग्- भावाभ्यां तदनुपपत्तेः । न तृतीयः ; संयोगाद्यव्याप्यवृत्तित्वादिपक्षे गगनादौ संयोगाभावाभावयोस्तदभावात् । अव्याप्यवृत्तिधर्मानभ्युपगन्तृपक्षे भावाभावयोर्वृत्तौ प्रकारान्तराभावे प्रमाणाभावात् । नापि चतुर्थः ; स हि यदि निर्देष्टुं शक्यते, तदाऽपि भावप्रागभावयोर्भाव- प्रध्वंसयोर्व्वैकदाऽनभ्युपगमेन तद्विशेषितयोरपि एकदाऽवश्यमनभ्युपगन्तव्यतया कदा विरोधस्य तदाश्रयतेति वक्तुमशक्यत्वात् । किञ्च—भावप्रागभावयोर्भावप्रध्वंसयोर्वा यदि तथाभावोऽभ्युपगम्यते, तदाऽऽश्रयभेदप्रसङ्गः । अथ नाऽभ्युपगम्यते, तदा भावप्रागभावयोर्भावप्रध्वंसयोश्चा- विरोधापत्तिः । कारण भाव और अभाव का मिलितत्व एकदेश में वृत्तित्व है, एक प्रकार से वृत्तित्व है या इनसे भिन्न उपाधि विशेष से अवच्छिन्नत्व है ? प्रथम कल्प मानें, तो भाव और अत्यन्ताभाव का मिलितत्व नहीं होगा । द्वितीय कल्प मानें, तो भाव और तत्प्रागभाव-तत्प्रध्वंस का मिलितत्व नहीं होगा । तृतीय कल्प कहें, तो भी संयोगादि को अव्याप्यवृत्ति माननेवालों के मत में भी आकाश आदि में संयोग और तदभाव अवच्छेद (देश)-भेद से ही रहते हैं । अतः उनके मत में भी एकप्रकारेण भाव और तदभाव का मिलितत्व अप्रसिद्ध है । जो संयोगादि को व्याप्यवृत्ति मानते हैं, उनके मत में भाव और तद्भाव के वृत्तित्व में प्रकारान्तर (अवच्छेदक-भेद) मानने में कोई प्रमाण न होने से प्रकार में 'एक' विशेषण व्यर्थ है । इनसे अतिरिक्त किसी चतुर्थ कल्प का कथन तो हो ही नहीं सकता । यदि किसी प्रकार हो भी, तो वह युक्त नहीं है। कारण भाव और तत्प्रागभाव तथा भाव और तत्प्रध्वंसाभाव कभी एक काल में नहीं रहते। फिर प्रकार से भिन्न उपाधियों से युक्त भाव और तत्प्रागभाव एक काल में कैसे रहेंगे ? और यदि एक काल में नहीं रहते, तो वे विरोध के आश्रय या स्वरूप भी कैसे और कब होंगे ? किञ्च—यदि भाव, तत्प्रागभाव और भाव, तत्प्रध्वंस का विरोध मानें, तो रक्तरूप और तत्प्रागभाव के अधिकरण घट का भी भेद हो जायगा । भाव और तदत्यन्ताभाव ही परस्पर निषेधरूप हैं। यदि भाव और तद्ध्वंसाभाव तथा भाव और तत्प्रागभाव का परस्पर विरोध न मानें, तो दोनों का अविरोध होने से एक काल और एक अधिकरण में दोनों की प्रतीति हो जायगी ।

५४२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ अभावान्तरेऽपि सावकाशत्वात् न परस्परप्रतिषेधात्मकत्वम् । परस्परप्रति- षेधात्मकत्वं हि भावात्यन्ताभावयोरेव । तत्तदसत्त्वमात्रयोर्विरोधो न तु तत्तदसत्त्वविशेषयोरिति चेन्न । विशेषस्य तथाप्यविरोधात् कदाऽपि सहावस्थितियोग्यतापत्तेः । नियमेन तथात्वे च विरोधव्याघातात् । मात्रशब्देन च यदि विशेषशून्यत्वमसत्त्वस्योच्यते तदा तदनभ्युपगम एव प्रमाणाभावात् । नहि निर्विशेषासत्त्वमात्रसद्भावे प्रमाणमभिधातुं शक्यते । अथ मात्रशब्दोपादानं सत्यपि विशेषेऽसत्त्वस्य साधारणरूपपुरस्कारेण विरोध- व्यवस्थितिप्रदर्शनार्थं तदा भावप्रध्वंसयोस्तादृगेव दोषापत्तिः । प्रध्वंसादौ विशेषे सामान्यरूपस्यावश्याभ्युपगम्यत्वात् तदादायैव विशेषे विरोधपर्यवसानात् । किञ्च—घट और तत्प्रागभाव तथा घट और तत्प्रध्वंसाभाव परस्पर निषेधरूप भी नहीं हैं; कारण घट ध्वंसाभाव का निषेधरूप भी है तथा घटप्रागभाव भी घटध्वंस का निषेधरूप है । समर्थन—केवल भाव और सामान्यतः अभाव का विरोध है, भाव और विशेषरूप से अभाव का विरोध नहीं है । खण्डन—ऐसा मानने पर विशेष प्रागभावादि के साथ अविरोध होने से कदाचित् सह-अवस्थिति हो जायगी । यदि कहें, 'घट तत्प्रागभाव तथा घट तत्प्रध्वंस का स्वभाव है कि वे नियम से साथ नहीं रहते, तो 'इनमें विरोध नहीं है' इस कथन से व्याघात हो जायगा । किञ्च—यदि मात्रशब्दार्थ के बल पर सामान्य में विशेषशून्यत्व का प्रतिपादन करें, तो प्रमाण न होने से सामान्य असत्त्व का अभाव हो जायगा । कारण निर्विशेष सामान्य को असत्त्व में प्रमाण कह ही नहीं सकते । यदि मात्रशब्द का उपादान, विशेष के होने पर भी असत्त्व का सामान्यधर्म के पुरस्कार से विरोध-प्रदर्शन करने के लिए है, तो भाव और प्रध्वंस का भी सामान्य- रूपेण विरोध होने से अधिकरण का भेद हो जायगा । कारण प्रध्वंस आदि विशेषों में सामान्यरूप अवश्य होने के कारण उसी सामान्यरूप का ग्रहण कर विशेष (प्रध्वंसादि) में विरोध का पर्यवसान हो जायगा ।

परिच्छेद ] तर्क-सामान्य-लक्षण का खण्डन ५४३ तर्क-सामान्य-लक्षण-खण्डनम् भावाभावयोर्विरोधानभ्युपगमे तवाप्यनिष्टापत्तिरिति चेत्; केयमापत्तिः ? तर्कभेद इति चेत् ; अथ कस्तर्कः ? अभ्युपगतव्याप्यं प्रति व्यापकप्रसञ्जनं सः। तत्प्रसञ्जनं च स्वीकारार्हता- बोधनमिति चेन्न । अव्याप्तेः। अस्ति ह्यप्रसङ्गोऽपि सम्भावना नाम तर्कः। तद्यथा - 'यदि जलं सहकारिभिः सम्पत्स्यते तदा मे तृषं शमयिष्यती'ति; इष्टापादनेऽपि गतत्वाच्च। अनभ्युपगतव्यापकमित्यपीति चेन्न । तथाभूतमपि प्रत्यव्याप्यादव्यापकप्रस- ञ्जने गतत्वात् । व्याप्येनेत्यपि कार्यमिति चेन्न। विकल्पासहत्वात्—किं तर्क-सामान्य-लक्षण का खण्डन यदि कहें कि “इस तरह भाव और अभाव का विरोध ही न मानें, तो आप पर भी अनिष्ट की आपत्ति हो जायगी। अर्थात् अद्वैत से द्वैत का प्रतिक्षेप नहीं होगा; क्योंकि इनमें विरोध ही न रहा” तो कहिये, आपत्ति ही क्या वस्तु है ? यदि तर्कभेद (तर्कविशेष) है, तो वह तर्क ही क्या वस्तु है ? निर्वचन—‘जो व्याप्य का स्वीकार किये हों, उनके प्रति व्यापक का प्रसञ्जन तर्क है।’ व्यापक की स्वीकारार्हता का बोधन ही व्यापक का प्रसञ्जन है। खंडन—इस लक्षण की 'यदि जल सहकारी से सम्पन्न ( पीत ) हो, तो मेरी पिपासा की निवृत्ति करेगा' इस सम्भावनारूप तर्क में अव्याप्ति हो जायगी। यदि कहें कि प्रसङ्गरूप तर्क का ही यह लक्षण है, सम्भावनात्मक तर्क का नहीं, अतः सम्भावना के लक्ष्य ही न होने से उसमें लक्षण का न जाना अव्याप्ति नहीं है, तो जहाँ व्यापक वह्नि इष्ट ( प्रथम से सिद्ध ) है, वहां 'यदि धूम है, तो वह्नि अवश्य है' आदि इष्टापादनरूप तर्काभास-स्थल में अतिव्याप्ति हो जायगी। समर्थन—‘जो व्याप्य का स्वीकार करे और व्यापक का स्वीकार न करता हो, ऐसे पुरुष के प्रति व्यापक का प्रसञ्जन तर्क है।' खण्डन—उस पुरुष के प्रति भी 'यदि इन्धन है, तो वह्नि अवश्य है' इस स्थल में, जहां अव्याप्य से व्यापक का प्रसञ्जन है, अतिव्याप्ति हो जायगी। समर्थन—लक्षण में 'व्याप्य से व्यापक का प्रसञ्जन तर्क है' यह भी निवेश

५४४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ परमार्थतो व्याप्यव्यापकभावव्यवस्थितयोः स्वरूपेणेष्टानिष्टत्वम्, उत व्याप्य- व्यापकयोर्भावेन तत् ? नाद्यः ; तथात्वाज्ञातेन वैपरीत्येनेष्टेनापि प्रसञ्जने प्रसङ्गात् । अन्यथा परै- स्तथात्वेनानङ्गीकृतेन स्वयमपि परान्प्रति तथात्वेन व्युत्पादयितुमशक्तेन परमार्थत- स्तथाभूतेन प्रसञ्जने जयप्रसङ्गात् । न द्वितीयः ; स्वयमपि तथेष्टानिष्टतायां सत्यां कृते तादृशि प्रसङ्गे 'यत्रोभयो- रि'त्यादिना दोषेण सत्प्रसङ्गतया अनिष्टेऽपि गततयाऽतिव्यापकत्वात् । कर देंगे, तो उक्त स्थल में अतिव्याप्ति नहीं होगी। खंडन—यह लक्षण भी विकल्प सहने में असमर्थ होने से अयुक्त है। देखिये—क्या जिनमें वस्तुसत् व्याप्यव्यापकभाव हो, उनका स्वरूपतः अभ्युपगम-अनभ्युपगम लक्षण का घटक है अथवा व्याप्यत्व से और व्यापकत्वरूप से अभ्युपगम-अनभ्युपगम लक्षण में प्रविष्ट है ? प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, कारण जहाँ धूम और वह्नि का वस्तुतः विद्यमान भी व्याप्य-व्यापकभाव ज्ञात न हो, वहाँ भी धूम से वह्नि का प्रसञ्जन तर्क हो जायगा। अर्थात् वहाँ अन्यतर के प्रति व्याप्ति सिद्ध न होने से शिथिल-मूल होने के कारण वास्तव में वह तर्काभास ही है, तर्क नहीं। अतः उक्त स्थल में अतिव्याप्ति हो जायगी। किञ्च— जहां धूम में ही व्यापकत्व तथा वह्नि में व्याप्यत्व का भ्रम है, वहां भी वस्तुतः धूम व्याप्य होने से धूम के अभ्युगम से वह्नि का प्रसञ्जन तर्क हो जायगा। यदि आपाद्यनिरूपित व्याप्ति आपादक में न मानकर वस्तुभूत ही व्याप्यत्व-व्यापकत्व को प्रसङ्ग का मूल मानें, तो जहां वादी व्याप्यव्यापकभाव नहीं मानता और उसके सामने स्वयं ( प्रतिवादी ) भी व्याप्यव्यापकभाव का प्रतिपादन नहीं कर सकता, पर वस्तुतः व्याप्यव्यापकभाव है, वहां भी व्याप्य से व्यापक के प्रसङ्ग द्वारा प्रतिवादी की विजय हो जानी चाहिए। किन्तु होती है पराजय ही। द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं है; कारण जहाँ वादी के तुल्य प्रतिवादी स्वयं भी व्याप्य का अभ्युपगम और व्यापक का अनभ्युपगम करता हो, वहां 'यदि सत्ता सद्- व्यवहारविषय हो, तो सत्तावती हो जायगी' इस प्रसङ्ग में अतिव्याप्ति हो जायगी। स्वमत में भी सत्ता में सत्ता का अस्तित्व अनिष्ट होने से यह तर्काभास है, तर्क नहीं है। कारण 'यत्रोभयोः समो दोषः' इस न्याय के अनुसार जो दोष दोनों मतों में है, उसका एक मत में आपादन नहीं कर सकते।

परिच्छेद ] तर्क-सामान्यलक्षण का खण्डन ५४५ स्वयं व्याप्यतयाऽनिष्टेनेत्यपि विशेषणीयमिति चेन्न । स्वयमपि व्याप्य- तयेष्टेन स्वमात्रेष्टव्यापके विषये प्रसङ्गस्याव्यापनात् । अथ स्वयमनिष्टव्यापके स्वयं व्याप्यतयेष्टेन यन्न भवति, तत्रानभ्युपगत- व्यापकं परं प्रति पराभ्युपगतेन व्याप्येन व्यापकप्रसञ्जनं तर्कः । एवं सति हि स्वानिष्टव्यापके स्वयमिष्टव्याप्येन यत्र प्रसङ्गस्तत्र गमनादतिव्याप्तिर्या, या च स्वमात्रेष्टव्यापके स्वयमपि व्याप्यतयेष्टेन प्रसङ्गस्याव्याप्तिस्ते निरस्ते भवत इति चेन्न । 'यद्यत्र सत्ताऽपि घटोऽभविष्यत्तदाऽद्रक्ष्यदि'त्याद्यव्यापनात् । तत्र स्वयम- समर्थन—'जो पुरुष व्याप्य का स्वीकार करता हो और वही व्यापक का अस्वीकार करता हो, उसके प्रति स्व द्वारा अस्वीकृत व्याप्य से व्यापक का प्रसञ्जन तर्क है ।' यदि सत्ता सद्व्यवहार-विषय हो, तो सत्तावती हो जायगी' इस स्थल में सत्ता में सद्- व्यवहार-विषयत्वरूप व्याप्य स्व द्वारा इष्ट ही है, अनिष्ट नहीं। अतः वहाँ अतिव्याप्ति नहीं है । खंडन—जहाँ नैयायिक स्व द्वारा व्याप्यत्वरूप से इष्ट प्रमेयत्व से स्वमात्र द्वारा [ ईश्वरादि प्रत्यक्षविषय होने से ] इष्ट प्रत्यक्षरूप व्यापक का मीमांसक के प्रति 'यदि अदृष्ट प्रमेय हो, तो प्रत्यक्ष हो जायगा' इस प्रकार प्रसञ्जन करता हो, वहां अव्याप्ति हो जायगी । कारण उक्त स्थल में व्याप्य स्व द्वारा अनिष्ट नहीं है, अतः उक्त लक्षण का समन्वय नहीं होता । समर्थन—'स्व से अनिष्ट व्यापक का स्व से इष्ट व्याप्य द्वारा जो प्रसञ्जन है, उससे भिन्न ( अर्थात् अनभ्युपगत है व्यापक जिस पुरुष से, उसके प्रति पर द्वारा अभ्युपगत व्याप्य से व्यापक का ) प्रसञ्जन तर्क है । ऐसा लक्षण करने पर 'यदि सत्ता सद्व्यवहार-विषय हो, तो सत्तावती हो जायगी' इस असत्-प्रसङ्ग में स्व से भी अनिष्ट व्यापक का स्व से इष्ट व्याप्य द्वारा प्रसङ्ग होने से तद्भिन्नत्व न होने के कारण अतिव्याप्ति नहीं होगी । 'स्व द्वारा अस्वीकृत व्याप्य से' यह निवेश न होने के कारण 'यदि अदृष्ट प्रमेय हो तो प्रत्यक्ष हो जायगा' इस सत्प्रसङ्ग में अव्याप्ति भी नहीं होगी । कारण नैयायिक ( स्व ) द्वारा अदृष्ट में प्रत्यक्षत्व ( व्यापक ) इष्ट होने से भिन्नान्त लक्षण भी समन्वित हो जायगा । खण्डन—'यदि यहां घट विद्यमान होता तो दीखता' इस प्रसङ्ग में अव्याप्ति हो जायगी, कारण यहां स्व से इष्ट : ६६

५४६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ निष्ठदर्शनरूपव्यापके स्वयं व्याप्यतयेष्टेनैव हि दर्शनयोग्येन घटसत्त्वेनासौ प्रसङ्गः । अथ तत्र सत्त्याऽपि स्वयमनिष्टेनेति निषेध्यकोटौ प्रविश्य निषेधोऽभिधी- यते--एवं यत्र भवतीति । तदपि न ; एवम्भूते एव विपर्ययापर्यवसायिनि गततयाऽतिव्यापकत्वात् । विपर्ययपर्यवसायिनेत्यपि प्रक्षेप्यमिति चेन्न । केवलपरपक्षदूषणाय पर- मात्राभ्युपगम्यमानव्याप्यत्वेन एवंक्षमस्य परं प्रति व्यापकप्रसञ्जनस्याव्यापनात् । तत्र स्वयं व्याप्त्यनभ्युपगमेन विपर्ययपर्यवसायित्वासम्भवात् । स प्रसङ्ग एव न भवति, विरोधमात्रं तदिति चेन्न । अनिष्टं व्याप्याभ्युप- गमबलेन परं प्रत्यापाद्यत इत्येवम्भूतस्यार्थस्य उभयत्रापि तुल्यत्वात् । तुल्यत्वेऽपि सत्त्वरूप व्याप्य द्वारा ही स्व से अनिष्ट दर्शनरूप व्यापक का प्रसञ्जन होने से भिन्नान्त लक्षणभाग समन्वित नहीं होता । समर्थन--'स्व से अनिष्ट व्यापक का स्व द्वारा सत्त्वरूप से तथा व्याप्य- त्वरूप से जो इष्ट हो, उससे जो प्रसञ्जन, उससे भिन्नत्व' ऐसा लक्षण में निवेश करने पर उक्त स्थल में अव्याप्ति नहीं होगी । कारण उक्त स्थल में स्व द्वारा सत्त्वरूप से घट इष्ट न होने से भिन्नान्त का समन्वय नहीं होता । खण्डन--ऐसा निवेश करने पर 'यदि ब्रह्म वेदैकमम्य हो, तो अग्निहोत्र के तुल्य अस्वप्रकाश हो जायगा' इस विपर्यय-अपर्यवसानी असत्प्रसङ्ग में अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन--उक्त लक्षण के विशेष्य दल में 'विपर्यय-पर्यवसायी' यह विशेषण देने पर उक्त अतिव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन--उक्त विशेषण देने पर केवल परपक्ष के दूषण के लिए परमात्र द्वारा अभ्युपगम्यमान व्याप्य से परपक्ष के दूषण में क्षम व्यापक का पर के प्रति जो प्रसञ्जन होगा, उसमें अव्याप्ति हो जायगी । अर्थात् 'यदि ब्रह्म को जगत् का उपादान मानें, तो मिट्टी के तुल्य वह भी विकारी हो जायगा' इस सत्प्रसङ्ग में अव्याप्ति हो जायगी । कारण नैयायिक के मत में निर्विकार आकाश शब्द का उपादान होने से यहां विपर्यय में पर्यवसान नहीं है । समर्थन--'यदि ब्रह्म को उपादान मानें, तो वह विकारी हो जायगा' ऐसा प्रसञ्जन तर्क ही नहीं है, कारण जिस प्रसंग ( तर्क ) का विपर्यय में पर्यवसान न हो, उसे हम प्रसंग ही नहीं मानते । उक्त स्थल में 'उपादानत्वरूप व्याप्य ब्रह्म में है, तो व्यापक विकारित्व के न होने में विरोध होगा' इस तरह हम केवल विरोध का

परिच्छेद ] तर्क-सामान्यलक्षण का खण्डन ५४७ लक्षणकरणासामर्थ्याद्यदि विपर्ययपर्यवसायिन्येव प्रसङ्गत्वं त्वया परिभाष्येत, तर्हि मया परबाधमात्र एव प्रसङ्गतायाः, विपर्ययपर्यवसायिनि तु तत्र विरोधतायाः परिभाषितुं शक्यत्वात् ! अन्यथा विरोधत्वमेवोभयोरपि स्यात् । प्रत्यवस्थानवैचित्री चेत्तत्र विरोधाद्विशेषः, साऽत्रापि तुल्यैव । अत एव सम्भावनाऽपि तर्कादिन्यैवेति निरस्तम् ; आरोपादपि व्याप्यता- निमित्तव्यापकाभ्युपगमाविशेषात् । अत एव परप्रमितेनेति विशिष्य परानिष्टापादनमात्ररूपविपर्ययापर्यव- उद्भावन ही करते हैं । एवञ्च वहाँ अव्याप्ति ही कहाँ है ? खंडन—व्याप्य के अभ्युपगम के बल पर पर के प्रति अनिष्ट ( व्यापक ) का आपादनरूप अर्थ तो दोनों स्थलों में तुल्य ही है । इस प्रकार तुल्य-प्रसङ्ग होने पर भी लक्षण करने में असमर्थ होने के कारण यदि आप केवल विपर्ययपर्यवसायी स्थल में ही प्रसङ्गत्व का व्यवस्थापन करें, तो हम भी ऐसी परिभाषा ( संकेत ) कर सकते हैं कि जहां 'केवल परपक्ष का बाध है, वहीं प्रसङ्गत्व है और जहाँ विपर्यय में पर्यवसान हो, वहां विरोध है ।' यदि हमारी यह परिभाषा न मानें, तो [ विशेष न होने से ] दोनों स्थलों में विरोध ही मानिये । यदि कहें कि वहाँ की अपेक्षा विपर्यय में पर्यवसानरूप विरोध विशेष है, तो हम भी कह सकते हैं कि पराभ्युपगत व्याप्य से अनिष्ट व्यापक का प्रसञ्जन दोनों स्थलों में तुल्य होने से उक्त वैचित्र्य अकिञ्चित्कर है । अतएव “यदि जल सहकारी से सम्पन्न हो, तो तृषा की शान्ति करे' यह सम्भावना प्रसङ्गरूप न होने से तर्क नहीं है,” यह कथन भी युक्त नहीं है । कारण सम्भावना प्रसंगरूप न होकर आरोपरूप होने पर भी व्याप्य के अभ्युपगम से व्यापक के अभ्युपगम में दोनों स्थलों में कोई विशेष नहीं है । इसीलिए 'पराभ्युपगत व्याप्य से' इसके स्थान पर 'परप्रमित व्याप्य' ऐसा निवेश कर जहाँ पर के प्रति अनिष्ट का आपादन है, परन्तु विपर्यय में पर्यवसान नहीं है, वहां तर्कलक्षण की अतिव्याप्ति का निरास करना चाहिए' यह कथन भी अयुक्त है । कारण जहां विपर्यय में अपर्यवसान है, वहाँ परमार्थतः व्याप्ति न होने पर भी

५४८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्ये [ चतुर्थ सायितर्कता निरस्येति निरस्तम् । परमार्थतो व्याप्त्यभावेऽपि पराभ्युपगम- मादाय प्रसङ्गप्रवृत्तेरुपपत्तेः । कथं हि परेण व्याप्यतयाऽनुमतात्तं प्रति व्यापकानुमत्या नाऽऽपतितव्यम् । नहि प्रसङ्गो वास्तवत्वं व्याप्तेरवलम्बते । किं नाम ? अभ्युपगममात्रम् । अनभ्युपगतौ वस्तुगत्या स्थितेनापि तेनाऽऽपादनाप्रवृत्तेः । अत एव परस्य प्रमाणेन व्याप्यानुमितिमृत्पाद्याप्यापादनं क्रियते । वस्तुगत्या व्याप्यत्वं तथात्वेनाभ्युपगतत्वं च द्वयमपि प्रसङ्गस्याङ्कमिति चेन्न । तथात्वेनाभ्युपगमस्यावश्यं प्रसङ्गाङ्गतया मन्तव्यस्य परानपेक्षस्यैव समर्थत्वे वास्तवव्याप्तत्वस्यापि प्रवेशने प्रमाणाभावात् । तस्माद्यः प्रसङ्गः स्वपक्षसिद्ध्यङ्गं तस्य विपर्ययापर्यवसायिता दोषायैव स्यात् । प्रसङ्गस्य तस्य विपर्ययपर्यवसानदार्ढ्यार्थं दण्डतयोपन्यासात् , पर के अभ्युपगममात्र से यदि अनिष्ट का प्रसङ्ग हो, तो उसे अलक्ष्य मानना अयुक्त है । जब उक्त स्थल में पर व्याप्य का अभ्युपगम करता है, तब उसके प्रति व्यापक का भी आपादन क्यों न हो ? कारण प्रसङ्ग व्याप्ति के वास्तवत्व की अपेक्षा नहीं करता, किन्तु व्याप्ति के अभ्युपगममात्र की अपेक्षा करता है । यदि व्याप्ति का अभ्युपगम न हो, तो वस्तुस्थित व्याप्ति से भी प्रसङ्ग नहीं होता । अत- एव जहाँ वादी विशिष्ट व्याप्ति को नहीं मानता, वहाँ भी पर के प्रति व्याप्य की अनु- मिति कराकर व्यापक का आपादन किया जाता है । समर्थन—वस्तुतः व्याप्ति और व्याप्ति का अभ्युपगम दोनों प्रसङ्ग के कारण हैं। अतः जहां वस्तुतः व्याप्ति नहीं है, वहां विरोधमात्र है, प्रसङ्ग नहीं । खंडन—व्याप्यत्वरूपेण व्याप्य के अभ्युपगम को प्रसंग का आवश्यक अंग ( कारण ) मान लेने पर तो वह इतर की अपेक्षा के बिना भी प्रसंग-करण में समर्थ हो सकता है । फिर वास्तव व्याप्ति को भी प्रसंग का कारण मानने में कोई प्रमाण नहीं है । तस्मात् जो प्रसङ्ग स्वपक्षसिद्धि का अङ्ग है, उसकी विपर्यय में अपर्यवसायिता दोष ही होगा । कारण उसका उपन्यास विपर्यय में पर्यवसानरूप स्वपक्ष की दृढता के लिए विपक्ष के बाधनाथं दण्डरूप से ही होता है । जैसे—बौद्धों के मत में सत्त्व में क्षणिकत्व की व्याप्ति के साधनार्थ, 'सत्त्व रहे, पर क्षणिकत्व न रहे' यह व्यभिचार-शङ्का होने पर

परिच्छेद ] तर्क-सामान्यलक्षण का खण्डनं ५४६ सौगतानां सत्त्वक्षणिकत्वव्याप्तिसाधकविपर्ययान्यथाभावदण्डप्रसङ्गवत् । तामन्त- रेण तस्य स्वपक्षसाधनाक्षमत्वात् , तस्य च व्याप्तिवास्तवत्वमपि मन्तव्यम् । अन्यथा विपर्ययेऽपि व्याप्त्यभावेन स्वपक्षसाधनाक्षमत्वादेव । यस्तु प्रसङ्गः परपक्षबाधनाङ्गं तत्र पराभ्युपगममात्रं प्रयोजकम् । तावतैव परपक्षप्रतिक्षेपक्षमत्वेन वास्तवव्याप्तिविपर्ययपर्यवसानपर्यन्तानुसारित्वादिति युक्तं पश्यामः । तथाच सति कथितलक्षणासङ्गतिस्तदवस्थैव । अथ व्याप्याभ्युपगमेनानिष्टस्य व्यापकस्य प्रतीतिस्तर्कइति चेन्न । इष्टार्थसम्भा- वनायामव्याप्तेः । तेन व्यापकस्य प्रतीतिः स इति चेन्न । इष्टापादनेऽपि गतत्वात् । अप्रमितस्य तथेति चेन्न । प्रथमानुमानेऽपि गतत्वात् । अनुमाने व्याप्यस्य उसके बाधन के लिए 'यदि क्षणिकत्व न हो, तो सत्त्व भी नहीं रहेगा' ऐसा प्रसङ्ग उपन्यस्त होता है । जबतक विपर्यय में पर्यवसान न हो, तबतक वह प्रसङ्ग स्वपक्ष- साधन में समर्थ ही नहीं हो सकता । इसी तरह वहां वास्तव व्याप्ति भी माननी चाहिए, अन्यथा विपर्यय में भी व्याप्ति न होने से वह स्वपक्ष का साधक नहीं होगा । एवञ्च जो प्रसङ्ग परपक्ष के बाधन के कारण हैं, उनमें पराभ्युपगममात्र प्रयोजक है । क्योंकि पर के अभ्युपगममात्र से ही परपक्ष का खण्डन हो जाने के कारण वास्तविक व्याप्ति और विपर्ययपर्यवसान तक अनुसरण करने में कुछ भी फल न होने से व्याप्ति आदि का अननुसरण ही हमें उचित दीखता है । ऐसा मानने पर यदि तर्कलक्षण में 'विपर्ययपर्यवसायी' यह विशेषण दें, तो 'यदि ब्रह्म उपादान हो तो विकारी हो जायगा' इस स्थल में, जहाँ विपर्यय में पर्यवसान नहीं है, अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'व्याप्य के अभ्युपगम से अनिष्ट व्यापक की प्रतीति तर्क है' ऐसा कहेंगे । खण्डन—'यदि जल सहकारी से सम्पन्न हो, तो तृषा की शान्ति करे' यहाँ अव्याप्ति हो जायगी । यदि 'अनिष्ट' विशेषण न दें, तो भी जहाँ इष्ट वह्नि का धूम से आपादान है, वहाँ अतिव्याप्ति हो जायगी । । समर्थन—'व्याप्य के अभ्युपगम से अप्रमित व्यापक की प्रतीति तर्क है' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—धूम से वह्नि की प्रथम अनुमिति में अतिव्याप्ति हो जायगी; कारण वह्नि अनुमिति से पूर्व अप्रमित ही है । समर्थन—अनुमान-स्थल में धूम की प्रमा से वह्नि की अनुमिति होती है, अभ्यु- पगम से नहीं । लक्षण में तो अभ्युपगम का निवेश है, अतः वहाँ अतिव्याप्ति नहीं

५५० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्यं [ चतुर्थ प्रमया तथा, न त्वभ्युपगमेनेति चेन्न । वस्तुगत्या व्याप्यस्य प्रमयाऽपि प्रतिवाद्य- सिद्धस्य व्यापकानुमानासम्भवेन तत्राप्यभ्युपगमपर्यन्तं गन्तव्यत्वादेव । नन्वेवमन्यतरासिद्धं व्याप्यं प्रसाध्य अनुमानव्यवस्थापनमुच्छिन्नम् । तदप्रसा- धनेऽन्यतरासिद्ध्या, तत्प्रसाधने परस्याभ्युपगन्तुरपसिद्धान्तात् । अपसिद्धान्तमनु- द्भाव्य वादिना प्रसाधितात् व्याप्यात् व्यापकसाधने पर्यनुयोज्योपेक्षणादिति । किं तत्र तथा न स्यात्, किमत्राप्रस्तुतया तच्चिन्तया ? अन्यतरासिद्धस्य तावद्व्याप्यस्याभ्युपगमं परेणाकारयित्वैव न व्यापकसाधनमुपेयम् । तस्याप्रमा स इति चेन्न । मिथोविरुद्धादौ तर्काभासेऽपि गतत्वात् । आश्रया- सिद्ध्यादिव्यतिरेके सतीति चेन्न । सन्दिग्धधूमदर्शनात् । यद्यत्र धूमस्तदाऽग्नि- होगी । खंडन— वस्तुतः जहाँ व्याप्ति की प्रमा तो है; परन्तु प्रतिवादी व्याप्य का अभ्यु- पगम नहीं करता, वहाँ अनुमान नहीं होता । अतः अनुमिति में भी व्याप्य के अभ्युपगम को कारण मानना ही होगा । एवञ्च पूर्वोक्त अतिव्याप्ति तदवस्थ ही है । • समर्थन—यदि अनुमिति में व्याप्ति के अभ्युपगम को कारण मानें, तो अन्यतर के प्रति असिद्ध व्याप्य का प्रसाधनकर अनुमिति-साधन की प्रक्रिया का ही उच्छेद हो जायगा । कारण यदि व्याप्य का साधन न करें, तो उसकी अन्यतर के प्रति असिद्धि होने से अनुमिति नहीं होगी । यदि साधन करें, तो पर के लिए व्याप्य के अभ्युपगम से अपसिद्धान्त हो जायगा । उक्त अपसिद्धान्त का उद्भावन न करने पर 'वादि द्वारा साधित व्याप्य से व्यापक के साधन में पर्यनुयोज्य अपसिद्धान्त की उपेक्षारूप निग्रह हो जायगा । खंडन— अन्यतरासिद्ध व्याप्य-स्थल में उक्त प्रकार से अनुमान का उच्छेद निश्चित है । किन्तु उस अप्रस्तुत की चिन्ता से यहाँ क्या लाभ है ? अन्यतर के प्रति असिद्ध व्याप्य का अभ्युपगम बिना कराये व्यापक का साधन स्वीकार्तव्य नहीं है । अतः उस अनुमिति में तर्कलक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'व्याप्य के अभ्युपगम से अप्रमित व्यापक की अप्रमा तर्क है।' खण्डन—मिथो-विरुद्ध आदि तर्काभासों में अतिव्याप्ति हो जायगी । अर्थात् 'यदि शुक्तिरूप्य प्रतीयमान हो, तो वह सत् हो जायगा' और 'सत् होने पर भी यदि

परिच्छेद ] तर्क-सामान्यलक्षण का खण्डन ५५१ मानिति सम्भावनायाः परमार्थतस्तथार्थावस्थानात् । प्रमात्वं त्यक्तुमपारयन्त्या अव्यापनात् । तत्कालं प्रमात्वेनाप्रमीयमाण इत्यपीति चेन्न । बहुशो दत्तोत्तरत्वात् । सर्वस्य चास्य पूर्वोक्तोभयानिष्टव्यापकेष्टव्याप्योदाहरणे गतत्वेनातिव्यापकत्वात् । तद्व्यवच्छेदार्थमारोपितस्य व्याप्यस्याभ्युपगमेनेति करणे च सिद्धेन उसका बाध मानें, तो असत् हो जायगा' इस सत् और असत् के परस्पर विरोधरूप तर्काभास में अतिव्याप्ति हो जायगी' । समर्थन—लक्षण में 'आश्रयासिद्धादिभिन्नत्व ( मिथोविरुद्धानि-भिन्नत्व ) का निवेश करने पर उक्त स्थल में अतिव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन— संदिग्ध धूम-दर्शन से जहाँ 'यदि वहाँ धूम है तो अग्नि भी है' ऐसी सम्भावना होती है, वस्तुतः वह्नि होने से प्रमारूप उस सम्भावना में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'व्याप्य के अभ्युपगम से व्यापक की उस काल में प्रमात्वरूप से अप्रमी- यमाण प्रतीति तर्क है' ऐसा कहेंगे। खंडन—यह लक्षण भी 'तत्-शब्दघटित होने से अननुगत हो जायगा । इसी तरह 'वादी द्वारा प्रमितत्वरूप से अप्रमीयमाण है या प्रतिवादी द्वारा ?' इस विकल्प से कवलित होने से भी यह लक्षण असङ्गत है । किञ्च—जहाँ सत्ता में दोनों के व्यापक ( सत्ता ) अनिष्ट हैं और व्याप्य इष्ट हैं, वहां 'यदि सत्ता सद्द्व्यवहारविषय हो, तो सत्तावती हो जायगी' इस असत्प्रसङ्ग में अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'आरोपित व्याप्य के अभ्युपगम से व्यापक की प्रतीति तर्क है' ऐसा कहेंगे । उक्त स्थल में व्याप्य का आरोप नहीं, किन्तु विद्यमानता है; अतः अति- 'मिथोविरुद्धादौ' का सदसद् के परस्पर विरोधरूप तर्काभास, यह अर्थ 'विद्यासागरी' का है । 'शारदाकार लिखते हैं कि "शब्दो यदि अनित्यो न स्यात्, कृतको न स्यात्' और 'शब्दो यदि नित्यो न स्यात्, श्रावणो न स्यात्' ये दोनों जो सत्प्रतिपक्ष की तरह परस्पर विरुद्ध तर्काभास हैं, उनमें अतिव्याप्ति हो जायगी । परस्पर परामर्शो का प्रतिबन्ध होने से इनकी फलभूत अनुमितियों के न होने पर भी उक्त तर्काभासों के होने में कोई बाधक नहीं है । विपर्ययापर्यवसायी तर्क- विशेष का संग्रह करने के लिए आप वस्तुसत् व्याप्ति की विवक्षा कर ही नहीं सकते, अतः इसका अभाव कहकर इस अतिव्याप्ति का वारण नहीं हो सकता।" 'मिथोविरुद्धादौ' यहाँ आदिपद से आश्रयासिध्यादि का ग्रहण है । अतएव 'आश्रयासिद्धादिभ्यतिरेके सति' यह कहना संगत है ।

५५२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ- व्याप्येन प्रसङ्गस्याव्यापनात् । तद्यथा—कार्यत्वात् यद्यदृष्टसृष्टमङ्कुरादि मीमांसकः शंसति, तदानीमविशेषेण कर्तृकार्यमपि पर्यवस्येदस्य तदिति । अपिच—आत्माश्रयोऽन्योन्याश्रयश्चक्रकं व्याघातोऽनवस्था प्रतिबन्दी चेत्यापाद्यैर्भिद्यमाना षट्‌तर्कीष्यते । स्वरूपं चैषां स्वस्याव्यवहितस्वापेक्षण- मात्माश्रयः, अन्योन्यस्याऽव्यवहितान्योन्यापेक्षित्त्वमन्योन्याश्रयः, अन्तरितस्य तदेव द्वयमात्माश्रयोऽन्योन्याश्रयश्चक्रकम्, विरुद्धसमुच्चयो व्याघातः, उपपाद्योपपादकप्रवाहोऽनवधिरनवस्था, स्वाभ्युपगतदोषतुल्यता प्रतिबन्दी । तत्र आत्माश्रयस्य सम्बन्धद्वारभेदादाभासत्वम् । यथा प्रमेयत्वस्याऽऽत्मनि वृत्तौ । क्वचिन्नैवमपि । यथा—अनेककालस्थस्य घटस्य पूर्वकालवृत्त्यात्मन उत्तरकालवृत्त्यात्मानं प्रति कारणत्वे । व्याप्ति नहीं होगी । खण्डन—यदि उक्त लक्षण में आरोपितत्व व्यापक विशेषण दें, तो जहाँ मीमांसक के प्रति नैयायिक अङ्कुरादि में विद्यमान 'कार्यत्व' रूप व्याप्य से 'कर्तृसृष्टत्व' रूप व्यापक का प्रसङ्ग करता है, अर्थात् 'यदि अंकुरादि कार्य हैं तो अदृष्ट- सृष्ट के तुल्य कर्तृजन्य भी हैं' ऐसा तर्क करता है, तो उसमें अव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—आपाद्य के भेद से तर्क छः प्रकार के माने गये हैं । यथा—आत्मा- श्रय, अन्योन्याश्रय, चक्रक, व्याघात, अनवस्था और प्रतिबन्दी । इनके लक्षण क्रमशः इस प्रकार हैं—अपने ज्ञान के लिए जहाँ अव्यवहित पूर्वक्षण में अपने ज्ञान की अपेक्षा हो, वह आत्माश्रय है । अन्योन्याश्रय अन्योन्य द्वारा अव्यवधान से अन्योन्य की अपेक्षा- रूप है । व्यवधान से स्व के द्वारा स्व की अपेक्षा या व्यवधान से अन्योन्य द्वारा अन्योन्य की अपेक्षा चक्रक है। विरुद्ध दो धर्मों का एक धर्मी में समुच्चय व्याघात है । अवधि से रहित उपपाद्य-उपपादक का प्रवाह अनवस्था है । एक पक्ष द्वारा दिये गये दोष की अपर पक्ष में तुल्यता प्रतिबन्दी है । इनमें आत्माश्रय-दोष सम्बन्धरूप व्यापार के भेद से आभास है । जैसे— प्रमेयत्व में प्रमेयत्व के रहने से । अर्थात् घट में प्रमेयत्व घटत्वप्रकारक-प्रमाविषय- त्वरूप है और प्रमेय में प्रमेयत्वप्रकारक-प्रमाविषयत्वरूप है; अतः घटप्रमा और प्रमेयत्व- प्रकारकप्रमारूप ज्ञानों के भेद होने से आत्माश्रय दोष नहीं होता । कहीं-कहीं आत्माश्रय आभास नहीं, प्रत्युत दोष ही होता है । जैसे—'अनेककालवृत्तिर्घटः' इत्याकारक ज्ञान- काल में उत्तरकालवृत्ति घटज्ञान के प्रति पूर्वकालवृत्ति घटज्ञान कारण होने से वहाँ आत्माश्रय दोष ही है ।

परिच्छेद ] तर्कसामान्यलक्षण का खण्डन ५५३ अन्योन्याश्रयस्य व्यक्तिभेदात् । यथा—ज्ञानेन संस्कारस्य, तेन च ज्ञानस्य जनने । चक्रकस्यापि तस्मात् । यथा—बीजेनाऽङ्कुरस्तेन स्तम्बः, तेन बीजं जन्यत इत्यत्र । व्याघातस्य उपाधिभेदात् । यथा—कालभेदादिना जननाजननादौ । अनवस्थायाः क्रियायै परस्परानन्त्यानपेक्षणात् । यथा—सामग्र्या कार्य- जननाय स्वसामग्र्यानन्त्यानपेक्षणे । तामेतामधोधावन्तीमनवस्थामाचक्षते । क्वचिन्नेवमपि । यथा—स्वाश्रये भिन्नबुद्धिजननाय स्वगतभेदानुपजीवनादपि व्यक्ति-भेद से अन्योन्याश्रय भी कहीं-कहीं आभास होता है । जैसे—ज्ञान से संस्कार और संस्कार से ज्ञान की उत्पत्ति में । यहां संस्कार अनुभव- रूप ज्ञान से उत्पन्न होता और स्मरणरूप ज्ञान को उत्पन्न करता है; अतः अनुभव और स्मृतिरूप व्यक्तियों के भेद से अन्योन्याश्रय दोष नहीं, आभास ही हैं। चक्रक भी व्यक्ति-भेद से आभास होता है। जैसे—बीज से अंकुर और अंकुर से स्तम्ब और स्तम्ब से बीज की उत्पत्ति में। यहां बीजरूप व्यक्तियों का भेद है। व्याघात भी देश-कालरूप निमित्त-भेद से आभास होता है। जैसे—कुसूल (कोठिला) में स्थित बीज में अजनकत्व और क्षेत्रस्थ बीज में जनकत्वरूप विरुद्ध दो धर्म देश और काल-भेद से रहते हैं। अतः ऐसे स्थलों में व्याघात आभास है। जहाँ कार्योत्पत्ति में परस्पर आनन्त्य की अपेक्षा नहीं होती, वहाँ अनवस्था आभास होती है। जैसे—कार्य सामग्री से और वह सामग्री भी अपनी सामग्री से ही उत्पन्न होती है; कारण वह कादाचित्क है और जो कादाचित्क होता है, वह जन्य होता है। इस प्रकार एक से एक के जन्य होने से कार्य-कारण की अन- वधि धारा होने पर भी कार्योत्पत्ति में कार्य की सामग्री को अपनी सामग्री की अपेक्षा न होने से यह अनवस्था आभास है। कारण कार्योत्पत्ति में सामग्री की सामग्री अन्यथा- सिद्ध हुआ करती है। पण्डित लोग इस अनवस्था को नीचे की ओर दौड़नेवाली अनवस्था कहते हैं। कहीं अनवस्था आभास नहीं भी होती। जैसे—घट और घटभेद में भिन्नत्व-व्यवहार का साम्य होने पर भी घट में भिन्नत्व-बुद्धि के लिए १. कुसूलस्थ बीज में स्वरूपयोग्यातारूप कारणत्व होने पर भी यहाँ 'अजनकत्व' शब्द से फलोपधायकतारूप जनकत्वाभाव विवक्षित होने से वह तो उसमें नहीं ही है। ७०

५५४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [चतुर्थ भेदस्याऽऽनन्त्ये, प्राग्लोपादिदोषात् । तामेतामूर्ध्वं धावन्तीमनवस्थामाचक्षते । प्रतिबन्द्या विशेषात् । यथा—धूमानुमानेऽप्युपाधिशङ्काप्रतिबन्द्यां तर्कानुकूलत्वादिति । तदेषामापादनानि तर्काभासाः कथमुक्तलक्षणेन न सङ्ग्राह्याः, सत्यपि व्याप्याद्यदोषे प्रसङ्गस्थानगतेन तेन तेन विशेषेणाऽऽभासीभूतत्वात् । प्रसङ्गस्थाने तावतां विशेषाणामभावेनापि लक्षणं विशेषणीयमिति चेन्न । भेदगत भेद की अपेक्षा नहीं होती। यदि उसकी अपेक्षा मानें, तो 'प्राग्लोप, विनि- गमनाविरह और प्रमाणाभाव हो जायगा। पण्डित लोग इस अनवस्था को ऊपर की ओर दौड़नेवाली अनवस्था कहते हैं। प्रतिबन्दी भी एक पक्ष में अनुकूल तर्क रहा, तो आभास हो जाती है। जैसे 'शब्दः अनित्यः कृतकत्वात्' यह अनुमिति [ उपाधि-शङ्का होने से मीमांसक के मत में ] सन्दिग्धोपाधि है। यदि नैयायिक यहां 'यदि संदिग्धोपाधित्वं स्यात्तदा धूमानुमितावपि स्यात्' इस प्रकार प्रतिबन्दी दे, तो मीमांसक कह सकता है कि धूमानुमिति में कार्य-कारणभावरूप विशेष (तर्क) है, अतः यह प्रतिबन्दी आभास है। इन आत्माश्रय आदि के आभासों में उक्त तर्कलक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी। 'जो वस्तु है, वह स्वाश्रय नहीं है और परस्परापत्तिसिद्धिक भी नहीं है' इत्यादि व्याप्ति होने से ये सब तर्क ही हैं", ऐसा भी नहीं कह सकते। कारण सम्बन्ध, द्वारभेद आदि तत्-तत् विशेष से उनके आभासत्व का प्रतिपादन हम पीछे कर ही आये हैं। समर्थन—'आभासत्व के कारण उन सभी विशेषों का जहां अभाव हो, वहाँ आरोपित व्याप्य से व्यापक का प्रसञ्जन तर्क है' ऐसा निवेश करने पर उक्त आभास- स्थलों में अतिव्याप्ति नहीं होगी। खण्डन—यदि ऐसा निवेश करें, तो अन्योन्याश्रय अथवा चक्रक में आत्माश्रय के आभासत्व का प्रयोजक सम्बन्ध, द्वारभेद ही है, उसका १. अवश्य-क्लृप्त वस्तु के स्वीकार से ही काम चल जाने पर अक्लृप्त वस्तु का अस्वीकार ही 'प्राग्लोप' है। एक कालमें सम्बद्ध अनेक पदार्थों के निर्वाहा-निर्वाहकभावरूप सम्बन्ध का अनिश्चय ही यहाँ विनिगमनाविरहरूप से विवक्षित है। एक ही पदार्थ में पारस्परिक निर्वाहकत्व संभव होने पर अनेक पदार्थों की कल्पना का अभाव प्रमाणापगम है। यह विषय प्रत्यक्षादि- बाधोद्धार-प्रकरण में 'प्राग्लोपाविनिगम्यत्वं' इस कारिका ( १६ ) में विशेष रूप से विवेचित है।

१परिच्छेद ] तर्क-विशेष-लक्षणों का खण्डन ५५५ अन्योन्याश्रयाभासत्वप्रयोजकस्य व्यक्तिभेदस्याभावो नानवस्थायाम्, एवमात्मा- श्रयाभासत्वप्रयोजकस्य द्वारभेदस्याभावो नाऽऽत्माश्रयान्तरादाविति व्यक्तम- व्यापकत्वापत्तेः । अपिच - अपसिद्धान्तविरोधादिष्वपि तर्कलक्षणं गच्छत्कथङ्कारं वारणीयम् ? यत्रैवं निग्रहे तर्कान्तराणामन्तर्भावः, तत्रैवानयोरपीति पृथक्निग्रहत्वानुपपत्तेः । तर्क-विशेषलक्षण-खण्डनम् आत्माश्रयादेश्च मूलव्याप्तौ प्रमाणोपगमश्चेत्तर्हि प्रामाणिकत्वान्न दोषत्वम्, न चेन्मूलशैथिल्यमित्युभयतः पाशबन्धः कथं मोचनीयः । अथोच्येत—यदेतदाश्रयत्वमाश्रयित्वं च तद्भेदे दृष्टं तद्यदि विवादाध्या- अभाव नहीं है। अतः अन्योन्याश्रय आदि में अव्याप्ति हो जायगी। इसी प्रकार एक आत्माश्रय के आभासत्वप्रयोजक द्वार-भेद का अभाव अन्य आत्माश्रय में नहीं है, अतः वहाँ भी अव्याप्ति हो जायगी। किंच - 'यदि संस्कारस्थिरत्वं स्वीकृतं बौद्धेन तदा अपसिद्धान्तः स्यात्' इस अपसिद्धान्त के आपादन में तथा 'यदि अस्थिरत्वं कथयित्वा स्थिरत्वं कथ्यते बौद्धेन तदा वचनविरोधः स्यात्' इस वचन-विरोध के आपादन में अतिव्याप्ति भी हो जायगी। यदि इनको तर्क मान लें, तो आत्माश्रयादि के तुल्य इनकी भी तर्क में ही गणना होनी चाहिए, पृथक् निग्रह-स्थानों के रूप में नहीं। यदि तर्क होने पर भी इनकी निग्रहस्थान में गणना करें, तो आत्माश्रयादि तर्कों की भी निग्रह में ही गणना होनी चाहिए। यदि आत्माश्रयादि का किसी निग्रहस्थान में अन्तर्भाव हो, तो उसी निग्रह- स्थान में अपसिद्धान्त आदि का भी अन्तर्भाव होना चाहिए, पृथक् गणना सर्वथा व्यर्थ है। तर्क-विशेष-लक्षणों का खण्डन किञ्च—आत्माश्रयादि तर्कों की मूल व्याप्ति में कोई प्रमाण है या नहीं ? यदि है, तो प्रामाणिक होने से आत्माश्रय को दोष ही न कहना चाहिए। यदि व्याप्ति में कोई प्रमाण नहीं, तो मूल के शैथिल्य से वह तर्क ही नहीं है—इस प्रकार उभयतः पाशबन्ध (दोतरफा दोष) से पिण्ड कैसे छुड़ायेंगे ? समर्थन—'यदि स्वस्य स्वापेक्षित्त्वं स्यात्तदा आत्माश्रयः स्यात्' इस प्रकार हम यहाँ आत्माश्रय का आपादन नहीं करते, जिससे उसके प्रामाणिकत्व-अप्रामाणिकत्व के विकल्प

५५६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ सिते त्रयोपेयेते, तदा भेदः स्यादित्याकारेण आपादने नोक्तदोषापत्तिरिति । मैवम् ; एकत्र द्वयस्यापि दृष्टत्वात् । तदाश्रयत्वं तदाश्रितत्वं च मिथो भेदनियमितमिति चेन्न । तन्मिथः- शब्दाभ्यां क्षारीकृतत्वात् । एतदाश्रयत्वादेतदाश्रितत्वाद्वा नैकत्वं स्यादिति वचनभङ्ग्या आपाद्यमिति चेत् । मैवम्; यद्येतदेतदाश्रयादि स्यात्तदैतन्न स्यादिति हथापाद्यम्। न चैतद्युक्तम्, धर्म्यापाद्ययोर्व्याहतत्वात् । की गुंजाइश हो । प्रत्युत यहाँ का आपादन-प्रकार यह है—'यह जो आश्रयत्व और आश्रितत्व है, वह भेद में देखा गया है, यदि उसे आप विवाद-विषय में भी मानें तो भेद हो जायगा।' इस प्रकार आत्माश्रय का आपादन करने पर उक्त दोष नहीं होगा । खंडन—एक ही घट में रूप की अपेक्षा आश्रयत्व और भूतल की अपेक्षा आश्रितत्व दोनों का समावेश होने से उक्त प्रकार से भी आपादन नहीं हो सकता । समर्थन—'तदाश्रयत्व और तदाश्रितत्व भेद से नियत हैं, अर्थात् दोनों के अधिकरण भिन्न ही रहेंगे; अतः यदि वे विवाद-विषय में हों, तो भेद हो जायगा' इस प्रकार आपादन करने पर उक्त घटस्थल में व्यभिचार नहीं होगा । खंडन—यह कथन भी लक्षण में 'तत्' और 'मिथः' शब्दों का प्रवेश होने से खण्डित है । अर्थात् आत्माश्रयस्थलीय वस्तुमात्र में अनुगतरूप कोई धर्म नहीं है, जिसके कारण वस्तुमात्र को तद्शब्द से कहें। यदि कथञ्चित् कहें भी, तो उक्त घटस्थल में व्यभिचार तदवस्थ ही है। यदि तद्-शब्द को एकव्यक्तिपरक मानें, तो लक्षण का अनुगम नहीं होगा । इसी प्रकार मिथः-शब्द को यदि परस्परमात्राभिधायक मानें, तो इष्टापत्ति होगी; कारण हम घट-पटादि का परस्पर भेद मानते ही हैं। यदि विशेषाभिधायक मानें, तो अननुगम हो जायगा। समर्थन—'यदि इसमें एतदाश्रयत्व और एतदाश्रितत्व दोनों हों, तो एकत्व न होगा' इस प्रकार आपादन करेंगे । अर्थात् 'तद्' या 'एतद्' शब्द एकव्यक्तिपरक ही हैं और लक्ष्यभेद से लक्षण का भेद इष्ट ही है। लक्षण-भेद होने पर भी लक्ष्य- ज्ञानरूप लक्षण का प्रयोजन सिद्ध हो ही जाता है । खंडन—इस तरह तो आपके आपादन का आकार यह हुआ—'यदि एतत् एतदाश्रय हो, तो एतत् न होगा।' किन्तु वह युक्त नहीं, कारण 'एतत् एतत् न होगा' इस कथन में धर्मी (एतत्) और आपाद्य या विधेय (एतद् न) दोनों में व्याघात हो जायगा।

परिच्छेद ] तर्क-विशेष-लक्षणों का खण्डन ५५७ न च वाच्यमापाद्यस्य प्रमाणबाध्यताऽनुकूलैवेति व्याघातादपि सा सम्भ- वन्ती न दोषमावहतीति ; यत आपाद्यापादकयोः सामानाधिकरण्यानादरेऽति- प्रसङ्गः स्यादतो विपर्ययापर्यवसायित्वमेवं स्यात् । एवं हि विपर्ययो वक्तव्यो यन्नाम ? भवति चैतदेतत्, तस्मान्नैतदाश्रय इति । न चैतदेतद् भवितुं शक्नोति, एतदित्युद्दिष्टे धर्मिण्‍येतत्त्वविधानासम्भवात्, उद्देश्यविधेययोः प्रकारभेदस्याभावात् । न च प्रसङ्गमात्रमेतद्भाधायैवास्तु, कृतमस्य विपर्ययपर्यवसानेनेति युक्तम् । समर्थन—आत्माश्रय आदि तर्क परपक्ष-दूषण के लिए ही हैं, उनमें आपाद्य के व्याघात आदि से जायमान प्रमाणबाध्यता आदि दोष नहीं, गुण ही हैं। खण्डन—एत- दाश्रयत्व और एतदाश्रितत्व तो आपादक हैं और अनेकत्व आपाद्य । इन दोनों के सामानाधिकरण्य का यदि अनादर करें, तो एकत्व से अभिमत वस्तुमात्र में एकत्व का भङ्ग हो जायगा । कारण अन्यत्र स्थित उक्त आपादक से सर्वत्र भेद का आपादन हो सकेगा । इसके लिए यदि सामानाधिकरण्य का आदर करें, तो विपर्यय में पर्यव- सान नहीं होगा, जिससे वह तर्काभास हो जायगा । कारण विपर्यय में पर्यवसान इसी प्रकार करेंगे कि ‘एतद्घटः एतद्घटो भवति, तस्मान्न एतद्घटाश्रयः ।’ किन्तु यह संभव नहीं। कारण एतद्-धर्मी में एतत्त्व का विधान¹ नहीं हो सकता, क्योंकि सर्वत्र उद्देश्य-विधेय के सामानाधिकरण्य के लिए उनमें प्रकारभेद का नियम है और यहाँ प्रकारभेद है नहीं । समर्थन—आत्माश्रय आदि केवल परपक्ष के बाधन के लिए ही हैं। अतः इनमें विपर्यय-पर्यवसान व्यर्थ है । स्वपक्षसाधनार्थ प्रयुक्त प्रसंग में ही विपर्यय- पर्यवसायित्व अपेक्षित हुआ करता है। खण्डन—आत्माश्रयादि प्रसङ्गों के मूल में आपको भी व्याप्ति माननी ही होगी। अन्यथा ¹मूलशैथिल्य होने से वह तर्काभास हो जायगा । एवञ्च आपादित (प्रसंजित) अनेकत्व के निषेध (एकत्व) में तद्व्यतिरेक (व्यतिरेकव्याप्ति) को प्रामाणिक अवश्य मानना चाहिए । कारण अन्वय-व्याप्ति १. यदि कहें कि ‘पर-पक्षबाधनस्थल में पर द्वारा स्वीकृत ही व्याप्ति को लेकर काम चला लेंगे; तो मूलशैथिल्य कहाँ होगा ?’ तो वह भी ठीक नहीं। उसका (प्रसंग का) कभी स्वपक्षसाधनत्वेन भी उपयोग किया ही जाता है। उस समय उसमें व्याप्ति न मानें, तो मूलशैथिल्य स्पष्ट ही है । किञ्च—स्वयं व्याप्ति न मानें, तो अन्यतर द्वारा असिद्ध आपादक भी आभास का ही प्रयोजक हो जायगा ।

५५८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थे स्वयमपि प्रसङ्गमूलस्य व्याप्तेरिष्टतया प्रसञ्जितनिषेधे तद्व्यतिरेकप्रामाणिकत्वस्य अवश्यमन्तव्यत्वापत्तेः । अत एव 'एतदन्यत्स्यादि'त्यपि न शक्यप्रसञ्जनम्, एतदन्यत्वस्य एतत्स्वरूप- भेदमादायैव प्रतीतिपर्यवसायितया प्रसङ्गे व्याघातादेव । विपर्ययोऽप्येतद्विशेषिता- न्यविशेषितान्यत्वविधायिनो विशेषणविशेषणताप्रविष्टमात्मानमात्मनि विधीयमानं न क्षमते ; एतदनन्यत्वस्यैतदन्यान्यत्वस्यैतत्त्वादेव अन्यत्वावधेरात्मन उपलक्षणत्वे चान्यत्वमात्रमुपलक्ष्यमाणमन्यस्मादपि अन्यत्वमादाय पर्यवस्येत् । स्वरूपत एव विलक्षणमन्यत्वविशेषमवधिरात्मोपलक्षयतीति च न घटते ; यतोऽन्यत्वमात्रमेवावधिविशेषैरुपधीयमानं तदन्यत्वप्रत्ययव्यवहारोपपादकं व्यतिरेक-व्याप्ति की व्यापिका होती है और विपर्यय-पर्यवसान के बिना व्यतिरेक-व्याप्ति का ग्रह नहीं होगा । समर्थन—'यदि आश्रयत्व और आश्रितत्व दोनों इसमें हों, तो यह इससे अन्य हो जायगा' इस प्रकार आत्माश्रय का आपादन करें, तो कोई हानि नहीं है । खंडन— आपादन का यह प्रकार भी युक्त नहीं; कारण 'एतदन्यत्व' का भी एतत्-स्वरूप के भेद में ही पर्यवसान होने से 'एतत् एतदन्यत् स्यात्' इस प्रकार के प्रसङ्ग में भी धर्मी और आपाद्य में व्याघात पूर्ववत् ही है । इसी तरह इस प्रसंग का विपर्यय में पर्यवसान भी नहीं बन सकता; कारण 'एतत् एतदन्यत् न' इत्याकारक प्रसंग का एतत् में एतदन्यान्यत्व का विधान करनेवाला विपर्यय विशेषण ( एतद्विशेषितान्यत्व ) के विशेषणरूप से प्रविष्ट स्वात्मा ( एतत्त्व ) के भी विधीयमानत्व को सह नहीं सकता । कारण एतदनन्यत्व और एतदन्यान्यत्व दोनों ( उद्देश्य-विधेय ) एतत्स्वरूप ही हैं । समर्थन—'एतत् एतदन्यत् न भवति' इस विपर्यय में अन्यत्व में एतत्त्व यदि विशेषण होता, तब तो उक्त कथन युक्त न होता । किन्तु एतत्त्व उपलक्षण है, अतः उक्त कथन युक्त ही है । खण्डन—यदि एतद् के अर्थ घट को अन्यत्व में उपलक्षण मानें, तो उद्देश्य घट में पट से अन्यत्व होने से फिर भी 'एतत् अन्यत् न' इस प्रकार विपर्यय में पर्यवसान न होगा । समर्थन—एतत् अन्यत्वमात्र का उपलक्षण नहीं, किन्तु अन्यत्व-विशेष अर्थात् वस्प्रतियोगिक भेद का उपलक्षण है । एवञ्च स्वप्रतियोगिक अन्यत्व का अन्यत्व एतत्-पदवाच्य उद्देश्य में होने से विपर्यय में पर्यवसान हो ही जायगा । खण्डन—

परिच्छेद ] तर्क-विशेष-लक्षणों का खण्डन ५५६ भवदन्यत्वव्यक्तिभेदपर्यन्तगमनं प्रमाणस्य न सहते । यदि चान्यत्वव्यक्ति- भेदोऽपि स्यात्तथापि प्रसङ्गमूलभूता व्याप्तिः सामान्याकारपुरस्कारित्वात् एतेनैवो- पधीयमानानामन्यत्वव्यक्तीनामैक्यमादाय प्रवृत्ता तथैव प्रसङ्गे विपर्यये चोपनयन्ती स्यादेवोक्तदोषालङ्घनायेति । एवं प्रकारता चाऽऽश्रयाश्रयिभाववत् प्रकारान्तराश्रयेष्वपि आत्माश्रयोदाहरणे- ष्वतिदिश्यते । अन्योन्याश्रयो यथा—भेदेनावगताद्भेदज्ञानोपगमे, सोऽपि त्वया कथङ्कार- ऐसा कहा जा सकता, यदि प्रतियोगी भेद से अन्यत्व का भेद होता । किन्तु अन्यत्व का भेद है नहीं, कारण आकाश की तरह अन्यत्व एक होने पर भी घट-पटप्रति- योगिरूप उपाधियों के भिन्न होने से घटाकाश, मठाकाश की तरह 'घटो न, मठो न' इत्यादि प्रतीतियों के भेदों की उपपत्ति हो सकती है। फिर प्रतियोगी भेद से अन्यत्व का भेद क्यों माना जाय ? यदि किसी प्रकार अन्यत्वव्यक्ति का भेद मान भी लें, तब भी उपलक्षण-कल्प में निर्वाह नहीं हो सकता । कारण उक्त प्रसङ्ग का मूल (कारण) व्याप्ति सामान्यरूप से प्रवृत्त होती है । एवञ्च वह एतत्त्व से उपलक्षित अनन्त अन्यत्व-व्यक्तियों के ऐक्य का ग्रहण करके ही होगी । अतः वह एतत्त्व से उपलक्षित अन्यत्वरूप से प्रसङ्ग तथा विपर्यय में प्राप्त होगी । तथाच उक्त दोष का लंघन (निवारण) नहीं हो सकता । अर्थात् पट का अन्यत्व घट मे रहने से उक्त प्रसङ्ग हो ही नहीं सकता । इसी प्रकार 'स्वस्मात् स्वं जायते' इत्यादि आत्माश्रय-प्रकारों में भी दोष जानने चाहिए । कारण वहां भी 'स्व यदि स्व से उत्पन्न हो, तो स्व से अन्य हो जायगा' ऐसा ही आपादन-आकार होने से व्याघात और विपर्यय में अपर्यवसान स्पष्ट है । आत्माश्रय की तरह अन्योन्याश्रय भी तात्त्विक नहीं । कारण तार्किक अन्योन्याभाव वहीं मानते हैं, जहां [अभाव भाव का प्रतियोगी रूप होने तथा प्रतियोगी से अनालिङ्गित अभाव की प्रतीति न होने से ] भेदज्ञानजन्य प्रतियोगिज्ञान से भेद का ज्ञान और प्रतियोगिज्ञानजन्य भेदज्ञान से प्रतियोगी का ज्ञान माना जाता है । किन्तु आप उसका उपन्यास कैसे करेंगे ? 'यदि भेद, भेदज्ञान के अधीन जो प्रतियोगिज्ञान, उसके अधीन ज्ञान का विषय होता, तो ज्ञान का विषय न होता' इस प्रकार आपादन तो हो नहीं सकता । कारण प्रतियोगिज्ञानाधीन ज्ञान का विषय भेद अन्यत्र

५६० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ मुपन्यसनीयः ? न तावत् 'यद्येतत् एतद्बोधाधीनबोधं स्यात्तदा न बुद्धयेते'ति । तथा सति व्याप्त्यसिद्धेः, एतद्बोधाधीनबोधं यत्तद्बोधाधीनबोधस्य तस्यैवा- दृष्टचरत्वात् । कयाचन व्याप्यव्यापकभेदकल्पनया व्यभिचाराप्रतीतचरत्वयोर्वारणेऽपि अतथाभावशङ्काखण्डकदण्डदुर्लभत्वात् । एवमन्योन्याश्रयान्तरेऽपि । चक्रकं च मध्ये परन्तर्भाव्य आत्माश्रयान्योन्याश्रयावेव विपरिणमत इति तद्दोषं नातिक्रामति । व्याघातस्तु यथा—सन्नास्तीत्यत्र । तमपि कथं प्रयोक्ष्यसे ? यदि 'यद्ययं सन् स्यात्तदानीमसन्न स्यादि'ति ; तर्हि 'असन्न स्यादि'त्यस्यापि 'सन् स्यादित्य'- स्मिन्नेवार्थे पर्यवसानादभेदेन व्याप्यव्यापकभावस्यैवासिद्ध्यापत्तिः । दृष्ट है या नहीं ? यदि दृष्ट है तो 'न बुद्ध्येते' इस आपाद्य ( व्यापक ) के वहाँ न होने से व्यभिचार है । यदि दृष्ट नहीं है, तो धर्मी के अज्ञान से आपाद्य ( ज्ञानावि- षयत्व ) तथा आपादक ( भेदज्ञानाधीन जो प्रतियोगिज्ञान, तदधीन ज्ञानविषयत्व ) दोनों का सामानाधिकरण्य न होने से व्याप्ति का ग्रहण ( ज्ञान ) ही नहीं होगा । एवञ्च शिथिल-मूल होने से वह तर्क नहीं, तर्काभास हो जायगा । समर्थन—'जो वस्तु होती है, वह परस्पराधीनसिद्धिक नहीं होती; जैसे—घट- द्वय' इस प्रकार हम सामान्यमुखी व्याप्ति मानते ही हैं । एवञ्च विशेषरूप से भेद की अज्ञानदशा में भी व्याप्ति का ग्रह हो ही जायगा और व्यभिचार भी नहीं होगा । खंडन —आपादन का यह प्रकार भी युक्त नहीं । कारण ॰ 'वस्तुत्व रहे और परस्पराधीनबोधत्व का अभाव न रहे, तो क्या हानि है' इस प्रकार व्यभिचार-शङ्का होने पर उसका निवर्तक अनुकूलतर्क नहीं है । इसी प्रकार अन्यान्य अन्योन्याश्रयों में भी दोष जानने चाहिए । मध्य में अन्य को देकर आत्माश्रय तथा अन्योन्याश्रय ही चक्रकरूप में परिणत होता है । अतः चक्रक भी उन दोनों के दोषों का उल्लंघन नहीं कर सकता । तथान वह भी तर्क नहीं, तर्काभास ही है । व्याघात भी 'सन् नास्ति' इस स्थल में तार्किक बतलाते हैं । किन्तु उसका भी आपादन कैसे होगा ? 'यदि यह सत् है तो असत् नहीं है' इस प्रकार आपादन तो हो नहीं सकता । कारण 'असत् न' इसका भी फलितार्थ 'सत्' ही है और अभेद