संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
पृष्ठ 100, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 100
| ९० | * कूर्मपुराण * |
|---|
| रजोह्यश्चोर्ध्वबाहुश्च सवनश्चानघस्तथा।<br>सुतपाः शुक्र इत्येते सप्त पुत्रा महौजसः॥ १३॥<br><br>योऽसौ रुद्रात्मको वह्निर्ब्रह्मणस्तनयो द्विजाः।<br>स्वाहा तस्मात् सुतान् लेभे त्रीनुदारान् महौजसः॥ १४॥<br><br>पावकः पवमानश्च शुचिरग्निश्च ते त्रयः।<br>निर्मथ्यः पवमानः स्याद् वैद्युतः पावकः स्मृतः॥ १५॥<br><br>यश्चासौ तपते सूर्यः शुचिरग्निस्त्वसौ स्मृतः।<br>तेषां तु संततावन्ये चत्वारिंशच्च पञ्च च॥ १६॥<br><br>पावकः पवमानश्च शुचिस्तेषां पिता च यः।<br>एते चैकोनपञ्चाशद् वह्नयः परिकीर्तिताः॥ १७॥<br><br>सर्वे तपस्विनः प्रोक्ताः सर्वे यज्ञेषु भागिनः।<br>रुद्रात्मकाः स्मृताः सर्वे त्रिपुण्ड्राङ्कितमस्तकाः॥ १८॥<br><br>अयज्वानश्च यज्वानः पितरो ब्रह्मणः स्मृताः।<br>अग्निष्वात्ता बर्हिषदो द्विधा तेषां व्यवस्थितिः॥ १९॥<br><br>तेभ्यः स्वधा सुतां जज्ञे मेनां वैतरणीं तथा।<br>ते उभे ब्रह्मवादिन्यौ योगिन्यौ मुनिसत्तमाः॥ २०॥<br><br>असूत मेना मैनाकं क्रौञ्चं तस्यानुजं तथा।<br>गङ्गा हिमवतो जज्ञे सर्वलोकैकपावनी॥ २१॥<br><br>स्वयोगाग्निबलाद् देवीं लेभे पुत्रीं महेश्वरीम्।<br>यथावत् कथितं पूर्वं देव्या माहात्म्यमुत्तमम्॥ २२॥<br><br>एषा दक्षस्य कन्यानां मयापत्यानुसंततिः।<br>व्याख्याता भवतामद्य मनोः सृष्टिं निबोधत॥ २३॥ | रज, ऊह, ऊर्ध्वबाहु, सवन, अनघ, सुतपा और शुक्र—(नामवाले) ये (वसिष्ठके) सात महान् ओजस्वी पुत्र थे। द्विजो! ब्रह्माका रुद्रस्वरूप जो वह वह्नि नामक पुत्र था, उससे स्वाहाने महातेजस्वी तीन उदार पुत्रोंको प्राप्त किया। वे तीनों पावक, पवमान तथा शुचि (नामवाले) अग्नि थे। मन्थनद्वारा उत्पन्न अग्निको पवमान और विद्युत्से सम्बद्ध अग्निको पावक कहा जाता है। जो यह सूर्य चमकता है वही शुचि अग्नि कहलाता है। उन (तीनों अग्नियों)—की पैंतालीस संतानें हुईं। (इस प्रकार) पावक, पवमान तथा शुचि (नामक तीन अग्नियाँ) और इन तीनोंके पिता (रुद्रात्मक अग्नि) एवं (उन तीनों अग्नियोंके पैंतालीस पुत्र) ये सभी मिलाकर उनचास अग्नियाँ कही गयी हैं। ये सभी (उनचास) तपस्वी कहे गये हैं, सभी यज्ञभागके अधिकारी हैं, रुद्रात्मक कहलाते हैं और सभी मस्तकपर त्रिपुण्ड्रके चिह्नसे अङ्कित रहते हैं॥ १३-१८॥<br><br>ब्रह्माके अग्निष्वात्त तथा बर्हिषद् नामक दो पुत्र कहे गये हैं जो पितर हैं। उनमें अयज्वा (यज्ञ न करनेवाले) तथा यज्वा (यज्ञ करनेवाले)-के रूपमें दो प्रकारकी व्यवस्था है। मुनिश्रेष्ठो! स्वधाने उनके द्वारा मेना और वैतरणी नामक दो पुत्रियोंको प्राप्त किया। वे दोनों ही ब्रह्मवादिनी और योगिनी थीं। मेनाने मैनाक और उसके अनुज क्रौञ्च (नामक पर्वत)-को जन्म दिया। हिमालयसे समस्त लोकोंको पवित्र करनेमें अद्वितीय गङ्गा उत्पन्न हुईं। (हिमालयने) अपनी योगाग्निके बलसे (उन) देवी महेश्वरीको पुत्री-रूपमें प्राप्त किया, जिन देवीके उत्तम माहात्म्यको भलीभाँति पहले बता दिया गया है॥ १९-२२॥<br><br>मैंने प्रजापति दक्षकी कन्याओंकी संतान-परम्पराका आप लोगोंसे वर्णन किया। अब आप (स्वायम्भुव) मनुकी सृष्टिका वर्णन सुनें॥ २३॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें बारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १२॥