संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* अध्याय १३ * | ९१
तेरहवाँ अध्याय
स्वायम्भुव मनुके वंशका वर्णन, चाक्षुष मनुकी उत्पत्ति, महाराज पृथुका आख्यान, पृथुका वंश-वर्णन, पृथुके पौत्र 'सुशील' का रोचक आख्यान, सुशीलको हिमालयके 'धर्मपद' नामक वनमें महापाशुपत श्वेताश्वतर मुनिके दर्शन तथा उनसे पाशुपत-व्रतका ग्रहण, दक्षके पूर्वजन्मका वृत्तान्त तथा पुनः दक्ष प्रजापतिके रूपमें आविर्भावकी कथा, दक्षद्वारा शंकरका अपमान, सतीद्वारा देह-त्याग तथा शंकरका दक्षको शाप
सूत उवाच
प्रियव्रतोत्तानपादौ मनोः स्वायम्भुवस्य तु।
धर्मज्ञौ सुमहावीर्यौ शतरूपा व्यजीजनत्॥ १ ॥
ततस्तूत्तानपादस्य ध्रुवो नाम सुतोऽभवत्।
भक्तो नारायणे देवे प्राप्तवान् स्थानमुत्तमम्॥ २ ॥
ध्रुवात् श्लिष्टं च भव्यं च भार्या शम्भुर्व्यजायत।
श्लिष्टेराधत्त सुच्छाया पञ्च पुत्रानकल्मषान्॥ ३ ॥
वसिष्ठवचनाद् देवी तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम्।
आराध्य पुरुषं विष्णुं शालग्रामे जनार्दनम्॥ ४ ॥
रिपुं रिपुञ्जयं विप्रं वृकलं वृषतेजसम्।
नारायणपरान् शुद्धान् स्वधर्मपरिपालकान्॥ ५ ॥
**सूतजी बोले—**स्वायम्भुव मनुकी पत्नी शतरूपाने प्रियव्रत तथा उत्तानपाद नामवाले दो पुत्रोंको जन्म दिया, जो धर्मको जाननेवाले तथा महान् पराक्रमी थे। कालान्तरमें उत्तानपादका ध्रुव नामक पुत्र हुआ। भगवान् विष्णुके उस भक्तने उत्तम स्थान प्राप्त किया। ध्रुवकी शम्भुनामक पत्नीने श्लिष्ट तथा भव्य नामक पुत्रोंको जन्म दिया। श्लिष्टकी सुच्छाया नामक पत्नीने पाँच पुण्यात्मा पुत्रोंको उत्पन्न किया। महर्षि वसिष्ठके कथनानुसार सुच्छाया नामक देवीने अत्यन्त कठोर तप करके शालग्राममें जनार्दन पुरुष विष्णुकी आराधना कर रिपु, रिपुञ्जय, विप्र, वृकल तथा वृषतेजस् नामवाले पाँच पुत्रोंको जन्म दिया, जो नारायणमें अनन्य निष्ठा रखनेवाले, शुद्ध तथा अपने धर्मका विशेषरूपसे पालन करनेवाले थे॥ १—५॥
रिपोराधत्त बृहती चक्षुषं सर्वतेजसम्।
सोऽजीजनत् पुष्करिण्यां वैरिण्यां चाक्षुषं मनुम्।
प्रजापतेरात्मजायां वीरणस्य महात्मनः॥ ६ ॥
मनोरजायन्त दश नड्वलायां महौजसः।
कन्यायां सुमहावीर्या वैराजस्य प्रजापतेः॥ ७ ॥
ऊरुः पूरुः शतद्युम्नस्तपस्वी सत्यवाक् शुचिः।
अग्निष्टुदतिरात्रश्च सुद्युम्नश्चाभिमन्युकः॥ ८ ॥
ऊरोरजनयत् पुत्रान् षडाग्नेयी महाबलान्।
अङ्गं सुमनसं स्वातिं क्रतुमङ्गिरसं शिवम्॥ ९ ॥
अङ्गाद् वेनोऽभवत् पश्चाद् वैन्यो वेनादजायत।
योऽसौ पृथुरिति ख्यातः प्रजापालो महाबलः॥ १० ॥
येन दुग्धा मही पूर्वं प्रजानां हितकारणात्।
नियोगाद् ब्रह्मणः सार्धं देवेन्द्रेण महौजसा॥ ११ ॥
रिपुकी पत्नी बृहतीने सब प्रकारके तेजोंसे सम्पन्न चक्षुष् (नामक पुत्र)-को जन्म दिया। उस चक्षुष्ने महात्मा वीरण प्रजापतिकी पुष्करिणी* नामवाली पुत्रीसे चाक्षुष मनुको जन्म दिया। अत्यन्त तेजस्वी (चाक्षुष) मनुके वैराज प्रजापतिकी कन्या नड्वलासे दस पुत्र उत्पन्न हुए, जो ऊरु, पूरु, शतद्युम्न, तपस्वी, सत्यवाक्, शुचि, अग्निष्टुत्, अतिरात्र, सुद्युम्न तथा अभिमन्युक (नामवाले) थे। ऊरुकी पत्नी आग्नेयीने अङ्ग, सुमनस्, स्वाति, क्रतु, अङ्गिरस् एवं शिव (नामवाले) महाबलशाली छः पुत्रोंको उत्पन्न किया। अङ्गसे वेन हुआ और फिर वेनसे वैन्य उत्पन्न हुए। प्रजापालक, महाबलवान् वे ही वैन्य पृथु नामसे विख्यात हुए। पूर्वकालमें उन्होंने प्रजाओंके कल्याणकी कामनासे ब्रह्माके आदेशसे महा-तेजस्वी देवराज इन्द्रके साथ (गोरूपा) पृथ्वीका दोहन किया था॥ ६—११॥
* यह पुष्करिणी प्रजापति वीरणकी पुत्री होनेसे वैरिणी भी कही जाती है।