भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

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९२ * कूर्मपुराण *


वेनपुत्रस्य वितते पुरा पैतामहे मखे।<br>सूतः पौराणिको जज्ञे मायारूपः स्वयं हरिः ॥ १२ ॥<br><br>प्रवक्ता सर्वशास्त्राणां धर्मज्ञो गुणवत्सलः ।<br>तं मां वित्त मुनिश्रेष्ठाः पूर्वोद्भूतं सनातनम् ॥ १३ ॥<br><br>अस्मिन् मन्वन्तर व्यासः कृष्णद्वैपायनः स्वयम्।<br>श्रावयामास मां प्रीत्या पुराणं पुरुषो हरिः ॥ १४ ॥<br><br>मदन्वये तु ये सूताः सम्भूता वेदवर्जिताः ।<br>तेषां पुराणवक्तृत्वं वृत्तिरासीदजाज्ञया ॥ १५ ॥प्राचीन कालमें वेनके पुत्र पृथुके पैतामह नामक यज्ञ करते समय मायारूपधारी साक्षात् विष्णु ही पौराणिक सूतके रूपमें उत्पन्न हुए। वे सभी शास्त्रोंके प्रवक्ता, धर्मको जाननेवाले तथा वात्सल्यगुणसे सम्पन्न थे। मुनिश्रेष्ठो! प्राचीन कालमें आविर्भूत वही सनातन (विष्णु) मुझे जानो। इस मन्वन्तरमें स्वयं कृष्णद्वैपायन व्यास नामक पुराणपुरुष विष्णुने प्रीतिपूर्वक मुझे पुराण सुनाया। मेरे वंशमें वेदवर्जित जो सूत उत्पन्न हुए, ब्रह्माकी आज्ञासे 'पुराणोंका प्रवचन करना' उनकी वृत्ति हुई ॥ १२–१५॥
स तु वैन्यः पृथुर्धीमान् सत्यसंधो जितेन्द्रियः ।<br>सार्वभौमो महातेजाः स्वधर्मपरिपालकः ॥ १६ ॥<br><br>तस्य बाल्यात् प्रभृत्येष भक्तिर्नारायणेऽभवत् ।<br>गोवर्धनगिरिं प्राप्य तपस्तेपे जितेन्द्रियः ॥ १७ ॥<br><br>तपसा भगवान् प्रीतः शङ्खचक्रगदाधरः ।<br>आगत्य देवो राजानं प्राह दामोदरः स्वयम् ॥ १८ ॥<br><br>धार्मिकौ रूपसम्पन्नौ सर्वशस्त्रभृतां वरौ ।<br>मत्प्रसादादसंदिग्धं पुत्रौ तव भविष्यतः ।<br>एवमुक्त्वा हृषीकेशः स्वकीयां प्रकृतिं गतः ॥ १९ ॥<br><br>वैन्योऽपि वेदविधिना निश्चलां भक्तिमुद्वहन्।<br>अपालयत् स्वकं राज्यं न्यायेन मधुसूदने ॥ २० ॥वेनके पुत्र वे पृथु बुद्धिमान्, सत्यसंकल्प, जितेन्द्रिय, सम्पूर्ण पृथ्वीके स्वामी, महान् तेजस्वी तथा अपने धर्मका पालन करनेवाले थे। उनकी बाल्यकालसे ही नारायणमें भक्ति थी। इन्द्रियजयी पृथुने गोवर्धन पर्वतपर जाकर तप किया। शंख, चक्र तथा गदा धारण करनेवाले भगवान् विष्णु तपस्यासे प्रसन्न हो गये। स्वयं भगवान् दामोदर (विष्णु)-ने उनके पास आकर कहा—मेरी कृपासे निश्चित ही तुम्हें सुन्दर रूपसे सम्पन्न, सभी शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ दो धर्मात्मा पुत्र होंगे। ऐसा कहकर भगवान् हृषीकेश अपने प्राकृतिक रूपमें स्थित हो गये (अपने धाम चले गये)। वैन्य (पृथु) भी भगवान् मधुसूदनमें वैदिक विधानसे निश्चल भक्ति रखते हुए न्यायपूर्वक अपने राज्यका पालन करने लगे ॥ १६–२०॥
अचिरादेव तन्वङ्गी भार्या तस्य शुचिस्मिता ।<br>शिखण्डिनं हविर्धानमन्तर्धाना व्यजायत ॥ २१ ॥<br><br>शिखण्डिनोऽभवत् पुत्रः सुशील इति विश्रुतः ।<br>धार्मिको रूपसम्पन्नो वेदवेदाङ्गपारगः ॥ २२ ॥<br><br>सोऽधीत्य विधिवद् वेदान् धर्मेण तपसि स्थितः ।<br>मतिं चक्रे भाग्ययोगात् संन्यासं प्रति धर्मवित् ॥ २३ ॥<br><br>स कृत्वा तीर्थसंसेवां स्वाध्याये तपसि स्थितः ।<br>जगाम हिमवत्पृष्ठं कदाचित् सिद्धसेवितम् ॥ २४ ॥<br><br>तत्र धर्मपदं नाम धर्मसिद्धिप्रदं वनम्।<br>अपश्यद् योगिनां गम्यमगम्यं ब्रह्मविद्विषाम् ॥ २५ ॥मधुर एवं पवित्र मुसकानवाली तथा कृश शरीरवाली उनकी पत्नी अन्तर्द्धानाने थोड़े ही समयमें शिखण्डी तथा हविर्धान नामक दो पुत्रोंको जन्म दिया। शिखण्डीका पुत्र 'सुशील' नामसे प्रसिद्ध हुआ। वह धार्मिक, रूपसम्पन्न तथा वेद-वेदाङ्गका पारगामी विद्वान् था। विधिपूर्वक वेदोंका अध्ययन कर वह धर्मपूर्वक तपस्यामें स्थित हुआ। भाग्ययोगसे उस धर्मज्ञने संन्यास ग्रहण करनेका विचार किया। वह तीर्थस्थानोंका सेवन करते हुए स्वाध्याय तथा तपस्यामें स्थित रहने लगा। एक बार वह सिद्धोंके द्वारा सेवित हिमालय पर्वतपर गया। वहाँ उसने धर्म एवं सिद्धिको प्रदान करनेवाले, योगियोंके लिये प्राप्य, किंतु ब्रह्मासे द्वेष करनेवालोंके लिये अप्राप्य धर्मपद नामक एक वनको देखा ॥ २१–२५ ॥