संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- अध्याय १३ * | ९३ ---|--- तत्र मन्दाकिनी नाम सुपुण्या विमला नदी ।<br>पद्मोत्पलवनोपेता सिद्धाश्रमविभूषिता ॥ २६ ॥<br><br>स तस्या दक्षिणे तीरे मुनीन्द्रैर्यौगिभिर्वृतम् ।<br>सुपुण्यमाश्रमं रम्यमपश्यत् प्रीतिसंयुतः ॥ २७ ॥<br><br>मन्दाकिनीजले स्नात्वा संतर्प्य पितृदेवताः ।<br>अर्चयित्वा महादेवं पुष्पैः पद्मोत्पलादिभिः ॥ २८ ॥<br><br>ध्यात्वार्कसंस्थमीशानं शिरस्याधाय चाञ्जलिम् ।<br>सम्प्रेक्षमाणो भास्वन्तं तुष्टाव परमेश्वरम् ॥ २९ ॥<br><br>रुद्राध्यायेन गिरिशं रुद्रस्य चरितेन च ।<br>अन्यैश्च विविधैः स्तोत्रैः शाम्भवैर्वेदसम्भवैः ॥ ३० ॥ | वहाँ सिद्धोंके आश्रमसे सुशोभित तथा विभिन्न प्रकारके कमल-समूहोंसे सम्पन्न निर्मल जलवाली तथा पुण्य प्रदान करनेवाली मन्दाकिनी नामक एक नदी (प्रवाहित होती) थी। उसने प्रीतिपूर्वक उस मन्दाकिनी नदीके दक्षिण किनारेपर स्थित मुनीन्द्रों तथा योगियोंसे सेवित पुण्यदायी एक रमणीय आश्रम देखा। उसने मन्दाकिनीके जलमें स्नानकर देवस्वरूप पितरोंको (तर्पण आदिसे) संतृप्तकर विभिन्न वर्णके कमल आदि पुष्पोंके द्वारा भगवान् शंकरकी अर्चना की और सूर्यमण्डलमें स्थित भगवान् ईशानका ध्यानकर सिरसे हाथ जोड़ते हुए प्रकाशमान सूर्यका दर्शन करते हुए वह रुद्राष्टाध्यायी, रुद्रके चरित्र एवं और भी अनेक वेदवर्णित विविध प्रकारके शिव-सम्बन्धी स्तोत्रोंके द्वारा परमेश्वर गिरिशकी स्तुति करने लगा॥ २६-३० ॥ अथास्मिन्नन्तरेऽपश्यत् समायान्तं महामुनिम् ।<br>श्वेताश्वतरनामानं महापाशुपतोत्तमम् ॥ ३१ ॥<br><br>भस्मसंदिग्धसर्वाङ्गं कौपीनाच्छादनान्वितम् ।<br>तपसा कर्शितात्मानं शुक्लयज्ञोपवीतिनम् ॥ ३२ ॥<br><br>समाप्य संस्तवं शम्भोरानान्दास्राविलेक्षणः ।<br>ववन्दे शिरसा पादौ प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ॥ ३३ ॥ | इसी बीच उसने समस्त अङ्गोंमें भस्म लगाये हुए, कौपीन वस्त्रसे समन्वित, सफेद यज्ञोपवीत धारण किये हुए, तपस्याके द्वारा क्षीण शरीरवाले उत्तम महापाशुपत श्वेताश्वतर नामवाले महामुनिको समीपमें आते हुए देखा। नेत्रोंमें आनन्दाश्रु भरे हुए उसने भगवान् शंकरकी स्तुति समाप्त कर उनके चरणोंमें सिरसे प्रणाम किया और हाथ जोड़ते हुए यह वाक्य कहा— ॥ ३१-३३ ॥ धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यन्मे साक्षान्मुनीश्वरः ।<br>योगीश्वरोऽद्य भगवान् दृष्टो योगविदां वरः ॥ ३४ ॥ | मैं धन्य हूँ, मैं अनुगृहीत हूँ, जो (आज) मुझे योगज्ञानियोंमें श्रेष्ठ, मुनियोंके ईश्वर साक्षात् भगवान् योगीश्वरके दर्शन हुए। अहो! मेरा बड़ा ही सुन्दर भाग्य है। (आज) मेरे सभी तप सफल हो गये। अनघ! मैं क्या करूँ, आपका मैं शिष्य हूँ, आप मेरी रक्षा करें ॥ ३४-३५ ॥ अहो मे सुमहद्भाग्यं तपांसि सफ़लानि मे ।<br>किं करिष्यामि शिष्योऽहं तव मां पालयानघ ॥ ३५ ॥<br><br>सोऽनुगृह्याथ राजानं सुशीलं शीलसंयुतम् ।<br>शिष्यत्वे परिजग्राह तपसा क्षीणकल्मषम् ॥ ३६ ॥ | तपस्यासे जिसका सम्पूर्ण कल्मष नष्ट हो गया है, ऐसे उस निष्पाप एवं शीलसम्पन्न 'सुशील' नामवाले राजाके ऊपर अनुग्रह करके (शंकरने अपने) शिष्यरूपमें उसे ग्रहण किया। उन बुद्धिमान् (मुनि)-ने संन्यास-सम्बन्धी सम्पूर्ण विधि करवाकर उसे ईश्वर-सम्बन्धी ज्ञान तथा अपनी शाखाद्वारा विहित नियम और पशुरूपी जीवके पाश अर्थात् मायारूपी बन्धनसे मुक्त करनेवाला वह सम्पूर्ण वेदका सार प्रदान किया, साथ ही ब्रह्मा आदिके द्वारा सेवित 'अन्त्याश्रम' नामवाले आश्रमको भी प्रदान किया ॥ ३६-३८ ॥ सांन्यासिकं विधिं कृत्स्नं कारयित्वा विचक्षणः ।<br>ददौ तदैश्वरं ज्ञानं स्वशाखाविहितं व्रतम् ॥ ३७ ॥<br><br>अशेषवेदसारं तत् पशुपाशविमोचनम् ।<br>अन्त्याश्रममिति ख्यातं ब्रह्मादिभिरनुष्ठितम् ॥ ३८ ॥ |