भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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९४* कूर्मपुराण *

उवाच शिष्यान् सम्प्रेक्ष्य ये तदाश्रमवासिनः।
ब्राह्मणान् क्षत्रियान् वैश्यान् ब्रह्मचर्यपरायणान् ॥ ३९ ॥

मया प्रवर्तितां शाखामधीत्यैवेह योगिनः।
समासते महादेवं ध्यायन्तो निष्कलं शिवम् ॥ ४० ॥

इह देवो महादेवो रममाणः सहोमया।
अध्यास्ते भगवानीशो भक्तानामनुकम्पया ॥ ४१ ॥

उस आश्रममें रहनेवाले ब्रह्मचर्यपरायण ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य शिष्योंको देखकर वे (श्वेताश्वतर मुनि) बोले—मेरे द्वारा प्रवर्तित शाखाका अध्ययन करते हुए योगीजन निष्कल महादेव शिवका ध्यान करते हुए यहाँ निवास करते हैं। भक्तोंपर अनुकम्पा करनेके लिये भगवान् महादेव उमाके साथ रमण करते हुए यहाँ विराजमान रहते हैं॥ ३९-४१॥

इहाशेषजगद्धाता पुरा नारायणः स्वयम्।
आराधयन्महादेवं लोकानां हितकाम्यया ॥ ४२ ॥

इहैव देवमीशानं देवानामपि दैवतम्।
आराध्य महतीं सिद्धिं लेभिरे देवदानवाः ॥ ४३ ॥

इहैव मुनयः पूर्वं मरीच्याद्या महेश्वरम्।
दृष्ट्वा तपोबलाज्ज्ञानं लेभिरे सार्वकालिकम् ॥ ४४ ॥

प्राचीन कालमें संसारके कल्याणकी कामनासे समस्त जगत्‌को धारण करनेवाले स्वयं नारायण महादेवकी आराधना करते हुए यहाँ रहते थे। यहींपर देवताओंके भी देवता भगवान् शिवकी आराधना कर देवता तथा दानवोंने महान् सिद्धि प्राप्त की थी और यहींपर प्राचीन कालमें मरीचि आदि ऋषियोंने अपनी तपस्याके प्रभावसे महेश्वरका दर्शनकर सभी कालोंमें उपयोगी—हितकर ज्ञान प्राप्त किया था॥ ४२-४४॥

तस्मात् त्वमपि राजेन्द्र तपयोगसमन्वितः।
तिष्ठ नित्यं मया सार्धं ततः सिद्धिमवाप्स्यसि ॥ ४५ ॥

एवमाभाष्य विप्रेन्द्रो देवं ध्यात्वा पिनाकिनम्।
आचचक्षे महामंत्रं यथावत् स्वार्थसिद्धये ॥ ४६ ॥

सर्वपापोपशमनं वेदसारं विमुक्तिदम्।
अग्निरित्यादिकं पुण्यमृषिभिः सम्प्रवर्तितम् ॥ ४७ ॥

सोऽपि तद्वचनाद् राजा सुशीलः श्रद्धयान्वितः।
साक्षात् पाशुपतो भूत्वा वेदाभ्यासरतोऽभवत् ॥ ४८ ॥

इसलिये राजेन्द्र! तुम भी तप एवं योगसे समन्वित होकर नित्य ही मेरे साथ रहो, इससे तुम सिद्धि प्राप्त करोगे। ऐसा कहकर उन ब्राह्मण-श्रेष्ठ (श्वेताश्वतर मुनि)-ने पिनाक (नामक धनुष) धारण करनेवाले भगवान् (शंकर)-का ध्यान करके स्वार्थ-सिद्धिके लिये सभी पापोंका शमन करनेवाले, वेदसारस्वरूप, मुक्ति प्रदान करनेवाले तथा ऋषियोंद्वारा प्रवर्तित 'अग्नि' इत्यादि पुण्यजनक महामन्त्रका उसे (सुशीलको) विधिपूर्वक उपदेश दिया। उनके कथनानुसार 'सुशील' नामक वह राजा भी बड़ी ही श्रद्धासे साक्षात् पाशुपत होकर वेदाभ्यासमें निरत हो गया॥ ४५-४८॥

भस्मोद्धूलितसर्वाङ्गः कन्दमूलफलाशनः।
शान्तो दान्तो जितक्रोधः संन्यासविधिमाश्रितः ॥ ४९ ॥

हविर्धानस्तथाग्नेय्यां जनयामास सत्सुतम्।
प्राचीनबर्हिषं नाम्ना धनुर्वेदस्य पारगम् ॥ ५० ॥

प्राचीनबर्हिर्भगवान् सर्वशस्त्रभृतां वरः।
समुद्रतनयायां वै दश पुत्रानजीजनत् ॥ ५१ ॥

प्रचेतसस्ते विख्याता राजानः प्रथितौजसः।
अधीतवन्तः स्वं वेदं नारायणपरायणाः ॥ ५२ ॥

दशभ्यस्तु प्रचेतोभ्यो मारिषायां प्रजापतिः।
दक्षो जज्ञे महाभागो यः पूर्वं ब्रह्मणः सुतः ॥ ५३ ॥

अपने सभी अङ्गोंमें भस्म धारणकर कन्द, मूल एवं फलोंका आहार करते हुए शान्त, इन्द्रियजयी एवं क्रोधजयी राजाने संन्यास-विधिका आश्रय लिया। हविर्धानने आग्नेयी नामक अपनी पत्नीसे धनुर्वेदमें पारंगत प्राचीन बर्हिष् नामक श्रेष्ठ पुत्रको उत्पन्न किया। सभी शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ भगवान् प्राचीनबर्हिने समुद्रकी पुत्रीसे दस पुत्रोंको उत्पन्न किया। नारायणपरायण तथा अपने तेजके लिये विख्यात प्रचेतस् नामसे प्रसिद्ध उन राजाओंने अपने वेदका अध्ययन किया। इन्हीं दस प्रचेताओंद्वारा मारिषा (नामक उनकी पत्नी)-से महाभाग प्रजापति दक्ष (पुत्ररूपमें) उत्पन्न हुए, जो पूर्व समयमें ब्रह्माके पुत्र थे॥ ४९-५३॥