भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 105, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 105
* अध्याय १३ *९५
स तु दक्षो महेशेन रुद्रेण सह धीमता।<br>कृत्वा विवादं रुद्रेण शप्तः प्राचेतसोऽभवत्॥ ५४॥उन दक्षने बुद्धिमान् महेश रुद्रके साथ विवाद किया था, इससे रुद्रद्वारा शाप प्राप्तकर वे प्रचेताओके पुत्र बने ॥ ५४ ॥
समायान्तं महादेवो दक्षं देव्या गृहं हरः।<br>दृष्ट्वा यथोचितां पूजां दक्षाय प्रददौ स्वयम् ॥ ५५ ॥<br><br>तदा वै तमसाविष्टः सोऽधिकां ब्रह्मणः सुतः।<br>पूजामनर्हामन्विच्छन् जगाम कुपितो गृहम् ॥ ५६ ॥<br><br>कदाचित् स्वगृहं प्राप्तां सतीं दक्षः सुदुर्मनाः।<br>भर्त्रा सह विनिन्द्यैनां भर्त्सयामास वै रुषा ॥ ५७ ॥महादेव हरने स्वयं देवी (पार्वती)-के घर आये हुए दक्षको देखकर उनकी यथोचित पूजा की। (किंतु) उस समय तमोगुणके आवेशसे समाविष्ट ब्रह्माके पुत्र दक्ष (शंकरद्वारा की गयी अपनी) पूजाको अपर्याप्त और अयोग्य समझकर और भी अधिक पूजाकी इच्छा करनेके कारण कुपित होकर अपने घर चले गये। तदनन्तर कभी दूषित मनवाले दक्षने अपने घर आयी हुई (अपनी पुत्री) सतीकी (उनके) पति (भगवान् शंकर)-के साथ निन्दा करते हुए क्रुद्ध होकर भर्त्सना की ॥ ५५-५७ ॥
अन्ये जामातरः श्रेष्ठा भर्तुस्तव पिनाकिनः ।<br>त्वमप्यसत्सुतास्माकं गृहाद् गच्छ यथागतम् ॥ ५८ ॥<br><br>तस्य तद्वाक्यमाकर्ण्य सा देवी शंकरप्रिया ।<br>विनिन्द्य पितरं दक्षं ददाहात्मानमात्मना ॥ ५९ ॥<br><br>प्रणम्य पशुपतिं भर्तारं कृत्तिवाससम् ।<br>हिमवद्दुहिता साभूत् तपसा तस्य तोषिता ॥ ६० ॥(दक्ष बोले—सती !) तुम्हारे पिनाकधारी पतिसे मेरे अन्य जामाता श्रेष्ठ हैं। तुम भी अच्छी पुत्री नहीं हो, इसलिये मेरे घरसे वहीं चले जाओ जहाँसे आयी हो। शंकरप्रिया उन देवी सतीने उस (कठोर) वाक्यको सुनकर पिता दक्षकी निन्दा की और चर्माम्बरधारी अपने स्वामी पशुपतिको प्रणामकर स्वयं ही उन्होंने (योगाग्निद्वारा) अपनेको भस्म कर डाला। तदनन्तर वे ही हिमालयकी तपस्यासे प्रसन्न होकर उनकी पुत्री बनीं ॥ ५८-६० ॥
ज्ञात्वा तद्भगवान् रुद्रः प्रपन्नार्तिहरो हरः ।<br>शशाप दक्षं कुपितः समागत्याथ तद्गृहम् ॥ ६१ ॥<br><br>त्यक्त्वा देहमिमं ब्रह्मन् क्षत्रियाणां कुलोद्भवः ।<br>स्वस्यां सुतायां मूढात्मन् पुत्रमुत्पादयिष्यसि ॥ ६२ ॥<br><br>एवमुक्त्वा महादेवो ययौ कैलासपर्वतम् ।<br>स्वायम्भुवोऽपि कालेन दक्षः प्राचेतसोऽभवत् ॥ ६३ ॥उस बातको जानकर शरणागतोंका कष्ट हरनेवाले भगवान् रुद्र हर दक्षके घर आये और क्रुद्ध होकर उन्हें शाप दिया। ब्रह्मन् ! मूढात्मन् ! इस शरीरको छोड़कर तुम क्षत्रियोंके कुलमें उत्पन्न होओगे और पापवश अकार्यमें तुम्हारी प्रवृत्ति होगी। ऐसा कहकर महादेव कैलासपर्वतपर चले गये और समय आनेपर स्वायम्भुव दक्ष भी प्रचेताओके पुत्र बने ॥ ६१-६३ ॥
एतद् वः कथितं सर्वं मनोः स्वायम्भुवस्य तु।<br>विसर्गं दक्षपर्यन्तं शृण्वतां पापनाशनम् ॥ ६४ ॥(सूतजीने इस प्रकार कहा—) आप लोगोंसे मैंने स्वायम्भुव मनुकी दक्षपर्यन्त विशेष सृष्टिका वर्णन किया। (यह वर्णन) सुननेवालोंके पापको नष्ट करनेवाला है ॥ ६४ ॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥

इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें तेरहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १३ ॥