भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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९६ * कूर्मपुराण *


चौदहवाँ अध्याय

हरिद्वारमें दक्षद्वारा यज्ञका आयोजन, यज्ञमें शंकरका भाग न देखकर महर्षि दधीचद्वारा दक्षकी भर्त्सना तथा यज्ञमें भाग लेनेवाले ब्राह्मणोंको शाप, देवी पार्वतीके कहने-पर शंकरद्वारा रुद्रों, भद्रकाली तथा वीरभद्रको प्रकट करना, वीरभद्रादिद्वारा दक्षके यज्ञका विध्वंस, शंकर-पार्वतीका यज्ञस्थलमें प्राकट्य, भयभीत दक्षद्वारा शंकर तथा पार्वतीकी स्तुति और वर प्राप्त करना, ब्रह्माद्वारा दक्षको उपदेश और शिव-विष्णुके एकत्वका प्रतिपादन तथा दक्षद्वारा शिवकी शरण ग्रहण करना

नैमिषीया ऊचुःनैमिषीय ऋषि बोले—
देवानां दानवानां च गन्धर्वोरगरक्षसाम्।<br>उत्पत्तिं विस्तरात् सूत ब्रूहि वैवस्वतेऽन्तरे ॥ १ ॥<br>स शप्तः शम्भुना पूर्वं दक्षः प्राचेतसो नृपः।<br>किमकार्षीन्महाबुद्धे श्रोतुमिच्छाम साम्प्रतम् ॥ २ ॥सूतजी महाराज ! वैवस्वत मन्वन्तरमें हुई देवताओं, दानवों, गन्धर्वों, नागों तथा राक्षसोंकी उत्पत्तिको आप विस्तारसे बतलायें। महाबुद्धिमान् सूतजी ! इस समय हम यह सुनना चाहते हैं कि प्राचीन कालमें प्रचेताके पुत्र राजा दक्षने भगवान् शंकरसे शाप प्राप्तकर क्या किया था ॥ १-२ ॥
सूत उवाचसूतजीने कहा—
वक्ष्ये नारायणेनोक्तं पूर्वकल्पानुषङ्गिकम्।<br>त्रिकालबद्धं पापघ्नं प्रजासर्गस्य विस्तरम् ॥ ३ ॥<br>स शप्तः शम्भुना पूर्वं दक्षः प्राचेतसो नृपः।<br>विनिन्द्य पूर्ववैरेण गङ्गाद्वारेऽयजद् भवम् ॥ ४ ॥<br>देवाश्च सर्वे भागार्थमाहूता विष्णुना सह।<br>सहैव मुनिभिः सर्वैरागता मुनिपुङ्गवाः ॥ ५ ॥<br>दृष्ट्वा देवकुलं कृत्स्नं शंकरेण विनागतम्।<br>दधीचो नाम विप्रर्षिः प्राचेतसमथाब्रवीत् ॥ ६ ॥मैं पूर्वकल्पके प्रसंगमें नारायणद्वारा कहे गये (भूत, भविष्य तथा वर्तमान— इस प्रकार) तीनों कालोंसे सम्बद्ध तथा पाप हरनेवाले प्रजा-सर्गको विस्तारसे बतलाता हूँ ॥ ३ ॥<br>प्राचीन कालकी बात है, भगवान् शंकरके शापसे ग्रस्त उन प्रचेतापुत्र राजा दक्षने पूर्व वैरके कारण शंकरकी निन्दा कर गङ्गाद्वार हरिद्वारमें एक यज्ञका अनुष्ठान प्रारम्भ किया। श्रेष्ठ मुनियो! विष्णुके साथ सभी देवता उस यज्ञमें भाग ग्रहण करनेके लिये बुलाये गये। सभी मुनियोंके साथ वे वहाँ आये। शंकरको छोड़कर आये हुए समस्त देव-समूहोंको देखकर दधीच नामक विप्रर्षिने प्राचेतस-दक्षसे (इस प्रकार) कहा— ॥ ४-६ ॥
दधीच उवाचदधीच बोले—
ब्रह्मादयः पिशाचान्ता यस्याज्ञानुविधायिनः।<br>स देवः साम्प्रतं रुद्रो विधिना किं न पूज्यते ॥ ७ ॥ब्रह्मा आदिसे लेकर पिशाचतक जिनकी आज्ञाका शीघ्र ही अनुपालन करते हैं, उन रुद्रदेवकी पूजा इस समय क्यों नहीं की जा रही है ? ॥ ७ ॥
दक्ष उवाचदक्षने कहा—
सर्वेष्वेव हि यज्ञेषु न भागः परिकल्पितः।<br>न मन्त्रा भार्यया सार्धं शंकरस्येति नेज्यते ॥ ८ ॥<br>विहस्य दक्षं कुपितो वचः प्राह महामुनिः।<br>शृण्वतां सर्वदेवानां सर्वज्ञानमयः स्वयम् ॥ ९ ॥सभी यज्ञोंमें भार्यासहित शंकरके भाग एवं मन्त्रोंकी परिकल्पना नहीं हुई है, इसलिये उनकी पूजा नहीं की जाती। इसपर साक्षात् सर्वज्ञानमय महामुनि दधीचने कोपपूर्वक हँसते हुए सभी देवताओंको सुनाते हुए दक्षसे कहा— ॥ ८-९ ॥