भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय १४ *९७
दधीच उवाच<br>यतः प्रवृत्तिर्विश्वेषां यश्चास्य परमेश्वरः।<br>सम्पूज्यते सर्वयज्ञैर्विदित्वा किल शंकरः॥ १०॥<br>दक्ष उवाच<br>न ह्ययं शंकरो रुद्रः संहर्ता तामसो हरः।<br>नग्नः कपाली विकृतो विश्वात्मा नोपपद्यते॥ ११॥<br>ईश्वरो हि जगत्स्रष्टा प्रभुनारायणः स्वराट्।<br>सत्त्वात्मकोऽसौ भगवानिज्यते सर्वकर्मसु॥ १२॥<br>दधीच उवाच<br>किं त्वया भगवानेष सहस्त्रांशुर्न दृश्यते।<br>सर्वलोकैकसंहर्ता कालात्मा परमेश्वरः॥ १३॥<br>यं गृणन्तीह विद्वांसो धार्मिका ब्रह्मवादिनः।<br>सोऽयं साक्षी तीव्ररोचिः कालात्मा शांकरी तनुः॥ १४॥<br>एष रुद्रो महादेवः कपर्दी च घृणी हरः।<br>आदित्यो भगवान् सूर्यो नीलग्रीवो विलोहितः॥ १५॥<br>संस्तूयते सहस्त्रांशुः सामगाध्वर्युहोतृभिः।<br>पश्यैनं विश्वकर्माणं रुद्रमूर्तिं त्रयीमयम्॥ १६॥<br>दक्ष उवाच<br>य एते द्वादशादित्या आगता यज्ञभागिनः।<br>सर्वे सूर्या इति ज्ञेया न ह्यन्यो विद्यते रविः॥ १७॥<br>एवमुक्ते तु मुनयः समायाता दिदृक्षवः।<br>बाढमित्यब्रुवन् वाक्यं तस्य साहाय्यकारिणः॥ १८॥<br>तमसाविष्टमनसो न पश्यन्ति वृषध्वजम्।<br>सहस्त्रशोऽथ शतशो भूय एव विनिन्द्यते॥ १९॥<br>निन्दन्तो वैदिकान् मन्त्रान् सर्वभूतपतिं हरम्।<br>अपूजयन् दक्षवाक्यं मोहिता विष्णुमायया॥ २०॥<br>देवाश्च सर्वे भागार्थमागता वासवादयः।<br>नापश्यन् देवमीशानमृते नारायणं हरिम्॥ २१॥<br>हिरण्यगर्भो भगवान् ब्रह्मा ब्रह्मविदां वरः।<br>पश्यतामेव सर्वेषां क्षणादन्तरधीयत॥ २२॥दधीच बोले—जिनसे सभीकी प्रवृत्ति होती है और जो इस (विश्व)-के परमेश्वर हैं, वे शंकर निश्चय ही सभी यज्ञोंद्वारा ज्ञानपूर्वक पूजित होते हैं॥ १०॥<br>दक्षने कहा—संहार करनेवाले, तमोगुणी, नग्न, कपाल धारण करनेवाले तथा विकृत (वेशवाले) रुद्र, हर, शंकर किसी भी प्रकार विश्वात्मा नहीं हो सकते। संसारकी सृष्टि करनेवाले स्वराट्, प्रभु नारायण ही ईश्वर हैं और सभी कर्मोंमें उन सत्त्वात्मक भगवान् विष्णुकी पूजा की जाती है॥ ११-१२॥<br>दधीच बोले—क्या तुम समस्त लोकोंके एकमात्र संहारकर्ता कालस्वरूप, तथा हजारों किरणोंवाले इन परमेश्वर भगवान् (सूर्य)-को नहीं देख रहे हो। धर्मात्मा, ब्रह्मवादी विद्वान् जिनकी स्तुति करते हैं, वही ये (सूर्य) तीव्र तेजसे सम्पन्न कालात्मक साक्षी यहाँ शंकरके शरीररूपमें ही स्थित हैं। देवी अदितिके पुत्र ये भगवान् सूर्य ही रुद्र, महादेव, कपर्दी, घृणी, हर, नीलग्रीव, विलोहित (नामवाले) हैं। सामवेदका गान करनेवाले तथा अध्वर्यु एवं होताओंके द्वारा हजारों किरणोंवाले सूर्यकी स्तुति की जाती है। विश्वको बनानेवाले त्रयीमय—ऋक्, यजुः तथा सामवेदस्वरूप रुद्रकी मूर्तिको देखो॥ १३—१६॥<br>दक्षने कहा—यज्ञमें भाग ग्रहण करनेवाले ये जो बारह (अदिति-पुत्र) आदित्य यहाँ आये हुए हैं, ये सभी सूर्यके नामसे ही जाने जाते हैं। इनसे अतिरिक्त कोई अन्य सूर्य नहीं हैं। ऐसा कहनेपर यज्ञ देखनेकी इच्छासे आये हुए उनके (दक्षके) सहयोगी मुनियोंने (समर्थन करते हुए) दक्षसे कहा—ठीक है। तमोगुणसे आविष्ट मनवाले सैकड़ों-हजारोंकी संख्यामें आये हुए उन लोगोंने भगवान् वृषध्वज शंकरको न देखते हुए पुनः उनकी निन्दा करनी आरम्भ की। विष्णुकी मायासे मोहित होकर वे वैदिक मन्त्रोंकी निन्दा करते हुए सभी प्राणियोंके एकमात्र स्वामी भगवान् हरकी पूजा न करके दक्षके वचनका अनुमोदन करने लगे। यज्ञमें भाग ग्रहण करनेके लिये आये हुए इन्द्रादि सभी देवताओोंने भी नारायण हरिके अतिरिक्त देव ईशान (शंकर)-को भी नहीं देखा (अर्थात् शिवके माहात्म्यको वे जान नहीं पाये)। ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ हिरण्यगर्भ भगवान् ब्रह्मा सभीके देखते-देखते क्षणभरमें ही अन्तर्धान हो गये॥ १७—२२॥