भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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९८ * कूर्मपुराण *


अन्तर्हिते भगवति दक्षो नारायणं हरिम्।
रक्षकं जगतां देवं जगाम शरणं स्वयम्॥ २३॥

प्रवर्तयामास च तं यज्ञं दक्षोऽथ निर्भयः।
रक्षते भगवान् विष्णुः शरणागतरक्षकः॥ २४॥

पुनः प्राह च तं दक्षं दधीचो भगवानृषिः।
सम्प्रेक्ष्यर्षिगणाम् देवान् सर्वान् वै ब्रह्मविद्विषः॥ २५॥

अपूज्यपूजने चैव पूज्यानां चाप्यपूजने।
नरः पापमवाप्नोति महत् वै नात्र संशयः॥ २६॥

असतां प्रग्रहो यत्र सतां चैव विमानना।
दण्डो देवकृतस्तत्र सद्यः पतति दारुणः॥ २७॥

एवमुक्त्वा तु विप्रर्षिः शशापेश्वरविद्विषः।
समागतान् ब्राह्मणांस्तान् दक्षसाहाय्यकारिणः॥ २८॥

यस्माद् बहिष्कृता वेदा भवद्भिः परमेश्वरः।
विनिन्दितो महादेवः शंकरो लोकवन्दितः॥ २९॥

भगवान् ब्रह्माके अन्तर्धान हो जानेपर स्वयं दक्ष संसारकी रक्षा करनेवाले देव नारायण हरिकी शरणमें गये। तदनन्तर भयसे मुक्त होकर दक्षने वह यज्ञ आरम्भ किया। शरणागतकी रक्षा करनेवाले भगवान् विष्णु (उस यज्ञकी) रक्षा करने लगे। भगवान् दधीच ऋषिने ब्रह्म (शंकर)-से द्वेष माननेवाले उन सभी ऋषिगणों तथा देवताओंकी ओर देखकर उन दक्षसे पुनः कहा—जो अपूज्य है, उसका पूजन करनेसे और जो पूज्य है, उसका पूजन न करनेसे मनुष्य निश्चित ही महान् पापको प्राप्त करता है, इसमें किंचित् भी संदेह नहीं है। जहाँ दुर्जनोंका आदर होता है और सत्पुरुषोंका अनादर होता है, वहाँ अति शीघ्र ही दारुण दैवी दण्ड उपस्थित होता है। ऐसा कहकर विप्रर्षि दधीचने दक्षकी सहायता करनेके लिये आये हुए उन ईश्वर (शंकर)-से विद्वेष रखनेवाले ब्राह्मणोंको शाप देते हुए कहा—॥ २३-२८॥

चूँकि तुम लोगोंने वेदोंकी अवमानना की है और समस्त संसारके द्वारा वन्दित परमेश्वर महादेव शंकरकी निन्दा की है, अतः ईश्वर (शंकर)-से द्वेष रखनेवाले तुम सभी वेदत्रयीसे रहित हो जाओगे और असत्-शास्त्रोंमें मन लगाते हुए ईश्वर-मार्ग (शिव-मार्ग)-की निन्दा करोगे तथा घोर कलियुग आनेपर मिथ्या अध्ययन और मिथ्या आचारयुक्त होकर मिथ्या ज्ञानका प्रलाप करनेवाले होओगे, साथ ही कलिके द्वारा उत्पन्न कष्ट एवं दुःखों आदिसे पीड़ित रहोगे। पुनः तुम सभी अपने सम्पूर्ण तपोबलका त्याग करके नरक प्राप्त करोगे। तुम लोगोंके द्वारा हृषीकेश विष्णुके भलीभाँति आश्रय ग्रहण करनेपर भी वे तुम लोगोंसे विमुख ही रहेंगे॥ २९-३२॥

भविष्यध्वं त्रयीबाह्याः सर्वेऽपीश्वरविद्विषः।
निन्दन्तो हौश्वरं मार्गं कुशास्त्रासक्तमानसाः॥ ३०॥

मिथ्याधीतसमाचारा मिथ्याज्ञानप्रलापिनः।
प्राप्य घोरं कलियुगं कलिजैः किल पीडिताः॥ ३१॥

त्यक्त्वा तपोबलं कृत्स्नं गच्छध्वं नरकान् पुनः।
भविष्यति हृषीकेशः स्वाश्रितोऽपि पराङ्मुखः॥ ३२॥

एवमुक्त्वा तु विप्रर्षिर्विरराम तपोनिधिः।
जगाम मनसा रुद्रमशेषाघविनाशनम्॥ ३३॥

एतस्मिन्नन्तरे देवी महादेवं महेश्वरम्।
पतिं पशुपतिं देवं ज्ञात्वैतत् प्राह सर्वदृक्॥ ३४॥

ऐसा कहकर तपस्याकी निधि वे विप्रर्षि (दधीच) चुप हो गये और मानसिक रूपसे सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाले रुद्रकी शरणमें गये। इसी बीच यह सारी घटना जानकर सर्वदर्शी (सब कुछ प्रत्यक्ष देखनेवाली) देवी (पार्वती)-ने (अपने) पतिदेव पशुपति महादेव महेश्वरसे कहा—॥ ३३-३४॥

देव्युवाच
देवी बोलीं—शंकर! पूर्वजन्मके मेरे (सतीके) पिता दक्ष यज्ञ कर रहे हैं और आपके भाव तथा स्वरूपकी निन्दा कर रहे हैं। ऋषियोंके साथ देवता वहाँ उनकी सहायता करते हुए उपस्थित हैं। मैं आपसे एक वर माँगती हूँ कि 'आप शीघ्र ही उस यज्ञको नष्ट करें'॥ ३५-३६॥

दक्षो यज्ञेन यजते पिता मे पूर्वजन्मनि।
विनिन्द्य भवतो भावमात्मानं चापि शंकर॥ ३५॥

देवाः सहर्षिभिश्चासँस्तत्र साहाय्यकारिणः।
विनाशयाशु तं यज्ञं वरमेकं वृणोम्यहम्॥ ३६॥