संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
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* अध्याय १२ * <p align="right">८९</p>
बारहवाँ अध्याय
महर्षि भृगु, मरीचि, पुलस्त्य तथा अत्रि आदिद्वारा दक्ष-कन्याओंसे उत्पन्न संतान-परम्पराका वर्णन, उनचास अग्नियों, पितरों तथा गङ्गाके प्रादुर्भावका वर्णन
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| भृगोः ख्यात्यां समुत्पन्ना लक्ष्मीनारायणप्रिया।<br>देवौ धाताविधातारौ मेरोजामातरौ तथा॥ १ ॥<br>आयतिर्नियतिर्मेरोः कन्ये चैव महात्मनः।<br>धाताविधात्रोस्ते भार्ये तयोर्जातौ सुतावुभौ॥ २ ॥<br>प्राणश्चैव मृकण्डुश्च मार्कण्डेयो मृकण्डुतः।<br>तथा वेदशिरा नाम प्राणस्य द्युतिमान् सुतः॥ ३ ॥ | महर्षि भृगुकी 'ख्याति' नामक पत्नीसे नारायणकी पत्नी लक्ष्मी उत्पन्न हुईं तथा धाता एवं विधाता नामक दो देवता भी उनसे उत्पन्न हुए, जो मेरुके जामाता हुए। महात्मा मेरुकी आयति तथा नियति नामकी दो कन्याएँ थीं, वे क्रमशः धाता तथा विधाताकी पत्नियाँ थीं, उनसे दो पुत्र उत्पन्न हुए—प्राण और मृकण्डु। मृकण्डुसे मार्कण्डेय हुए तथा प्राणके कान्तिमान् वेदशिरा नामके पुत्र हुए॥ १-३॥ |
| मरीचेरपि सम्भूतिः पौर्णमासमसूत।<br>कन्याचतुष्टयं चैव सर्वलक्षणसंयुतम्॥ ४ ॥<br>तुष्टिर्ज्येष्ठा तथा वृष्टिः कृष्टिश्चापचितिस्तथा।<br>विरजाः पर्वतश्चैव पौर्णमासस्य तौ सुतौ॥ ५ ॥ | महर्षि मरीचिके भी सम्भूति (नामक पत्नी)-ने सभी (शुभ) लक्षणोंसे सम्पन्न पौर्णमास नामक पुत्र और चार कन्याओंको उत्पन्न किया। सबसे बड़ी (कन्याका नाम) तुष्टि तथा अन्य तीन कन्याओंका नाम वृष्टि, कृष्टि और अपचिति था। पौर्णमासके विरजा तथा पर्वत नामके दो पुत्र थे॥ ४-५॥ |
| क्षमा तु सुषुवे पुत्रान् पुलहस्य प्रजापतेः।<br>कर्दमं च वरीयांसं सहिष्णुं मुनिसत्तमम्॥ ६ ॥<br>तथैव च कनीयांसं तपोनिर्धूतकल्मषम्।<br>अनसूया तथैवात्रेर्जज्ञे पुत्रानकल्मषान्॥ ७ ॥<br>सोमं दुर्वाससं चैव दत्तात्रेयं च योगिनम्।<br>स्मृतिश्चाङ्गिरसः पुत्रीर्जज्ञे लक्षणसंयुताः॥ ८ ॥<br>सिनीवालीं कुहूं चैव राकामनुमतिं तथा।<br>प्रीत्यां पुलस्त्यो भगवान् दत्तात्रिमसृजत् प्रभुः॥ ९ ॥<br>पूर्वजन्मनि सोऽगस्त्यः स्मृतः स्वायम्भुवेऽन्तरे।<br>वेदबाहुं तथा कन्यां सन्नतिं नाम नामतः॥ १०॥ | प्रजापति पुलहकी पत्नी क्षमाने कर्दम, वरीयान् और उनसे छोटे सहिष्णु नामक श्रेष्ठ मुनिको जन्म दिया जो तपके कारण पाप-रहित थे। उसी प्रकार अत्रिकी पत्नी अनसूयाने चन्द्रमा, दुर्वासा और योगी दत्तात्रेय नामक पुण्यात्मा पुत्रोंको उत्पन्न किया। महर्षि अङ्गिराकी स्मृति नामक पत्नीने सिनीवाली, कुहू, राका तथा अनुमति (नामवाली) शुभलक्षणसम्पन्न (चार) पुत्रियोंको जन्म दिया। प्रभु भगवान् पुलस्त्यने (अपनी पत्नी) प्रीतिसे दत्तात्रि (नामक पुत्र)-को उत्पन्न किया। स्वायम्भुव मन्वन्तरके (अपने) पूर्वजन्ममें वे ही अगस्त्य नामसे प्रसिद्ध थे। (पुलस्त्यको प्रीतिसे) वेदबाहु (नामक एक अन्य पुत्र) और 'सन्नति' इस नामसे प्रसिद्ध (एक) कन्या थी॥ ६-१०॥ |
| पुत्राणां षष्टिसहस्रं संततिः सुषुवे क्रतोः।<br>ते चोर्ध्वरेतसः सर्वे बालखिल्या इति स्मृताः॥ ११॥<br>वसिष्ठश्च तथोर्जायां सप्त पुत्रानजीजनत्।<br>कन्यां च पुण्डरीकाक्षां सर्वशोभासमन्विताम्॥ १२॥ | महर्षि क्रतुकी पत्नी संततिने साठ हजार पुत्रोंको जन्म दिया। वे सभी ऊर्ध्वरेता बालखिल्य इस नामसे प्रसिद्ध हुए। महर्षि वसिष्ठने ऊर्जा नामक पत्नीसे सात पुत्रों और कमलके समान नेत्रवाली तथा सभी प्रकारकी शोभाओंसे सम्पन्न एक कन्याको जन्म दिया॥ ११-१२॥ |