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संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

* अध्याय १२ * <p align="right">८९</p>


बारहवाँ अध्याय

महर्षि भृगु, मरीचि, पुलस्त्य तथा अत्रि आदिद्वारा दक्ष-कन्याओंसे उत्पन्न संतान-परम्पराका वर्णन, उनचास अग्नियों, पितरों तथा गङ्गाके प्रादुर्भावका वर्णन

सूत उवाचसूतजी बोले—
भृगोः ख्यात्यां समुत्पन्ना लक्ष्मीनारायणप्रिया।<br>देवौ धाताविधातारौ मेरोजामातरौ तथा॥ १ ॥<br>आयतिर्नियतिर्मेरोः कन्ये चैव महात्मनः।<br>धाताविधात्रोस्ते भार्ये तयोर्जातौ सुतावुभौ॥ २ ॥<br>प्राणश्चैव मृकण्डुश्च मार्कण्डेयो मृकण्डुतः।<br>तथा वेदशिरा नाम प्राणस्य द्युतिमान् सुतः॥ ३ ॥महर्षि भृगुकी 'ख्याति' नामक पत्नीसे नारायणकी पत्नी लक्ष्मी उत्पन्न हुईं तथा धाता एवं विधाता नामक दो देवता भी उनसे उत्पन्न हुए, जो मेरुके जामाता हुए। महात्मा मेरुकी आयति तथा नियति नामकी दो कन्याएँ थीं, वे क्रमशः धाता तथा विधाताकी पत्नियाँ थीं, उनसे दो पुत्र उत्पन्न हुए—प्राण और मृकण्डु। मृकण्डुसे मार्कण्डेय हुए तथा प्राणके कान्तिमान् वेदशिरा नामके पुत्र हुए॥ १-३॥
मरीचेरपि सम्भूतिः पौर्णमासमसूत।<br>कन्याचतुष्टयं चैव सर्वलक्षणसंयुतम्॥ ४ ॥<br>तुष्टिर्ज्येष्ठा तथा वृष्टिः कृष्टिश्चापचितिस्तथा।<br>विरजाः पर्वतश्चैव पौर्णमासस्य तौ सुतौ॥ ५ ॥महर्षि मरीचिके भी सम्भूति (नामक पत्नी)-ने सभी (शुभ) लक्षणोंसे सम्पन्न पौर्णमास नामक पुत्र और चार कन्याओंको उत्पन्न किया। सबसे बड़ी (कन्याका नाम) तुष्टि तथा अन्य तीन कन्याओंका नाम वृष्टि, कृष्टि और अपचिति था। पौर्णमासके विरजा तथा पर्वत नामके दो पुत्र थे॥ ४-५॥
क्षमा तु सुषुवे पुत्रान् पुलहस्य प्रजापतेः।<br>कर्दमं च वरीयांसं सहिष्णुं मुनिसत्तमम्॥ ६ ॥<br>तथैव च कनीयांसं तपोनिर्धूतकल्मषम्।<br>अनसूया तथैवात्रेर्जज्ञे पुत्रानकल्मषान्॥ ७ ॥<br>सोमं दुर्वाससं चैव दत्तात्रेयं च योगिनम्।<br>स्मृतिश्चाङ्गिरसः पुत्रीर्जज्ञे लक्षणसंयुताः॥ ८ ॥<br>सिनीवालीं कुहूं चैव राकामनुमतिं तथा।<br>प्रीत्यां पुलस्त्यो भगवान् दत्तात्रिमसृजत् प्रभुः॥ ९ ॥<br>पूर्वजन्मनि सोऽगस्त्यः स्मृतः स्वायम्भुवेऽन्तरे।<br>वेदबाहुं तथा कन्यां सन्नतिं नाम नामतः॥ १०॥प्रजापति पुलहकी पत्नी क्षमाने कर्दम, वरीयान् और उनसे छोटे सहिष्णु नामक श्रेष्ठ मुनिको जन्म दिया जो तपके कारण पाप-रहित थे। उसी प्रकार अत्रिकी पत्नी अनसूयाने चन्द्रमा, दुर्वासा और योगी दत्तात्रेय नामक पुण्यात्मा पुत्रोंको उत्पन्न किया। महर्षि अङ्गिराकी स्मृति नामक पत्नीने सिनीवाली, कुहू, राका तथा अनुमति (नामवाली) शुभलक्षणसम्पन्न (चार) पुत्रियोंको जन्म दिया। प्रभु भगवान् पुलस्त्यने (अपनी पत्नी) प्रीतिसे दत्तात्रि (नामक पुत्र)-को उत्पन्न किया। स्वायम्भुव मन्वन्तरके (अपने) पूर्वजन्ममें वे ही अगस्त्य नामसे प्रसिद्ध थे। (पुलस्त्यको प्रीतिसे) वेदबाहु (नामक एक अन्य पुत्र) और 'सन्नति' इस नामसे प्रसिद्ध (एक) कन्या थी॥ ६-१०॥
पुत्राणां षष्टिसहस्रं संततिः सुषुवे क्रतोः।<br>ते चोर्ध्वरेतसः सर्वे बालखिल्या इति स्मृताः॥ ११॥<br>वसिष्ठश्च तथोर्जायां सप्त पुत्रानजीजनत्।<br>कन्यां च पुण्डरीकाक्षां सर्वशोभासमन्विताम्॥ १२॥महर्षि क्रतुकी पत्नी संततिने साठ हजार पुत्रोंको जन्म दिया। वे सभी ऊर्ध्वरेता बालखिल्य इस नामसे प्रसिद्ध हुए। महर्षि वसिष्ठने ऊर्जा नामक पत्नीसे सात पुत्रों और कमलके समान नेत्रवाली तथा सभी प्रकारकी शोभाओंसे सम्पन्न एक कन्याको जन्म दिया॥ ११-१२॥
९०* कूर्मपुराण *
रजोह्यश्चोर्ध्वबाहुश्च सवनश्चानघस्तथा।<br>सुतपाः शुक्र इत्येते सप्त पुत्रा महौजसः॥ १३॥<br><br>योऽसौ रुद्रात्मको वह्निर्ब्रह्मणस्तनयो द्विजाः।<br>स्वाहा तस्मात् सुतान् लेभे त्रीनुदारान् महौजसः॥ १४॥<br><br>पावकः पवमानश्च शुचिरग्निश्च ते त्रयः।<br>निर्मथ्यः पवमानः स्याद् वैद्युतः पावकः स्मृतः॥ १५॥<br><br>यश्चासौ तपते सूर्यः शुचिरग्निस्त्वसौ स्मृतः।<br>तेषां तु संततावन्ये चत्वारिंशच्च पञ्च च॥ १६॥<br><br>पावकः पवमानश्च शुचिस्तेषां पिता च यः।<br>एते चैकोनपञ्चाशद् वह्नयः परिकीर्तिताः॥ १७॥<br><br>सर्वे तपस्विनः प्रोक्ताः सर्वे यज्ञेषु भागिनः।<br>रुद्रात्मकाः स्मृताः सर्वे त्रिपुण्ड्राङ्कितमस्तकाः॥ १८॥<br><br>अयज्वानश्च यज्वानः पितरो ब्रह्मणः स्मृताः।<br>अग्निष्वात्ता बर्हिषदो द्विधा तेषां व्यवस्थितिः॥ १९॥<br><br>तेभ्यः स्वधा सुतां जज्ञे मेनां वैतरणीं तथा।<br>ते उभे ब्रह्मवादिन्यौ योगिन्यौ मुनिसत्तमाः॥ २०॥<br><br>असूत मेना मैनाकं क्रौञ्चं तस्यानुजं तथा।<br>गङ्गा हिमवतो जज्ञे सर्वलोकैकपावनी॥ २१॥<br><br>स्वयोगाग्निबलाद् देवीं लेभे पुत्रीं महेश्वरीम्।<br>यथावत् कथितं पूर्वं देव्या माहात्म्यमुत्तमम्॥ २२॥<br><br>एषा दक्षस्य कन्यानां मयापत्यानुसंततिः।<br>व्याख्याता भवतामद्य मनोः सृष्टिं निबोधत॥ २३॥रज, ऊह, ऊर्ध्वबाहु, सवन, अनघ, सुतपा और शुक्र—(नामवाले) ये (वसिष्ठके) सात महान् ओजस्वी पुत्र थे। द्विजो! ब्रह्माका रुद्रस्वरूप जो वह वह्नि नामक पुत्र था, उससे स्वाहाने महातेजस्वी तीन उदार पुत्रोंको प्राप्त किया। वे तीनों पावक, पवमान तथा शुचि (नामवाले) अग्नि थे। मन्थनद्वारा उत्पन्न अग्निको पवमान और विद्युत्से सम्बद्ध अग्निको पावक कहा जाता है। जो यह सूर्य चमकता है वही शुचि अग्नि कहलाता है। उन (तीनों अग्नियों)—की पैंतालीस संतानें हुईं। (इस प्रकार) पावक, पवमान तथा शुचि (नामक तीन अग्नियाँ) और इन तीनोंके पिता (रुद्रात्मक अग्नि) एवं (उन तीनों अग्नियोंके पैंतालीस पुत्र) ये सभी मिलाकर उनचास अग्नियाँ कही गयी हैं। ये सभी (उनचास) तपस्वी कहे गये हैं, सभी यज्ञभागके अधिकारी हैं, रुद्रात्मक कहलाते हैं और सभी मस्तकपर त्रिपुण्ड्रके चिह्नसे अङ्कित रहते हैं॥ १३-१८॥<br><br>ब्रह्माके अग्निष्वात्त तथा बर्हिषद् नामक दो पुत्र कहे गये हैं जो पितर हैं। उनमें अयज्वा (यज्ञ न करनेवाले) तथा यज्वा (यज्ञ करनेवाले)-के रूपमें दो प्रकारकी व्यवस्था है। मुनिश्रेष्ठो! स्वधाने उनके द्वारा मेना और वैतरणी नामक दो पुत्रियोंको प्राप्त किया। वे दोनों ही ब्रह्मवादिनी और योगिनी थीं। मेनाने मैनाक और उसके अनुज क्रौञ्च (नामक पर्वत)-को जन्म दिया। हिमालयसे समस्त लोकोंको पवित्र करनेमें अद्वितीय गङ्गा उत्पन्न हुईं। (हिमालयने) अपनी योगाग्निके बलसे (उन) देवी महेश्वरीको पुत्री-रूपमें प्राप्त किया, जिन देवीके उत्तम माहात्म्यको भलीभाँति पहले बता दिया गया है॥ १९-२२॥<br><br>मैंने प्रजापति दक्षकी कन्याओंकी संतान-परम्पराका आप लोगोंसे वर्णन किया। अब आप (स्वायम्भुव) मनुकी सृष्टिका वर्णन सुनें॥ २३॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥

इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें बारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १२॥


* अध्याय १३ * | ९१


तेरहवाँ अध्याय

स्वायम्भुव मनुके वंशका वर्णन, चाक्षुष मनुकी उत्पत्ति, महाराज पृथुका आख्यान, पृथुका वंश-वर्णन, पृथुके पौत्र 'सुशील' का रोचक आख्यान, सुशीलको हिमालयके 'धर्मपद' नामक वनमें महापाशुपत श्वेताश्वतर मुनिके दर्शन तथा उनसे पाशुपत-व्रतका ग्रहण, दक्षके पूर्वजन्मका वृत्तान्त तथा पुनः दक्ष प्रजापतिके रूपमें आविर्भावकी कथा, दक्षद्वारा शंकरका अपमान, सतीद्वारा देह-त्याग तथा शंकरका दक्षको शाप


सूत उवाच
प्रियव्रतोत्तानपादौ मनोः स्वायम्भुवस्य तु।
धर्मज्ञौ सुमहावीर्यौ शतरूपा व्यजीजनत्॥ १ ॥

ततस्तूत्तानपादस्य ध्रुवो नाम सुतोऽभवत्।
भक्तो नारायणे देवे प्राप्तवान् स्थानमुत्तमम्॥ २ ॥

ध्रुवात् श्लिष्टं च भव्यं च भार्या शम्भुर्व्यजायत।
श्लिष्टेराधत्त सुच्छाया पञ्च पुत्रानकल्मषान्॥ ३ ॥

वसिष्ठवचनाद् देवी तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम्।
आराध्य पुरुषं विष्णुं शालग्रामे जनार्दनम्॥ ४ ॥

रिपुं रिपुञ्जयं विप्रं वृकलं वृषतेजसम्।
नारायणपरान् शुद्धान् स्वधर्मपरिपालकान्॥ ५ ॥

**सूतजी बोले—**स्वायम्भुव मनुकी पत्नी शतरूपाने प्रियव्रत तथा उत्तानपाद नामवाले दो पुत्रोंको जन्म दिया, जो धर्मको जाननेवाले तथा महान् पराक्रमी थे। कालान्तरमें उत्तानपादका ध्रुव नामक पुत्र हुआ। भगवान् विष्णुके उस भक्तने उत्तम स्थान प्राप्त किया। ध्रुवकी शम्भुनामक पत्नीने श्लिष्ट तथा भव्य नामक पुत्रोंको जन्म दिया। श्लिष्टकी सुच्छाया नामक पत्नीने पाँच पुण्यात्मा पुत्रोंको उत्पन्न किया। महर्षि वसिष्ठके कथनानुसार सुच्छाया नामक देवीने अत्यन्त कठोर तप करके शालग्राममें जनार्दन पुरुष विष्णुकी आराधना कर रिपु, रिपुञ्जय, विप्र, वृकल तथा वृषतेजस् नामवाले पाँच पुत्रोंको जन्म दिया, जो नारायणमें अनन्य निष्ठा रखनेवाले, शुद्ध तथा अपने धर्मका विशेषरूपसे पालन करनेवाले थे॥ १—५॥

रिपोराधत्त बृहती चक्षुषं सर्वतेजसम्।
सोऽजीजनत् पुष्करिण्यां वैरिण्यां चाक्षुषं मनुम्।
प्रजापतेरात्मजायां वीरणस्य महात्मनः॥ ६ ॥

मनोरजायन्त दश नड्वलायां महौजसः।
कन्यायां सुमहावीर्या वैराजस्य प्रजापतेः॥ ७ ॥

ऊरुः पूरुः शतद्युम्नस्तपस्वी सत्यवाक् शुचिः।
अग्निष्टुदतिरात्रश्च सुद्युम्नश्चाभिमन्युकः॥ ८ ॥

ऊरोरजनयत् पुत्रान् षडाग्नेयी महाबलान्।
अङ्गं सुमनसं स्वातिं क्रतुमङ्गिरसं शिवम्॥ ९ ॥

अङ्गाद् वेनोऽभवत् पश्चाद् वैन्यो वेनादजायत।
योऽसौ पृथुरिति ख्यातः प्रजापालो महाबलः॥ १० ॥

येन दुग्धा मही पूर्वं प्रजानां हितकारणात्।
नियोगाद् ब्रह्मणः सार्धं देवेन्द्रेण महौजसा॥ ११ ॥

रिपुकी पत्नी बृहतीने सब प्रकारके तेजोंसे सम्पन्न चक्षुष् (नामक पुत्र)-को जन्म दिया। उस चक्षुष्ने महात्मा वीरण प्रजापतिकी पुष्करिणी* नामवाली पुत्रीसे चाक्षुष मनुको जन्म दिया। अत्यन्त तेजस्वी (चाक्षुष) मनुके वैराज प्रजापतिकी कन्या नड्वलासे दस पुत्र उत्पन्न हुए, जो ऊरु, पूरु, शतद्युम्न, तपस्वी, सत्यवाक्, शुचि, अग्निष्टुत्, अतिरात्र, सुद्युम्न तथा अभिमन्युक (नामवाले) थे। ऊरुकी पत्नी आग्नेयीने अङ्ग, सुमनस्, स्वाति, क्रतु, अङ्गिरस् एवं शिव (नामवाले) महाबलशाली छः पुत्रोंको उत्पन्न किया। अङ्गसे वेन हुआ और फिर वेनसे वैन्य उत्पन्न हुए। प्रजापालक, महाबलवान् वे ही वैन्य पृथु नामसे विख्यात हुए। पूर्वकालमें उन्होंने प्रजाओंके कल्याणकी कामनासे ब्रह्माके आदेशसे महा-तेजस्वी देवराज इन्द्रके साथ (गोरूपा) पृथ्वीका दोहन किया था॥ ६—११॥


* यह पुष्करिणी प्रजापति वीरणकी पुत्री होनेसे वैरिणी भी कही जाती है।

९२ * कूर्मपुराण *


वेनपुत्रस्य वितते पुरा पैतामहे मखे।<br>सूतः पौराणिको जज्ञे मायारूपः स्वयं हरिः ॥ १२ ॥<br><br>प्रवक्ता सर्वशास्त्राणां धर्मज्ञो गुणवत्सलः ।<br>तं मां वित्त मुनिश्रेष्ठाः पूर्वोद्भूतं सनातनम् ॥ १३ ॥<br><br>अस्मिन् मन्वन्तर व्यासः कृष्णद्वैपायनः स्वयम्।<br>श्रावयामास मां प्रीत्या पुराणं पुरुषो हरिः ॥ १४ ॥<br><br>मदन्वये तु ये सूताः सम्भूता वेदवर्जिताः ।<br>तेषां पुराणवक्तृत्वं वृत्तिरासीदजाज्ञया ॥ १५ ॥प्राचीन कालमें वेनके पुत्र पृथुके पैतामह नामक यज्ञ करते समय मायारूपधारी साक्षात् विष्णु ही पौराणिक सूतके रूपमें उत्पन्न हुए। वे सभी शास्त्रोंके प्रवक्ता, धर्मको जाननेवाले तथा वात्सल्यगुणसे सम्पन्न थे। मुनिश्रेष्ठो! प्राचीन कालमें आविर्भूत वही सनातन (विष्णु) मुझे जानो। इस मन्वन्तरमें स्वयं कृष्णद्वैपायन व्यास नामक पुराणपुरुष विष्णुने प्रीतिपूर्वक मुझे पुराण सुनाया। मेरे वंशमें वेदवर्जित जो सूत उत्पन्न हुए, ब्रह्माकी आज्ञासे 'पुराणोंका प्रवचन करना' उनकी वृत्ति हुई ॥ १२–१५॥
स तु वैन्यः पृथुर्धीमान् सत्यसंधो जितेन्द्रियः ।<br>सार्वभौमो महातेजाः स्वधर्मपरिपालकः ॥ १६ ॥<br><br>तस्य बाल्यात् प्रभृत्येष भक्तिर्नारायणेऽभवत् ।<br>गोवर्धनगिरिं प्राप्य तपस्तेपे जितेन्द्रियः ॥ १७ ॥<br><br>तपसा भगवान् प्रीतः शङ्खचक्रगदाधरः ।<br>आगत्य देवो राजानं प्राह दामोदरः स्वयम् ॥ १८ ॥<br><br>धार्मिकौ रूपसम्पन्नौ सर्वशस्त्रभृतां वरौ ।<br>मत्प्रसादादसंदिग्धं पुत्रौ तव भविष्यतः ।<br>एवमुक्त्वा हृषीकेशः स्वकीयां प्रकृतिं गतः ॥ १९ ॥<br><br>वैन्योऽपि वेदविधिना निश्चलां भक्तिमुद्वहन्।<br>अपालयत् स्वकं राज्यं न्यायेन मधुसूदने ॥ २० ॥वेनके पुत्र वे पृथु बुद्धिमान्, सत्यसंकल्प, जितेन्द्रिय, सम्पूर्ण पृथ्वीके स्वामी, महान् तेजस्वी तथा अपने धर्मका पालन करनेवाले थे। उनकी बाल्यकालसे ही नारायणमें भक्ति थी। इन्द्रियजयी पृथुने गोवर्धन पर्वतपर जाकर तप किया। शंख, चक्र तथा गदा धारण करनेवाले भगवान् विष्णु तपस्यासे प्रसन्न हो गये। स्वयं भगवान् दामोदर (विष्णु)-ने उनके पास आकर कहा—मेरी कृपासे निश्चित ही तुम्हें सुन्दर रूपसे सम्पन्न, सभी शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ दो धर्मात्मा पुत्र होंगे। ऐसा कहकर भगवान् हृषीकेश अपने प्राकृतिक रूपमें स्थित हो गये (अपने धाम चले गये)। वैन्य (पृथु) भी भगवान् मधुसूदनमें वैदिक विधानसे निश्चल भक्ति रखते हुए न्यायपूर्वक अपने राज्यका पालन करने लगे ॥ १६–२०॥
अचिरादेव तन्वङ्गी भार्या तस्य शुचिस्मिता ।<br>शिखण्डिनं हविर्धानमन्तर्धाना व्यजायत ॥ २१ ॥<br><br>शिखण्डिनोऽभवत् पुत्रः सुशील इति विश्रुतः ।<br>धार्मिको रूपसम्पन्नो वेदवेदाङ्गपारगः ॥ २२ ॥<br><br>सोऽधीत्य विधिवद् वेदान् धर्मेण तपसि स्थितः ।<br>मतिं चक्रे भाग्ययोगात् संन्यासं प्रति धर्मवित् ॥ २३ ॥<br><br>स कृत्वा तीर्थसंसेवां स्वाध्याये तपसि स्थितः ।<br>जगाम हिमवत्पृष्ठं कदाचित् सिद्धसेवितम् ॥ २४ ॥<br><br>तत्र धर्मपदं नाम धर्मसिद्धिप्रदं वनम्।<br>अपश्यद् योगिनां गम्यमगम्यं ब्रह्मविद्विषाम् ॥ २५ ॥मधुर एवं पवित्र मुसकानवाली तथा कृश शरीरवाली उनकी पत्नी अन्तर्द्धानाने थोड़े ही समयमें शिखण्डी तथा हविर्धान नामक दो पुत्रोंको जन्म दिया। शिखण्डीका पुत्र 'सुशील' नामसे प्रसिद्ध हुआ। वह धार्मिक, रूपसम्पन्न तथा वेद-वेदाङ्गका पारगामी विद्वान् था। विधिपूर्वक वेदोंका अध्ययन कर वह धर्मपूर्वक तपस्यामें स्थित हुआ। भाग्ययोगसे उस धर्मज्ञने संन्यास ग्रहण करनेका विचार किया। वह तीर्थस्थानोंका सेवन करते हुए स्वाध्याय तथा तपस्यामें स्थित रहने लगा। एक बार वह सिद्धोंके द्वारा सेवित हिमालय पर्वतपर गया। वहाँ उसने धर्म एवं सिद्धिको प्रदान करनेवाले, योगियोंके लिये प्राप्य, किंतु ब्रह्मासे द्वेष करनेवालोंके लिये अप्राप्य धर्मपद नामक एक वनको देखा ॥ २१–२५ ॥
  • अध्याय १३ * | ९३ ---|--- तत्र मन्दाकिनी नाम सुपुण्या विमला नदी ।<br>पद्मोत्पलवनोपेता सिद्धाश्रमविभूषिता ॥ २६ ॥<br><br>स तस्या दक्षिणे तीरे मुनीन्द्रैर्यौगिभिर्वृतम् ।<br>सुपुण्यमाश्रमं रम्यमपश्यत् प्रीतिसंयुतः ॥ २७ ॥<br><br>मन्दाकिनीजले स्नात्वा संतर्प्य पितृदेवताः ।<br>अर्चयित्वा महादेवं पुष्पैः पद्मोत्पलादिभिः ॥ २८ ॥<br><br>ध्यात्वार्कसंस्थमीशानं शिरस्याधाय चाञ्जलिम् ।<br>सम्प्रेक्षमाणो भास्वन्तं तुष्टाव परमेश्वरम् ॥ २९ ॥<br><br>रुद्राध्यायेन गिरिशं रुद्रस्य चरितेन च ।<br>अन्यैश्च विविधैः स्तोत्रैः शाम्भवैर्वेदसम्भवैः ॥ ३० ॥ | वहाँ सिद्धोंके आश्रमसे सुशोभित तथा विभिन्न प्रकारके कमल-समूहोंसे सम्पन्न निर्मल जलवाली तथा पुण्य प्रदान करनेवाली मन्दाकिनी नामक एक नदी (प्रवाहित होती) थी। उसने प्रीतिपूर्वक उस मन्दाकिनी नदीके दक्षिण किनारेपर स्थित मुनीन्द्रों तथा योगियोंसे सेवित पुण्यदायी एक रमणीय आश्रम देखा। उसने मन्दाकिनीके जलमें स्नानकर देवस्वरूप पितरोंको (तर्पण आदिसे) संतृप्तकर विभिन्न वर्णके कमल आदि पुष्पोंके द्वारा भगवान् शंकरकी अर्चना की और सूर्यमण्डलमें स्थित भगवान् ईशानका ध्यानकर सिरसे हाथ जोड़ते हुए प्रकाशमान सूर्यका दर्शन करते हुए वह रुद्राष्टाध्यायी, रुद्रके चरित्र एवं और भी अनेक वेदवर्णित विविध प्रकारके शिव-सम्बन्धी स्तोत्रोंके द्वारा परमेश्वर गिरिशकी स्तुति करने लगा॥ २६-३० ॥ अथास्मिन्नन्तरेऽपश्यत् समायान्तं महामुनिम् ।<br>श्वेताश्वतरनामानं महापाशुपतोत्तमम् ॥ ३१ ॥<br><br>भस्मसंदिग्धसर्वाङ्गं कौपीनाच्छादनान्वितम् ।<br>तपसा कर्शितात्मानं शुक्लयज्ञोपवीतिनम् ॥ ३२ ॥<br><br>समाप्य संस्तवं शम्भोरानान्दास्राविलेक्षणः ।<br>ववन्दे शिरसा पादौ प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ॥ ३३ ॥ | इसी बीच उसने समस्त अङ्गोंमें भस्म लगाये हुए, कौपीन वस्त्रसे समन्वित, सफेद यज्ञोपवीत धारण किये हुए, तपस्याके द्वारा क्षीण शरीरवाले उत्तम महापाशुपत श्वेताश्वतर नामवाले महामुनिको समीपमें आते हुए देखा। नेत्रोंमें आनन्दाश्रु भरे हुए उसने भगवान् शंकरकी स्तुति समाप्त कर उनके चरणोंमें सिरसे प्रणाम किया और हाथ जोड़ते हुए यह वाक्य कहा— ॥ ३१-३३ ॥ धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यन्मे साक्षान्मुनीश्वरः ।<br>योगीश्वरोऽद्य भगवान् दृष्टो योगविदां वरः ॥ ३४ ॥ | मैं धन्य हूँ, मैं अनुगृहीत हूँ, जो (आज) मुझे योगज्ञानियोंमें श्रेष्ठ, मुनियोंके ईश्वर साक्षात् भगवान् योगीश्वरके दर्शन हुए। अहो! मेरा बड़ा ही सुन्दर भाग्य है। (आज) मेरे सभी तप सफल हो गये। अनघ! मैं क्या करूँ, आपका मैं शिष्य हूँ, आप मेरी रक्षा करें ॥ ३४-३५ ॥ अहो मे सुमहद्भाग्यं तपांसि सफ़लानि मे ।<br>किं करिष्यामि शिष्योऽहं तव मां पालयानघ ॥ ३५ ॥<br><br>सोऽनुगृह्याथ राजानं सुशीलं शीलसंयुतम् ।<br>शिष्यत्वे परिजग्राह तपसा क्षीणकल्मषम् ॥ ३६ ॥ | तपस्यासे जिसका सम्पूर्ण कल्मष नष्ट हो गया है, ऐसे उस निष्पाप एवं शीलसम्पन्न 'सुशील' नामवाले राजाके ऊपर अनुग्रह करके (शंकरने अपने) शिष्यरूपमें उसे ग्रहण किया। उन बुद्धिमान् (मुनि)-ने संन्यास-सम्बन्धी सम्पूर्ण विधि करवाकर उसे ईश्वर-सम्बन्धी ज्ञान तथा अपनी शाखाद्वारा विहित नियम और पशुरूपी जीवके पाश अर्थात् मायारूपी बन्धनसे मुक्त करनेवाला वह सम्पूर्ण वेदका सार प्रदान किया, साथ ही ब्रह्मा आदिके द्वारा सेवित 'अन्त्याश्रम' नामवाले आश्रमको भी प्रदान किया ॥ ३६-३८ ॥ सांन्यासिकं विधिं कृत्स्नं कारयित्वा विचक्षणः ।<br>ददौ तदैश्वरं ज्ञानं स्वशाखाविहितं व्रतम् ॥ ३७ ॥<br><br>अशेषवेदसारं तत् पशुपाशविमोचनम् ।<br>अन्त्याश्रममिति ख्यातं ब्रह्मादिभिरनुष्ठितम् ॥ ३८ ॥ |
९४* कूर्मपुराण *

उवाच शिष्यान् सम्प्रेक्ष्य ये तदाश्रमवासिनः।
ब्राह्मणान् क्षत्रियान् वैश्यान् ब्रह्मचर्यपरायणान् ॥ ३९ ॥

मया प्रवर्तितां शाखामधीत्यैवेह योगिनः।
समासते महादेवं ध्यायन्तो निष्कलं शिवम् ॥ ४० ॥

इह देवो महादेवो रममाणः सहोमया।
अध्यास्ते भगवानीशो भक्तानामनुकम्पया ॥ ४१ ॥

उस आश्रममें रहनेवाले ब्रह्मचर्यपरायण ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य शिष्योंको देखकर वे (श्वेताश्वतर मुनि) बोले—मेरे द्वारा प्रवर्तित शाखाका अध्ययन करते हुए योगीजन निष्कल महादेव शिवका ध्यान करते हुए यहाँ निवास करते हैं। भक्तोंपर अनुकम्पा करनेके लिये भगवान् महादेव उमाके साथ रमण करते हुए यहाँ विराजमान रहते हैं॥ ३९-४१॥

इहाशेषजगद्धाता पुरा नारायणः स्वयम्।
आराधयन्महादेवं लोकानां हितकाम्यया ॥ ४२ ॥

इहैव देवमीशानं देवानामपि दैवतम्।
आराध्य महतीं सिद्धिं लेभिरे देवदानवाः ॥ ४३ ॥

इहैव मुनयः पूर्वं मरीच्याद्या महेश्वरम्।
दृष्ट्वा तपोबलाज्ज्ञानं लेभिरे सार्वकालिकम् ॥ ४४ ॥

प्राचीन कालमें संसारके कल्याणकी कामनासे समस्त जगत्‌को धारण करनेवाले स्वयं नारायण महादेवकी आराधना करते हुए यहाँ रहते थे। यहींपर देवताओंके भी देवता भगवान् शिवकी आराधना कर देवता तथा दानवोंने महान् सिद्धि प्राप्त की थी और यहींपर प्राचीन कालमें मरीचि आदि ऋषियोंने अपनी तपस्याके प्रभावसे महेश्वरका दर्शनकर सभी कालोंमें उपयोगी—हितकर ज्ञान प्राप्त किया था॥ ४२-४४॥

तस्मात् त्वमपि राजेन्द्र तपयोगसमन्वितः।
तिष्ठ नित्यं मया सार्धं ततः सिद्धिमवाप्स्यसि ॥ ४५ ॥

एवमाभाष्य विप्रेन्द्रो देवं ध्यात्वा पिनाकिनम्।
आचचक्षे महामंत्रं यथावत् स्वार्थसिद्धये ॥ ४६ ॥

सर्वपापोपशमनं वेदसारं विमुक्तिदम्।
अग्निरित्यादिकं पुण्यमृषिभिः सम्प्रवर्तितम् ॥ ४७ ॥

सोऽपि तद्वचनाद् राजा सुशीलः श्रद्धयान्वितः।
साक्षात् पाशुपतो भूत्वा वेदाभ्यासरतोऽभवत् ॥ ४८ ॥

इसलिये राजेन्द्र! तुम भी तप एवं योगसे समन्वित होकर नित्य ही मेरे साथ रहो, इससे तुम सिद्धि प्राप्त करोगे। ऐसा कहकर उन ब्राह्मण-श्रेष्ठ (श्वेताश्वतर मुनि)-ने पिनाक (नामक धनुष) धारण करनेवाले भगवान् (शंकर)-का ध्यान करके स्वार्थ-सिद्धिके लिये सभी पापोंका शमन करनेवाले, वेदसारस्वरूप, मुक्ति प्रदान करनेवाले तथा ऋषियोंद्वारा प्रवर्तित 'अग्नि' इत्यादि पुण्यजनक महामन्त्रका उसे (सुशीलको) विधिपूर्वक उपदेश दिया। उनके कथनानुसार 'सुशील' नामक वह राजा भी बड़ी ही श्रद्धासे साक्षात् पाशुपत होकर वेदाभ्यासमें निरत हो गया॥ ४५-४८॥

भस्मोद्धूलितसर्वाङ्गः कन्दमूलफलाशनः।
शान्तो दान्तो जितक्रोधः संन्यासविधिमाश्रितः ॥ ४९ ॥

हविर्धानस्तथाग्नेय्यां जनयामास सत्सुतम्।
प्राचीनबर्हिषं नाम्ना धनुर्वेदस्य पारगम् ॥ ५० ॥

प्राचीनबर्हिर्भगवान् सर्वशस्त्रभृतां वरः।
समुद्रतनयायां वै दश पुत्रानजीजनत् ॥ ५१ ॥

प्रचेतसस्ते विख्याता राजानः प्रथितौजसः।
अधीतवन्तः स्वं वेदं नारायणपरायणाः ॥ ५२ ॥

दशभ्यस्तु प्रचेतोभ्यो मारिषायां प्रजापतिः।
दक्षो जज्ञे महाभागो यः पूर्वं ब्रह्मणः सुतः ॥ ५३ ॥

अपने सभी अङ्गोंमें भस्म धारणकर कन्द, मूल एवं फलोंका आहार करते हुए शान्त, इन्द्रियजयी एवं क्रोधजयी राजाने संन्यास-विधिका आश्रय लिया। हविर्धानने आग्नेयी नामक अपनी पत्नीसे धनुर्वेदमें पारंगत प्राचीन बर्हिष् नामक श्रेष्ठ पुत्रको उत्पन्न किया। सभी शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ भगवान् प्राचीनबर्हिने समुद्रकी पुत्रीसे दस पुत्रोंको उत्पन्न किया। नारायणपरायण तथा अपने तेजके लिये विख्यात प्रचेतस् नामसे प्रसिद्ध उन राजाओंने अपने वेदका अध्ययन किया। इन्हीं दस प्रचेताओंद्वारा मारिषा (नामक उनकी पत्नी)-से महाभाग प्रजापति दक्ष (पुत्ररूपमें) उत्पन्न हुए, जो पूर्व समयमें ब्रह्माके पुत्र थे॥ ४९-५३॥

* अध्याय १३ *९५
स तु दक्षो महेशेन रुद्रेण सह धीमता।<br>कृत्वा विवादं रुद्रेण शप्तः प्राचेतसोऽभवत्॥ ५४॥उन दक्षने बुद्धिमान् महेश रुद्रके साथ विवाद किया था, इससे रुद्रद्वारा शाप प्राप्तकर वे प्रचेताओके पुत्र बने ॥ ५४ ॥
समायान्तं महादेवो दक्षं देव्या गृहं हरः।<br>दृष्ट्वा यथोचितां पूजां दक्षाय प्रददौ स्वयम् ॥ ५५ ॥<br><br>तदा वै तमसाविष्टः सोऽधिकां ब्रह्मणः सुतः।<br>पूजामनर्हामन्विच्छन् जगाम कुपितो गृहम् ॥ ५६ ॥<br><br>कदाचित् स्वगृहं प्राप्तां सतीं दक्षः सुदुर्मनाः।<br>भर्त्रा सह विनिन्द्यैनां भर्त्सयामास वै रुषा ॥ ५७ ॥महादेव हरने स्वयं देवी (पार्वती)-के घर आये हुए दक्षको देखकर उनकी यथोचित पूजा की। (किंतु) उस समय तमोगुणके आवेशसे समाविष्ट ब्रह्माके पुत्र दक्ष (शंकरद्वारा की गयी अपनी) पूजाको अपर्याप्त और अयोग्य समझकर और भी अधिक पूजाकी इच्छा करनेके कारण कुपित होकर अपने घर चले गये। तदनन्तर कभी दूषित मनवाले दक्षने अपने घर आयी हुई (अपनी पुत्री) सतीकी (उनके) पति (भगवान् शंकर)-के साथ निन्दा करते हुए क्रुद्ध होकर भर्त्सना की ॥ ५५-५७ ॥
अन्ये जामातरः श्रेष्ठा भर्तुस्तव पिनाकिनः ।<br>त्वमप्यसत्सुतास्माकं गृहाद् गच्छ यथागतम् ॥ ५८ ॥<br><br>तस्य तद्वाक्यमाकर्ण्य सा देवी शंकरप्रिया ।<br>विनिन्द्य पितरं दक्षं ददाहात्मानमात्मना ॥ ५९ ॥<br><br>प्रणम्य पशुपतिं भर्तारं कृत्तिवाससम् ।<br>हिमवद्दुहिता साभूत् तपसा तस्य तोषिता ॥ ६० ॥(दक्ष बोले—सती !) तुम्हारे पिनाकधारी पतिसे मेरे अन्य जामाता श्रेष्ठ हैं। तुम भी अच्छी पुत्री नहीं हो, इसलिये मेरे घरसे वहीं चले जाओ जहाँसे आयी हो। शंकरप्रिया उन देवी सतीने उस (कठोर) वाक्यको सुनकर पिता दक्षकी निन्दा की और चर्माम्बरधारी अपने स्वामी पशुपतिको प्रणामकर स्वयं ही उन्होंने (योगाग्निद्वारा) अपनेको भस्म कर डाला। तदनन्तर वे ही हिमालयकी तपस्यासे प्रसन्न होकर उनकी पुत्री बनीं ॥ ५८-६० ॥
ज्ञात्वा तद्भगवान् रुद्रः प्रपन्नार्तिहरो हरः ।<br>शशाप दक्षं कुपितः समागत्याथ तद्गृहम् ॥ ६१ ॥<br><br>त्यक्त्वा देहमिमं ब्रह्मन् क्षत्रियाणां कुलोद्भवः ।<br>स्वस्यां सुतायां मूढात्मन् पुत्रमुत्पादयिष्यसि ॥ ६२ ॥<br><br>एवमुक्त्वा महादेवो ययौ कैलासपर्वतम् ।<br>स्वायम्भुवोऽपि कालेन दक्षः प्राचेतसोऽभवत् ॥ ६३ ॥उस बातको जानकर शरणागतोंका कष्ट हरनेवाले भगवान् रुद्र हर दक्षके घर आये और क्रुद्ध होकर उन्हें शाप दिया। ब्रह्मन् ! मूढात्मन् ! इस शरीरको छोड़कर तुम क्षत्रियोंके कुलमें उत्पन्न होओगे और पापवश अकार्यमें तुम्हारी प्रवृत्ति होगी। ऐसा कहकर महादेव कैलासपर्वतपर चले गये और समय आनेपर स्वायम्भुव दक्ष भी प्रचेताओके पुत्र बने ॥ ६१-६३ ॥
एतद् वः कथितं सर्वं मनोः स्वायम्भुवस्य तु।<br>विसर्गं दक्षपर्यन्तं शृण्वतां पापनाशनम् ॥ ६४ ॥(सूतजीने इस प्रकार कहा—) आप लोगोंसे मैंने स्वायम्भुव मनुकी दक्षपर्यन्त विशेष सृष्टिका वर्णन किया। (यह वर्णन) सुननेवालोंके पापको नष्ट करनेवाला है ॥ ६४ ॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥

इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें तेरहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १३ ॥

९६ * कूर्मपुराण *


चौदहवाँ अध्याय

हरिद्वारमें दक्षद्वारा यज्ञका आयोजन, यज्ञमें शंकरका भाग न देखकर महर्षि दधीचद्वारा दक्षकी भर्त्सना तथा यज्ञमें भाग लेनेवाले ब्राह्मणोंको शाप, देवी पार्वतीके कहने-पर शंकरद्वारा रुद्रों, भद्रकाली तथा वीरभद्रको प्रकट करना, वीरभद्रादिद्वारा दक्षके यज्ञका विध्वंस, शंकर-पार्वतीका यज्ञस्थलमें प्राकट्य, भयभीत दक्षद्वारा शंकर तथा पार्वतीकी स्तुति और वर प्राप्त करना, ब्रह्माद्वारा दक्षको उपदेश और शिव-विष्णुके एकत्वका प्रतिपादन तथा दक्षद्वारा शिवकी शरण ग्रहण करना

नैमिषीया ऊचुःनैमिषीय ऋषि बोले—
देवानां दानवानां च गन्धर्वोरगरक्षसाम्।<br>उत्पत्तिं विस्तरात् सूत ब्रूहि वैवस्वतेऽन्तरे ॥ १ ॥<br>स शप्तः शम्भुना पूर्वं दक्षः प्राचेतसो नृपः।<br>किमकार्षीन्महाबुद्धे श्रोतुमिच्छाम साम्प्रतम् ॥ २ ॥सूतजी महाराज ! वैवस्वत मन्वन्तरमें हुई देवताओं, दानवों, गन्धर्वों, नागों तथा राक्षसोंकी उत्पत्तिको आप विस्तारसे बतलायें। महाबुद्धिमान् सूतजी ! इस समय हम यह सुनना चाहते हैं कि प्राचीन कालमें प्रचेताके पुत्र राजा दक्षने भगवान् शंकरसे शाप प्राप्तकर क्या किया था ॥ १-२ ॥
सूत उवाचसूतजीने कहा—
वक्ष्ये नारायणेनोक्तं पूर्वकल्पानुषङ्गिकम्।<br>त्रिकालबद्धं पापघ्नं प्रजासर्गस्य विस्तरम् ॥ ३ ॥<br>स शप्तः शम्भुना पूर्वं दक्षः प्राचेतसो नृपः।<br>विनिन्द्य पूर्ववैरेण गङ्गाद्वारेऽयजद् भवम् ॥ ४ ॥<br>देवाश्च सर्वे भागार्थमाहूता विष्णुना सह।<br>सहैव मुनिभिः सर्वैरागता मुनिपुङ्गवाः ॥ ५ ॥<br>दृष्ट्वा देवकुलं कृत्स्नं शंकरेण विनागतम्।<br>दधीचो नाम विप्रर्षिः प्राचेतसमथाब्रवीत् ॥ ६ ॥मैं पूर्वकल्पके प्रसंगमें नारायणद्वारा कहे गये (भूत, भविष्य तथा वर्तमान— इस प्रकार) तीनों कालोंसे सम्बद्ध तथा पाप हरनेवाले प्रजा-सर्गको विस्तारसे बतलाता हूँ ॥ ३ ॥<br>प्राचीन कालकी बात है, भगवान् शंकरके शापसे ग्रस्त उन प्रचेतापुत्र राजा दक्षने पूर्व वैरके कारण शंकरकी निन्दा कर गङ्गाद्वार हरिद्वारमें एक यज्ञका अनुष्ठान प्रारम्भ किया। श्रेष्ठ मुनियो! विष्णुके साथ सभी देवता उस यज्ञमें भाग ग्रहण करनेके लिये बुलाये गये। सभी मुनियोंके साथ वे वहाँ आये। शंकरको छोड़कर आये हुए समस्त देव-समूहोंको देखकर दधीच नामक विप्रर्षिने प्राचेतस-दक्षसे (इस प्रकार) कहा— ॥ ४-६ ॥
दधीच उवाचदधीच बोले—
ब्रह्मादयः पिशाचान्ता यस्याज्ञानुविधायिनः।<br>स देवः साम्प्रतं रुद्रो विधिना किं न पूज्यते ॥ ७ ॥ब्रह्मा आदिसे लेकर पिशाचतक जिनकी आज्ञाका शीघ्र ही अनुपालन करते हैं, उन रुद्रदेवकी पूजा इस समय क्यों नहीं की जा रही है ? ॥ ७ ॥
दक्ष उवाचदक्षने कहा—
सर्वेष्वेव हि यज्ञेषु न भागः परिकल्पितः।<br>न मन्त्रा भार्यया सार्धं शंकरस्येति नेज्यते ॥ ८ ॥<br>विहस्य दक्षं कुपितो वचः प्राह महामुनिः।<br>शृण्वतां सर्वदेवानां सर्वज्ञानमयः स्वयम् ॥ ९ ॥सभी यज्ञोंमें भार्यासहित शंकरके भाग एवं मन्त्रोंकी परिकल्पना नहीं हुई है, इसलिये उनकी पूजा नहीं की जाती। इसपर साक्षात् सर्वज्ञानमय महामुनि दधीचने कोपपूर्वक हँसते हुए सभी देवताओंको सुनाते हुए दक्षसे कहा— ॥ ८-९ ॥
* अध्याय १४ *९७
दधीच उवाच<br>यतः प्रवृत्तिर्विश्वेषां यश्चास्य परमेश्वरः।<br>सम्पूज्यते सर्वयज्ञैर्विदित्वा किल शंकरः॥ १०॥<br>दक्ष उवाच<br>न ह्ययं शंकरो रुद्रः संहर्ता तामसो हरः।<br>नग्नः कपाली विकृतो विश्वात्मा नोपपद्यते॥ ११॥<br>ईश्वरो हि जगत्स्रष्टा प्रभुनारायणः स्वराट्।<br>सत्त्वात्मकोऽसौ भगवानिज्यते सर्वकर्मसु॥ १२॥<br>दधीच उवाच<br>किं त्वया भगवानेष सहस्त्रांशुर्न दृश्यते।<br>सर्वलोकैकसंहर्ता कालात्मा परमेश्वरः॥ १३॥<br>यं गृणन्तीह विद्वांसो धार्मिका ब्रह्मवादिनः।<br>सोऽयं साक्षी तीव्ररोचिः कालात्मा शांकरी तनुः॥ १४॥<br>एष रुद्रो महादेवः कपर्दी च घृणी हरः।<br>आदित्यो भगवान् सूर्यो नीलग्रीवो विलोहितः॥ १५॥<br>संस्तूयते सहस्त्रांशुः सामगाध्वर्युहोतृभिः।<br>पश्यैनं विश्वकर्माणं रुद्रमूर्तिं त्रयीमयम्॥ १६॥<br>दक्ष उवाच<br>य एते द्वादशादित्या आगता यज्ञभागिनः।<br>सर्वे सूर्या इति ज्ञेया न ह्यन्यो विद्यते रविः॥ १७॥<br>एवमुक्ते तु मुनयः समायाता दिदृक्षवः।<br>बाढमित्यब्रुवन् वाक्यं तस्य साहाय्यकारिणः॥ १८॥<br>तमसाविष्टमनसो न पश्यन्ति वृषध्वजम्।<br>सहस्त्रशोऽथ शतशो भूय एव विनिन्द्यते॥ १९॥<br>निन्दन्तो वैदिकान् मन्त्रान् सर्वभूतपतिं हरम्।<br>अपूजयन् दक्षवाक्यं मोहिता विष्णुमायया॥ २०॥<br>देवाश्च सर्वे भागार्थमागता वासवादयः।<br>नापश्यन् देवमीशानमृते नारायणं हरिम्॥ २१॥<br>हिरण्यगर्भो भगवान् ब्रह्मा ब्रह्मविदां वरः।<br>पश्यतामेव सर्वेषां क्षणादन्तरधीयत॥ २२॥दधीच बोले—जिनसे सभीकी प्रवृत्ति होती है और जो इस (विश्व)-के परमेश्वर हैं, वे शंकर निश्चय ही सभी यज्ञोंद्वारा ज्ञानपूर्वक पूजित होते हैं॥ १०॥<br>दक्षने कहा—संहार करनेवाले, तमोगुणी, नग्न, कपाल धारण करनेवाले तथा विकृत (वेशवाले) रुद्र, हर, शंकर किसी भी प्रकार विश्वात्मा नहीं हो सकते। संसारकी सृष्टि करनेवाले स्वराट्, प्रभु नारायण ही ईश्वर हैं और सभी कर्मोंमें उन सत्त्वात्मक भगवान् विष्णुकी पूजा की जाती है॥ ११-१२॥<br>दधीच बोले—क्या तुम समस्त लोकोंके एकमात्र संहारकर्ता कालस्वरूप, तथा हजारों किरणोंवाले इन परमेश्वर भगवान् (सूर्य)-को नहीं देख रहे हो। धर्मात्मा, ब्रह्मवादी विद्वान् जिनकी स्तुति करते हैं, वही ये (सूर्य) तीव्र तेजसे सम्पन्न कालात्मक साक्षी यहाँ शंकरके शरीररूपमें ही स्थित हैं। देवी अदितिके पुत्र ये भगवान् सूर्य ही रुद्र, महादेव, कपर्दी, घृणी, हर, नीलग्रीव, विलोहित (नामवाले) हैं। सामवेदका गान करनेवाले तथा अध्वर्यु एवं होताओंके द्वारा हजारों किरणोंवाले सूर्यकी स्तुति की जाती है। विश्वको बनानेवाले त्रयीमय—ऋक्, यजुः तथा सामवेदस्वरूप रुद्रकी मूर्तिको देखो॥ १३—१६॥<br>दक्षने कहा—यज्ञमें भाग ग्रहण करनेवाले ये जो बारह (अदिति-पुत्र) आदित्य यहाँ आये हुए हैं, ये सभी सूर्यके नामसे ही जाने जाते हैं। इनसे अतिरिक्त कोई अन्य सूर्य नहीं हैं। ऐसा कहनेपर यज्ञ देखनेकी इच्छासे आये हुए उनके (दक्षके) सहयोगी मुनियोंने (समर्थन करते हुए) दक्षसे कहा—ठीक है। तमोगुणसे आविष्ट मनवाले सैकड़ों-हजारोंकी संख्यामें आये हुए उन लोगोंने भगवान् वृषध्वज शंकरको न देखते हुए पुनः उनकी निन्दा करनी आरम्भ की। विष्णुकी मायासे मोहित होकर वे वैदिक मन्त्रोंकी निन्दा करते हुए सभी प्राणियोंके एकमात्र स्वामी भगवान् हरकी पूजा न करके दक्षके वचनका अनुमोदन करने लगे। यज्ञमें भाग ग्रहण करनेके लिये आये हुए इन्द्रादि सभी देवताओोंने भी नारायण हरिके अतिरिक्त देव ईशान (शंकर)-को भी नहीं देखा (अर्थात् शिवके माहात्म्यको वे जान नहीं पाये)। ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ हिरण्यगर्भ भगवान् ब्रह्मा सभीके देखते-देखते क्षणभरमें ही अन्तर्धान हो गये॥ १७—२२॥

९८ * कूर्मपुराण *


अन्तर्हिते भगवति दक्षो नारायणं हरिम्।
रक्षकं जगतां देवं जगाम शरणं स्वयम्॥ २३॥

प्रवर्तयामास च तं यज्ञं दक्षोऽथ निर्भयः।
रक्षते भगवान् विष्णुः शरणागतरक्षकः॥ २४॥

पुनः प्राह च तं दक्षं दधीचो भगवानृषिः।
सम्प्रेक्ष्यर्षिगणाम् देवान् सर्वान् वै ब्रह्मविद्विषः॥ २५॥

अपूज्यपूजने चैव पूज्यानां चाप्यपूजने।
नरः पापमवाप्नोति महत् वै नात्र संशयः॥ २६॥

असतां प्रग्रहो यत्र सतां चैव विमानना।
दण्डो देवकृतस्तत्र सद्यः पतति दारुणः॥ २७॥

एवमुक्त्वा तु विप्रर्षिः शशापेश्वरविद्विषः।
समागतान् ब्राह्मणांस्तान् दक्षसाहाय्यकारिणः॥ २८॥

यस्माद् बहिष्कृता वेदा भवद्भिः परमेश्वरः।
विनिन्दितो महादेवः शंकरो लोकवन्दितः॥ २९॥

भगवान् ब्रह्माके अन्तर्धान हो जानेपर स्वयं दक्ष संसारकी रक्षा करनेवाले देव नारायण हरिकी शरणमें गये। तदनन्तर भयसे मुक्त होकर दक्षने वह यज्ञ आरम्भ किया। शरणागतकी रक्षा करनेवाले भगवान् विष्णु (उस यज्ञकी) रक्षा करने लगे। भगवान् दधीच ऋषिने ब्रह्म (शंकर)-से द्वेष माननेवाले उन सभी ऋषिगणों तथा देवताओंकी ओर देखकर उन दक्षसे पुनः कहा—जो अपूज्य है, उसका पूजन करनेसे और जो पूज्य है, उसका पूजन न करनेसे मनुष्य निश्चित ही महान् पापको प्राप्त करता है, इसमें किंचित् भी संदेह नहीं है। जहाँ दुर्जनोंका आदर होता है और सत्पुरुषोंका अनादर होता है, वहाँ अति शीघ्र ही दारुण दैवी दण्ड उपस्थित होता है। ऐसा कहकर विप्रर्षि दधीचने दक्षकी सहायता करनेके लिये आये हुए उन ईश्वर (शंकर)-से विद्वेष रखनेवाले ब्राह्मणोंको शाप देते हुए कहा—॥ २३-२८॥

चूँकि तुम लोगोंने वेदोंकी अवमानना की है और समस्त संसारके द्वारा वन्दित परमेश्वर महादेव शंकरकी निन्दा की है, अतः ईश्वर (शंकर)-से द्वेष रखनेवाले तुम सभी वेदत्रयीसे रहित हो जाओगे और असत्-शास्त्रोंमें मन लगाते हुए ईश्वर-मार्ग (शिव-मार्ग)-की निन्दा करोगे तथा घोर कलियुग आनेपर मिथ्या अध्ययन और मिथ्या आचारयुक्त होकर मिथ्या ज्ञानका प्रलाप करनेवाले होओगे, साथ ही कलिके द्वारा उत्पन्न कष्ट एवं दुःखों आदिसे पीड़ित रहोगे। पुनः तुम सभी अपने सम्पूर्ण तपोबलका त्याग करके नरक प्राप्त करोगे। तुम लोगोंके द्वारा हृषीकेश विष्णुके भलीभाँति आश्रय ग्रहण करनेपर भी वे तुम लोगोंसे विमुख ही रहेंगे॥ २९-३२॥

भविष्यध्वं त्रयीबाह्याः सर्वेऽपीश्वरविद्विषः।
निन्दन्तो हौश्वरं मार्गं कुशास्त्रासक्तमानसाः॥ ३०॥

मिथ्याधीतसमाचारा मिथ्याज्ञानप्रलापिनः।
प्राप्य घोरं कलियुगं कलिजैः किल पीडिताः॥ ३१॥

त्यक्त्वा तपोबलं कृत्स्नं गच्छध्वं नरकान् पुनः।
भविष्यति हृषीकेशः स्वाश्रितोऽपि पराङ्मुखः॥ ३२॥

एवमुक्त्वा तु विप्रर्षिर्विरराम तपोनिधिः।
जगाम मनसा रुद्रमशेषाघविनाशनम्॥ ३३॥

एतस्मिन्नन्तरे देवी महादेवं महेश्वरम्।
पतिं पशुपतिं देवं ज्ञात्वैतत् प्राह सर्वदृक्॥ ३४॥

ऐसा कहकर तपस्याकी निधि वे विप्रर्षि (दधीच) चुप हो गये और मानसिक रूपसे सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाले रुद्रकी शरणमें गये। इसी बीच यह सारी घटना जानकर सर्वदर्शी (सब कुछ प्रत्यक्ष देखनेवाली) देवी (पार्वती)-ने (अपने) पतिदेव पशुपति महादेव महेश्वरसे कहा—॥ ३३-३४॥

देव्युवाच
देवी बोलीं—शंकर! पूर्वजन्मके मेरे (सतीके) पिता दक्ष यज्ञ कर रहे हैं और आपके भाव तथा स्वरूपकी निन्दा कर रहे हैं। ऋषियोंके साथ देवता वहाँ उनकी सहायता करते हुए उपस्थित हैं। मैं आपसे एक वर माँगती हूँ कि 'आप शीघ्र ही उस यज्ञको नष्ट करें'॥ ३५-३६॥

दक्षो यज्ञेन यजते पिता मे पूर्वजन्मनि।
विनिन्द्य भवतो भावमात्मानं चापि शंकर॥ ३५॥

देवाः सहर्षिभिश्चासँस्तत्र साहाय्यकारिणः।
विनाशयाशु तं यज्ञं वरमेकं वृणोम्यहम्॥ ३६॥

* अध्याय १४ *९९
एवं विज्ञापितो देव्या देवो देववरः प्रभुः।<br>ससर्ज सहसा रुद्रं दक्षयज्ञजिघांसया ॥ ३७ ॥<br><br>सहस्रशीर्षपादं च सहस्राक्षं महाभुजम्।<br>सहस्रपाणिं दुर्धर्षं युगान्तानलसंनिभम् ॥ ३८ ॥<br><br>दंष्ट्राकरालं दुष्प्रेक्ष्यं शङ्खचक्रगदाधरम्।<br>दण्डहस्तं महानादं शार्ङ्गिणं भूतिभूषणम् ॥ ३९ ॥<br><br>वीरभद्र इति ख्यातं देवदेवसमन्वितम्।<br>स जातमात्रो देवेशमुपतस्थे कृताञ्जलिः ॥ ४० ॥देवीके द्वारा ऐसा कहे जानेपर देवताओंमें श्रेष्ठ प्रभु भगवान् (शंकर)-ने दक्षके यज्ञका विध्वंस करनेके लिये शीघ्र ही हजारों सिर एवं पैरवाले, हजारों आँखवाले, विशाल भुजायुक्त, हजारों हाथवाले, दुर्जेय प्रलयकालीन अग्निके समान, भयंकर दाढ़युक्त, देखनेमें भयंकर, शंख, चक्र तथा गदा धारण किये, हाथमें दण्ड धारण करनेवाले, घोर नाद करनेवाले, सींगसे बने धनुषको धारण किये, विभूतिसे सुशोभित तथा अनेक देवताओंसे घिरे हुए वीरभद्र नामवाले रुद्रको उत्पन्न किया। उत्पन्न होते ही वह हाथ जोड़कर देवताओंके स्वामी भगवान् शंकरके सम्मुख उपस्थित हुआ ॥ ३७—४० ॥
तमाह दक्षस्य मखं विनाशय शिवोऽस्त्विति।<br>विनिन्द्य मां स यजते गङ्गाद्वारे गणेश्वर ॥ ४१ ॥<br><br>ततो बन्धुप्रयुक्तेन सिंहेनैकेन लीलया।<br>वीरभद्रेण दक्षस्य विनाशमगमत् क्रतुः ॥ ४२ ॥<br><br>मन्युना चोमया सृष्टा भद्रकाली महेश्वरी।<br>तया च सार्धं वृषभं समारुह्य ययौ गणः ॥ ४३ ॥<br><br>अन्ये सहस्रशो रुद्रा निसृष्टास्तेन धीमता।<br>रोमजा इति विख्यातास्तस्य साहाय्यकारिणः ॥ ४४ ॥<br><br>शूलशक्तिगदाहस्ताष्टङ्कोपलकराज्जथा ।<br>कालाग्निरुद्रसंकाशा नादयन्तो दिशो दश ॥ ४५ ॥<br><br>सर्वे वृषासनारूढाः सभार्याश्चातिभीषणाः।<br>समावृत्य गणश्रेष्ठं ययुर्दक्षमखं प्रति ॥ ४६ ॥(शंकरने उससे कहा—) गणेश्वर! दक्षके यज्ञका विध्वंस करो, वह गङ्गाद्वार (हरिद्वार)-में मेरी निन्दा करते हुए यज्ञ कर रहा है। तुम्हारा कल्याण हो। तदनन्तर बन्धु (शिव)-के द्वारा निर्दिष्ट वीरभद्रने सिंहके समान लीला करते हुए अकेले ही दक्षके यज्ञका विध्वंस कर दिया। उमाने भी क्रोध करते हुए महेश्वरी भद्रकालीको उत्पन्न किया, उसके साथ वृषभपर आरूढ़ होकर वह गण (वीरभद्र) वहाँ (गङ्गाद्वार यज्ञमें) गया। बुद्धिमान् उन शंकरने उनकी सहायता करनेवाले हजारों दूसरे रुद्रोंको भी उत्पन्न किया। (शंकरके) रोमोंसे उत्पन्न होनेके कारण वे रुद्र 'रोमज' कहलाये। हाथोंमें त्रिशूल, शक्ति, गदा, टङ्क (पत्थर तोड़नेके हथियार—घन, हथौड़ा, छेनी आदि) तथा पत्थर लिये हुए और कालाग्नि रुद्रके समान अत्यन्त भीषण सभी अपनी-अपनी भार्याओंके साथ वृषभरूप आसनपर आरूढ़ होकर दसों दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए गणोंमें सर्वश्रेष्ठ वीरभद्रको अपने समूहके बीच रखते हुए जहाँ दक्षयज्ञ हो रहा था, उस ओर चल पड़े ॥ ४१—४६ ॥
सर्वे सम्प्राप्य तं देशं गङ्गाद्वारमिति श्रुतम्।<br>ददृशुर्यज्ञदेशं तं दक्षस्यामिततेजसः ॥ ४७ ॥<br><br>देवाङ्गनासहस्राढ्यमप्सरोगीतिनादितम् ।<br>वीणावेणुनिनादाढ्यं वेदवादाभिनादितम् ॥ ४८ ॥<br><br>दृष्ट्वा सहर्षिभिर्देवैः समासीनं प्रजापतिम्।<br>उवाच भद्रया रुद्रैर्वीरभद्रः स्मयन्निव ॥ ४९ ॥गङ्गाद्वार (हरिद्वार) नामसे प्रसिद्ध उस देशमें पहुँचकर उन सभीने अमित तेजस्वी दक्षके उस यज्ञस्थलको देखा, जो हजारों देवाङ्गनाओंसे सुशोभित था, अप्सराओंके गीतोंसे मुखरित था, वीणा तथा वेणुके निनादसे प्रतिध्वनित और वेद-मन्त्रोंसे गुञ्जित था। देवताओं तथा ऋषियोंके साथ बैठे हुए प्रजापति दक्षको देखकर भद्रकाली तथा रुद्रोंसहित वीरभद्रने हँसते हुए कहा— ॥ ४७—४९ ॥

१०० * कूर्मपुराण *


वयं ह्यनुचराः सर्वे शर्वस्यामिततेजसः।<br>भागाभिलिप्सया प्राप्ता भागान् यच्छध्वमीप्सितान्॥ ५० ॥हम सभी अमित तेजस्वी शंकरके अनुचर हैं, यज्ञमें भाग प्राप्त करनेकी इच्छासे यहाँ आये हैं, आप हमें अभीप्सित यज्ञभाग प्रदान करें। अथवा श्रेष्ठ मुनियो और देवताओ! आप हमें यह बतलायें कि किसने आपको ऐसी आज्ञा दी है कि मुझे यज्ञभाग न दें और आप लोगोंका ही सब भाग है। जो ऐसी आज्ञा देनेवाला है, उसे बतलायें, फिर हम उसे देख लेंगे। गणोंके स्वामी वीरभद्रके ऐसा कहे जानेपर प्रजापति दक्षसहित देवताओंने प्रभु (वीरभद्र)-से कहा—'आपको यज्ञभाग देने-सम्बन्धी मन्त्र नहीं हैं'॥ ५०–५२॥<br><br>(यह सुनकर वेद-) मन्त्रोंने (मूर्तिमान् स्वरूप धारणकर) देवताओंसे कहा—आपका मन तमोगुणसे आक्रान्त हो गया है, इसीलिये आप यज्ञके स्वामी महेश्वरकी पूजा नहीं कर रहे हैं। सभी प्राणियोंके एकमात्र स्वामी और सभी प्राणियोंके शरीर-रूप तथा समस्त अभ्युदय एवं सिद्धियोंको प्रदान करनेवाले हर (शंकर) सभी यज्ञोंमें पूजित होते हैं। ईशान अर्थात् शंकरके बारेमें ऐसा कहे जानेपर भी मायाके कारण नष्ट चेतनावाले देवोंने (जब उनकी बातको) नहीं माना, तब मन्त्र उन्हें छोड़कर अपने स्थानको चले गये। तदनन्तर भार्या और गणेश्वरोंसहित उन (वीरभद्रस्वरूप) रुद्रने ब्रह्मर्षि दधीचको हाथोंसे स्पर्श करते हुए देवताओंसे कहा— ॥ ५३–५६ ॥<br><br>तुम लोगोंने अपने बलसे गर्वित होकर मन्त्रोंको प्रमाण नहीं माना, इसलिये इसे सहन न कर मैं आज बलपूर्वक सभीके गर्वको नष्ट करूँगा। ऐसा कहकर गणोंमें श्रेष्ठ वीरभद्रने उस यज्ञशालाको जला डाला और गणेश्वरोंने अत्यन्त क्रुद्ध होकर (यज्ञशालाके) यूपों (स्तम्भों)-को उखाड़कर फेंक दिया। भयानक सभी गणेश्वरोंने आहुति देनेवालोंसहित पाठ करनेवालों एवं घोड़ेको भी पकड़कर गङ्गाके प्रवाहमें फेंक दिया। प्रदीप्त आत्मावाले तथा दीनतारहित वीरभद्रने भी इन्द्रके उठे हुए सौ हाथों तथा अन्य देवताओंके उठे हुए हाथोंको स्तम्भित कर दिया। उन्होंने नाखूनोंके अग्रभागसे खेल-खेलमें ही भग (देवता)-के नेत्रोंको उखाड़ डाला, मुक्केसे मारकर पूषा (देवता)-के दाँतोंको तोड़ डाला ॥ ५७–६१ ॥
अथ चेत् कस्यचिदियमाज्ञा मुनिसुरोत्तमाः।<br>भागो भवद्भ्यो देयस्तु नास्मभ्यमिति कथ्यताम्।<br>तं ब्रूताज्ञापयति यो वेत्स्यामो हि वयं ततः ॥ ५१ ॥
एवमुक्ता गणेशेन प्रजापतिपुरःसराः।<br>देवा ऊचुर्यज्ञभागे न च मन्त्रा इति प्रभुम्॥ ५२ ॥
मन्त्रा ऊचुः सुरान् यूयं तमोपहतचेतसः।<br>ये नाध्वरस्य राजानं पूजयध्वं महेश्वरम्॥ ५३ ॥
ईश्वरः सर्वभूतानां सर्वभूततनुर्हरः।<br>पूज्यते सर्वयज्ञेषु सर्वाभ्युदयसिद्धिदः॥ ५४ ॥
एवमुक्ता अपीशानं मायया नष्टचेतसः।<br>न मेनिरे ययुर्मन्त्रा देवान् मुक्त्वा स्वमालयम्॥ ५५ ॥
ततः स रुद्रो भगवान् सभार्यः सगनेश्वरः।<br>स्पृशन् कराभ्यां ब्रह्मर्षिं दधीचं प्राह देवताः॥ ५६ ॥
मन्त्राः प्रमाणं न कृता युष्माभिर्बलगर्वितैः।<br>यस्मात् प्रसह्म तस्माद् वो नाशयाम्यद्य गर्वितम्॥ ५७ ॥
इत्युक्त्वा यज्ञशालां तां ददाह गणपुङ्गवः।<br>गणेश्वराश्च संक्रुद्धा यूपानुत्पाट्य चिक्षिपुः॥ ५८ ॥
प्रस्तोत्रा सह होत्रा च अश्वं चैव गणेश्वराः।<br>गृहीत्वा भीषणाः सर्वे गङ्गास्रोतसि चिक्षिपुः॥ ५९ ॥
वीरभद्रोऽपि दीप्तात्मा शक्रस्योद्यच्छतः करम्।<br>व्यष्टम्भयददीनात्मा तथान्येषां दिवौकसाम्॥ ६० ॥
भगस्य नेत्रे चोत्पाट्य करजाग्रेण लीलया।<br>निहत्य मुष्टिना दन्तान् पूष्णश्चैवमपातयत्॥ ६१ ॥
* अध्याय १४ *१०१
तथा चन्द्रमसं देवं पादाङ्गुष्ठेन लीलया।<br>धर्षयामास बलवान् स्मयमानो गणेश्वरः॥ ६२॥<br><br>वह्नेर्हस्तद्वयं छित्त्वा जिह्वामुत्पाट्य लीलया।<br>जघान मूर्ध्नि पादेन मुनीनपि मुनीश्वराः॥ ६३॥<br><br>तथा विष्णुं सगरुडं समायान्तं महाबलः।<br>विव्याध निशितैर्बाणैः स्तम्भयित्वा सुदर्शनम्॥ ६४॥<br>समालोक्य महाबाहुरगत्य गरुडो गणम्।<br>जघान पक्षैः सहसा ननादाम्बुनिधिर्यथा॥ ६५॥<br><br>ततः सहस्त्रशो भद्रः ससर्ज गरुडान् स्वयम्।<br>वैनतेयादभ्यधिकान् गरुडं ते प्रदुद्रुवुः॥ ६६॥<br><br>तान् दृष्ट्वा गरुडो धीमान् पलायत महाजवः।<br>विसृज्य माधवं वेगात् तदद्भुतमिवाभवत्॥ ६७॥<br><br>अन्तर्हिते वैनतेये भगवान् पद्मसम्भवः।<br>आगत्य वारयामास वीरभद्रं च केशवम्॥ ६८॥<br>प्रसादयामास च तं गौरवात् परमेष्ठिनः।<br>संस्तूय भगवानीशः साम्बस्तत्रागमत् स्वयम्॥ ६९॥<br><br>वीक्ष्य देवाधिदेवं तं साम्बं सर्वगणैर्वृतम्।<br>तुष्टाव भगवान् ब्रह्मा दक्षः सर्वे दिवौकसः॥ ७०॥<br><br>विशेषात् पार्वतीं देवीमीश्वरार्धशरीरिणीम्।<br>स्तोत्रैर्नानाविधैर्दक्षः प्रणम्य च कृताञ्जलिः॥ ७१॥<br><br>ततो भगवती देवी प्रहसन्ती महेश्वरम्।<br>प्रसन्नमानसा रुद्रं वचः प्राह घृणानिधिः॥ ७२॥<br>त्वमेव जगतः स्रष्टा शासिता चैव रक्षकः।<br>अनुग्राह्यो भगवता दक्षश्चापि दिवौकसः॥ ७३॥<br><br>ततः प्रहस्य भगवान् कपर्दी नीललोहितः।<br>उवाच प्रणतान् देवान् प्राचेतसमथो हरः॥ ७४॥<br><br>गच्छध्वं देवताः सर्वाः प्रसन्नो भवतामहम्।<br>सम्पूज्यः सर्वयज्ञेषु न निन्द्योऽहं विशेषतः॥ ७५॥इसी प्रकार लीला करते हुए बलशाली गणेश्वर वीरभद्रने हँसकर पैरके अँगूठेसे चन्द्रमाको धर्षित कर (रौंद) दिया। अग्नि (देवता)-के दोनों हाथोंको काटकर लीलासे ही उनकी जीभ उखाड़ दी। मुनीश्वरो! उन्होंने पैरसे मुनियोंके मस्तकपर भी प्रहार किया। साथ ही (उस) महाबली (वीरभद्र)-ने सुदर्शनचक्रको स्तम्भित कर गरुडपर बैठकर आते हुए विष्णुको भी तीक्ष्ण बाणोंसे विद्ध (चोटिल) कर दिया॥ ६२-६४॥<br><br>महाबाहु गरुडने वहाँ आकर गण (वीरभद्र)-को देखकर अचानक उन्हें अपने पंखोंसे मारा और समुद्रके समान गर्जन किया। तदनन्तर उन वीरभद्रने भी स्वयं हजारों गरुडोंको उत्पन्न कर डाला, जो विनतापुत्र गरुडसे भी अधिक बलशाली थे, वे सभी गरुडके ऊपर टूट पड़े। उन (वीरभद्रद्वारा उत्पन्न) गरुडोंको देखकर बुद्धिमान् वे गरुड विष्णुको छोड़कर बड़े ही वेगसे भाग उठे, यह एक आश्चर्यकी बात थी। विनताके पुत्र गरुडके अन्तर्धान हो जानेपर कमलसे उत्पन्न भगवान् ब्रह्माने वहाँ उपस्थित होकर वीरभद्र तथा केशवको (युद्ध करनेसे) रोका॥ ६५-६८॥<br><br>परमेष्ठी ब्रह्माकी महत्ताको समझकर (वीरभद्रने उनकी) स्तुति कर उन्हें प्रसन्न किया। (उस समय) पार्वतीसहित साक्षात् भगवान् शंकर भी वहाँ आये। सभी गणोंसे घिरे हुए पार्वतीसहित उन देवाधिदेव शंकरको देखकर भगवान् ब्रह्मा, दक्ष तथा द्युलोकमें रहनेवाले सभी देवता उनकी (भगवान् शंकरकी) स्तुति करने लगे। दक्षने विशेषरूपसे शंकरकी अर्धाङ्गिनी देवी पार्वतीको हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए नाना प्रकारके स्तोत्रोंसे प्रसन्न किया। तदनन्तर दयाकी निधि देवी भगवतीने हँसते हुए प्रसन्न-मनसे महेश्वर रुद्रसे यह वचन कहा- ॥ ६९-७२॥<br><br>आप ही संसारकी सृष्टि करनेवाले तथा आप ही शासन करनेवाले एवं रक्षक हैं। आप भगवान्‌को दक्ष तथा देवताओंपर कृपा करनी चाहिये। तदनन्तर जटा धारण करनेवाले नीललोहित भगवान् हरने हँसकर देवताओं तथा प्रचेतापुत्र दक्षसे कहा-॥ ७३-७४॥<br><br>देवताओ! आप सभी लोग जायें। मैं आपपर प्रसन्न हूँ। सभी यज्ञोंमें विशेषरूपसे मेरी पूजा करनी चाहिये और मेरी निन्दा नहीं करनी चाहिये॥ ७५॥

१०२ * कूर्मपुराण *

त्वं चापि शृणु मे दक्ष वचनं सर्वरक्षणम्। त्यक्त्वा लोकैषणानेतां मद्भक्तो भव यत्नतः ॥ ७६ ॥

भविष्यसि गणेशानः कल्पान्तेऽनुग्रहान्मम । तावत् तिष्ठ ममादेशात् स्वाधिकारेषु निर्वृतः ॥ ७७ ॥

एवमुक्त्वा स भगवान् सपत्नीकः सहानुगः। अदर्शनमनुप्राप्तो दक्षस्यामिततेजसः ॥ ७८ ॥

अन्तर्हिते महादेवे शंकरे पद्मसंभवः। व्याजहार स्वयं दक्षमशेषजगतो हितम् ॥ ७९ ॥

ब्रह्मोवाच

किं तवापगतो मोहः प्रसन्ने वृषभध्वजे । यदाचष्ट स्वयं देवः पालयैतदतन्द्रितः ॥ ८० ॥

सर्वेषामेव भूतानां हृद्येष वसतीश्वरः । पश्यन्त्येनं ब्रह्मभूता विद्वांसो वेदवादिनः ॥ ८१ ॥

स आत्मा सर्वभूतानां स बीजं परमा गतिः । स्तूयते वैदिकैर्मन्त्रैर्देवदेवो महेश्वरः ॥ ८२ ॥

तमर्चयति यो रुद्रं स्वात्मन्येकं सनातनम् । चेतसा भावयुक्तेन स याति परमं पदम् ॥ ८३ ॥

तस्मादनादिमध्यान्तं विज्ञाय परमेश्वरम् । कर्मणा मनसा वाचा समाराधय यत्नतः ॥ ८४ ॥

यत्नात् परिहरेशस्य निन्दाम आत्मविनाशिनीम् । भवन्ति सर्वदोषाय निन्दकस्य क्रिया यतः ॥ ८५ ॥

यस्त्वैष महायोगी रक्षको विष्णुरव्ययः । स देवदेवो भगवान् महादेवो न संशयः ॥ ८६ ॥

मन्यन्ते ये जगद्योनिं विभिन्नं विष्णुमीश्वरात् । मोहाद्वेदवनिष्ठत्वात् ते यान्ति नरकं नराः ॥ ८७ ॥

वेदानुवर्तिनो रुद्रं देवं नारायणं तथा । एकीभावेन पश्यन्ति मुक्तिभाजो भवन्ति ते ॥ ८८ ॥

यो विष्णुः स स्वयं रुद्रो यो रुद्रः स जनार्दनः । इति मत्वा यजेद् देवं स याति परमां गतिम् ॥ ८९ ॥

हे दक्ष! तुम भी सभीकी रक्षा करनेमें समर्थ मेरे वचनको सुनो- तुम 'मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ' इस लोकैषणा (यशकी इच्छा)-का परित्यागकर प्रयत्नपूर्वक मेरे भक्त बनो। इस कल्पके बीत जानेपर मेरी कृपासे तुम गणोंके अधिपति बनोगे। मेरे आदेशसे उस समयतक तुम अपने अधिकारपर शान्तिसे बने रहो॥ ७६-७७॥

ऐसा कहकर वे भगवान् शंकर पत्नी पार्वती तथा अपने अनुचरोंसहित अमित तेजस्वी दक्षके लिये अन्तर्धान (अदृश्य) हो गये। महादेव शंकरके अन्तर्धान हो जानेपर साक्षात् पद्मोद्भव ब्रह्माने समस्त संसारके लिये कल्याणकारी वचन कहे- ॥ ७८-७९॥

ब्रह्माजीने कहा-(दक्ष!) वृषभध्वज शंकरके प्रसन्न हो जानेपर क्या तुम्हारा मोह दूर हुआ? साक्षात् भगवान्ने जो तुमसे कहा है, आलस्यरहित होकर उसका पालन करो। ये परमेश्वर सभी प्राणियोंके हृदयमें निवास करते हैं। वेदवादी ब्रह्मस्वरूप विद्वान् लोग इनका दर्शन करते हैं। वे सभी प्राणियोंके आत्मा, वे ही बीजरूप तथा परम गति हैं। वैदिक मन्त्रोंके द्वारा देवदेव महेश्वरकी स्तुति की जाती है। जो उस अद्वितीय सनातन रुद्रकी अपनी आत्मामें श्रद्धायुक्त मनसे आराधना करता है, वह परमपद अर्थात् मोक्ष प्राप्त करता है। इसलिये आदि, मध्य और अन्तसे रहित परमेश्वरको जानकर मन, वाणी तथा कर्मसे प्रयत्नपूर्वक उनकी आराधना करो॥ ८०-८४॥

अपना ही विनाश कर डालनेवाली शंकरकी निन्दा करना प्रयत्नपूर्वक छोड़ दो, क्योंकि (भगवान् शंकरकी) निन्दा करनेवालेकी सारी क्रियाएँ दोषयुक्त ही होती हैं। जो आपके ये अव्यय तथा महायोगी विष्णु रक्षक हैं, वे भी देवताओंके देव भगवान् महादेव ही हैं, इसमें कोई संशय नहीं। जो अज्ञानसे तथा वेदमें निष्ठा न रखनेके कारण संसारके मूल कारण भगवान् विष्णुको शंकरसे पृथक् मानते हैं, वे मनुष्य नरकमें जाते हैं। वेदमार्गका अनुवर्तन करनेवाले लोग रुद्रदेव तथा नारायणको एकीभावसे देखते हैं, अतः वे मुक्तिपदके भागी होते हैं॥ ८५-८८॥

जो विष्णु हैं वे ही साक्षात् रुद्र हैं और जो रुद्र हैं, वे ही जनार्दन विष्णु हैं-इस प्रकार समझकर जो देवका पूजन करता है, वह परमगतिको प्राप्त करता है ॥ ८९ ॥

  • अध्याय १४ * १०३

सृजत्येतज्जगत् सर्वं विष्णुस्तत् पश्यतीश्वरः।<br>इत्थं जगत् सर्वमिदं रुद्रनारायणोद्भवम्॥ ९०॥विष्णु इस सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करते हैं और शंकर उसकी देख-रेख करते हैं। इस प्रकार यह सारा संसार रुद्र और नारायणद्वारा ही उत्पन्न होता है॥ ९०॥
तस्मात् त्यक्त्वा हरेर्निन्दां विष्णावपि समाहितः।<br>समाश्रयेन्महादेवं शरण्यं ब्रह्मवादिनाम्॥ ९१॥इसलिये भगवान् शंकरकी निन्दाका परित्याग कर और विष्णुमें भी ध्यान लगाकर ब्रह्मवादियोंके एकमात्र शरण्य महादेवका आश्रय ग्रहण करना चाहिये। इस प्रकार ब्रह्माके वचन सुनकर प्रजापति दक्ष चर्माम्बर धारण करनेवाले देव पशुपतिकी शरणमें गये। और जो दूसरे महर्षि दधीचके शापरूपी अग्निसे दग्ध हो गये थे तथा मोहवश शंकरसे द्वेष करनेवाले थे, वे पूर्वजन्मके संस्कारोंके माहात्म्य तथा ब्रह्माके वचनसे सम्पूर्ण तपोबलका त्याग करके कलियुगमें ब्राह्मणोंके कुलमें उत्पन्न होंगे॥ ९१-९४॥
उपश्रुत्याथ वचनं विरिञ्चस्य प्रजापतिः।<br>जगाम शरणं देवं गोपतिं कृत्तिवाससम्॥ ९२॥<br>येऽन्ये शापाग्निानिर्दग्धा दधीचस्य महर्षयः।<br>द्विषन्तो मोहिता देवं सम्बभूवुः कलिष्वथ॥ ९३॥<br><br>त्यक्त्वा तपोबलं कृत्स्नं विप्राणां कुलसम्भवाः।<br>पूर्वसंस्कारमाहात्म्याद् ब्रह्मणो वचनादिह॥ ९४॥
मुक्तशापास्ततः सर्वे कल्पान्ते रौरवादिषु।<br>निपात्यमानाः कालेन सम्प्राप्यादित्यवर्चसम्।<br>ब्रह्माणं जगतामीशमनुज्ञाताः स्वयम्भुवा॥ ९५॥रौरव आदि नरकोंमें डाले गये वे सभी (शंकरसे विद्वेष करनेवाले) कल्पान्तमें यथासमय स्वयम्भूकी आज्ञासे आदित्यके समान तेजोमय जगत्के स्वामी ब्रह्मको प्राप्तकर शापसे मुक्त हो जायँगे और तपोयोगद्वारा देवताओंके स्वामी शंकरकी आराधना कर और उनकी कृपासे पुनः जैसे पहले थे वैसे ही (विप्रर्षि) हो जायँगे॥ ९५-९६॥
समाराध्य तपोयोगादीशं त्रिदशाधिपम्।<br>भविष्यन्ति यथा पूर्वं शंकरस्य प्रसादतः॥ ९६॥
एतद् वः कथितं सर्वं दक्षयज्ञनिषूदनम्।<br>शृणुध्वं दक्षपुत्रीणां सर्वासां चैव संततिम्॥ ९७॥प्रसंगवश (मैंने) यह सब दक्ष-यज्ञके विध्वंसकी कथा आप लोगोंसे कही। अब आप लोग प्रजापति दक्षकी सभी कन्याओंकी संतान-परम्पराका वर्णन सुनें॥ ९७॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षत्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे चतुर्दशोऽध्यायः॥ १४॥

इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें चौदहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १४॥

१०४ * कूर्मपुराण *


पंद्रहवाँ अध्याय

दक्ष-कन्याओंकी संतति, नृसिंहावतार, हिरण्यकशिपु एवं हिरण्याक्ष-वधका वर्णन, पृथ्वीका उद्धार, प्रह्लाद-चरित, गौतमद्वारा दारुवननिवासी मुनियोंको शाप, अन्धकके साथ महादेवका युद्ध एवं महादेवद्वारा अपने स्वरूपका उपदेश, अन्धकद्वारा महादेवकी स्तुति तथा महादेव (शंकर)-द्वारा अन्धकको गाणपत्य-पदकी प्राप्ति, अन्धक-द्वारा देवीकी स्तुति और देवीद्वारा अन्धकको पुत्ररूपमें ग्रहण करना तथा विष्णुद्वारा उत्पन्न माताओंसे अपनी तीनों मूर्तियोंका प्रतिपादन

सूत उवाचसूतजी बोले—
प्रजाः सृजेति व्यादिष्टः पूर्वं दक्षः स्वयम्भुवा।<br>ससर्ज देवान् गन्धर्वान् ऋषींश्चैवासुरोरगान्॥ १ ॥पूर्वकालमें 'प्रजाकी सृष्टि करो' इस प्रकारकी स्वयम्भू—ब्रह्माकी आज्ञा प्राप्तकर दक्षने देवताओं, गन्धर्वों, ऋषियों, असुरों तथा नागोंकी सृष्टि की।
यदास्य सृजमानस्य न व्यवर्धन्त ताः प्रजाः।<br>तदा ससर्ज भूतानि मैथुनेनैव धर्मतः॥ २ ॥जब सृष्टि करनेवाले उन दक्षकी वे प्रजाएँ नहीं बढ़ीं, तब उन्होंने मर्यादापूर्वक मिथुन-धर्म (स्त्री-पुरुष-संयोग)-से प्राणियोंकी सृष्टि की।
असिक्न्यां जनयामास वीरणस्य प्रजापतेः।<br>सुतायां धर्मयुक्तायां पुत्राणां तु सहस्रकम्॥ ३ ॥उन्होंने वीरण प्रजापतिकी धर्मपरायणा असिक्नी नामकी कन्यासे एक हजार पुत्रोंको उत्पन्न किया।
तेषु पुत्रेषु नष्टेषु मायया नारदस्य सः।<br>षष्टिं दक्षोऽसृजत् कन्या वैरिण्यां वै प्रजापतिः॥ ४ ॥देवर्षि नारदकी मायासे उन पुत्रोंके नष्ट हो जानेपर पुनः उन दक्ष प्रजापतिने वीरणकी पुत्री असिक्नीसे ही साठ कन्याओंको उत्पन्न किया॥ १—४॥
ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश।<br>विंशत् सप्त च सोमाय चतस्रोऽरिष्टनेमिने॥ ५ ॥(उन साठ कन्याओंमेंसे) उन्होंने दस धर्मको, तेरह कश्यपको, सत्ताईस चन्द्रमाको, चार अरिष्टनेमिको,
द्वे चैव बहुपुत्राय द्वे कृशाश्वाय धीमते।<br>द्वे चैवाङ्गिरसे तद्वत् तासां वक्ष्येऽथ विस्तरम्॥ ६ ॥दो बहुपुत्रको, दो बुद्धिमान् कृशाश्वको और इसी प्रकार दो कन्याएँ अंगिराको प्रदान कीं। अब मैं उनके वंश-विस्तारका वर्णन करूँगा॥ ५-६॥
अरुन्धती वसुर्जाभी लम्बा भानुर्मरुत्वती।<br>संकल्पा च मुहूर्ता च साध्या विश्वा च भामिनी॥ ७ ॥अरुन्धती, वसु, जामी, लम्बा, भानु, मरुत्वती, संकल्पा, मुहूर्ता, साध्या तथा भामिनी विश्वा—ये दस धर्मकी पत्नियाँ हैं।
धर्मपत्न्यो दश त्वेतास्तासां पुत्रान् निबोधत।<br>विश्वाया विश्वेदेवास्तु साध्या साध्यान्जीजनत्॥ ८ ॥इनके पुत्रोंके नाम सुनो। विश्वाके विश्वेदेव हुए और साध्याने साध्य नामवाले पुत्रोंको जन्म दिया।
मरुत्वन्तो मरुत्वत्यां वसवोऽष्टौ वसोः सुताः।<br>भानोस्तु भानवश्चैव मुहूर्ता वै मुहूर्तजाः॥ ९ ॥मरुत्वतीसे मरुद्गण हुए और वसुसे वसु नामक आठ पुत्र हुए। भानुसे भानुओं और मुहूर्तासे मुहूर्तोंकी उत्पत्ति हुई।
लम्बायाश्चाथ घोषो वै नागवीथी तु जामिजा।<br>पृथिवीविषयं सर्वमरुन्धत्यामजायत।<br>संकल्पायास्तु संकल्पो धर्मपुत्रा दश स्मृताः॥ १०॥लम्बासे घोष और जामिसे नागवीथी नामक पुत्र उत्पन्न हुए। अरुन्धतीसे सम्पूर्ण पृथ्वीसे सम्बद्ध प्राणियोंकी उत्पत्ति हुई और संकल्पासे संकल्प नामक पुत्र उत्पन्न हुए। इस प्रकार धर्मके (ये) दस पुत्र कहे गये हैं॥ ७—१०॥
आपो ध्रुवश्च सोमश्च धरश्चैवानिलोऽनलः।<br>प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः॥ ११॥आप, ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्यूष तथा प्रभास—ये अष्ट वसु कहे गये हैं।
आपस्य पुत्रो वैतण्ड्यः श्रमः श्रान्तो धुनिरस्तथा।<br>ध्रुवस्य पुत्रो भगवान् कालो लोकप्रकालनः॥ १२॥आपके वैतण्ड्य, श्रम, श्रान्त तथा धुनि नामक पुत्र हुए और ध्रुवके पुत्र संसारके संहारक भगवान् काल हैं॥ ११-१२॥
  • अध्याय १५ * | १०५ ---|---

| सोमस्य भगवान् वर्चा धरस्य द्रविणः सुतः।<br>पुरोजवोऽनिलस्य स्यादविज्ञातगतिस्तथा॥ १३॥<br><br>कुमारो ह्यनलस्यासीत् सेनापतिरिति स्मृतः।<br>देवलो भगवान् योगी प्रत्यूषस्याभवत् सुतः।<br>विश्वकर्मा प्रभासस्य शिल्पकर्ता प्रजापतिः॥ १४॥ | भगवान् वर्चा सोमके पुत्र हैं और धरके द्रविण नामक पुत्र हैं। अनिलके पुरोजव तथा अविज्ञातगति नाम-वाले पुत्र हैं। अतुलके पुत्र कुमार हैं जो 'सेनापति' नामसे कहे जाते हैं। प्रत्यूष (नामक वसु)-के महायोगी भगवान् देवल नामक पुत्र हुए। इसी प्रकार प्रभासके प्रजापति विश्वकर्मा नामक पुत्र हैं जो शिल्पकारी हैं॥ १३-१४॥ | | अदितिर्दितिर्दनुस्तद्वदरिष्टा सुरसा तथा।<br>सुरभिर्विनता चैव ताम्रा क्रोधवशा इरा।<br>कद्रुर्मुनिश्श्व धर्मज्ञा तत्पुत्रान् वै निबोधत॥ १५॥ | अदिति, दिति, दनु, अरिष्टा, सुरसा, सुरभि, विनता, ताम्रा, क्रोधवशा, इरा, कद्रु, मुनि तथा धर्मज्ञा— (दक्षकी ये तेरह कन्याएँ कश्यपकी पत्नियाँ हैं) उनके पुत्रोंके विषयमें सुनो—॥ १५॥ | | अंशो धाता भगस्त्वष्टा मित्रोऽथ वरुणोऽर्यमा।<br>विवस्वान् सविता पूषा ह्यंशुमान् विष्णुरेव च॥ १६॥<br>तुषिता नाम ते पूर्वं चाक्षुषस्यान्तरे मनोः।<br>वैवस्वतेऽन्तरे प्रोक्ता आदित्याश्चादितेः सुताः॥ १७॥<br>दितिः पुत्रद्वयं लेभे कश्यपाद् बलसंयुतम्।<br>हिरण्यकशिपुं ज्येष्ठं हिरण्याक्षं तथापरम्॥ १८॥<br>हिरण्यकशिपुर्दैत्यो महाबलपराक्रमः।<br>आराध्य तपसा देवं ब्रह्माणं परमेष्ठिनम्।<br>दृष्ट्वा लेभे वरान् दिव्यान् स्तुत्वासौ विविधैः स्तवैः॥ १९॥<br>अथ तस्य बलाद् देवाः सर्व एव सुरर्षयः।<br>बाधितास्ताडिता जग्मुर्देवदेवं पितामहम्॥ २०॥<br>शरण्यं शरणं देवं शम्भुं सर्वजगन्मयम्।<br>ब्रह्माणं लोककर्तारं त्रातारं पुरुषं परम्।<br>कूटस्थं जगतामेकं पुराणं पुरुषोत्तमम्॥ २१॥ | अंश, धाता, भग, त्वष्टा, मित्र, वरुण, अर्यमा, विवस्वान्, सविता, पूषा, अंशुमान् तथा विष्णु—ये सभी पूर्वकालमें चाक्षुष मन्वन्तरमें तुषित नामक देवता थे और वैवस्वत मन्वन्तरमें ये ही अदितिके पुत्र (बारह) आदित्य कहे गये हैं। दितिने कश्यपसे बलवान् दो पुत्रोंको प्राप्त किया। उनमें हिरण्यकशिपु बड़ा था, उसका अनुज हिरण्याक्ष था। दैत्य हिरण्यकशिपु महाबलशाली और पराक्रमी था। उसने तपस्याद्वारा परमेष्ठी ब्रह्माकी आराधनाकर उनका दर्शन किया तथा विविध स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुतिकर दिव्य वरोंको प्राप्त किया। उसके पराक्रमसे पीड़ित एवं ताडित सभी देवता एवं देवर्षिगण शरण ग्रहण करने योग्य, आश्रयस्वरूप, सर्वजगन्मय, शम्भु देवस्वरूप त्राता, लोककर्ता, परमपुरुष, कूटस्थ, जगत्के एकमात्र पुराण पुरुष पुरुषोत्तम देवोंके देव पितामह ब्रह्माकी शरणमें गये॥ १६-२१॥ | | स याचितो देववरैर्मुनिभिश्च मुनीश्वराः।<br>सर्वदेवहितार्थाय जगाम कमलासनः॥ २२॥<br><br>संस्तूयमानः प्रणतैर्मुनीन्द्रैरमरैरपि।<br>क्षीरोदस्योत्तरं कूलं यत्रास्ते हरिरीश्वरः॥ २३॥<br><br>दृष्ट्वा देवं जगद्योनिं विष्णुं विश्वगुरुं शिवम्।<br>ववन्दे चरणौ मूर्ध्ना कृताञ्जलिरभाषत॥ २४॥ | मुनीश्वरो ! श्रेष्ठ देवताओं तथा मुनियोंके द्वारा प्रार्थना किये जानेपर सभी देवताओंके कल्याण करनेकी इच्छासे कमलके आसनवाले ब्रह्मा क्षीरसागरके उत्तरी तटपर गये, जहाँ विनीत मुनीन्द्रों तथा देवताओंके द्वारा स्तुति किये जाते हुए हरि ईश्वर निवास करते हैं। जगत्के मूल कारण, विश्वके गुरु, कल्याणमय, विष्णुदेवका दर्शन करके उन्होंने मस्तक झुकाकर चरणोंमें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर (इस प्रकार) कहा—॥ २२-२४॥ | | ब्रह्मोवाच<br><br>त्वं गतिः सर्वभूतानामनन्तोऽस्यखिलात्मकः।<br>व्यापी सर्वामरवपुर्महायोगी सनातनः॥ २५॥ | ब्रह्माने कहा— (भगवन्!) आप सभी प्राणियोंकी गति हैं, अनन्त हैं और इस सम्पूर्ण विश्वके आत्मस्वरूप हैं। आप सर्वत्र व्याप्त, सभी देवताओंके शरीररूप, महायोगी तथा सनातन हैं॥ २५॥ |

१०६* कूर्मपुराण *
त्वमात्मा सर्वभूतानां प्रधानं प्रकृतिः परा।<br>वैराग्यैश्वर्यनिरतो रागातीतो निरञ्जनः॥ २६॥<br><br>त्वं कर्ता चैव भर्ता च निहन्ता सुरविद्विषाम्।<br>त्रातुमर्हस्यनन्तेश त्राता हि परमेश्वरः॥ २७॥<br>इत्थं स विष्णुर्भगवान् ब्रह्मणा सम्प्रबोधितः।<br>प्रोवाचोन्निद्रपद्माक्षः पीतवासासुरद्विषः॥ २८॥<br><br>किमर्थं सुमहावीर्याः सप्रजापतिकाः सुराः।<br>इमं देशमनुप्राप्ताः किं वा कार्यं करोमि वः॥ २९॥<br><p align="center">देवा ऊचुः</p>हिरण्यकशिपुर्नाम ब्रह्मणो वरदर्पितः।<br>बाधते भगवन् दैत्यो देवान् सर्वान् सहर्षिभिः॥ ३०॥<br><br>अवध्यः सर्वभूतानां त्वामृते पुरुषोत्तम।<br>हन्तुमर्हसि सर्वेषां त्वं त्रातासि जगन्मय॥ ३१॥<br><br>श्रुत्वा तद्देवैरुक्तं स विष्णुर्लोकभावनः।<br>वधाय दैत्यमुख्यस्य सोऽसृजत् पुरुषं स्वयम्॥ ३२॥<br><br>मेरुपर्वतवर्ष्माणं घोररूपं भयानकम्।<br>शङ्खचक्रगदापाणिं तं प्राह गरुडध्वजः॥ ३३॥<br>हत्वा तं दैत्यराजं त्वं हिरण्यकशिपुं पुनः।<br>इमं देशं समागन्तुं क्षिप्रमर्हसि पौरुषात्॥ ३४॥<br>निशम्य वैष्णवं वाक्यं प्रणम्य पुरुषोत्तमम्।<br>महापुरुषमव्यक्तं ययौ दैत्यमहापुरम्॥ ३५॥<br>विमुञ्चन् भैरवं नादं शङ्खचक्रगदाधरः।<br>आरुह्य गरुडं देवो महामेरुरिवापरः॥ ३६॥<br>आकर्ण्य दैत्यप्रवरा महामेघरवोपमम्।<br>समाचचक्षिरे नादं तदा दैत्यपतेर्भयात्॥ ३७॥<br><p align="center">असुरा ऊचुः</p>कश्चिदागच्छति महान् पुरुषो देवचोदितः।<br>विमुञ्चन् भैरवं नादं तं जानीमोऽमरार्दन॥ ३८॥<br><br>ततः सहासुरवरैर्हिरण्यकशिपुः स्वयम्।<br>संनद्धैः सायुधैः पुत्रैः प्रह्लादाद्यैस्तदा ययौ॥ ३९॥<br><br>दृष्ट्वा तं गरुडासीनं सूर्यकोटिसमप्रभम्।<br>पुरुषं पर्वताकारं नारायणमिवापरम्॥ ४०॥आप सभी प्राणियोंकी आत्मा, प्रधान और परा प्रकृति हैं। आप वैराग्य और ऐश्वर्यमें निरत, रागातीत तथा निरञ्जन हैं। आप ही कर्ता-भर्ता तथा देवताओंसे द्वेष रखनेवालोंके संहर्ता हैं। अनन्तेश! आप ही रक्षा करनेवाले परमेश्वर हैं, आप रक्षा करें॥ २६-२७॥<br><br>ब्रह्माके द्वारा इस प्रकार भलीभाँति प्रबुद्ध किये जानेपर विकसित कमलके समान नेत्रवाले, पीत वस्त्र धारण करनेवाले तथा असुरोंके द्वेषी भगवान् विष्णु बोले—अत्यन्त वीर्यशाली देवताओ! आपलोग प्रजापतियोंके साथ इस स्थानपर किस कारणसे आये हैं अथवा मैं आप लोगोंका कौन-सा कार्य करूँ?॥ २८-२९॥<br><br>देवता बोले—भगवन्! ब्रह्माके द्वारा प्राप्त वरदानके कारण घमंडसे भरा हुआ हिरण्यकशिपु नामका दैत्य ऋषियोंसहित सभी देवताओंको पीड़ित कर रहा है। हे पुरुषोत्तम! आपको छोड़कर अन्य सभी प्राणियोंसे वह अवध्य है। जगन्मय! आप उसे मारनेमें समर्थ हैं, आप ही सभीके रक्षक हैं। देवताओंके द्वारा कही गयी उस बातको सुनकर संसारके रक्षक विष्णुने दैत्यप्रमुख उस हिरण्यकशिपुके वधके लिये स्वयं एक पुरुषको उत्पन्न किया। सुमेरु पर्वतके समान शरीरवाले, घोर रूपवाले, भयानक एवं हाथमें शंख, चक्र, गदा धारण करनेवाले उस पुरुषसे गरुडध्वज (विष्णु)-ने कहा॥ ३०-३३॥<br><br>तुम (अपने) पराक्रमसे उस दैत्यराज हिरण्यकशिपुको मारकर पुनः इस स्थानपर शीघ्र ही वापस लौट आओ। विष्णुका वचन सुनकर शंख, चक्र, गदाधारी वह दूसरे महामेरुके समान देव गरुडपर आरूढ़ होकर भीषण नाद करते हुए अव्यक्त, महापुरुष पुरुषोत्तमको प्रणामकर (हिरण्यकशिपु) दैत्यके महानगरकी ओर गया। महामेघकी गर्जनाके समान नादको सुनकर बड़े-बड़े दैत्योंने दैत्यराजसे (हिरण्यकशिपुसे) भयपूर्वक कहा—॥ ३४-३७॥<br><br>दैत्योंने कहा—देवताओंका विनाश करनेवाले दैत्यराज! देवताओंकी प्रेरणा प्राप्त कर कोई महान् पुरुष भीषण नाद करता हुआ आ रहा है, हमें उसे जानना चाहिये। तदनन्तर मुख्य-मुख्य असुरों तथा आयुधोंसे सुसज्जित प्रह्लाद आदि पुत्रोंके साथ हिरण्यकशिपु स्वयं वहाँ गया। करोड़ों सूर्यके समान प्रभाववाले तथा दूसरे नारायणके समान पर्वताकार गरुडपर बैठे हुए उस
  • अध्याय १५ * | १०७ ---|---

दुद्रुवुः केचिदन्योन्यमूचुः सम्भ्रान्तलोचनाः ।
अयं स देवो देवानां गोप्ता नारायणो रिपुः ॥ ४१ ॥

अस्माकमव्ययो नूनं तत्सुतो वा समागतः ।
इत्युक्त्वा शस्त्रवर्षाणि ससृजुः पुरुषाय ते ।
तानि चाशेषतो देवो नाशयामास लीलया ॥ ४२ ॥

तदा हिरण्यकशिपोश्चत्वारः प्रथितौजसः ।
पुत्रा नारायणोद्भूतं युयुधुर्मेघनिःस्वनाः ।
प्रह्लादश्चाप्यनुह्लादः संह्लादो ह्लाद एव च ॥ ४३ ॥

प्रह्लादः प्राहिणोद् ब्राह्ममनुह्लादोऽथ वैष्णवम् ।
संह्लादश्चापि कौमारमाग्नेयं ह्लाद एव च ॥ ४४ ॥

तानि तं पुरुषं प्राप्य चत्वार्यस्त्राणि वैष्णवम् ।
न शेकुर्बाधितुं विष्णुं वासुदेवं यथा तथा ॥ ४५ ॥

अथासौ चतुरः पुत्रान् महाबाहुर्महाबलः ।
प्रगृह्य पादेषु करैः संचिक्षेप ननाद च ॥ ४६ ॥

विमुक्तेष्वथ पुत्रेषु हिरण्यकशिपुः स्वयम् ।
पादेन ताडयामास वेगेनोरसि तं बली ॥ ४७ ॥

स तेन पीडितोऽत्यर्थं गरुडेन तथाशुगः ।
अदृश्यः प्रययौ तूर्णं यत्र नारायणः प्रभुः ।
गत्वा विज्ञापयामास प्रवृत्तमखिलं तथा ॥ ४८ ॥

संचिन्त्य मनसा देवः सर्वज्ञानमयोऽमलः ।
नरस्यार्धतनुं कृत्वा सिंहस्यार्धतनुं तथा ॥ ४९ ॥

नृसिंहवपुरव्यक्तो हिरण्यकशिपोः पुरे ।
आविर्बभूव सहसा मोहयन् दैत्यपुङ्गवान् ॥ ५० ॥

दंष्ट्राकरालो योगात्मा युगान्तदहनोपमः ।
समारुह्यात्मनः शक्तिं सर्वसंहारकारिकाम् ।
भाति नारायणोऽनन्तो यथा मध्यान्दिने रविः ॥ ५१ ॥

दृष्ट्वा नृसिंहवपुषं प्रह्लादं ज्येष्ठपुत्रकम् ।
वधाय प्रेरयामास नरसिंहस्य सोऽसुरः ॥ ५२ ॥

इमं नृसिंहवपुषं पूर्वस्माद् बहुशक्तिकम् ।
सहैव त्वनुजैः सर्वैर्नाशयाशु मयेरितः ॥ ५३ ॥

पुरुषको देखकर कोई तो भाग गये और कोई भ्रान्त-दृष्टि होकर आपसमें कहने लगे—'यह निश्चित ही हमारा शत्रु और देवताओंका रक्षक वही अव्यय नारायण देव है अथवा उसका पुत्र ही यह आया है।' ऐसा कहकर वे उस पुरुषपर शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे, किंतु उस देवने लीलासे ही उन सभी शस्त्रोंको नष्ट कर डाला ॥ ३८—४२ ॥

तदनन्तर अतितेजस्वी तथा मेघके समान गर्जना करनेवाले प्रह्लाद, अनुह्लाद, संह्लाद तथा ह्लाद नामक हिरण्यकशिपुके चार पुत्र नारायणसे उत्पन्न उस पुरुषसे युद्ध करने लगे। प्रह्लादने ब्रह्मास्त्र, अनुह्लादने वैष्णवास्त्र, संह्लादने कौमारास्त्र तथा ह्लादने आग्नेयास्त्रका प्रयोग किया ॥ ४३-४४ ॥

वे चारों अस्त्र उस वैष्णव पुरुषके पास पहुँचकर उन वासुदेव विष्णुको किसी भी प्रकार बाँधनेमें समर्थ न हो सके। तदनन्तर महाबाहु महाबलशाली उस पुरुषने उन चारों पुत्रोंके पैरोंको अपने हाथसे पकड़कर उन्हें फेंक दिया और गर्जना की। इस प्रकार पुत्रोंके फेंक दिये जानेपर बलवान् स्वयं हिरण्यकशिपुने पैरद्वारा बड़े ही वेगसे उस (पुरुष)-की छातीपर प्रहार किया। उस प्रहारसे पीड़ित होकर वह पुरुष गरुड़पर चढ़कर अदृश्य हो गया तथा शीघ्र ही वहाँ गया जहाँ प्रभु नारायण स्थित थे। वहाँ जाकर उसने सम्पूर्ण घटित वृत्तान्त उन्हें बतला दिया ॥ ४५—४८ ॥

तब सर्वज्ञानमय विमल देवने मनमें विचारकर आधा शरीर मनुष्यका एवं आधा शरीर सिंहका बनाया। नरसिंह-शरीर धारण करनेवाले अव्यक्त देव दैत्य-समूहोंको मोहित करते हुए अकस्मात् हिरण्यकशिपुके नगरमें प्रकट हो गये। भयंकर दाढ़ोंवाले योगात्मा तथा प्रलयाग्निके समान अनन्त नारायण अपनी सर्वसंहारकारिणी शक्तिपर आरूढ़ होकर उसी प्रकार प्रकाशित हो रहे थे जैसे मध्याह्नकालीन सूर्य प्रकाशमान होता है। नरसिंहका शरीर धारण किये उन्हें देखकर उस असुरने अपने बड़े लड़के प्रह्लादको नरसिंहके वधके लिये प्रेरित किया और कहा— ॥ ४९—५२ ॥

अपने सभी छोटे भाइयोंके साथ तुम पहलेसे अधिक शक्तिवाले इस नरसिंह-शरीरधारी पुरुषको मेरी प्रेरणासे शीघ्र ही मार डालो ॥ ५३ ॥

१०८ * कूर्मपुराण *

तत्संनियोगादसुरः प्रह्लादो विष्णुमव्ययम्।<br>युयुधे सर्वयत्नेन नरसिंहेन निर्जितः ॥ ५४ ॥<br><br>ततः संचोदितो दैत्यो हिरण्याक्षस्तदानुजः।<br>ध्यात्वा पशुपतेरस्त्रं ससर्ज च ननाद च ॥ ५५ ॥<br><br>तस्य देवादिदेवस्य विष्णोरमिततेजसः।<br>न हानिमकरोदस्त्रं यथा देवस्य शूलिनः ॥ ५६ ॥उसकी आज्ञा पाकर असुर प्रह्लादने सभी प्रकारके प्रयत्नोंके द्वारा अव्यय विष्णुके साथ युद्ध किया, किंतु वह नरसिंहद्वारा पराजित हो गया। तदनन्तर उस (हिरण्यकशिपु)-की आज्ञा प्राप्तकर उसके छोटे भाई हिरण्याक्षने पाशुपतास्त्रका ध्यान करके उसे चलाया और गर्जना की। वह अस्त्र देवाधिदेव अमित तेजस्वी उन विष्णुकी, कोई हानि न कर सका जैसे कोई अस्त्र त्रिशूलधारी देव (शंकर)-की हानि नहीं करता ॥ ५४-५६ ॥
दृष्ट्वा पराहतं त्वस्त्रं प्रह्लादो भाग्यगौरवात्।<br>मेने सर्वात्मकं देवं वासुदेवं सनातनम् ॥ ५७ ॥<br><br>संत्यज्य सर्वशस्त्राणि सत्त्वयुक्तेन चेतसा।<br>ननाम शिरसा देवं योगिनां हृदयेशयम् ॥ ५८ ॥<br><br>स्तुत्वा नारायणैः स्तोत्रैः ऋग्यजुःसामसम्भवैः।<br>निवार्य पितरं भ्रातॄन् हिरण्याक्षं तदाब्रवीत् ॥ ५९ ॥अस्त्रको विफल होते देखकर भाग्यशाली होनेके कारण प्रह्लादने उन देवको सर्वात्मक सनातन वासुदेव ही समझा। उसने सभी शस्त्रोंका परित्याग कर दिया और सत्त्वगुणसम्पन्न चित्तसे योगियोंके हृदयमें निवास करनेवाले देवको सिरसे प्रणाम किया तथा ऋक्, यजुष् तथा सामवेदमें प्राप्त वैष्णव स्तुतियोंके द्वारा स्तुतिकर अपने पिता (हिरण्यकशिपु), भाइयों एवं हिरण्याक्षको युद्ध करनेसे रोकते हुए इस प्रकार कहा— ॥ ५७-५९ ॥
अयं नारायणोऽनन्तः शाश्वतो भगवानजः।<br>पुराणपुरुषो देवो महायोगी जगन्मयः ॥ ६० ॥<br>अयं धाता विधाता च स्वयंज्योतिर्निरञ्जनः।<br>प्रधानपुरुषस्तत्त्वं मूलप्रकृतिरव्ययः ॥ ६१ ॥<br>ईश्वरः सर्वभूतानामन्तर्यामी गुणातिगः।<br>गच्छध्वमेनं शरणं विष्णुमव्यक्तमव्ययम् ॥ ६२ ॥ये अनन्त, सनातन, अजन्मा, महायोगी, जगन्मय पुराणपुरुष भगवान् नारायण देव हैं। ये धाता, विधाता, स्वयंज्योति, निरञ्जन, प्रधानपुरुषरूप, तत्त्व, मूलप्रकृति, अव्यय, ईश्वर, सभी प्राणियोंके अन्तर्यामी तथा गुणातीत हैं। इन अव्यक्त, अव्यय विष्णुकी आप लोग शरण ग्रहण करें ॥ ६०-६२ ॥
एवमुक्ते सुदुर्बुद्धिर्हिरण्यकशिपुः स्वयम्।<br>प्रोवाच पुत्रमत्यर्थं मोहितो विष्णुमायया ॥ ६३ ॥<br><br>अयं सर्वात्मना वध्यो नृसिंहोऽल्पपराक्रमः।<br>समागतोऽस्मद्भवनमिदानीं कालचोदितः ॥ ६४ ॥(प्रह्लादके) इस प्रकार कहनेपर विष्णुकी मायासे अत्यन्त मोहित दुर्बुद्धि हिरण्यकशिपुने स्वयं पुत्रसे कहा—यह थोड़े पराक्रमवाला नरसिंह सभी प्रकारसे वध करने योग्य है। कालके द्वारा प्रेरित होकर इस समय यह हमारे घरमें ही आ गया है ॥ ६३-६४ ॥
विहस्य पितरं पुत्रो वचः प्राह महामतिः।<br>मा निन्दस्वैनमीशानं भूतानामेकमव्ययम् ॥ ६५ ॥<br><br>कथं देवो महादेवः शाश्वतः कालवर्जितः।<br>कालेन हन्यते विष्णुः कालात्मा कालरूपधृक् ॥ ६६ ॥<br><br>ततः सुवर्णकशिपुर्दुरात्मा विधिचोदितः।<br>निवारितोऽपि पुत्रेण युयोध हरिमव्ययम् ॥ ६७ ॥<br><br>संरक्तनयनोऽनन्तो हिरण्यनयनाग्रजम्।<br>नखैर्विदारयामास प्रह्लादस्यैव पश्यतः ॥ ६८ ॥पिताका वचन सुनकर महामति प्रह्लादने हँसकर कहा—प्राणियोंके एकमात्र स्वामी इन अव्ययकी निन्दा मत करो। सनातन, कालवर्जित, कालात्मा, कालका रूप धारण करनेवाले, महादेव विष्णु देवको काल कैसे मार सकता है। तदनन्तर भाग्यसे प्रेरित हिरण्यकशिपु पुत्रके द्वारा रोके जानेपर भी अव्यय हरिसे लड़ने लगा। (क्रोधसे) अत्यन्त लाल नेत्रोंवाले अनन्त विष्णुने प्रह्लादके देखते-ही-देखते हिरण्य (स्वर्ण)-के समान नयन हैं जिसके, उस हिरण्यनयन (हिरण्याक्ष)-के बड़े भाई हिरण्यकशिपुको अपने नखोंद्वारा विदीर्ण कर डाला ॥ ६५-६८ ॥