संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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८८ * कूर्मपुराण *
| यश्चैतत् पठते स्तोत्रं ब्राह्मणानां समीपतः ।<br>देव्याः समाहितमनाः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ३२६ ॥ | जो एकाग्रमनसे ब्राह्मणोंके समीपमें देवीके इस (सहस्रनाम) स्तोत्रका पाठ करता है, वह सभी पापोंसे विमुक्त हो जाता है ॥ ३२६ ॥ |
| नाम्नामष्टसहस्रं तु देव्या यत् समुदीरितम् ।<br>ज्ञात्वार्कमण्डलगतां सम्भाव्य परमेश्वरीम् ॥ ३२७ ॥<br><br>अभ्यर्च्य गन्धपुष्पाद्यैर्भक्तियोगसमन्वितः ।<br>संस्मरन् परमं भावं देव्या माहेश्वरं परम् ॥ ३२८ ॥<br><br>अनन्यमानसो नित्यं जपेदामरणाद् द्विजः ।<br>सोऽन्तकाले स्मृतिं लब्ध्वा परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ ३२९ ॥ | देवीका जो एक सहस्र आठ नामवाला स्तोत्र बतलाया गया है, उसे जानकर सूर्यमण्डलमें स्थित परमेश्वरीकी भावना करते हुए गन्ध, पुष्प आदिके द्वारा भक्तियोगपूर्वक उनकी अर्चना द्विजको करनी चाहिये और देवीके परम माहेश्वर श्रेष्ठ भावका अनन्य-मनसे मरणपर्यन्त स्मरण करते हुए इस उपदिष्ट एक हजार आठ नामोंका नित्य जप करना चाहिये। ऐसा करनेसे द्विज अन्त-समयमें (देवीकी) स्मृति प्राप्तकर परब्रह्मको प्राप्त करता है ॥ ३२७-३२९ ॥ |
| अथवा जायते विप्रो ब्राह्मणानां कुले शुचौ ।<br>पूर्वसंस्कारमाहात्म्याद् ब्रह्मविद्यामवाप्य सः ॥ ३३० ॥<br><br>सम्प्राप्य योगं परमं दिव्यं तत् पारमेश्वरम् ।<br>शान्तः सर्वगतो भूत्वा शिवसायुज्यमाप्नुयात् ॥ ३३१ ॥<br><br>प्रत्येकं चाथ नामानि जुहुयात् सवनत्रयम् ।<br>पूतनादिकृतैर्दोषैर्ग्रहदोषैश्च मुच्यते ॥ ३३२ ॥ | अथवा वह विप्र ब्राह्मणोंके पवित्र कुलमें उत्पन्न होता है और पूर्वजन्मके संस्कारोंके प्रभावसे वह ब्रह्मविद्याको प्राप्त करता है। परमेश्वर-सम्बन्धी उस परम दिव्य योगको प्राप्तकर वह शान्त तथा सर्वत्र व्याप्त होते हुए शिवसायुज्यको प्राप्त करता है। (जो व्यक्ति प्रातः, मध्याह्न तथा सायं—) तीनों समय देवीके प्रत्येक नामसे हवन करता है, वह पूतना आदिद्वारा उत्पन्न (अरिष्ट) दोषों तथा ग्रहोंके दोषोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ३३०-३३२॥ |
| जपेद् वाहरहर्नित्यं संवत्सरमतन्द्रितः ।<br>श्रीकामः पार्वतीं देवीं पूजयित्वा विधानतः ॥ ३३३ ॥<br><br>सम्पूज्य पार्श्वतः शम्भुं त्रिनेत्रं भक्तिसंयुतः ।<br>लभते महतीं लक्ष्मीं महादेवप्रसादतः ॥ ३३४ ॥ | अथवा लक्ष्मीप्राप्तिकी इच्छा करनेवाला द्विज विधिपूर्वक देवीकी पूजाकर और उनके पार्श्वभाग (समीप)-में तीन नेत्रवाले भगवान् शंकरकी पूजा करता है तथा एक वर्षतक आलस्यरहित होकर प्रतिदिन निरन्तर (देवीके सहस्रनामका) जप करता है, वह महादेव भगवान् शंकरकी कृपासे महालक्ष्मीको प्राप्त करता है ॥ ३३३-३३४ ॥ |
| तस्मात् सर्वप्रयत्नेन जप्तव्यं हि द्विजातिभिः ।<br>सर्वपापापनोदार्थं देव्या नाम सहस्रकम् ॥ ३३५ ॥<br><br>प्रसङ्गात् कथितं विप्रा देव्या माहात्म्यमुत्तमम् ।<br>अतः परं प्रजासर्गं भृग्वादीनां निबोधत ॥ ३३६ ॥ | इसलिये द्विजातियोंको सभी प्रकारके प्रयत्नोंके द्वारा सभी पापोंसे छुटकारा प्राप्त करनेके लिये देवीके सहस्रनामका जप करना चाहिये। विप्रो! मैंने प्रसङ्गवश देवीका उत्तम माहात्म्य आप लोगोंसे कहा। अब इसके बाद आपलोग भृगु आदि महर्षियोंकी प्रजासृष्टिको सुनें ॥ ३३५-३३६ ॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ११ ॥