भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 97, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 97
* अध्याय ११ *८७
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठायां परस्य परमः शिवः।<br>अनन्तस्याव्ययस्यैकः स्वात्माधारो महेश्वरः॥ ३११॥<br><br>ज्ञानेन कर्मयोगेन भक्तियोगेन वा नृप।<br>सर्वसंसारमुक्त्यर्थमीश्वरं सततं श्रय॥ ३१२॥<br><br>एष गुह्योपदेशस्ते मया दत्तो गिरीश्वर।<br>अन्वीक्ष्य चैतदखिलं यथेष्टं कर्तुमर्हसि॥ ३१३॥<br><br>अहं वै याचिता देवैः संजाता परमेश्वरात्।<br>विनिन्द्य दक्षं पितरं महेश्वरविनिन्दकम्॥ ३१४॥<br><br>धर्मसंस्थापनार्थाय तवाराधनकारणात्।<br>मेनादेहसमुत्पन्ना त्वामेव पितरं श्रिता॥ ३१५॥<br><br>स त्वं नियोगाद् देवस्य ब्रह्मणः परमात्मनः।<br>प्रदास्यसे मां रुद्राय स्वयंवरसमागमे॥ ३१६॥<br><br>तत्सम्बन्धाच्च ते राजन् सर्वे देवाः सवासवाः।<br>त्वां नमस्यन्ति वै तात प्रसीदति च शंकरः॥ ३१७॥<br><br>तस्मात् सर्वप्रयत्नेन मां विद्धीश्वरगोचराम्।<br>सम्पूज्य देवमीशानं शरण्यं शरणं व्रज॥ ३१८॥<br><br>स एवमुक्तो भगवान् देवदेव्या गिरीश्वरः।<br>प्रणम्य शिरसा देवीं प्राञ्जलिः पुनरब्रवीत्॥ ३१९॥ये अद्वितीय, अपनी आत्माके आश्रय महेश्वर परमशिव ही अनन्त तथा अव्यय पर ब्रह्मकी प्रतिष्ठा-रूप हैं। राजन्! ज्ञानयोग, कर्मयोग अथवा भक्तियोगके द्वारा समस्त संसारसे मुक्ति प्राप्त करनेके लिये निरन्तर ईश्वरका आश्रय ग्रहण करो। पर्वतराज हिमालय! मैंने यह गुह्य उपदेश तुम्हें प्रदान किया है, इस सम्पूर्ण उपदेशपर विचारकर तुम जैसा चाहो वैसा करो॥ ३११-३१३॥<br><br>महादेव शंकरकी निन्दा करनेवाले अपने पिता दक्षकी आलोचना कर देवताओंके द्वारा प्रार्थना करनेपर मैं परमेश्वरसे प्रादुर्भूत हुई हूँ। तुम्हारी आराधनाके कारण धर्मकी स्थापना करनेके लिये तुम्हें ही पिताके रूपमें आश्रय बनाकर मैं मेनाकी देहसे उत्पन्न हुई हूँ। आप परमात्मा ब्रह्मदेवके निर्देशसे स्वयंवरके समय मुझे रुद्रको प्रदान करेंगे। राजन्! तात! उस सम्बन्धके कारण इन्द्रसहित सभी देवता आपको नमस्कार करेंगे तथा भगवान् शंकर भी आपसे प्रसन्न होंगे। इसलिये सभी प्रकारके प्रयत्नोंके द्वारा मुझे ही ईश्वरकी विषयस्वरूपा (ईश्वरका सर्वस्व) समझो और शरण ग्रहण करने योग्य भगवान् शंकरकी पूजाकर उनकी शरणमें जाओ॥ ३१४-३१८॥<br><br>भगवान् महादेवकी देवी (शंकरपत्नी)-के द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर वे पर्वतराज हिमालय विनयपूर्वक प्रणामकर हाथ जोड़ते हुए पुनः महेश्वरीसे कहने लगे—महेशानि! आप मुझे परम माहेश्वर योगको विस्तारसे बतलाइये और ज्ञान तथा साधनोंसहित आत्मयोगको भी विस्तारपूर्वक बतलायें॥ ३१९-३२०॥
विस्तरेण महेशानि योगं माहेश्वरं परम्।<br>ज्ञानं चैवात्मनो योगं साधनानि प्रचक्ष्व मे॥ ३२०॥<br><br>तस्यैतत् परमं ज्ञानमात्मयोगमनुत्तमम्।<br>यथावद् व्याजहारेशा साधनानि च विस्तरात्॥ ३२१॥<br><br>निशम्य वदनाम्भोजाद् गिरीन्द्रो लोकपूजितः।<br>लोकमातुः परं ज्ञानं योगासक्तोऽभवत् पुनः॥ ३२२॥<br><br>प्रददौ च महेशाय पार्वतीं भाग्यगौरवात्।<br>नियोगाद् ब्रह्मणः साध्वीं देवानां चैव संनिधौ॥ ३२३॥<br><br>य इमं पठतेऽध्यायं देव्या माहात्म्यकीर्तनम्।<br>शिवस्य संनिधौ भक्त्या शुचिस्तद्भावभावितः॥ ३२४॥<br><br>सर्वपापविनिर्मुक्तो दिव्ययोगसमन्वितः।<br>उल्लङ्घ्य ब्रह्मणो लोकं देव्याः स्थानमवाप्नुयात्॥ ३२५॥(इसपर) भगवती पार्वतीने उन्हें वह परम ज्ञान, श्रेष्ठ आत्मयोग और उसकी प्राप्तिके साधनोंको भी विस्तारपूर्वक भलीभाँति बतलाया। जगज्जननीके मुखकमलसे परम ज्ञान सुनकर वे लोकपूजित पर्वतराज हिमालय पुनः योगमें आसक्त हो गये। (कालान्तरमें हिमालयने) ब्रह्माजीके आदेशसे देवताओंकी संनिधिमें (अपने) सौभाग्यकी अभिवृद्धि समझते हुए साध्वी पार्वतीको महेश्वरके लिये प्रदान किया॥ ३२१-३२३॥<br><br>जो व्यक्ति भगवान् शिवके सांनिध्यमें उनके भावसे भावित होकर पवित्रतापूर्वक देवीके माहात्म्यका वर्णन करनेवाले इस अध्यायका पाठ करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है और दिव्य योगसे समन्वित होकर ब्रह्मलोकको पारकर देवीके स्थानको प्राप्त करता है॥ ३२४-३२५॥