भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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८६ * कूर्मपुराण *


तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥ २९६ ॥

मामाश्रित्य परं निर्वाणममलं पदम्।
प्राप्यते न हि राजेन्द्र ततो मां शरणं व्रज ॥ २९७ ॥

एकत्वेन पृथक्त्वेन तथा चोभयतोऽपि वा।
मामुपास्य महाराज ततो यास्यसि तत्पदम्॥ २९८ ॥

उसीमें (मेरे दिव्य रूपमें) बुद्धि रखनेवाले, उसीमें अपनेको लगानेवाले, उसीमें निष्ठा रखनेवाले तथा उसीके परायण और ज्ञानके द्वारा जिनके समस्त पाप विनष्ट हो गये हैं, वे सभी आवागमनके चक्रमें नहीं पड़ते अर्थात् मोक्षको प्राप्त करते हैं। राजेन्द्र! मेरी शरण ग्रहण किये बिना परम निर्वाण,निर्मल पद प्राप्त नहीं होता, इसलिये मेरी शरण ग्रहण करो। महाराज! द्वैत या अद्वैत अथवा दोनों ही रूपोंसे मेरी उपासना कर तुम्हें उस पदकी प्राप्ति हो जायगी ॥ २९६-२९८ ॥


मामाश्रित्य तत् तत्त्वं स्वभावविमलं शिवम्।
ज्ञायते न हि राजेन्द्र ततो मां शरणं व्रज ॥ २९९ ॥

तस्मात् त्वमक्षरं रूपं नित्यं चारूपमैश्वरम्।
आराध्य प्रयत्नेन ततो बन्धं प्रहास्यसि ॥ ३०० ॥

कर्मणा मनसा वाचा शिवं सर्वत्र सर्वदा।
समाराध्य भावेन ततो यास्यसि तत्पदम्॥ ३०१॥

न वै पश्यन्ति तत् तत्त्वं मोहिता मम मायया।
अनाद्यनन्तं परमं महेश्वरमजं शिवम्॥ ३०२ ॥

सर्वभूतात्मभूतस्थं सर्वाधारं निरञ्जनम्।
नित्यानन्दं निराभासं निर्गुणं तमसः परम् ॥ ३०३ ॥

अद्वैतमचलं ब्रह्म निष्कलं निष्प्रपञ्चकम्।
स्वसंवेद्यमवेद्यं तत् परे व्योम्नि व्यवस्थितम्॥ ३०४॥

हे राजेन्द्र! बिना मेरा आश्रय लिये स्वभावसे ही निर्मल, उस शिवतत्त्वको जाना नहीं जा सकता, अतः मेरी शरण ग्रहण करो। इसलिये तुम नित्य, अक्षरस्वरूप एवं रूपरहित ईश्वर (तत्त्व)-की प्रयत्नपूर्वक आराधना करो। इससे (तुम) बन्धनसे मुक्त हो जाओगे। मन, वाणी तथा कर्मसे बड़े ही भावसे सर्वत्र शिवकी आराधना करो, इससे (तुम) उस पदको प्राप्त करोगे। मेरी मायासे मोहित (प्राणी) उस अनादि, अनन्त, अजन्मा, कल्याणकारी, परम महेश्वर, सभी प्राणियोंके अन्तरमें निवास करनेवाले, सभीके आधार, निरञ्जन, नित्य आनन्दस्वरूप, निराभास, निर्गुण, अन्धकारसे परे, अद्वैत, अचल, कलारहित, निष्प्रपञ्च, स्वसंवेद्य, अज्ञेय तथा परमाकाशमें स्थित ब्रह्मसंज्ञक तत्त्वको नहीं जान पाते ॥ २९९-३०४ ॥


सूक्ष्मेण तमसा नित्यं वेष्टिता मम मायया।
संसारसागरे घोरे जायन्ते च पुनः पुनः ॥ ३०५ ॥

भक्त्या त्वनन्यया राजन् सम्यग् ज्ञानेन चैव हि।
अन्वेष्टव्यं हि तद् ब्रह्म जन्मबन्धन्निवृत्तये ॥ ३०६ ॥

अहंकारं च मात्सर्यं कामं क्रोधं परिग्रहम्।
अधर्माभिनिवेशं च त्यक्त्वा वैराग्यमास्थितः ॥ ३०७ ॥

सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
अन्वीक्ष्य चात्मनात्मानं ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ३०८ ॥

ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा सर्वभूताभयप्रदः।
ऐश्वरीं परमां भक्तिं विन्देतानन्यगामिनीम् ॥ ३०९ ॥

वीक्षते तत् परं तत्त्वमैश्वरं ब्रह्मनिष्कलं।
सर्वसंसारनिर्मुक्तो ब्रह्मण्येवावतिष्ठते ॥ ३१० ॥

मेरी मायाद्वारा नित्य सूक्ष्म तमोगुणसे घिरे हुए प्राणी (इस) घोर संसारसागरमें बार-बार जन्म लेते हैं। राजन्! जन्मरूपी बन्धनकी निवृत्तिके लिये अनन्य भक्ति एवं सम्यक् ज्ञानके द्वारा उस ब्रह्मका अन्वेषण करना चाहिये। (राजन्! जो) अहंकार, मात्सर्य, काम, क्रोध, संग्रहकी प्रवृत्ति तथा अधर्माचरणमें रुचिका सर्वथा परित्याग कर अनासक्तभावमें स्थित रहते हैं और सभी प्राणियोंमें अपनेको एवं सभी प्राणियोंको अपनी अन्तरात्मामें स्थित देखते हैं, वे आत्माद्वारा अन्तरात्माका साक्षात्कार कर ब्रह्मको प्राप्त करनेके योग्य बन जाते हैं। सभी प्राणियोंको अभय प्रदान करनेवाले तथा प्रसन्न मनवाले ब्रह्ममें एकीभावसे स्थित, अनन्यगामिनी परम ईश्वरभक्तिको प्राप्त कर लेते हैं। वे उस ऐश्वर्ययुक्त निष्कल ब्रह्मतत्त्वका साक्षात् करते हैं और समस्त संसारसे अनासक्त होते हुए एकमात्र ब्रह्ममें ही प्रतिष्ठित हो जाते हैं॥ ३०५-३१०॥